Wednesday, March 12, 2025

साहित्य चिंतन में सौंदर्य की अवधारणा

साहित्य चिंतन में सौंदर्य की अवधारणा प्रोफे0 राकेश नारायण द्विवेदी ​सौंदर्य की अवधारणा मानव चिंतन की मूल धाराओं में से एक है। सौंदर्य मनुष्य के केंद्र में प्रारंभ से ही रहा है। सौंदर्य के प्रति आकर्षण उसका जन्मजात स्वभाव है। सौंदर्य मनुष्य का स्वभाविक और अन्वेषणीय मर्म है। सौंदर्य का उद्घाटन करना उसके जीवन का ध्येय है। सौंदर्य वस्तुतः वह तत्व है, जिसके सहारे हम ब्रह्म तत्व तक पहुंच जाते हैं। बिना सौंदर्य का मूल ग्रहण किए हुए हम धार्मिक नहीं हो सकते। धर्म व्यक्ति की स्वाभाविक स्फुरणा है। मनुष्य के स्वाभाविक जीवन का नाम धर्म है। किंतु स्वभाव क्या है बिना इसे जाने व्यक्ति धर्म के मर्म को नहीं जान सकता। यह स्वभाव तत्व सौंदर्य हीह ै। ​सौंदर्य पर भारतीय चिंतक अलग-अलग तरह से समय-समय पर विचार करते आए हैं। वस्तुतः मनुष्य सौंदर्य का इतना आग्रही है िकवह उसे बिना पाए नहीं रह सकता। वह उसका आनंद है, मनुष्य आनंद में रहकर आता है, आनंद में रहता है और आनंद में ही विलीन हो जाता है। सौंदर्य से बाहर कोई सत्ता नहीं, जो कुछ दृश्यमान है, वह इस सौंदर्य के घटक हैं। विचारकों की उत्कंठा सौंदर्य की अवधारणा को जानने की रहा करती है। साहित्य का उद्देश्य भी सौंदर्य का उद्धाटन करना है। सौंदर्य का एक निकट समानार्थी रस है। रस ही भारतीय साहित्य के चिंतन की आत्मा है। ​रस क्या है! सौंदर्य ही तो। जब हमारी सहज भावनाएं उद्भूत होती हैं, जिनसे सामाजिक के कोमल हृदय में एक प्रकार की आनंदानुभूति होने लगती है, इसे ही तो रस कहा गया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस दशा को साधारणीकरण की दशा कहते हैं। रस की न उत्पत्ति होती है, न अनुमिति होती है और न भुक्ति ही। काश्मीर के शैव आचार्य अभिनवगुप्त ने पहली बार यह माना कि रस की तो मात्र अभिव्यक्ति होती है। सब जगह बस हो रहा है, इस हुब्बपन को देखने वाला ही तो रस है। मुंडक एवं श्वेताश्वतर उपनिषदों में आए एक रूपक के माध्यम से यह बात भलीभांति समझी जा सकती है- ​द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। ​तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।। आशय यह कि दो सुंदर पंखों वाले पक्षी, जो एक दूसरे के निकट मित्र हैं, एक ही पेड़ से लटकते हैं। इनमें से एक पक्षी पेड़ के मीठे फल खाता है, जबकि दूसरी पक्षी मा़त्र अपने मित्र पक्षी को देखता है। इस रूपक में भले फल खाने वाले पक्षी को हम प्रथम दृष्टया कहेगे कि रस का उपभोग करने वाला पक्षी ही रसोपभोग कर रहा है, परंतु वास्तविकता यह है कि उस रस का दर्शन करने वाला अपर पक्षी ही रसग्राही है। खाने वाले पक्षी को उसकी रसनेंद्रिय को अच्छी अनुभूति हो रही है और उसका उदर पोषण हो रहा है, परंतु यह सब देखने वाला पक्षी रस की उद्भावना अपने भीतर कर रहा है। दोनों पक्षियों का नाम, काम और स्वभाव लगभग एक जैसा है, किंतु इनमें भिन्नता यह है कि एक एकदेशीय है और दूसरा सर्वव्यापी। एक मात्र भोक्ता और दूसरा उसका साक्षी। दोनों एक होते हुए भी विलक्षणता उस रस की यानि सौंदर्य की हीह ै। जिसका रूप निरंतर बदलता रहे, उस शक्ति का नाम वृक्ष है। देखने वाला पक्षी समान वृक्ष पर होते हुए भी अलग दशा में निवास करता है। सौंदर्य की हीह म प्रार्थना करते हैं। सबसे अच्छे गीत प्रार्थना गीत ही होते हैं। प्रार्थना में सौंदर्य भर-भर के छलकता है। भारतीय चिंतन की आरंभिक प्रार्थनाएं वेदों के रूप में हमारे सम्मुख आती हैं। वेदोें में प्रार्थना का सौंदर्य सर्वत्र विकीर्णित हो रहा है। भारत का समूचा साहित्यिक वाड़मय वेदों का विस्तार हीह ै। सुंदर विशेषण का संज्ञा पद सौंदर्य है। संज्ञा में विशेषण उपस्थित रहता है। सुंदरता की प्रतीति हमारे आंतरिक आकाश को फैलाव देती है, उसे व्यापक बनाती है। सुंदरता हमें अनंत से जोड़ने का माध्यम बनती है। दृश्यमान जगत् ब्रह्म का सौंदर्य ही है, जो अनंत रूपों और उनके नामों में अभिव्यक्त हो रहा है। हम उस सौंदर्य का विविध प्रकार से गान करते हैं, तरह-तरत से सम्मान करते हैं और भांति-भांति से अनुपान करते हैं। उसका आस्वाद लेते हैं। पूजा और उपासना उस सौंदर्य का गौरव-गान है। पूजा करना सौंदर्य का उपस्थापन है। पूजा का अर्थ ह ैपूर्ण जागरण। सौंदर्य जागरूकता के बिना उद्घाटित नहीं होता। सौंदर्य सत्य है, ज बवह हमारे भीतर कौंधता है तो स्पष्ट हो जाता है कि हमें इसी की इच्छा थी। वस्तुतः सौंदर्य के अन्वेषण की मूल प्रेरक इच्छा ही है। सौंदर्य अखंड है, निस्सीम है, परंतु जब उसकी प्रतीति होती है तो वह खंड-खंड, क्षण-क्षण एवुं सीमाओं में विभाजित होता हुआ प्रकट होता है। संसार और उसकी विविध कलाएं और साहित्य खंड सौंदर्य ही हैं। यहां यह भी कहना आवश्यक है कि वस्तुतः सौंदर्य खंड-खंड दिखता हुआ भी अखंड और संपूर्ण है। पूर्ण परमात्मा से पूर्ण ही व्यक्त होता है और वह पूर्ण में ही विलीन होता है। व्यक्ति जहां से जो कुछ जान रहा हो, वहां से ह ीवह सौंदर्य को प्राप्त कर सकता है, क्योंकि वह सर्वत्र है और सार्वकालिक है। सौंदर्य वर्तमान है, वह अतीत और भविष्य नहीं है। अतीत स्मृति का सौंदर्य है और भविष्य कल्पना का। ​सौंदर्य को यदि किसी नियम और व्यवस्था से आबद्ध करेंगे तो वह खंडित हो जाएगा। उस पर कोई यदि अपना अधिकार जमाना चाहेगा तो वह तिरोहित हो जाएगा। वह तो एक नन्हें शिशु की भांति है। सौंदर्य का ेपाने के लिए धनी-मानी होना आवश्यक नहीं, वह तो एक प्रकाश है, जिसकी आभा मे ंहम सब स्नात हो रहे हैं। जब हमारा प्रेम इतना घनीभूत हो जाए, जैसा अनुराग हमें अपने शरीर के साथे हैं। अप्रतिबंधित, अनन्य और दृढ़ भक्ति का जब उदय होता है तो सौंदर्य का उद्घाटन वैसे ही हो जाता है, जैसे हिमाच्छादित पर्वत पर सूर्य की प्रथम रश्मि का आगमन होता है। देखने से, सुनने से, छूने से, आस्वादन से और घ्राण करने से सौंदर्य खंडित होकर हमारे सामने आता है, किंतु विडंबना देखें कि हमें इन्हीं इंद्रियों के माध्यम से उसकी प्रतीति होती है। अंतःकरण के अवलंब से सौंदर्य इंद्रियों द्वारा प्रकट होता है। इंद्रिय इंद्र से बना है, इंद्र का अर्थ है झांकना। इंद्र इंदियों के स्वामी हैं, क्यांेकि वे सौंदर्य का प्रथम अवगाहन करते हैं। ​व्यक्ति के जीवन का लगभग 80 प्रतिशत कार्य व्यापार आंखांे से चलता है, इसलिए हम समझते हैं सौंदर्य बाहर हीह ै, किंतु केवल आंखें ही सौंदर्य की संवाहक नहीं होती, अंधकार में स्पर्श और अव्यक्त दशा में अवचेतन के सौंदर्य की प्रतीति अंतःकरण के माध्यम से होती है। यदि कहा जाए यह फुल सुंदर है, इसका आशय है कि वास्तव में जो मैं बताना चाहता हूं वह यह कि मैं उस प्रकार का व्यक्ति हूं जिसे यह फूल इस समय सुंदर दिख रहा है। किसी को यह फूल उक्त व्यक्ति की भांति सुंदर नहीं भी लग सकता है तो बहुतों का उस पर ध्यान भी नहीं जा रहा होता है। यदि सबको कोई व्यक्ति या वस्तु संुदर लग भी रही है तो उसकी प्रतीति हर व्यक्ति या उद्भावक को पृथक्-पृथक् ही हो रही होगी। किंतु यह प्रतीति पृथक-पृथक् होकर भी थोक में अर्थात् संपूर्ण होती है। किसी को वह फूल जब सुंदर लगा, आवश्यक नहीं कि उसे आने वाले समय में भी वह फूल सुंदर लगेगा। फूल के रूप में परिवर्तन आने पर व्यक्ति की दृष्टि समान रहने पर भी उसका भाव परिवर्तित हो जाता है। हमारी ही जवानी एक समय हमें सुंदर लगती है और जब यह बुढ़ापे में परिवर्तित हो जाती है तो कुरूप लगने लगती है। ​तो सौंदर्य विषयगत है या वस्तुगत! क्या यह हमारी निजी या आंतरिक भावना है या फिर वस्तुओं का वास्तविक रूप! वे क्या हैं, सौंदर्य का आश्रय हमारे मन की संवेदनाएं और छायाएं हैं। ​निर्णायक बुद्धि को किनारे रखकर फूल को और स्वयं को अलग-अलग रखकर देखें। फूल की सुंदरता और कुरूपता या आपेक्षिक सुंदरता के प्रति कोई धारणा न रखें। समग्र अस्तित्व के साथ एकतान होते चले जाने पर हम ब्रह्मांडीय चेतना से लयबद्ध हो जाते हैं। हमारे हृदय की धड़कन और ब्रह्मांडीय धड़कन एक साथ लयबद्ध हो जाने पर कुरूपता या असत् वृत्ति से हम ऊपर उठ जाते हैं। इसी दशा में पहुंचकर हमारे ऋषियों ने वाड़मय का सृजन किया है। विभिन्न कलाओं को मूर्तिमान किया है, संगीत के विविध राम और रागिनियों में निबद्ध करते हुए पदों को गाया है। साहित्यकारों ने ऊंची कृतियों और कविताओं की रचना की है। व्यक्ति के इस प्रकार रहने पर उसके शारीरिक कर्म भी उन्नत हो जाते हैं। इस दशा में रहते हुए व्यक्ति की रचनाशीलता से व्यक्ति स्वयं, उसका परिवेश और राष्ट्र का उत्थान होता है। ​साहित्य सौंदर्य की अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण एवं सशक्त माध्यम है। साहित्य के माध्यम से रचनाकार सौंदर्य के क्षणों को इस प्रकार शब्दबद्ध करता है कि उसके पाठक उसका आस्वाद लिए बिना नहीं रहते। साहित्य वह माध्यम है, जिसमें सौंदर्य के बाहरी और भीतरी स्वरूप की अनंत संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। बाह्य यानि जागतिक सौंदर्य वास्तविक सौंदर्य तक पहुंचने का उपस्कारक है। जागतिक सौंदर्य अभिव्यक्ति का सौंदर्य है। अभिव्यक्ति ही तो सौंदर्य की संवाहिका है। बाह्य सौंदर्य के कतिपय साहित्यिक उदाहरण वर्ण्य आलेख के अंतर्गत यहां समाहित किए जाने हेतु अनुपयुक्त नहीं होंगे। ​कविवर बिहारी ने नायिका के सौंदर्य को शब्द और उनके अर्थ से जोड़ा है कि जैसे शब्दों से उनके अर्थ का प्रकाश फैलता है, नायिका का आंगिक सौंदर्य भी छिपाते हुए भी छिप नहीं पा रहा है। ऐसा भी नहीं कि शब्द अपने अर्थ को प्रकट न करना चाहते हों, अन्यथा वह अभिव्यक्त ही क्यों होगे। ​दुरत न कुच बिन कंचुकी चुपरी सारी सेत। ​कवि आंकनु के अरथ लौं प्रगटि दिखाई देत।। ​भारतीय साहित्य में सौंदर्य को एक सिद्धांत समझकर विषय प्रवर्तन नहीं किया गया है, किंतु उसके मूल तत्व पर गहन चिंतन अवश्य किया गया है। ​भारतीय काव्यशास्त्र को सौंदर्यशास्त्र का अग्रदूत कहा जा सकता है। काव्य की आत्मा क्या है अर्थात् उसका सौंदर्य क्या है, जिससे उसकी ओर लोग खिंचे चले जाते हैं। उसमें ऐसा क्या है कि पढ़ने-समझने के बाद उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। इस पर विचार करने के लिए भारतीय काव्य शास्त्र अलग-अलग कालक्रमिक संप्रदाय लेकर हमारे सामने आता है। रस, ध्वनि, अलंकार, रीति-गुण, वक्रोक्ति एवं औचित्य यह संप्रदाय काव्य की आत्मा पर जैसे कि उनके नाम हैं, उन्हें केंद्र में रखकर अपनी स्थापना देते हैं। सौंदर्य शब्द का काव्यशास़्त्रीय प्रयोग सर्वप्रथम आचार्य भामह ने अपने काव्यशास्त्र में किया। उन्होंने कहा- ​सौंदर्यमलंकारः। अर्थात् अलंकार किसी रचना के सौंदर्य का हेतु हैं। पंडितराज जगन्नाथ कहते हैं- ​रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्। अर्थात् सुंदर अर्थ के प्रतिपादक शब्दों से मिलकर काव्य बनता है। ​संस्कृत साहित्य के आचार्य माघ अपने शिशुपाल बध नामक महाकाव्य में लिखते है- ​क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः अर्थात् क्षण-क्षण में जो नवता होती है, वही रमणीयता है। यानि यह कभी फीका नहीं पड़ता। ​आधुनिक भारतीय चिंतकों ने सौंदर्य के अनुद्घाटित पक्षों को और उद्घाटित पक्षों को नए संदर्भ मेें व्यक्त किया है। रवींद्रनाथ ठाकुर का मत है कि उपयोगिता के बिना भी जो हमें आनंद मिलता है, उसे सौंदर्य की भावना कहा जाता है। ​डॉ नगेंद्र ने कहा है कि भारतीय सौंदर्य अद्वंद्व एवं सामरस्य का दर्शन है। अभिव्यक्ति के स्तर पर यह सौंदर्य है और अनुभूति के स्तर पर आनंद है। ​संसार का रहस्य और अनंतता का ज्ञान प्राप्त होने के बाद व्यक्तिगत सूख-दुःख, माया-मोह, सफलता-विफलता आदि सब तुच्छ लगता है। जीवन में विराट दृष्टि संपन्न होने पर मोह दूर हो जाता है, आंखें उज्ज्वल और तेजयुक्त, गति में वीरता और हृदय में एक अद्भुद प्रसाद का आविर्भाव होता है। महाभारत में इस गंभीर अनुभव को शांति कहा गया है। इस अनुभव को प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति संघर्ष करता है, परंतु उसके परिणाम से अप्रभावित रहता है। जीवन को वह एक प्रेममय संघर्ष में रूपांतरित कर लेता है। ​एक सौंदर्य ग्राही व्यक्ति के लिए दुःख या कुरूपता पापों या दुष्कर्म का परिणाम नहीं होता। वह समझ जाता है कि वास्तव में दुःख निवृत्ति तो कभी किसी तत्वज्ञानी की संगत का परिणाम है, व्यक्ति का मन बिना दुःख पाए भागता ही नहीं है। कुरूपता बिना सौंदर्य दर्शन के ज्ञात कैसे हो सकती है। इसका आशय यह नहीं कि हमें कुरूपता या जागतिक समस्याओं से पार जाने की आवश्यकता नहीं है। हम यथास्थितिवादी होकर नहीं रह सकते। शरीर की प्रकृति ही ऐसी नहीं है। जहाज हमेशा किनारे पर सुरक्षित रहता है, किंतु वह इसके लिए नहीं बनाया गया है। हृदय और आंखें अपने शरीर में सुरक्षित स्थानों पर और सुरक्षा साधनों के साथ स्थित हैं, किंतु वे निश्चेष्ट होने के लिए नहीं रखे गए हैं। आयासपूर्वक हमें निठल्ले होकर तो कदापि नहीं बैठना चाहिए। ​सौंदर्य को उपलब्ध किसी व्यक्ति में प्रेम और करुणा छलकने लगेगी। उसे किसी अन्य से शिकायत नहीं रह जाएगी, अपितु उसके संसर्ग में जो आएगा, उसे ही अपूर्व शांति का अनुभव होने लगेगा। ​समकालीन साहित्यकार बाबुषा कोहली कहती है- यदि वह तुम्हें बेहतर, सुंदर और सरल नही ंकर रहा है तो चाहे जो हो, वह प्रेम नहीं है। ​बाबुषा एक कविता में गाती हैं- ​जीत की चाहना से लथपथ इस संसार में ​एक सुंदर दृश्य की तरह उगता ह ैहारा हुआ पुरुष ​जैसे पथरीली जमीन पर बिना किसी तैयारी के उग आता ​कोई हरा बिरवा। यह हरा बिरवा बनने के लिए हमें हारना तो पडे़गा। बुंदेली भाषा मे ंतो हार उस जंगल को भी कहते हैं, जिसमें जानवर चरते हैं और जहां किसान अपने खेत जोतते हैं। ​एक और समकालीन रचनाकार निरंजन श्रोत्रिय की सौंदर्य शीर्षक कविता की पंक्तियां हैं- ​आज मैंने मोर के बदसूरत पैर देखे ​और खुश हुआ ​इन्हीं पैरों पर सवार हो आएगी बरसात ​............ ​आज मैंने सौंदर्य को उलट-पलट कर देखा ​और खुश हुआ। ​​​​-ध्यानमंगलम्, सिल्वर सिटी, कैलगुवां रोड, ललितपुर - उ0प्र0-284403 मोबाइल 9236114604

Sunday, November 17, 2024

सितंबर २२

६/९/२२ शिशु गर्भस्थ हो, वह ईश्वरीय अवस्था है। फिर तो क्रमशः तम राज और सत्व गुण में उसका विकास होता है। पुनः गर्भस्थ आनंद में लौटना घर की ओर जाना है। ८/९/२२ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ Forsaking all other dharmas (duties), remember Me alone; I will free thee from all sins (accruing from nonperformance of those lesser duties). Do not grieve! A PROSAIC INTERPRETATION OF THIS COUNSEL unequivocally advises the deeply devoted Arjuna, and all true renunciants, to relinquish worldly duties entirely in order to be single-pointedly with God. “O Arjuna, forsake all lesser duties to fulfill the highest duty: find your lost home, your eternal shelter, in Me! Remember, no duty can be performed by you without powers borrowed from Me, for I am the Maker and Sustainer of your life. More important than your engagement with other duties is your engagement with Me; because at any time I can recall you from this earth, canceling all your duties and actions. THE WORD DHARMA, DUTY, comes from the Sanskrit root dhri, “to hold (anything).” The universe exists because it is held together by the will of God manifesting as the immutable cosmic principles of creation. Therefore He is the real Dharma. Without God no creature can exist. The highest dharma or duty of every human being is to find out, by realization, that he is sustained by God. Dharma,therefore, is the cosmic law that runs the mechanism of the universe; and after accomplishing the primary God-uniting yogadharma (religious duties), man should perform secondarily his duties to the cosmic laws of nature. As an air-breathing creature, he should not foolishly drown himself by jumping into the water and trying to breathe there; he should observe rational conduct in all ways, obeying the natural laws of living in an environment where air, sunshine, and proper food are plentiful. Man should perform virtuous dharma, for by obedience to righteous duty he can free himself from the law of cause and effect gov. erning all actions. He should avoid irreligion (adharma) which takes him away from God, and follow religion (Sanatana Dharma), by which he finds Him. Man should observe the religious duties (yoga-dharma) enjoined in the true scriptures of the world. Sri Paramahansa Yogananda, 18/66, God talks with Arjuna, The Bhagavad Gita. ९/८/२२ ŚRIMAD BHAGVATAM 10.14.58 समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवंमहत्पदं पुण्ययशो मुरारे: ।भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदंपदं पदं यद् विपदां न तेषाम् ॥ For those who have accepted the boat of the lotus feet of the Lord, who is the shelter of the cosmic manifestation and is famous as Murāri, the enemy of the Mura demon, the ocean of the material world is like the water contained in a calf’s hoof-print. Their goal is paraṁ padam, Vaikuṇṭha, the place where there are no material miseries, not the place where there is danger at every step. कल रात ललितपुर से उरई पहुँचे। घर में बेटी पीयूषा से वार्ता हुयी। १५-२० दिन पहले ही उसने जीवन और जगत के अनेक प्रश्न मुझसे पूछे थे, पर आज स्थिति अलग थी। प्रश्न हम कर रहे थे उत्तर वह दे रही थी। ऐसे प्रश्न जिन्हें जानने समझने में जन्म जन्मांतरों की यात्रा करनी पड़ती है। उनके सारगर्भित उत्तर जानकर मुझे स्पष्ट हुआ कि उस पर गुरुदेव की अहैतुकी कृपा हुयी है। ललितपुर जाने से पहले उसे शारीरिक संचार व्यायाम बताकर गए थे और योगदा की वेब्सायट से पंजीकरण कराते हुए इसे अपने दैनन्दिन जीवन का अंग बनाने के आशय से बताए थे। बाद में उसने फ़ोन से योगदा के पाठों को पढ़ने में रुचि प्रकट की। उसका पाठमाला का रेजिस्ट्रेशन दो वर्ष पूर्व से ही है। उससे अनेक प्रकार के प्रश्नो ke उत्तर पाकर क्रिया लेशन पढ़ने का निर्देश भी कर दिया। अपने जवाबों में बार बार गुरुजी का नाम ले रही थी। कहती हमें गुरुजी मार्ग दिखाते हैं। महावतार बाबाजी के दर्शन हुए हैं। यह सब केवल पढ़ने से उपलब्ध हुआ नहीं जान पड़ता। अगर पढ़ने से भी है तो काम का ही है। काम ऊर्जा यानि लस्ट पर भी उसने क्या अद्भुत बातें की कि आत्मानंद के आगे उसका आनंद कुछ नहीं है।यह तो मात्र शरीर के तल का आनंद है। ईश्वर, माया, अन्य व्यक्तियों से संबंध, क्रोध, मोह, मोक्ष, दूसरों के द्वारा किए अपमान पर उसने सिद्ध महात्माओं की तरह बातें की. पिछले जन्म की बात की कि वह विगत जन्म में बहुत अमीर थी। गुरुदेव उसे अपनी शरण में लें, आप आशीर्वाद बनाए रखें। १०/८/२२ सफलता का अर्थ है अपने दिव्य स्वरूप अर्थात् आत्मा के अंतर्जात गुणों को अभिव्यक्त करना। स्वामी चिदानंद ईश्वर वह आनंद है, जिसे आप प्रत्येक वस्तु में खोज रहे हैं। स्वयं अपनी चेतना का शासक होना यथार्थ राजत्व है। प्रसन्नता इस बात पर अत्यधिक निर्भर करती है कि आप अपनी असफलताओं के पश्चात् कितने अच्छे ढंग से पुनः सामान्य अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर के लिए किया गया कार्य पूजा है। दीक्ष का अर्थ स्वयं को समर्पित करना है। मुझे इसकी चिंता नहीं है कि ईश्वर हमारे पक्ष में है या नहीं, मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या हम ईश्वर के पक्ष में हैं, क्योंकि ईश्वर सदा सही होते हैं। अच्छाई और बुराई को पृथक करने वाली रेखा अवस्थाओं, वर्गों अटगी राजनैतिक दलों के बीच से नहीं अपितु मानव हृदय के मध्य से होकर गुजरती है। विनम्रत का अर्थ है स्वयं को निरंतर दूसरों से अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने की आवश्यकता से मुक्ति, किंतु अहंकार एक छोटी- आत्मकेंद्रित, प्रतिस्पर्धात्मक और प्रतिष्ठा पिपासु- परिधि में एक हिंसक भूख है। आत्मसम्मान बाह्य विजय से नहीं, अपितु आंतरिक विजय से उत्पन्न होता है। स्वतं अपनी दुर्बलता के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए विनम्रत सबसे महान गुण होता है। विनम्रता आपको स्मरण कराती है कि आप ब्रह्मांड के केंद्र नहीं अपितु आप एक उससे भी बड़ी व्यवस्था के लिए कार्य कर रहे हैं। संघर्ष के मार्ग का आकार होता आगे बढ़ो- पीछे जाओ- आगे बढ़ो। u के आकार की भाँति। लड़खड़ाने में जीवन का सौंदर्य और अर्थ छिपा रहता है। विनम्रत से अपने आप को समझने की क्षमता उत्पन्न होती है। संभोग को रति क्रिया मात्र मानने से इसके वास्तविक अर्थ की ओर ध्यान नहीं जा पाया है. संभोग सभी इंद्रियों द्वारा सम्यक रूपेण किया गया आस्वाद है, कब्जा या अधिग्रहण नहीं। संभोग में सभी तत्व समन्वित रूप में क्रियाशील होते हैं. दूसरे शब्दों में, आत्मा और परमात्मा के योग का नाम संभोग है। ११/८/२२ सुरति समाँनी निरति मैं, निरति रही निरधार। सुरति निरति परचा भया, तब खूले स्यंभ दुवार॥ सुरति- निरति शब्द का अर्थ :-*सुरति* = सु + रति = सु- सुनने में, रति- लगे हुए । *निरति* = नि + रति = निरखना, देखना; रति = लगे हुए । *१. सुरति* :-सुरति आत्मा की वह अवस्था है जो कि शब्द (सृष्टि में जो शब्द/रमा हुआ है) को सुनने की अवस्था को ही सुरति कहते हैं । 'सुरति' शब्द आम आदमी के लिये अपरिचित ही है । सत्संग में जब सुरति शब्द का प्रयोग प्रायः होता रहता है तो नये लोग सिर्फ़ मुंह ताकते रह जाते हैं कि आखिर यह किसके विषय में बात हो रही है....? जबकि निरति शब्द अक्सर पढने को मिल जाता है । मनुष्य की अपनी अज्ञानता के कारण उसकी सुरति 7 शून्य नीचे उतर आई है, इसीलिये मनुष्य को यह संसार अजीब और रहस्यमय दिखाई देता है...? अब सबसे पहले एक शून्य की बात करते हैं । प्रथम शून्य- यहां पर कुछ भी नहीं हैं, लेकिन बेहद अजीब बात यह है कि "इसी कुछ भी नहीं से ही है"....! सब कुछ हुआ है या कुछ नहीं ही सब कुछ है (Everything is nothing but nothing to everything)...! सतगुरु कबीर साहेब जी महाराज ने इसी विषय में कहा है कि:-*"चाह गई चिंता गई,**मनुआ बेपरवाह ।**जाको कछु न चाहिए,**वो ही शहंशाह" ।।* पहले शून्य में थोडी हलचल या थोडा प्रकंपन (vibration) होता है। दुसरे शून्य में यह प्रकंपन (vibration) कुछ अधिक हो जाता है । तीसरे शून्य में कुछ और भी अधिक हो जाता है । चौथे शून्य में यह प्रकंपन (vibration) और भी बढ़ जाता है, फिर पांचवां शुन्य और उसके बाद छटा शून्य । अब सातवें शून्य में यह प्रकंपन (vibration) शब्द रूप में यानी निरंतर होने लगा । इसी तरह के एक विशेष ध्वनि रूपी प्रकंपन (vibration) से (जिसको शास्त्रों में शब्द कहा गया है) पूरी सृष्टि का खेल चल रहा है । इसी से सूर्य, चन्द्रमा, तारे आदि गति करते रहते हैं । इसी प्रकंपन (vibration) से मनुष्य़ का शरीर बालापन, जवानी और बुढ़ापा आदि को प्राप्त होता है । इसी प्रकंपन (vibration) से आज बनी एक मजबूत बिल्डिंग निश्चित समय बाद जर्जर होकर धराशायी हो जाती है । आधुनिक विज्ञान की समस्त क्रियायें इसी प्रकंपन (vibration) पर आश्रित हैं । जैसे मोबायल फ़ोन से बात होना, वायरलेस, इंटरनेट, टी. वी. आदि के सिग्नल । हमारी आपस की बातचीत । यानी हम हाथ भी हिलाते है तो वह भी इसी vibration की वजह से हिल पाता है । इसी को चेतना या करंट भी कह सकते हैं । शुद्ध रूप में यह *र्र्र्र्र्र्र्रर्र्रर्र्रर्र्र र्र्रर्र्रर्र्* इस तरह की धुन होती है । बाद में आदि शक्ति या महामाया द्वारा इसमें *म्म्म्म्म* जोड़ दिया गया । तब यह धुन *र्म्र्म्र्म्र्म र्म्र्म्र्म्र्म* इस तरह हो गई । सरलता से समझने के लिये *रररररर* हो रही धव्नि माया से अलग हो जाती है । लेकिन जब तक *रमरमरम* ऐसी धुनि है तब तक ये माया से संयुक्त हैं । इसीलिये परमपिता परमात्मा (सतपुरुष) को सबसे बडा माना जाता है । यही 'र' और 'म' पहले स्त्री पुरुष हैं । यही असली राम (सतपुरुष) है । संत या योगी इसी राम को पाने की या जानने की लालसा करते हैं । यही आकर्षण यानी कृष्ण या श्रीकृष्ण में भी है । मेरा अनुभव ये कहता है कि यदि आदमी संसार को निसार देखता है या कामवासना, धन, ऐश्वर्य को भोग चुका है और खुद की अपनी वास्तविकता जानना चाहता है तथा उसे सतगुरु के सान्निध्य में ध्यान का थोडा पूर्व अभ्यास है तो सिर्फ़ सात दिन में इस शुन्य को जाना जा सकता है । बस शर्ते यही है कि ये सात दिन उसे एकान्त में और सतगुरु द्वारा बताई गई विधि के अनुसार अभ्यास करना होगा । इस तरह सुरति इस शब्द या अक्षर को जान लेगी और यहां पहुंचकर सुरति निरति हो जायेगी यानी सुनना बन्द करके प्रकृति के रहस्यों या माया को देखने लगेगी...? क्योंकि यहीं से जुडकर आदि शक्ति यानी पहली औरत अपना खेल कर रही है । ये नारी रूपा प्रकृति अक्षर (निरंजन) से निरंतर सम्भोग करती रहती है । ये सब महज ज्ञान की बातें नहीं हैं । सुरति शब्द योग द्वारा इसको आसानी से जाना जा सकता है । *२.निरति :-**निरति* = नि + रति = निरखना, देखना; रति = लगे हुए । निरति आत्मा की उस अवस्था को कहते हैं जिसमें वह शब्द स्वरुप/ ज्योति स्वरूप यानि परमपिता परमात्मा को निरखने/ देखने में लीन रहने लग जाए। *सुरति और निरति = "श्रुति और निऋति"।*परवर्ती हठ-योगियों की परिभाषा में अन्तर्नाद सुनना और उसी में लीन हो जाना। (अर्थात् ससीम का असीम में या व्यक्त का अव्यक्त में समा जाना। रूपाली सक्सेना ११/८/२२ कुछ लोग कहते हैं जीवित व्यक्ति के प्रति श्रद्धा रखें, सुश्रूषा करें, उन्हें तृप्त रखें, फिर मरने के बाद तर्पण करने की आवश्यकता नहीं। पुरखों की सेवा और तृप्ति की बात ग़लत नहीं है। तर्पण और श्राद्ध क्रियाओं में देखा जाता है कि ब्रह्म और अन्य देवताओं की तृप्ति सर्वप्रथम करते हैं, उनके बाद पुरखों को जोड़ते हुए हवि अर्पित की जाती है। यह सीधा प्रमाण है कि हमारी मृत्यु नहीं होती, ब्रह्म में लय होता है बस। कर्मकांड पर किसी की आपत्ति हो सकती है, पर कर्मकांड से बाहर क्या है आख़िर! आप विशेष प्रकार के कर्मकांड से परहेज़ बरतें तो भी... अपने प्रकार का कर्मकांड करेंगे ही, जो आपको अनुकूल लगे। आप अपने स्रोत को याद किए बिना, उससे जुड़े बिना नहीं रह सकते। १३/८/२२ ब नामे ऊ कि ऊ नामे नदारद ब हर नामे कि ख़्वानी सर बरारद। मौलाना रूम १५/८/२२ स्वयं का पिंडदान --- . जब यह दृढ़ अनुभूति हो जाये कि मैं यह भौतिक शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हूँ, उसी समय हमारा स्वयं का पिंडदान हो जाता है। मूलाधारस्थ कुंडलिनी -- "पिंड" है। गुरु-प्रदत्त विधि से बार-बार कुंडलिनी महाशक्ति को मूलाधार-चक्र से उठाकर सहस्त्रार में भगवान विष्णु के चरण-कमलों (विष्णुपद) में अर्पित करना यथार्थ "पिंडदान" है। इसे श्रद्धा के साथ करना "श्राद्ध" है। . लेकिन शास्त्रों के आदेशानुसार गृहस्थों का दायित्व है कि परिवार में अपने से बड़े-बूढ़ों की सेवा करे, और पितृ-पक्ष में पूरी श्रद्धा से अपने पित्तरों का श्राद्ध करे। इस विषय पर मनु महाराज और याज्ञवल्क्य ऋषि के शास्त्रों में कथन ही अंतिम प्रमाण हैं। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! कृपाशंकर मुद्गल १४ सितंबर २०२२ जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥ १७/९/२२ प्रधानता वनस्पति - जल कीड़ों मकोड़ों - वायु तथा अग्नि, उड़ने वाले कीड़ों में अग्नि और वायु, रेंगने वालों में पृथ्वी और अग्नि पशु- पृथ्वी जल अग्नि और वायु मनुष्य- सभी पाँच तत्व होते हैं। १८/९/२२ संसार मे जितने भी धर्म हैं सब के प्रवर्तक एक ही हैं । देश काल तथा अधिकारी भेद के कारण भिन्न भिन्न पथ का भेद परिलक्षित होता है । ईसाई मतानुसार अनन्त स्वर्ग एवं नरकों की स्थिति है । बौद्धगण भी ऐसा ही मानते हैं ।अब भिन्नता का वर्णन करता हूँ । बुद्धदेव जन्मांतर मानते हैं । जिन देशों में बुद्धधर्म का प्रचार हुआ है , वे सब भी जन्मांतर मानते हैं । एतद विपरीत ईसा मसीह ने जहाँ धर्म का प्रचार किया था ,वह देश इस गम्भीर तत्व को ग्रहण करने में समर्थ नहीं था । वहाँ पर तत्व को हृदयंगम करने योग्य जनमानस का उत्कर्ष नही हो सका था । अतः तत्वोपदेश देते समय श्रोता के सामर्थ्य को देखकर उतना ही उपदेश दिया गया ,जितना वहाँ का जनमानस समझ सकता था । अतएव आधारगत भिन्नता के कारण उपदेशगत भिन्नता परिलक्षित होने लगती है । शाश्वत स्वर्ग एवं नरक का सिद्धांत जिसे ईसाई गण स्वीकार करते हैं ,वह बौद्धधर्म का ही सिद्धांत है । महापथ पृष्ठ 70 २०/९/२२ बैखरी, जिसे जिह्वा और होंठों द्वारा बोला जाता है मध्यमा गले में चुपचाप उच्चारण किया जाता है पश्यंती मन ही मन (हृदय में) जाप किया जाता है परा जिसे योगी नाभि से हिपोर उठाकर उत्पन्न करते हैं। सुरत यानि आत्मा की शक्ति निरत अंतर में देखने की शक्ति जब तक निरत अर्थात् आत्मा की देखने की शक्ति जागृत नहीं होती, आत्मा अंतर में ऊपर नहीं चढ़ती। आत्मा की दोनों शक्तियों सुरत और निरत की सहायता के बिना आध्यात्मिक उन्नति सम्भव नहीं। सुनने पर बल देने की अपेक्षा अंतर में देखने शक्ति प्रबल है। निरत सबल होगी तभी शब्द भी साफ़ सुनाई देगा। पहला बंधन शरीर का दूसरा स्त्री का फिर संतान चौथा पोते पोतियों पाँचवाँ पड़पोते पड़पोतियों छठा धन संपत्ति सत्व अहंकार अपनी सदाचारिता के मान का आठवाँ रीति रिवाज और कर्मकांड का होता है २१/९/२२ अंजन माहिं निरंजन भेट्या, तिल मुप भेट्या तेलं । मुरति माहिं अमरति परस्या, भया निरतरि घेलं । गोरखबानी २३/९/२२ सच जानने वाले व्यक्ति के समक्ष झूठ का कार्य व्यापार करने वाले कितने निरीह और बेचारे जान पड़ते हैं। ज्ञानी और प्रेमी के आगे मूर्ख और ईर्ष्यालु व्यक्ति कितने असहाय दिखते हैं। इन सबके प्रति करुणा भाव उदित होना ही साक्षात्कार है, बोध है। Man is the expression of God and God is the reality of man. २४/९/२२ कर लूंगा जमा दौलत ओ ज़र उस के बाद क्या कर लूंगा जमा दौलत-ओ-ज़र उस के बाद क्या ले लूँगा शानदार सा घर उस के बाद क्या (ज़र = धन-दौलत, रुपया-पैसा) मय की तलब जो होगी तो बन जाऊँगा मैं रिन्द कर लूंगा मयकदों का सफ़र उस के बाद क्या (रिन्द = शराबी) होगा जो शौक़ हुस्न से राज़-ओ-नियाज़ का कर लूंगा गेसुओं में सहर उस के बाद क्या (राज़-ओ-नियाज़ = राज़ की बातें, परिचय, मुलाक़ात), (गेसुओं =ज़ुल्फ़ें, बाल), (सहर = सुबह) शे'र-ओ-सुख़न की ख़ूब सजाऊँगा महफ़िलें दुनिया में होगा नाम मगर उस के बाद क्या (शे'र-ओ-सुख़न = काव्य, Poetry) मौज आएगी तो सारे जहाँ की करूँगा सैर वापस वही पुराना नगर उस के बाद क्या इक रोज़ मौत ज़ीस्त का दर खटखटाएगी बुझ जाएगा चराग़-ए-क़मर उस के बाद क्या (ज़ीस्त = जीवन), (चराग़-ए-क़मर = चन्द्रमा का चराग़) उठी थी ख़ाक, ख़ाक से मिल जाएगी वहीं फिर उस के बाद किस को ख़बर उस के बाद क्या -ओम प्रकाश भंडारी "क़मर" जलालाबादी यह कथन भी पूरा नहीं लगता। क्योंकि अगर बोध हो गया तो उसके बाद और उसके पहले आनंद ही शेष रहता है। २७/९/२२ तुलसीदासजी ने लिखा है, 'सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी। तव प्रेरित माया उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।' काकभुशुण्डिजी ने कहा-हे गरुडज़ी सुनिए! समुद्र ने भयभीत होकर चरण पकड़कर श्रीरामजी से कहा मेरे सब अपराध क्षमा करें। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन सबकी करनी स्वभाव से जड़ है। आपकी माया से प्रेरित होकर ये सब उपयोगी बनते हैं।' जब परमात्मा हस्तक्षेप करता है तो हम इनका भरपूर फायदा उठा सकते हैं। सुरत आत्मा को कहते हैं, शब्द धुनात्मक नाम है और योग का अर्थ है जुड़ना। सुरत शब्द योग का अर्थ है आत्मा का शब्द के साथ जुड़ना। आत्मा का शब्द के प्रति सहज आकर्षण है, क्योंकि शब्द आत्मा का स्रोत है। शब्द एक आत्मिक राग है। ब्रह्मांड के छः चक्रों का प्रतिबिंब अंड में है। एंड के छः चक्रों का प्रतिबिंब पिंड में है। हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नहिं ठौर। कबीर शिवे रुश्ते गुरुस्त्राता गुरौ रुश्टे न कश्चन। ३०/९/२२ यज्ञ/हवन का वास्तविक तत्व ————————————— वैदिक दृष्टि के अनुसार अग्नि ही एक मात्र भोक्ता एवं सोम ही एकमात्र भोग्य है। कर्तृत्वाभिमान विगलित होने पर यह स्पष्ट रूप से देख सकते है कि हम कर्ता और भोक्ता दोनों ही नहीं है। कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों ही आरोपित होता है। जगत के जो एक मात्र भोक्ता है, वे सभी आधारों में रहते हुए भोग करते रहते है। इन सब आधारों के अभिमानी पुरुष अपने को व्यर्थ में ही भोक्ता समझते है। जगत के इस मूल भोक्ता को वैदिक ऋषियों ने अग्नि के रूप मे वर्णन किया है। इसी प्रकार भोग्य भी मूल रूप से एक ही वस्तु है। उसे सोम के रूप में वर्णन किया गया है। सोम का दूसरा नाम अमृत है। अतएव ये सोम अथवा अमृतकण ही जीव मात्र के लिए भोग का विषय है। सभी इसी का एकमात्र आहरण करते रहते है। इसीलिए इसे आहार या आहार्य कहा जाता है। जीव किसी भी प्रकार की खाद्य वस्तु ग्रहण करे,उसकी सार-सत्ता सोम ही है। सभी प्रकार के खाद्यों में मात्रा-भेद के अनुसार इसी सोम का अंश है। समग्र जगत इसी प्रकार अग्नि एवं सोम इन दो भागों में विभक्त है। ज्ञाता, ज्ञेय / कर्ता, कर्म जिस प्रकार संश्लिष्ट है, उसी प्रकार भोक्ता और भोग भी परस्पर संश्लिष्ट है। शिव और शक्ति के बीच जिस प्रकार नित्य सम्बन्ध स्वीकार किया गया है, ठीक उसी प्रकार भोक्ता-भोग्य के बीच भी नित्य सम्बन्ध विद्यमान है। यही यज्ञ है, यज्ञ वास्तव में नित्य सिद्ध परम भोक्ता के निकट भोग्य पदार्थ का अर्पण करने के अलावा और कुछ नहीं है। अग्नि में सोम की आहुति प्रदान करना यज्ञ का तत्व है। —जय गुरु 🙏💐🌹🌺🌺 (सनातन साधना की गुप्त धारा)

डायरी जून २२

१/६/२२ बिना पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के किसी आध्यात्मिक प्रथा में निष्ठा रखना पाखंड है. किसी प्रथा के बाह्य कर्मकांड से चिपके बिना, उसके पीछे विद्यमान सत्य में निष्ठा का होना विवेक है। परंतु आध्यात्मिक प्रथा, सिद्धांत, गुरु, इनमे से किसी के भी प्रति निष्ठा न होना आध्यात्मिक पतन है. ईश्वर और उनके दूत का साथ न छोड़िए, तब आप प्रत्येक वस्तु में उनके हाथ को कार्यरत देखेंगे. योगदा सत्संग पत्रिका. १७ मई आध्यात्मिक दैनंदिनी 2/6/22 स्त्री के गर्भ में आने के बाद शैशव, यौवन और वृद्धावस्था से होते हुए हिरण्यगर्भ में पहुँचने की यात्रा का नाम अध्यात्म है. हिरण्यगर्भ में पहुँचने के बाद वापस नहीं आना एक योगी का लक्ष्य होता है. जिस प्रकार एक शिशु माता के वक्ष से लिपटकर दूध पीते हुए आनंद लेता है, एक आध्यात्मिक या आत्मदर्शी व्यक्ति उसी आनंद से पूरे जीवन रहा करता है. तत त्वं असि! ऋषि उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद: छान्दोग्योपनिषद् की एक कथा है। बात उस समय की है जब धोम्य ऋषि के शिष्य आरुणी उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करके अपने घर आया। एक दिन पिता आरुणी उद्दालक ने श्वेतकेतु से पूछा, “श्वेतकेतु! अभी और वेदाभ्यास करने की इच्छा है या विवाह?” पिता की यह बात सुनकर श्वेतकेतु बड़े गर्व से बोला, “एक बार राजा जनक की सभा को जीत लूँ, उसके बाद जैसा आप उचित समझे।” अपने पुत्र के मुँह से ऐसे अहंकार से युक्त वचन सुनकर ऋषि उद्दालक सहम से गए। वह बिना कुछ कहे वहाँ से उठकर चल दिए। श्वेतकेतु अपनी ही मस्ती में घर से निकल गया। तब श्वेतकेतु की माँ ने ऋषि उद्दालक का चेहरा पढ़ लिया और पूछा, “आप ऐसे सहमे हुए से क्यों हैं?” तब व्यथित होते हुए ऋषि उद्दालक बोले, “श्वेतकेतु की राजा जनक की सभा को जीतने की लालसा ही बता रही है कि उसने वेदों के मर्म को नहीं समझा। वह केवल शाब्दिक शिक्षाओं का बोझा ढोकर आया है। वह जब घर आए तो उसे मेरे पास भेजना।” इतना कहकर ऋषि उद्दालक अपने अध्ययन कक्ष की ओर चल दिए। जब श्वेतकेतु घर आया तो उसकी माँ ने उसे पिता के पास जाने के लिए कहा। पिता के पास जाकर श्वेतकेतु बोला, “तात! आपने मुझे बुलाया?” ऋषि उद्दालक बोले, “हाँ! बैठो! इतना कहकर वह अपना काम करने लगे।” श्वेतकेतु से धैर्य नहीं रखा गया अतः वह बोला, “तात! आपने मुझे क्यों बुलाया?” तब ऋषि उद्दालक बोले, “श्वेतकेतु! मुझे नहीं लगता कि तुमने वेदों का मर्म समझा है! क्या तुम उसे जानते हो, जिसे जानने से, जो सुना न गया हो, वो सुनाई देने लगता है। जिसका चिंतन नहीं किया गया हो, वो चिंतनीय बन जाता है। जो अज्ञात है, वो ज्ञात हो जाता है।” तब श्वेतकेतु बोला, “तात! मेरे महान आचार्यों ने मुझे इसकी शिक्षा नहीं दी। यदि वे जानते होते तो उन्होंने मुझे इसकी शिक्षा अवश्य दी होती। अतः आप ही मुझे इस बारे में बताएँ?” यह सुनकर तथा श्वेतकेतु की जिज्ञासा को जानकर ऋषि उद्दालक श्वेतकेतु को घर से बाहर ले गए। ऋषि आरुणि उद्दालक श्वेतकेतु को लेकर एक पेड़ के नीचे बैठ गए और कुछ मिट्टी उठाते हुए बोले, “श्वेतकेतु! जिस तरह जब तुम मिट्टी को जान लेते हो, तब तुम मिट्टी से बने सभी बर्तनों को जान लेते हो कि वह भी मिट्टी स्वरूप ही है। जब तुम स्वर्ण को जान लेते हो, तब तुम स्वर्ण से बने सभी स्वर्णाभूषणों को जान लेते हो। उसी तरह अब तुम ही बताओ? क्या है वह मूलभूत तत्व, जिसको जान लेने से तुम सबको जान लेते हो, जिससे यह सम्पूर्ण जगत बना है।” जिज्ञासु दृष्टि से श्वेतकेतु बोला, “मैं नहीं जानता! तात।” तब आरुणि उद्दालक बोले, “वह सर्वोच्च सत्य सत् है, अस्तित्व है, चेतना है। इसी चेतना से नाम और रूप के सारे संसार ने जन्म लिया है। जैसे स्वर्ण ही स्वर्णाभूषण है, मिट्टी ही मिट्टी का घड़ा है। वैसे ही चेतना या अस्तित्व ही सबकुछ है। इसलिए तुम वही सत् चेतना हो। तत त्वं असि = तत्वमसि।” तत्वमसि यह एक महावाक्य है जो यह घोषणा करता है कि “तुम वो ही हो, जो तुम खोज रहे हो।” यह साधक और साध्य के एक्य को दर्शाता है। इसी महावाक्य के माध्यम से आचार्य अपने शिष्य को उपदेश करता है, “वह तुम ही हो जो तुम खोज रहे हो!” श्वेतकेतु की ब्रह्म जिज्ञासा को देखकर आचार्य उद्दालक उसे फूलों के एक बगीचे में ले गए और बोले, “यहाँ विभिन्न फूलों से शहद इकठ्ठा कर रही मधुमखियों को देख रहे हो श्वेतकेतु?” श्वेतकेतु, “हाँ! तात।” आचार्य उद्दालक, “छत्ते में मिलने के बाद क्या वो शहद कह सकता है कि मैं उस फूल का हूँ और मैं उस फूल का हूँ?” श्वेतकेतु, “नहीं तात!” आचार्य उद्दालक, “ उसी तरह जब कोई व्यक्ति उस शुद्ध चेतना के साथ एक हो जाता है तो उसकी व्यक्तिगत पहचान खत्म हो जाती है। ठीक उसी तरह जैसे सागर में मिलने के बाद नदियाँ अपना अस्तित्व खो देती हैं। वह चेतना ही है जो सबको जोड़ती है। जिससे तुम, मैं और यह सब चराचर जगत बना है।” तब श्वेतकेतु बोला, “लेकिन तात! एक सत या चेतना से ही विविधता से भरे इस जगत की उत्पत्ति कैसे हुई?” आचार्य उद्दाक बोले, “जाओ! कहीं से बरगद के वृक्ष का फल लेके आओ।” श्वेतकेतु फल लाता है तो आचार्य उद्दालक उसे तोड़ने को कहते हैं और पूछते हैं कि इसमें क्या है? श्वेतकेतु कहता है, “इसमें बहुत सारे छोटे-छोटे बीज हैं।” तब आचार्य उद्दालक बोलते हैं, “इसके किसी एक बीज को तोड़के देखो, उसमें क्या है?” जब श्वेतकेतु ने छोटे से बीज को तोड़के देखा तो बोला, “यह इतना सूक्ष्म है कि इसे देख पाना संभव नहीं! तात।” तब आचार्य उद्दालक बोले, "यह सूक्ष्म बीज, जिसे तुम देख नहीं सकते। इसी से विशालकाय बरगद का वृक्ष अपनी विभिन्न शाखाओं और फूलों को लेकर उत्पन्न होता है। उसी तरह उस शुद्ध चेतन तत्व, (जिसे तुम देख नहीं सकते) से ही विविधता से भरा यह जगत उत्पन्न होता है।” इसके बाद आचार्य उद्दालक ने श्वेतकेतु को एक लोटे जल में नमक घोलकर लाने के लिए कहा और श्वेतकेतु से लोटे की उपरी सतह से जल पीने को कहा और पूछा, “कैसा है?” जल नमकीन था। फिर उसे लोटे के बीच का जल पीने को कहा। वो भी नमकीन था। अंत में उन्होंने उसे पैंदे का जल पीने को कहा। वो भी नमकीन था। तब आचार्य उद्दालक बोले, “जिस तरह दिखाई नहीं देते हुए भी जल की प्रत्येक बूँद में नमक है। उसी तरह दिखाई नहीं देते हुए भी सभी जगह वही चेतना विद्यमान है। वो मुझमें भी है, वही तुम हो। तत त्वं असि।” इस तरह ऋषि उद्दालक ने श्वेतकेतु को दैनिक जीवन के उदहारण लेकर “तत त्वं असि” महावाक्य की नौ बार उद्घोषणा की। जब तक कि श्वेतकेतु इसके अर्थ को हृदयंगम नहीं कर लिया। यह प्रसंग छान्दोग्योपनिषद् के छठवें अध्याय में वर्णित है। आनंदमस्तु! ऊँ तत् सत्। Tathastu प्रणाम! Sakshi Prem 10/6/22 उपनिषदों में ब्रह्म की ज्ञान शक्ति को गायत्री कहा गया है और क्रिया शक्ति को सावित्री। जड़ चेतनमय सृष्टि में ज्ञान और क्रिया दोनो की अनिवार्यता है और ब्रह्म में ही दोनो शक्तियां निहित हैं। व्रतों और त्योहारों में कहीं वेद और उपनिषदों की उक्तियाँ झांकती अवश्य हैं, रूप चाहे जितने बदल गए हों। आज वट सावित्री अमावस्या का दिन है। 10/6/21 फ़ेसबुक पोस्ट जब आप अपने हृदय में ईश्वर को अनुभव करना प्रारम्भ करेंगे, तो आप विश्व सभ्यता के प्रति इतना योगदान करेंगे, जितना किसी राजा अथवा किसी राजनीतिज्ञ ने पहले कभी नहीं किया होगा। गुरुदेव। किसी की कोई चीज पसंद नहीं है तो उसकी अवज्ञा मत करो सोचो ठाकुर ने उसे भी पैदा किया है वही उसे इस संसार मे लाया है । माँ सारदा कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥ भावार्थ ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन, समझने में कठिन और साधने में भी कठिन है। यदि घुणाक्षर न्याय से (संयोगवश) कदाचित यह ज्ञान हो भी जाए, तो फिर (उसे बचाए रखने में) अनेकों विघ्न हैं॥ कोऊ कह सत्य झूठ कह कोऊ जुगल प्रबल कोऊ माने तुलसीदास परिहरै तीनि भ्रम सो आपन पहिचाने। पैग़म्बर मोहम्मद का बड़ा सामाजिक योगदान है कि उन्होंने अपने समय के लड़ने वाले कबीलों को इकट्ठा किया. उन्हें अनुशासित किया. उनकी तपस्या से उन पर क़ुरान आयत्त हुयी. उसकी व्याख्या को लेकर उसी तरह के मतभेद हैं जैसे वेदों के विभिन्न भाष्य हुए हैं. कई व्याख्याये या भाष्य होने से क़ुरान या वेदों का महत्व तो नहीं घट जाएगा. मुश्किल उन लोगों से है जो न क़ुरान समझते हैं और न वेद ही. न समझ पाएँ, पर समझने वालों और उनके आचरण से ही सीख लें. 🙏 संसार की गति एक रेखीय नही होती. अतीत वर्तमान और भविष्य की भाँति भी नहीं और न उसका पूर्वापर क्रम निर्धारित किया जा सकता है. यह सब एक समय में ही घटित हो रहे हैं, किसे आगे और किसे पीछे कहा जा सकता है. इस समय को हम क्षण नाम देते हैं. इस क्षण में ही ईश्वर द्वारा सृष्टि, स्थिति और लय ही नहीं, पिधान और अनुग्रह भी घटित हो रहे हैं. इन सब ईश्वरीय विधानों को पृथक पृथक देखना-समझना ही बोध प्राप्त करना है. १२/६/२२ नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन। राजा भर्तृहरि ने कहा है- भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयं। शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतांताद्भयं सर्व वस्तु भयान्वितम भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयं।। अर्थात : विषयों के भोग में रोग का भय बना रहता है, कुल में आचार से भ्रष्ट होने का भय, धन-संचय में राजा द्वारा छीन लिये जाने का भय, मान-सम्मान में अपमानित होने का भय, शौर्य-वीरता में शत्रु से हार जाने का भय, शारीरिक सौंदर्य में वृद्धावस्था का भय, शास्त्रों के पांडित्य में प्रतिवादी से पराजित होने का भय, विद्या-विनय-दान-धर्म आदि सद्गुणों में दुष्टों द्वारा निंदा का भय और शरीर धारण के विषय में यम अर्थात मृत्यु का भय बना रहता है। इस प्रकार संसार में मनुष्यों के लिए सारी वस्तुएं ही भय से परिपूर्ण हैं, एकमात्र वैराग्य यानि इन सबसे अपने को समेटने की प्रक्रिया ही अभय प्रदान करने वाला है। परा और अपरा दो विद्याएँ बताई गयी हैं. स्वयं वेद अपरा विद्या हैं, पर उनमें परा विद्या भी मिलती है. सब कुछ बड़ा मिश्रित है. खोजने और पाने की पात्रता विकसित करनी होगी. ईशोपनिषद में विद्या और अविद्या को साथ साथ जानना आवश्यक कहा गया है. मुंडक उपनिषद की स्पष्ट घोषणा है... तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ मुंडक उप १/१/५ ॥ 5. Of these, the Apara is the Rig Veda, the Yajur Veda, the Sama Veda, and the Atharva Veda, the siksha, the code of rituals, grammar, nirukta, chhandas and astrology. Then the para is that by which the immortal is known. अष्टावक्र उवाच । आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ १६/१ ॥ aṣṭāvakra uvāca | ācakṣva śṛṇu vā tāta nānāśāstrāṇyanekaśaḥ | tathāpi na tava svāsthyaṃ sarvavismaraṇādṛte || 1 || Ashtavakra: My son, you may recite or listen to countless scriptures, but you will not be established within until you can forget everything. 14/6/22 शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त, विकल बिखरे हैं, हो निरूपाय: समन्वय उसका करें समस्त, विजयिनी मानवता हो जाय। (i) हरि , तुम बहुत अनुग्रह कीनों । साधनधाम विबुध दुर्लभ तन मोहि कृपा करि दीनों । तुलसी 16/6/22 वर्षा ईश्वर का वीर्य हैं. बूँदे गिरते समय और उनकी नमी से ही कितने जीवों का पुनरागमन हो जाता है. औषधियाँ और पादप बनते हैं, वे हमारे लिए अन्न बनते हैं. अंत में हम भी किसी का अन्न बन जाते हैं. १७/६/२२ इंद्र व्यक्तिगत आत्मा को कहते हैं. वही सब देवताओं का अधिपति है. श्री अरबिंदो इंद्र को गिवर ओफ़ लाइट कहते हैं. यह व्यक्तिगत आत्मा जब दृश्य देखने का काम करती है तो उसे इंद्रिय कहते हैं. संस्कृत भाषा में इदं यह को कहते हैं द्र का अर्थ देखने से है, वह जो देखता है इंद्र कहलाता है. इदंद्र का संक्षिप्तीकरण इंद्र रूप में हुआ है. ध्यान में देखे अनदेखे मंदिर और विग्रह दर्शन हो रहे हैं. क्षितिज में चमकते तैरते तारों के बीच पाते हैं. सिर के ऊपरी भाग में तरावट रहती है. शरीर याद कदा स्फुरित होता रहता है. बहुत से अनुभव लिखना चाहते तब भी लिखते समय भूल जाते हैं. फिर अगली बैठकी में उन्हें लिखने का प्रयास करते हैं, पर तब तक नया अनुभव आ जाता है, वह अनुभव तिरोहित ही रहता है. हिमालय के बद्रीनाथ क्षेत्र में शंकर और पार्वती निवास करते थे। एक दिन अचानक एक बालक उनके सम्मुख आया। पार्वती ने उसे उठाकर संभालने की इच्छा प्रकट की, पर शंकर ने रोका कि यह साधारण बालक नही है, अन्यथा इसके माता पिता के पदचिह्न बर्फ पर दिखते। पार्वती नही मानी, बालक की सम्भाल करने लगीं। एक दिन जब पार्वती और शंकर बाहर निकले और घर वापस आये तो बालक ने कुंडी लगा दी और खोली नहीं। मजबूरन शंकर पार्वती को अपना स्थान बदलना पड़ा और केदारनाथ जाकर रहने लगे। हिमालय की यात्रा कुछ पाने के लिए नही की जाती, वरन वहां जाकर संसार के सारे पदार्थ हिमालय के सामने बौने दिखने लगते हैं। यही इस यात्रा का निहितार्थ है। बद्रीनाथ और गंगोत्री के लिए अब मोटर वाहन सुलभ हो गए हैं, पर पहले लोग वहां पैदल जाते थे। बद्रीनाथ की यात्रा में वहां से पच्चीस किमी पूर्व गोविद घाट से अद्भुत दृश्य और शांति प्राप्त होती है। इस क्षेत्र को लोग विश्व के सभी क्षेत्रों से विरल मानते हैं। गोविंद घाट से ही सिखों के पवित्र हेमकुंड सरोवर की यात्रा आरम्भ होती है। आदि जगतगुरु आचार्य शंकर ने हज़ारो वर्ष पहले सुदूर दक्षिण के केरल में जन्म लेकर हिमालय की तीन हज़ार किमी से अधिक की यात्रा तीन बार पूरी की। यही नहीं, उन्होंने पूर्व से पश्चिम की यात्रा भी एक बार पूरी करके देश मे चार पीठें स्थापित की। यह कार्य उन्होंने कोई सम्प्रदाय या धर्म निर्मित करने के लिए नही किया, वरन सनातन धर्म को मौलिकता प्रदान करते हुए पुनर्स्थापित किया। आदि शंकराचार्य द्वारा सर्वप्रथम हिमालय के जोशीमठ (ज्योतिर्मठ) में पीठ स्थापित की गई। दुर्भाग्यवश, यही पीठ आजकल विवादित हो गयी है। इस पीठ पर शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवानंद सरस्वती के बीच अवर न्यायालय और हाइकोर्ट से होते हुए मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। वर्तमान में स्वरूपानंद जी ने कुछ ज़मीन लेकर मन्दिर और अन्य स्थापत्य निर्मित कर लिए, इसी से सटे क्षेत्र पर ऊपर पुराने भवन में वासुदेवानंद जी की पीठ चल रही है। स्वरूपानन्द जी पर आरोप है कि वह बद्रीनाथ क्षेत्र की पीठ हथियाने के लिए अपने को गुरु ब्रह्मानंद सरस्वती की जगह बोधाश्रमजी का शिष्य बताने लगे। ब्रह्मानंद जी के बाद शांतानंद और एक अन्य शंकराचार्य इस पीठ को सुशोभित किये और फिर वासुदेवानंद जी आसीन हुए। स्वरूपानन्द जी ब्रह्मानंद जी के बाद बोधाश्रम जी और फिर स्वयं पीठाचार्य बताते हैं। जो हो, लेकिन इस विवाद से नुकसान पहुच रहा है। यही नहीं आदि शंकराचार्य ने भारत की एकता और अखंडता के लिए बद्रीनाथ मंदिर की पूजा के लिए केरल के नंबूदरी ब्राह्मणों को नियुक्त किया। नंबूदरियो कि सहायता के लिए गढ़वाली ब्राह्मण रहते हैं। उनका दावा है कि इन दोनों शंकराचार्यो का दावा झूठा है यह तो नम्बूदरी ब्राह्मणों की पीठ है। परम्परा में भगवान बद्रीनाथ का स्वरूप जैसा मिलता है, उससे किंचित भिन्न यहां बद्रीनाथ पद्मासन में ध्यान करते हुए बिराजे हैं। हाथ चार ही हैं। दो अलग अलग हाथो में शंख और चक्र पर दो अन्य नीचे के हाथ ध्यान दशा में परस्पर मिले हुए हैं। इस स्वरूप से यह भी स्पष्ट है कि योग और ध्यान अपनी परम्परा में अति प्राचीन विधियां हैं। कहा जाता है भगवान विष्णु ध्यान करते गए और पत्नी लक्ष्मी ने बदरी पेड़ का रूप धारण कर उन्हें छाया प्रदान की, इससे वह बद्रीनाथ हुए। बद्री को बेर के पेड़ के रुप में जनसामान्य जानता है, पर बदरी बेर से भिन्न एक अन्य पेड़ हैं, यद्यपि वह पेड़ भी आजकल यहां मौजूद नहीं हैं। उत्तराखंड के चार धामों की यात्रा का क्रम यमुनोत्री से शुरू होता है। यमुना का उद्गम स्थल यमुनोत्री है। यमुना सूर्य की पुत्री हैं, इनका भाई यम है, पर माता अलग अलग हैं। यम के श्राप या दुःख को बहिन यमुना ने दूर किया था। यमी का उल्लेख वेद में भी है। इसलिए व्यक्ति असामयिक मृत्यु और उसके भय को दूर करने यहां आते हैं। गंगोत्री में व्यक्ति के पूर्वजों को भी मुक्त कर दिया जाता है, जैसा भागीरथ के प्रयासों से उनके पूर्वज राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार करने की कथा सर्वविदित है। गंगा का उद्गम स्थल गोमुख है। ग्लेशियरों से नदियां निकलती हैं। गंगा का ग्लेशियर गाय के मुख की आकृति की भांति है। गौमुख गंगोत्री से पैदल 18 किमी है और सरकार की अनुमति के बिना यहां नही जाया जा सकता है। यमुनोत्री और गंगोत्री के बाद केदारनाथ के दर्शन किये जाते हैं। केदारनाथ के पुजारी कर्नाटक के वीर शैव सम्प्रदाय के आचार्य हैं। केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की आकृति भी प्रचलित शिवलिंग से भिन्न है। उत्तराखण्ड के चार धामों में अंत मे बद्रीनाथ की यात्रा सम्पन्न होती है। भगवान की पूजा उपासना में श्रृंगार इतना अधिक कर दिया जाता है कि उनका मूल स्वरूप ढंक जाता है। इससे लोगों को स्वरूपों की विलक्षणता पता नही लग पाती है। ओरछा में भी रामराजा पद्मासन में बिराजे हुए हैं और उनके दरबार मे दुर्गा माता भी विद्यमान हैं...१८ जून २०१९ फ़ेसबुक से * सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥ भावार्थ:-शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥3॥ * ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥ दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥4॥ भावार्थ:- ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥4॥ * अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥ कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥5॥ भावार्थ:-निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है॥5॥ * सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥6॥ भावार्थ:- हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिए जीतने को कहीं शत्रु ही नहीं है॥6॥ sufficient precision, thus: — Principle 1. Pure Existence — Sat 2. Pure Consciousness — Chit 3. Pure Bliss — Ananda 4. Knowledge or Truth — Vijnana 5. Mind 6. Life (nervous being) 7. Matter World World of the highest truth of being (Satyaloka) World of infinite Will or con- scious force (Tapoloka) World of creative delight of existence (Janaloka) World of the Vastness (Maharloka) World of light (Swar) Worlds of various becoming (Bhuvar) The material world (Bhur) १९/६/२२ भगवान् कृष्ण का एक नाम है 'सत्कृति' भगवान् कृष्ण का एक नाम है 'सत्कृति'। सत्कृति का अर्थ है जो अपने भक्त के निर्याण (शरीर त्यागने के) समय में उसकी सहायता करते हैं। वराह पुराण में भगवान् हरि कहते हैं-- वातादि दोषेण मद्भक्तों मां न च स्मरेत्। अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्।। “यदि वातादि दोष के कारण मृत्यु के समय मेरा भक्त मेरा स्मरण नहीं कर पाता तो मैं उसका स्मरण कर उसे परम गति प्राप्त करवाता हूँ।“ मुकुंदमाला से.. कृष्ण त्वदीय पद पंकज पंजरान्तं अद्यैव मे विशतु मानस राज हंसः | प्राण प्रयाण समये कफ वात पित्तैः कंठावरोधनविधौ स्मरणम् कुतस्ते ।। हे कृष्ण! मेरा चित्तरूपी राजहंस आज ही आपके श्रीचरण रूपी कमल के केशर में जाकर प्रवेश करे, क्योंकि प्राण परित्याग के समय जब कफ, वायु तथा पित्त से कंठ अवरुद्ध हो जाएगा तब आपका स्मरण कैसे कर पाऊँगा. आदि शंकराचार्य कहते हैं बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपु: स्तन्यपाने पिपासा नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिता जन्तवो मां तुदन्ति । नाना रोगोत्थदुःखाद् रुदन परवशः शंकरं न स्मरामि क्षंतव्यो मे अपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शंभो. आज अंतरराष्ट्रीय पितृ दिवस है। जिनके पिता जीवित नहीं हैं, उनका स्मरण तो आज वैसा ही हुआ, जैसा श्राद्ध कर्म में किया जाता है। कई व्यक्ति श्राद्ध को व्यर्थ बता देते हैं। कहीं यह कान घूमकर तो नहीं पकड़ा गया है। ऋग्वेद की एक ऋचा है.. ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते । तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ॥ ॥ हमारे जिन पितरोंको अग्निने पावन किया है और जो अग्निद्वारा भस्मसात किये बिना ही स्वयं पितृभूत हैं तथा जो अपनी इच्छाके अनुसार स्वर्गके मध्यमें आनन्दसे निवास करते हैं । उन सभीकी अनुमतिसे, हे स्वराट् अग्ने ! ( पितृलोकमें इस नूतन मृतजीवके ) प्राण धारण करने योग्य ( उसके ) इस शरीरको उसकी इच्छाके अनुसार ही बना दो और उसे दे दो .२० जून २०२१ की फ़ेसबुक पोस्ट भागवत (1.3.28) में कहते हैं-- एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् | इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे || “ ये सब अवतार तो भगवान के अंशावतार अथवा कलावतार हैं, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान अवतारी ही हैं l २३/६/२२ मौलाना वाहिदुद्दीन की अनूदित पवित्र क़ुरान का विहगावलोकन किया, मौलाना साहब की भूमिका पूरी पढ़ी. इसमें कुछ ऐसा नहीं,क़ुरान में ऐसा कुछ नहीं, जिसे लेकर बखेड़ा खड़ा किया जाता है. ख़ुद मौलाना साहब ने कतिपय शंकाएँ उठाते हुए उनका निवारण इस भूमिका में किया है. गर्दन काटने और मारने की जो बातें क़ुरान में की गयी हैं, वे राज्य के लिए हैं, व्यक्ति के लिए नहीं. व्यक्ति अपना जिहाद शांतिपूर्वक किए गए आचरण से लड़ सकता है. हिंसक कार्यवाही की अनुमति राज्य के लिए ही है. कितनी सुखद अनुभूतियों को शब्दों में वर्णित नहीं कर सकते. बड़ी बड़ी अनुभूतियाँ शास्त्रों और गुरुदेव के ग्रंथों में आयी हैं, पर उनकी उन्हें आज्ञा रही, इसलिए वे आयी, मुझे न ऐसी आज्ञा है, न सामर्थ्य कि उन्हें व्यक्त कर पाएँ. २५/६/२२ कर्तृत्व की मूल कृति-- इच्छा नहीं । इच्छा का उदय पूर्व संस्कार से होता है ---- उस इच्छा की ओर yield करना या नहीं करना , यह कृति है । यही कृतित्व है । देवता कर्ता नहीं हैं ,उनकी देह कर्मदेह नहीं । क्योंकि उन्हें इच्छा होती है और उसी क्षण उसकी पूर्ति होती है । कृति का अवकाश नहीं रहता , प्रवृत्ति- निवृत्ति का अवकाश नहीं रहता , choice नहीं रहता । कर्तृत्व जब नहीं रहता , तब भी इच्छा का उदय होता है ।उस इच्छा का मूल क्या है ? स्वभाव । यह स्वभाव दो प्रकार का है ; ( क )योगमाया और ( ख) माया पूर्वस्थल में इच्छा का उदय होता है , उसकी पूर्ति होती है -- कृति की आवश्यकता नहीं होती । इच्छापूर्ति -- आनन्दावस्था । इच्छा के उदित होने से विलम्ब क्यों नहीं होता ? क्योंकि चिंतामणि राज्य है , पूर्ण राज्य -- विलम्ब का हेतु नहीं । उत्तर में राज्य अभाव और अपूर्णता का है । इसलिए , इच्छा का उदय तो होता है ,लेकिन तुरन्त उसकी पूर्ति नहीं होती । इसीलिए प्राप्ति के लिए कृति होती है । यहाँ कर्तृत्व का आरम्भ है । पूर्ण के राज्य में कर्तृत्व नहीं । अभाव के ही राज्य में कर्तृत्व है । कर्तृत्व के जाने से ही चेष्टा ,क्रिया आदि , moral life है । सब गया ,माया कट गई । तब लीला । यह योगमाया का राज्य है । पौर्णमासी का राज्य । स्व संवेदन / पृष्ठ 283 Date 23/ 1/ 1925 आग पर कागज़ रखने से जलता है । आग जलाती है इसलिए जलता है । दाह कार्य में आग का कर्तृत्व है । अतएव, यह भी वास्तव में स्वाभाविक कार्य नहीं । दाह करना आग का स्वभाव है -- यह महज लौकिक बात है । इस कार्य के मूल में भी इच्छा है । इसलिए ,इच्छा से यह नियमित हो सकता , स्तम्भित हो सकता है । संसार के सभी कार्यों का मूल इच्छा है । इच्छा और स्वभाव में भेद क्या है ? इच्छा की पूर्णता ही स्वभाव या आनन्द है । पूर्ण इच्छा = स्वभाव । स्वभाव का विकार नहीं -- इसीलिए , परमेश्वर की इच्छा या पूर्णइच्छा निर्विकार है । आधार- भेद से वही इच्छा नाना प्रकार से अपूर्ण होती है , सीमाबद्ध होती है , विकृत होती है । हम साधारणतया जिसे इच्छा कहते हैं , उसका उदय और अस्त है , वह जन्य और विकृत है । परमेश्वर की इच्छा नित्य प्रकाशमान है , निर्विकार -- इसीलिए वह स्वभाव है । वह पूर्ण है , इसलिए कोई उसे इच्छा नहीं कहते । वही आनन्द है । वह सदा एकरस है , इसलिए , उसे पूर्णता या स्वभाव कहना ही अच्छा है । आधार के सम्बंध से वही सीमाबद्ध होती है । तब वह इच्छा होती है -- पूर्ण के स्पर्श से आनन्द होती है । स्वभाव या पूर्ण निराधार है । इच्छा या आनन्द को लौकिक अर्थ में प्रयोग करने के लिए विषय - सम्बंध चाहिए , आधार -सम्बंध चाहिए । बिंदु ही मूल आधार है । उसी को ग्रहण करने से इच्छा का स्फुरण होता है , आनन्द का विकास होता है । वही सृष्टि का उन्मेष है । बिंदु का त्याग करने से ही पूर्णता है -- विशुद्ध स्वभाव । वह नित्यानन्द पारमैश्वर्य है -- उसका विकास और लय नहीं । स्व संवेदन पृष्ठ 329 Date 23 , 6 , 1927 आज एक और पुस्तक डाक से प्राप्त हुयी, श्री अरबिंदो की सीक्रेट आँफ वेद, ईबुक के रूप में जब इस पुस्तक को देखा तो मंगाए बिना न रहा गया. कभी-कभी अर्थोन्मेष की अनुभूति परम तक पहुचाने का आभास कराती है. अर्थ का यह प्रसार ही उसे मुद्रा या धन के अर्थ की सार्थकता व्यक्त करती है. धन्य करने के कारण वह धन है, प्रसन्न करने के चलते वह मुद्रा है. शब्द का अर्थ भी हमें यही अहसास कराता है. किसी शब्द के दो अलग अलग अर्थ बाद में विकसित हुए, मूलतः या तत्वतः एक शब्द का एक ही अर्थ है. गो का अर्थ प्रकाश है, गाय का अर्थ विकसित हुआ. अश्व का अर्थ प्राण के एक रूप से है, बाद में इससे घोड़ा का अर्थ विदित हुआ. ब्रह्म से अतीत भूमि में संचित सत्ता ही षोडश कलामय पूर्ण सत्ता है । उसकी पन्द्रह कला एवं सोलहवीं कला का त्रिपादांश ज्ञान राज्य में है । एक कला का पादांश मात्र ( 1/4 ) कार्य करने के लिए मर जगत में अवतीर्ण है । ज्ञान राज्य में अवशिष्ट पन्द्रह कला विश्वगुरु भृगुराम के रूप में स्थित है । बाकी त्रिपादांश ( 3/ 4 ) कला भृगुशक्ति के आधारभूत अचलानन्द या महातपा रूप से अवस्थित हैं । मात्र एक कला के पादांश ( 1/ 4 ) का प्रकाश ( इस मर जगत में ) विशुद्धानंद के रूप से हुआ । इन सब को मिलाकर विशुद्धसत्ता ( षोडशकलायुक्त ) हैं पुकार ( आर्तपुकार ) यदि माँ रूप है । अचलानन्द हैं , अनादि स्वरूप । अचल की क्षुब्ध अवस्था " आदि माँ " , "माँ की पुकार " या भावशक्ति है । आदि शक्ति से जिनका स्फुरण हुआ , वे हैं "कर्मशक्ति या श्यामा शक्ति । " जिनके कारण यह स्फुरण हुआ , वे ज्ञान या उमाशक्ति पद वाच्य हैं । उमा का स्वरूप है " ॐ माँ " अतएव अचल के तीन कोण हैं आदि माँ ( आदि शक्ति ) , श्यामा माँ ( कर्मशक्ति ) एवं उमा माँ ( ज्ञान शक्ति ) वहीं से ' ॐ माँ ' शब्द निर्गत हुआ पूर्व वर्णित एकपाद विशुद्धसत्ता , इस महाशब्द को चतुर्दश भुवन का अतिक्रमण कर , इस मर्त्यलोक में लाई । ज्ञान राज्य में ' ॐ माँ ' ध्वनि निरन्तर उत्थित हो रही है । किन्तु धारक में अभाववश , धृत न होकर वापस लौट जाती है । विशुद्धसत्ता का अवतरण मातृ स्वरूप आसन प्रतिष्ठा पृष्ठ 32 २७/६/२२ सृष्टि से परे उस निर्गुण ब्रह्म या परमपिता को कोई भी तब तक प्राप्त नही कर सकता जब तक वह पहले सृष्टि में व्याप्त कूटस्थ चैतन्य या पुत्र को अपने मे प्रकट न कर दे। गीता में आये मंत्र ॐ तत सत के अर्थ से इसे समझा जा सकता है। कूटस्थ चेतना परमपिता का एकमात्र पुत्र है। इसमें लिंग या जेंडर का प्रश्न नहीं है। वैसे तो सब प्राणी परमपिता की संतानें हैं, पर मनुष्य में ही यह पुत्र प्रकट होने की संभावना पाई जाती है। पितृ ऋण की अदायगी के नाम पर पुत्र पैदा करने की अभिधात्मक व्याख्या अथवा मैं ही ईश्वर का एकमात्र पुत्र हूँ, ऐसी व्याख्या करने से सनातन, ईसाई और अन्य शास्त्रों को सही रूप में नही समझा गया। एक बार गलत व्याख्या को पकड़कर आगे बढ़ते जाने से वह गलत ही बनी रहती है। लेखिका मैत्रेयी पुष्पा की तीन बेटियां हैं, इस पर एक बार उनसे पूछा कि ऐसा करने के पीछे क्या कारण रहा! उन्होंने स्पष्ट कहा पुत्र के लिए समाज का दबाव था। इससे अधिक हम लोग जोखिम नही ले सकते थे। जनसंख्या के बारे में पापुलेशन ट्रेंड वेबसाइट पर दिये ग्राफ कहते हैं कि आने वाले कुछ दशकों में भारत की जनसंख्या की वृद्धि दर और संख्या वर्तमान दर से कम हो जाएगी, पर जनसंख्या को एक तर्कसंगत स्तर पर उससे पहले अगर आज का समाज ले जाये तो उसमे हर्ज क्या है! फ़ेसबुक २३/६/२१ २८/६/२२ गाँठ को संधि भी बोलते हैं. कश्मीर में इसे संध कहा जाता है. यह एक खोज है, अवसर है दो छोरों को जानने का, उन्हें जोड़ने का. सब धर्मों या सम्प्रदायों की एकता संभव नही है. तत्व की उपलब्धि अनुभूति का विषय है. धार्मिक आचार और व्यवहार उस उपलब्धि को प्राप्त करने के साधन हैं. यह उपलब्धि प्रचार नहीं, परिवर्तन नहीं, फिर किस विधि से कोई अन्य जान पाएगा कि उपलब्धि क्या है🙏 भारतीय संस्कृति के सारे अंतर्विरोध द्वयर्थक या बहुअर्थक श्लोकों की अलग अलग व्याख्या के कारण है. वेदों का एक भाष्य आचार्य सायण का है और दूसरा भाष्य अन्य अनेक मनीषियों का. जब तक द्वयर्थी भावों का ग्रहण नहीं हो जाएगा, सार नहीं मिल पाएगा....

Friday, November 15, 2024

साहित्य चिंतन में भारतीय सौंदर्य की अवधारणा

साहित्य चिंतन में भारतीय सौंदर्य की अवधारणा प्रोफे0 राकेश नारायण द्विवेदी सौंदर्य की अवधारणा मानव चिंतन की मूल धाराओं में से एक है। सौंदर्य मनुष्य के केंद्र में प्रारंभ से ही रहा है। सौंदर्य के प्रति आकर्षण उसका जन्मजात स्वभाव है। सौंदर्य मनुष्य का स्वभाविक और अन्वेषणीय मर्म है। सौंदर्य का उद्घाटन करना उसके जीवन का ध्येय है। सौंदर्य वस्तुतः वह तत्व है, जिसके सहारे हम ब्रह्म तत्व तक पहुंच जाते हैं। बिना सौंदर्य का मूल ग्रहण किए हुए हम धार्मिक नहीं हो सकते। धर्म व्यक्ति की स्वाभाविक स्फुरणा है। मनुष्य के स्वाभाविक जीवन का नाम धर्म है। किंतु स्वभाव क्या है बिना इसे जाने व्यक्ति धर्म के मर्म को नहीं जान सकता। यह स्वभाव तत्व सौंदर्य हीह ै। सौंदर्य पर भारतीय चिंतक अलग-अलग तरह से समय-समय पर विचार करते आए हैं। वस्तुतः मनुष्य सौंदर्य का इतना आग्रही है िकवह उसे बिना पाए नहीं रह सकता। वह उसका आनंद है, मनुष्य आनंद में रहकर आता है, आनंद में रहता है और आनंद में ही विलीन हो जाता है। सौंदर्य से बाहर कोई सत्ता नहीं, जो कुछ दृश्यमान है, वह इस सौंदर्य के घटक हैं। विचारकों की उत्कंठा सौंदर्य की अवधारणा को जानने की रहा करती है। साहित्य का उद्देश्य भी सौंदर्य का उद्धाटन करना है। सौंदर्य का एक निकट समानार्थी रस है। रस ही भारतीय साहित्य के चिंतन की आत्मा है। रस क्या है! सौंदर्य ही तो। जब हमारी सहज भावनाएं उद्भूत होती हैं, जिनसे सामाजिक के कोमल हृदय में एक प्रकार की आनंदानुभूति होने लगती है, इसे ही तो रस कहा गया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस दशा को साधारणीकरण की दशा कहते हैं। रस की न उत्पत्ति होती है, न अनुमिति होती है और न भुक्ति ही। काश्मीर के शैव आचार्य अभिनवगुप्त ने पहली बार यह माना कि रस की तो मात्र अभिव्यक्ति होती है। सब जगह बस हो रहा है, इस हुब्बपन को देखने वाला ही तो रस है। मुंडक एवं श्वेताश्वतर उपनिषदों में आए एक रूपक के माध्यम से यह बात भलीभांति समझी जा सकती है- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।। आशय यह कि दो सुंदर पंखों वाले पक्षी, जो एक दूसरे के निकट मित्र हैं, एक ही पेड़ से लटकते हैं। इनमें से एक पक्षी पेड़ के मीठे फल खाता है, जबकि दूसरी पक्षी मा़त्र अपने मित्र पक्षी को देखता है। इस रूपक में भले फल खाने वाले पक्षी को हम प्रथम दृष्टया कहेगे कि रस का उपभोग करने वाला पक्षी ही रसोपभोग कर रहा है, परंतु वास्तविकता यह है कि उस रस का दर्शन करने वाला अपर पक्षी ही रसग्राही है। खाने वाले पक्षी को उसकी रसनेंद्रिय को अच्छी अनुभूति हो रही है और उसका उदर पोषण हो रहा है, परंतु यह सब देखने वाला पक्षी रस की उद्भावना अपने भीतर कर रहा है। दोनों पक्षियों का नाम, काम और स्वभाव लगभग एक जैसा है, किंतु इनमें भिन्नता यह है कि एक एकदेशीय है और दूसरा 2 ध् 6 सर्वव्यापी। एक मात्र भोक्ता और दूसरा उसका साक्षी। दोनों एक होते हुए भी विलक्षणता उस रस यानि सौंदर्य की हीह ै। जिसका रूप निरंतर बदलता रहे, उस शक्ति का नाम वृक्ष है। देखने वाला पक्षी समान वृक्ष पर होते हुए भी अलग दशा में निवास करता है। सौंदर्य की हीह म प्रार्थना करते हैं। सबसे अच्छे गीत प्रार्थना गीत ही होते हैं। प्रार्थना में सौंदर्य भर-भर के छलकता है। भारतीय चिंतन की आरंभिक प्रार्थनाएं वेदों के रूप में हमारे सम्मुख आती हैं। वेदोें में प्रार्थना का सौंदर्य सर्वत्र विकीर्णित हो रहा है। भारत का समूचा साहित्यिक वाड़मय वेदों का विस्तार हीह ै। सुंदर विशेषण का संज्ञा पद सौंदर्य है। संज्ञा में विशेषण उपस्थित रहता है। सुंदरता की प्रतीति हमारे आंतरिक आकाश को फैलाव देती है, उसे व्यापक बनाती है। सुंदरता हमें अनंत से जोड़ने का माध्यम बनती है। दृश्यमान जगत् ब्रह्म का सौंदर्य ही है, जो अनंत रूपों और उनके नामों में अभिव्यक्त हो रहा है। हम उस सौंदर्य का विविध प्रकार से गान करते हैं, तरह-तरत से सम्मान करते हैं और भांति-भांति से अनुपान करते हैं। उसका आस्वाद लेते हैं। पूजा और उपासना उस सौंदर्य का गौरव-गान है। पूजा करना सौंदर्य का उपस्थापन है। पूजा का अर्थ ह ैपूर्ण जागरण। सौंदर्य जागरूकता के बिना उद्घाटित नहीं होता। सौंदर्य सत्य है, ज बवह हमारे भीतर कौंधता है तो स्पष्ट हो जाता है कि हमें इसी की इच्छा थी। वस्तुतः सौंदर्य के अन्वेषण की मूल प्रेरक इच्छा ही है। सौंदर्य अखंड है, निस्सीम है, परंतु जब उसकी प्रतीति होती है तो वह खंड-खंड, क्षण-क्षण एवुं सीमाओं में विभाजित होता हुआ प्रकट होता है। संसार और उसकी विविध कलाएं और साहित्य खंड सौंदर्य ही हैं। यहां यह भी कहना आवश्यक है कि वस्तुतः सौंदर्य खंड-खंड दिखता हुआ भी अखंड और संपूर्ण है। पूर्ण परमात्मा से पूर्ण ही व्यक्त होता है और वह पूर्ण में ही विलीन होता है। व्यक्ति जहां से जो कुछ जान रहा हो, वहां से ह ीवह सौंदर्य को प्राप्त कर सकता है, क्योंकि वह सर्वत्र है और सार्वकालिक है। सौंदर्य वर्तमान है, वह अतीत और भविष्य नहीं है। अतीत स्मृति का सौंदर्य है और भविष्य कल्पना का। सौंदर्य को यदि किसी नियम और व्यवस्था से आबद्ध करेंगे तो वह खंडित हो जाएगा। उस पर कोई यदि अपना अधिकार जमाना चाहेगा तो वह तिरोहित हो जाएगा। वह तो एक नन्हें शिशु की भांति है। सौंदर्य का ेपाने के लिए धनी-मानी होना आवश्यक नहीं, वह तो एक प्रकाश है, जिसकी आभा मे ंहम सब स्नात हो रहे हैं। जब हमारा प्रेम इतना घनीभूत हो जाए, जैसा हम अपने शरीर के साथ करते हैं। अप्रतिबंधित, अनन्य और दृढ़ भक्ति का जब उदय होता है तो सौंदर्य का उद्घाटन वैसे ही हो जाता है, जैसे हिमाच्छादित पर्वत पर सूर्य की प्रथम रश्मि का आगमन होता है। देखने से, सुनने से, छूने से, आस्वाद से और घ्राण करने से सौंदर्य खंडित होकर हमारे सामने आता है, किंतु विडंबना देखें कि हमें इन्हीं इंद्रियों के माध्यम से उसकी प्रतीति होती है। अंतःकरण के अवलंब से सौंदर्य इंद्रियों द्वारा प्रकट होता है। इंद्रिय इंद्र से बना है, इंद्र का अर्थ है झांकना। इंद्र इंदियों के स्वामी हैं, क्यांेकि वे सौंदर्य का प्रथम अवगाहन करते हैं। 3 ध् 6 व्यक्ति के जीवन का लगभग 80 प्रतिशत कार्य व्यापार आंखांे से चलता है, इसलिए हम समझते हैं सौंदर्य बाहर हीह ै, किंतु केवल आंखें ही सौंदर्य की संवाहक नहीं होती, अंधकार में स्पर्श और अव्यक्त दशा में अवचेतन के सौंदर्य की प्रतीति अंतःकरण के माध्यम से होती है। यदि कहा जाए यह फुल सुंदर है, इसका आशय है कि वास्तव में जो मैं बताना चाहता हूं वह यह कि मैं उस प्रकार का व्यक्ति हूं जिसे यह फूल इस समय सुंदर दिख रहा है। किसी को यह फूल उक्त व्यक्ति की भांति सुंदर नहीं भी लग सकता है तो बहुतों का उस पर ध्यान भी नहीं जा रहा होता है। यदि सबको कोई व्यक्ति या वस्तु संुदर लग भी रही है तो उसकी प्रतीति हर व्यक्ति या उद्भावक को पृथक्-पृथक् ही हो रही होगी। किंतु यह प्रतीति पृथक-पृथक् होकर भी थोक में अर्थात् संपूर्ण होती है। किसी को वह फूल जब सुंदर लगा, आवश्यक नहीं कि उसे आने वाले समय में भी वह फूल सुंदर लगेगा। फूल के रूप में परिवर्तन आने पर व्यक्ति की दृष्टि समान रहने पर भी उसका भाव परिवर्तित हो जाता है। हमारी ही जवानी एक समय हमें सुंदर लगती है और जब यह बुढ़ापे में परिवर्तित हो जाती है तो कुरूप लगने लगती है। तो सौंदर्य विषयगत है या वस्तुगत! क्या यह हमारी निजी या आंतरिक भावना है या फिर वस्तुओं का वास्तविक रूप! वे क्या हैं, वे हमारे मन की संवेदनाएं और छायाएं हैं। निर्णायक बुद्धि को किनारे रखकर फूल को और स्वयं को अलग-अलग रखकर देखें। फूल की सुंदरता और कुरूपता या आपेक्षिक सुंदरता के प्रति कोई धारणा न रखें। समग्र अस्तित्व के साथ एकतान होते चले जाने पर ब्रह्मांडीय चेतना से लयबद्ध हो जाते हैं। हमारे हृदय की धड़कन और ब्रह्मांडीय धडत्रकन एक साथ लयबद्ध हो जाने पर कुरूपता या असत् वृत्ति से हम ऊपर उठ जाते हैं। इसी दशा में पहुंचकर हमारे ऋषियों ने वाड़मय का सृजन किया है। विभिन्न कलाओं को मूर्तिमान किया है, संगीत के विविध राम और रागिनियों में निबद्ध करते हुए पदों को गाया है। साहित्यकारों ने ऊंची कृतियों और कविताओं की रचना की है। व्यक्ति के इस प्रकार रहने पर उसके शारीरिक कर्म भी उन्नत हो जाते हैं। इस दशा में रहते हुए व्यक्ति की रचनाशीलता से व्यक्ति स्वयं, उसका परिवेश और राष्ट्र का उत्थान होता है। साहित्य सौंदर्य की अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण एवं सशक्त माध्यम है। साहित्य के माध्यम से रचनाकार सौंदर्य के क्षणों को इस प्रकार शब्दबद्ध करता है कि उसके पाठक उसका आस्वाद लिए बिना नहीं रहते। साहित्य वह माध्यम है, जिसमें सौंदर्य के बाहरी और भीतरी स्वरूप की अनंत संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। बाह्य यानि जागतिक सौंदर्य वास्तविक सौंदर्य तक पहुंचने का उपस्कारक है। जागतिक सौंदर्य अभिव्यक्ति का सौंदर्य है। अभिव्यक्ति ही तो सौंदर्य की संवाहिका है। बाह्य सौंदर्य के कतिपय साहित्यिक उदाहरण वर्ण्य आलेख के अंतर्गत यहां समाहित किए जाने अनुपयुक्त नहीं होंगे। कविवर बिहारी ने नायिका के सौंदर्य को शब्द और उनके अर्थ से जोड़ा है कि जैसे शब्दों से उनके अर्थ का प्रकाश फैलता है, नायिका का आंगिक सौंदर्य भी छिपाते हुए भी छिप नहीं पा रहा है। ऐसा भी नहीं कि शब्द अपने अर्थ को प्रकट न करना चाहते हों, अन्यथा वह अभिव्यक्त ही क्यों होगे। 4 ध् 6 दुरत न कुच बिन कंचुकी चुपरी सारी सेत। कवि आंकनु के अरथ लौं प्रगटि दिखाई देत।। भारतीय साहित्य में सौंदर्य को एक सिद्धांत समझकर विषय प्रवर्तन नहीं किया गया है, किंतु उसके मूल तत्व पर गहन चिंतन अवश्य किया गया है। भारतीय काव्यशास्त्र को सौंदर्यशास्त्र का अग्रदूत कहा जा सकता है। काव्य की आत्मा क्या है अर्थात् उसका सौंदर्य क्या है, जिससे उसकी ओर लोग खिंचे चले जाते हैं। उसमें ऐसा क्या है कि पढ़ने-समझने के बाद उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। इस पर विचार करने के लिए भारतीय काव्य शास्त्र अलग-अलग कालक्रमिक संप्रदाय लेकर हमारे सामने आता है। रस, ध्वनि, अलंकार, रीति-गुण, वक्रोक्ति एवं औचित्य यह संप्रदाय काव्य की आत्मा पर जैसे कि उनके नाम हैं, उन्हें केंद्र में रखकर अपनी स्थापना देते हैं। सौंदर्य शब्द का काव्यशास़्त्रीय प्रयोग सर्वप्रथम आचार्य भामह ने अपने काव्यशास्त्र में किया। उन्होंने कहा- सौंदर्यमलंकारः। अर्थात् अलंकार किसी रचना के सौंदर्य का हेतु हैं। पंडितराज जगन्नाथ कहते हैं- रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्। अर्थात् सुंदर अर्थ के प्रतिपादक शब्दों से मिलकर काव्य बनता है। संस्कृत साहित्य के आचार्य माघ अपने शिशुपाल बध नामक महाकाव्य में लिखते है- क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः अर्थात् क्षण-क्षण में जो नवता होती है, वही रमणीयता है। यानि यह कभी फीका नहीं पड़ता। आधुनिक भारतीय चिंतकों ने सौंदर्य के अनुद्घाटित पक्षों को और उद्घाटित पक्षों को नए संदर्भ मेें व्यक्त किया है। रवींद्रनाथ ठाकुर का मत है कि उपयोगिता के बिना भी जो हमें आनंद मिलता है, उसे सौंदर्य की भावना कहा जाता है। डॉ नगेंद्र ने कहा है कि भारतीय सौंदर्य अद्वंद्व एवं सामरस्य का दर्शन है। अभिव्यक्ति के स्तर पर यह सौंदर्य है और अनुभूति के स्तर पर आनंद है। संसार का रहस्य और अनंतता का ज्ञान होने के बाद व्यक्तिगत सूख-दुःख, माया-मोह, सफलता-विफलता आदि सब तुच्छ लगता है। जीवन में विराट दृष्टि संपन्न होने पर मोह दूर हो जाता है, आंखें उज्ज्वल और तेजयुक्त, गति में वीरता और हृदय में एक अद्भुद प्रसाद का आविर्भाव होता है। महाभारत में इस गंभीर अनुभव को शांति कहा गया है। इस अनुभव को प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति संघर्ष करता है, परंतु उसके परिणाम से अप्रभावित रहता है। जीवन को वह एक प्रेममय संघर्ष में रूपांतरित कर लेता है। 5 ध् 6 एक सौंदर्य ग्राही व्यक्ति के लिए दुःख या कुरूपता पापों या दुष्कर्म का परिणाम नहीं होता। वह समझ जाता है कि वास्तव में दुःख निवृत्ति तो कभी किसी तत्वज्ञानी की संगत का परिणाम है, व्यक्ति का मन बिना दुःख पाए भागता ही नहीं है। कुरूपता बिना सौंदर्य दर्शन के ज्ञात कैसे हो सकती है। इसका आशय यह नहीं कि हमें कुरूपता या जागतिक समस्याओं से पार जाने की आवश्यकता नहीं है। हम यथास्थितिवादी होकर नहीं रह सकते। शरीर की प्रकृति ही ऐसी नहीं है। जहाज हमेशा किनारे पर सुरक्षित रहता है, किंतु वह इसके लिए नहीं बनाया गया है। हृदय और आंखें अपने शरीर में सुरक्षित स्थानों पर और सुरक्षा साधनों के साथ स्थित हैं, किंतु वे निश्चेष्ट होने के लिए नहीं रखे गए हैं। आयासपूर्वक हमें निठल्ले होकर तो कदापि नहीं बैठना चाहिए। सौंदर्य को उपलब्ध किसी व्यक्ति में प्रेम और करुणा छलकने लगेगी। उसे किसी अन्य से शिकायत नहीं रह जाएगी, अपितु उसके संसर्ग में जो आएगा, उसे ही अपूर्व शांति का अनुभव होने लगेगा। समकालीन साहित्यकार बाबुषा कोहली कहती है- यदि वह तुम्हें बेहतर, सुंदर और सरल नही ंकर रहा है तो चाहे जो हो, वह प्रेम नहीं है। बाबुषा एक कविता में गाती हैं- जीत की चाहना से लथपथ इस संसार में एक सुंदर दृश्य की तरह उगता ह ैहारा हुआ पुरुष जैसे पथरीली जमीन पर बिना किसी तैयारी के उग आता कोई हरा बिरवा। यह हरा बिरवा बनने के लिए हमें हारना तो पडे़गा। बुंदेली भाषा मे ंतो हार उस जंगल को भी कहते हैं, जिसमें जानवर चरते हैं और किसान अपने खेत जोतते हैं। एक और समकालीन रचनाकार निरंजन श्रोत्रिय की सौंदर्य शीर्षक कविता की पंक्तियां हैं- आज मैंने मोर के बदसूरत पैर देखे और खुश हुआ इन्हीं पैरों पर सवार हो आएगी बरसात ............ आज मैंने सौंदर्य को उलट-पलट कर देखा और खुश हुआ। -ध्यानमंगलम्, सिल्वर सिटी, कैलगुवां रोड, ललितपुर - उ0प्र0-284403 मोबाइल 9236114604

जुलाई २४

जुलाई २४ हमारे यहाँ जो कुछ लोग जानते हैं, उसे कृपण प्रकृति के कारण छिपा लेते हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कहाँ बताएँ, इसे नहीं समझ पाते। भारत विद्या (Indology) को प्रकट करने की दृष्टि से ऑनलाइन सिस्टम ने दुनिया भर को बहुत अधिक मंच और अवसर प्रदान किया है। इस ऑनलाइन व्यवस्था ने कृपण व्यक्तियों की हालत ख़राब कर दी है। वे चाहे दुनिया के तरह तरह के बाज़ार के ख़रीददार हों या विक्रेता। गूगल बाबा ने बहुत सी जानकारी सुलभ कर दी है। आप गूगल में आइये और अनावश्यक गोपनीयता से बाहर हो जाइए अन्यथा अप्रासंगिक हो जाएँगे और आने वाले समय में आप जो कुछ नया और उत्तम जानते हैं, उसे कोई दूसरा प्रकट कर देगा। ज्ञान विज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता। एडिसन ने बल्ब दिया, उसकी रोशनी पूरे जगत् को मिल रही है। १३/७/२४ मन ही जिसका दर हो जाए, वही मंदिर है। दरवाज़ा ऐसा स्थान है, जहां से भीतर और बाहर दोनों जगह का दिखने लगता है। नाम स्वाँस दोउ विलग चलत हैं इनको भेद न मोकों भावे। स्वाँसई नाम नाम ही स्वाँसा नाम स्वाँस को भेद मिटावे॥ रोम रोम जब रग रग बोले तब लग स्वाद नाम को पावे॥ पुरी जगन्नाथ के कतिपय रहस्य हैं... मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हवा के विपरीत लहराता है। प्रतिदिन ध्वज का आरोहण होता है। यह वहाँ की १८०० वर्ष पुरानी परंपरा है। किसी दिन यदि आरोहण न हुआ तो मंदिर १८ वर्ष के लिए बंद हो जायेगा। ४५ मंज़िल ऊँचे शिखर पर पुजारी चढ़कर ध्वजारोहण करते हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में नीम की लकड़ी की मूर्तियाँ हैं। यह ८, १२ या १९ वर्षों में बदलती हैं। २०१५ में पिछला नवकलेबर हुआ था। कृष्ण सुभद्रा और बलराम की मूर्तियाँ हैं जो बहुत शैल्पिक नहीं होतीं, परंतु अपनी परंपरा और महत्व में अप्रतिम हैं। मंदिर में सूर्य की छाया नहीं पड़ती। यहाँ सुखिला और शंखुड़ी नाम से दो महाप्रसाद मिलते हैं। सुखिला में सूखे अन्न के दाने और शंखुड़ी में दाल भात इत्यादि मिलता है। यहाँ कभी कोई भूखा नहीं रहता, न प्रसाद बचता है या बर्बाद होता है। प्रसाद तैयार करने की भी इनकी अपनी विधि और परंपरा है। एक के ऊपर एक मिट्टी की हाँड़ियों में भात पकाया जाता है, जिसका चावल भी कहते हैं प्रतिदिन महाप्रभु के खेतों से नया तैयार होकर आता है। इसका जल भी पुजारिगण अलग से लाते हैं। मंदिर के अंदर प्रविष्ट होने पर पुरी के समुद्र का शोर सुनाई नहीं पड़ता। मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी या जहाज़ उड़ नहीं सकता। मंदिर के शिखर पर एक चक्र लगा है, जिसका मुख सदा पुरी की ओर दिखता है। १२वी सदी में एक टन वजन का इतने ऊँचे यह चक्र कैसे स्थापित किया गया होगा, यह अपने आप में विलक्षण है। पुरी का समुद्री तट बड़े तटों में से एक है, यह बीच मनमोहक है। यहाँ चलने वाली समुद्री हवा भी बदलकर बहती है। यहाँ शाम की हवा समुद्र से मैदान की तरफ़ आती है। दूसरे समुद्री तटों पर इसका उल्टा होता है। स्क्रॉल के अनुसार, यीशु ने 13 वर्ष की आयु में यरूशलेम को त्याग दिया और सिंध की ओर प्रस्थान किया, "ईश्वरीय समझ में सुधार करने और खुद को पूर्ण करने तथा महान बुद्ध के नियमों का अध्ययन करने के इरादे से" । वे पंजाब को पार करके पुरी जगन्नाथ पहुँचे जहाँ उन्होंने ब्राह्मण पुजारियों के अधीन वेदों का अध्ययन किया। यहाँ भगवान कृष्ण की नाभि में ब्रह्म एक नीले पत्थर के रूप में है। बौद्धों का विश्वास है कि यह गौतम बुद्ध का दाँत है, जो उनके निधन के बाद कुशीनगर से पुरी लाया गया था। यहाँ मूर्तियाँ अर्धनिर्मित हैं। कहते हैं कलाकार ने निर्देश दिया था कि निर्माण के दौरान कोई अंदर नहीं आएगा, पर उसका उल्लंघन हो गया और कृष्ण की मूर्ति आधी ही रह गई। बड़े गोल नेत्रों के कारण उड़िया में इन्हें चकानयन और दारूब्रह्म जैसे नामों से जाना जाता है। जगन्नाथ जी वैष्णवों का तो प्रमुख स्थान है ही, यह चार धामों में से एक है, यहाँ शंकराचार्य जी का मठ है। किंतु शैव और शाक्त तंत्र के उपासकों के लिए भी यह स्थान उतना ही महत्वपूर्ण है। ललितपुर में डेढ़ दो सौ वर्ष पहले मुख्य बाज़ार राजमार्ग पर और घंटाघर से सटा हुआ जगदीश मंदिर है। मंदिर की व्यवस्था हुण्डैत परिवार की देखरेख में चलती है। उनके पूर्वज पुरी के जगन्नाथ जी से प्रेरित और निर्देशित होकर यह मंदिर स्थापित किए थे। आज पुरी की भाँति यहाँ भी प्रतिवर्ष की तरह रथ यात्रा का आयोजन हुआ। मनुष्य शरीर या विश्व की कोई स्थिर रचना पुर है, जिसका निवासी पुरुष है। पुर का गतिशील रूप रथ है, जिसका संचालक वामन या सूक्ष्म ईश्वर है। २१/७/२४ शिष्य आषाढ़ की भाँति धुंधला है, जिसमें बादल गरजते हैं, जल बरसता हैं। आषाढ़ बहुत तीव्र गर्मी के बाद आता है। तभी उसमें नया बीज बोया जाता है। नवता का संचार होता है। आषाढ़ महाविरह के बाद मिलन का प्रारंभ है। इसीलिए कई बारह मासा वियोग वर्णन आषाढ़ से शुरू होते हैं। संस्कृत में महाकवि कालिदास से लेकर सूफ़ी काव्य के बड़े उद्गाता मलिक मुहम्मद जायसी से होते हुए हिन्दी के कथाकार मोहन राकेश तक के यहाँ आषाढ़ अलग अलग ढंग से बोलता है। आषाढ़ की पूर्णिमा हमारी गुरु है। पूर्णिमा पर चंद्रमा निरभ्र आकाश को अपनी चाँदनी से स्वच्छ और सुहाना बना देता है। चंद्रमा को मामा कहा है, उससे हमारा निकट का संबंध है। चंद्रमा मनसो जात है। मन और चंद्रमा कहियत भिन्न न भिन्न हैं। मन के पार ले जाने में चंद्रमा सक्षम है। इस चंद्रमा का प्रकाश सूरज से आता है, सूरज यानि परमात्मा। परंतु चंद्रमा में वह प्रकाश दर्पण की भाँति प्रतिबिंबित होता है। हम सूर्य का पूर्ण प्रकाश सीधे नहीं देख सकते, उसके लिए चंद्रमा माध्यम बनता है। इसीलिए मान्यता है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन वेद व्यास का जन्म हुआ। वेदव्यास ने वेदों की आभा को इकट्ठा करके मानव समाज तक प्रसारित किया। हर पूर्णिमा के दिन किसी न किसी संत/महापुरुष का संबंध जुड़ा हुआ है। आप सबको गुरुपूर्णिमा की शुभकामनाएँ। २५/७/२४ राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृति चारिउ अनघ उदारा।। चहू चतुर कहूँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।। ʹजगत में चार प्रकार के (अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी) राम भक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं। चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है। इनमें से ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं।ʹ १८/९/२४ जैन धर्म में क्षमा को एक पर्व मानकर इसकी महिमा गाई गई है। क्षमा एक बहुत बड़ा सद्गुण है। वीरों का भूषण इसे यूँ ही नहीं कहा गया है। क्षमा करने में जितने बड़े साहस की आवश्यकता होती है, उतनी तो अपराध कारित करने में भी नहीं होती। क्षमा कायरों का गुण नहीं है। क्षमा का गुण तपश्चर्या के बाद ही आ सकता है। क्षमाशील व्यक्ति की वाणी में सत्य प्रतिष्ठित हो जाता है। क्रोध और प्रतिहिंसा जाते रहते हैं। वर्णमाला का क्ष वर्ण अंत में आता है। जो कुछ भी जीवन में घटित हुआ, उसे मा यानि नहीं के स्तर तक ले जाना क्षमा है। २२/९/२४ तिरूपति बालाजी के प्रसाद में अभक्ष्य पदार्थ पाये जाने के बाद किसी देवस्थान पर प्रसाद चढ़ाने और पाने में कितने श्रद्धालु सावधान हुए होंगे! फल और धान्य ही विशुद्ध हो सकते हैं। अब इतने दूध देने वाले पशु नहीं, न उनकी देखभाल करने वाले लोग हैं। जो हैं, वे सीमित हैं। बाज़ार की मिलावट से, लोगों के आलस्य से, बदलती जीवन शैली से और जनसामान्य के लिए आपूर्ति की अधिक आवश्यकता के कारण अब भगवान का प्रसाद भोज्य नहीं, सम्मान्य भर रह गया है.... माँ वैष्णो देवी में प्रसाद के रूप में सूखे सेब के टुकड़े, लाई, अखरोट और धातु का सिक्का मिलता है। यद्यपि वह भी कितना हो सकता है। प्रसादे सर्वदुखानानाम् हानिरस्योपज़ायते... २/१०/२४ काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।" 'कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये "काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।"
'कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं।'
क्योंकि इस विश्वमें -
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।
विश्वमें कर्मको ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है।।
अर्थात् जिस अज्ञानी को यह पता ही नहीं है कि यह शरीर मैं नहीं हूँ और इस शरीरमें होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ भी वास्तवमें मेरी नहीं है, ऐसा अज्ञानी ही इस शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है और इस शरीरमें होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंको भी अपनी क्रियायें मानकर सुखी-दुःखी होता रहता है जबकि -
'वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्तःकरण अहङ्कारसे मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है।।'
अपने आपको कर्ता माननेवाले ये अज्ञानी जीव ही इस मायाके जाल (फंदों) में फंसते हैं और माया के फंदों का वर्णन करते हुए ही लक्ष्मणजी निषादराज से कहते हैं -
जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।।
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू।।
संयोग (मिलना), वियोग (बिछुड़ना), भले-बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन तथा हित-अनहित आदि कर्म - ये सभी भ्रमके फंदे हैं (कर्तापनेका अहंकार ही भ्रम है)। जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल (कालको ही समय अथवा अवस्थाएं भी कहते हैं) - जहाँतक जगत् के जंजाल हैं; अर्थात् ये सभी जीवको संसारचक्र में फंसानेवाले जाल ही हैं;।।
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।
धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अन्दर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं अर्थात् ये सब वास्तविक नहीं हैं ये तो मायिक अथवा स्वप्नवत ही हैं।
और जिस ज्ञानी पुरुषका यह निश्चय होता है कि मैं शरीर नहीं हूँ, यह शरीर तो प्रकृतिका ही है अथवा यह शरीर प्राकृतिक है और इसके सम्पूर्ण कर्म भी सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही किये जाते हैं, ऐसा ज्ञानी पुरुष ही अपना स्वरूप आत्माको ही समझता है और अपने आपको केवल साक्षी मानकर अकर्ता ही मानता है - ऐसे ज्ञानी पुरुषके लिये यह समस्त संसार अथवा यह दृश्य-प्रपञ्च ऐसे ही है जैसे कि -
दो० - सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ।
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोय।।
जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये।। 
क्योंकि यह साक्षी रूप परम आत्मा भी हृदय रूपी गुहा में ही रहता है, जो कि सबकुछ देखने और जाननेवाला होता है; इसीलिये ही इस आत्माको ज्ञानस्वरूप भी कहा जाता है। अशोक कुमार सुल्तानपुर ये सारा संसार ठोस दिखता है, इसमें जो छिपी हुई सूक्ष्म तरंग रूपी चेतना है, वे ही शैलपुत्री हैं। हमारे भीतर स्थित चिति शक्ति जो कुँवारी, नित नूतन, शुद्ध और शुभ्र हैं; ब्रह्म की ओर ले जाने वाली उस चेतना को ही माँ ब्रह्मचारिणी कहते हैं। चंद्रघंटा का अर्थ है शीतल और अति सुंदर! चंद्रघंटा वह चेतना है जो नाद और सुंदरता से आपको ऊपर उठाती हैं और आपकी सारी कामनाएँ पूरी करती हैं। विश्व में सब जगह व्याप्त तरंग रुपी जो चेतना है, शक्ति है, वह शक्ति कुष्मांडा हैं; सर्वत्र व्याप्त दिव्य चेतना को ही माँ कूष्मांडा कहते हैं।   स्कंदमाता उस चैतन्य का प्रतीक हैं जहाँ माता पूर्ण विश्वास से गर्व के साथ ममता के भाव में बनी रहती है। ममता के साथ एक गर्व हो, आत्मबल हो, विश्वास हो कि सब कुछ ठीक ही होगा, ठीक हो रहा है, कोई चिंता नहीं। वह मातृत्व स्कंदमाता की आराधना है।कात्यायनी यानि वह चेतना जो सबका मंगल करती हैं, सबकी इच्छाएँ पूरी करती हैं और सबको प्रसन्न रखती हैं। हमारा नाम, रूप और सारे गुणों को लेकर वे हमारी पुत्री के रूप में प्रकट होती हैं। कालरात्रि वही हैं जो अज्ञान को दूर करने वाली होती हैं। चैतन्य शक्ति से ही सारी सृष्टि बनी है। यहाँ जड़ नाम की कोई चीज़ नहीं है। इस समझ को देने वाली कालरात्रि हैं। महागौरी माने जो सबका अच्छा ही करती हैं। हमारी चेतना में न्याय और धर्म का गुण निहित है। देवी गुणमयी हैं, गुण रूपी हैं इसलिए गुणों को जगा कर ही देवी की आराधना होती है। जो हमने अभी तक प्राप्त नहीं किया ये जान लेना हमें ये माता सिद्धिदात्री देने वाली है, ये भी जान लें कि ये सब जो हमारे पास है वह उनकी कृपा से ही मिला है। नाम में फल निहित है सिद्धिदात्री। नवरात्र साधना के बाद मातृ कृपा से प्राप्त शक्ति से हममें राम बस जाते हैं, जिनका बाण संधान व्यर्थ नहीं जाता है। इसीलिए रामबाण मुहावरा बन गया। वे रावण रूपी अहंकार के दस विविध रूपों का उच्छेद कर देते हैं। यही दशहरा है। आप सब जनन खों दशरये की राम-राम पौंचे। ३१/१०/२४ दीपावली की रात्रि को कालरात्रि कहा गया है। नवरात्रि का सप्तम अहोरात्र माँ काली को समर्पित है। वर्ष में चार बड़ी रात्रियाँ आती हैं, दीपावली के अतिरिक्त होली यानी दारुण रात्रि, जन्माष्टमी यानि मोहरात्रि(शरद पूर्णिमा की रात्रि को भी मोहरात्रि माना गया है) एवं महाशिवरात्रि। दीपावली पर हम चाहें , न चाहें भीतर-बाहर की सफ़ाई किए बिना नहीं रह सकते। समय की चाल को हमारे पुरखों ने किस तरह पकड़ा हुआ है। शुभ दीपावली🙏🌹 १/११/२४ राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार तुलसी भीतर बाहिरेहुँ जो चाहसि उजिआर भावार्थ- तुलसीदास कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुखरूपी द्वार की जीभरूपी देहली पर रामनामरूपी मणि-दीपक को रख॥ वाल्मीकि रामायण में वर्णन आता है कि जब भगवान राम लंका से अयोध्या वापस आए तो नंदीग्राम में अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर उनका अभिनंदन किया। इससे स्पष्ट है कि भारत में दीपावली जैसी परंपरा का स्रोत बहुत पहले से है। दीपक जलाने की संस्कृति का तो उत्स खोजना ही मुश्किल है। दीपावली राम जी के राज्याभिषेक की ख़ुशी और सतयुग में माता लक्ष्मी जी के सागर मंथन से पृथ्वी पर आविर्भाव दोनों के लिए मनाई जाती है। महावीर ने ईसा पूर्व ५२७ में दीपावली के दिन महासमाधि ली थी। सम्राट अशोक ने इस दिन तीसरी शराब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध धर्म स्वीकार किया। पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में दीपावली पर्व का वर्णन है। सिख धर्म में दिवाली वह दिन है, जिस दिन गुरु हरगोबिंद जी को 1619 में मुगल सम्राट जहांगीर ने जेल से रिहा किया था। यह उत्पीड़न से मुक्ति का प्रतीक है। वास्तव में , जप आदि कर्म नहीं है , परन्तु परमेश्वर के स्वरूप की प्रकाशिका क्रिया शक्ति है । कर्म उसी का नाम है , जो निम्नस्तर का परिमित भोग देकर अपरिमित भोग या पूर्ण भोग के स्वरूप का आच्छादन करता है एवं नाना प्रकार के संकोचों के द्वारा आवरण करता है । भगवान की क्रियाशक्ति जब पशु में स्थित होकर बन्धन को उत्पन्न करती है , तब उसका नाम पड़ता है कर्म । भगवत्कृपा का रहस्य 34

Sunday, June 9, 2024

मई २०२४

1/5/24 ललितपुर : नामकरण का कश्मीर कनेक्शन.... ललितपुर नामक स्थानों के नामकरण में कश्मीर का योगदान प्रतीत होता है। नेपाल के ललितपुर के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश का ललितपुर भी उनमें से एक है। कश्मीर के इतिहास प्रसिद्ध राजा हुए हैं ललितादित्य। उनके बाद के शासकों का संबंध उत्तर प्रदेश के ललितपुर से सटे महाभारत काल के राज्य चंदेरी से रहा है। चंदेरी से जुड़ा हुआ बड़ा इतिहास हर कालखंड में मिलता है। महाभारत काल में यह राजा शिशुपाल की राजधानी था। बुद्ध काल के सोलह में से चेदि नाम का महाजनपद चंदेरी रहा है। सूफ़ी संतों के युग में सदन कसाई दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन के आदेश से यहाँ आकर रहे। उनके नाम की दरगाह ललितपुर में है। देश के अन्य भागों में भी सदन कसाई की बड़ी बड़ी दरगाहें हैं। नाभादास जी के भक्तमाल में इनकी कथा आई है। तुर्की से चंदेरी में आकर प्रथम मुग़ल शासक बाबर ने मेदिनी राय से युद्ध किया। चंदेरी में ही अकबर के युग में बैजू बावरा नाम के एक महान संगीतज्ञ का जन्म हुआ, चंदेरी के पुराने क़िले में ही उनकी समाधि भी है। बैजू बावरा के संतान नहीं थी, उन्होंने गोपाल कृष्ण को गोद ले लिया था। गोपाल कृष्ण स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा पाकर कश्मीर के राजा के दरबार में चले गये थे। स्वामी हरिदास भी इसी बुंदेलखंड के ओरछा दरबार में थे, बाद में वृंदावन चले गये, फिर कभी वापस नहीं लौटे। चंदेरी राज्य अंग्रेजों के समय तक रहा, जब मर्दन सिंह इसके अंतिम राजा रहे। चंदेरी के अतिरिक्त ललितपुर जनपद के तालबेहट, बानपुर और कैलगुवा में इनके क़िले और गढ़ियाँ इसकी गवाही दे रहे हैं। बैजू बावरा के दत्तक पुत्र गोपाल से एक पुत्री हुई, उसे छोड़कर गोपाल कश्मीर जाकर रहने लगे। बैजू बावरा को अपनी नातिन की देखरेख का दायित्व लेना पड़ा था। बैजू बावरा अकबर के दरबार में रहने के बजाय ग्वालियर आ गए, जहां उन्हें सूचना मिली कि उनके गुरु हरिदास समाधिस्थ होने वाले हैं। वे अपने गुरु के अंतिम दर्शनों के लिए वृन्दावन पहुंचे और उनके दर्शन करने के पश्चात् विभिन्न प्रकार की आपदाओं का सामना करते हुए अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में कश्मीर नरेश की राजधानी श्रीनगर पहुंचे। उस समय उनका शिष्य गोपालदास वहां दरबारी गायक था। फटेहाल बैजू ने अपने आने की सूचना गोपालदास तक पहुंचाने के लिए द्वारपाल से कहा, तो द्वारपाल ने दो टूक जवाब दिया कि उनके स्वामी का कोई गुरु नहीं है। यह सुनकर बैजू को काफ़ी आघात पहुंचा और वे श्रीनगर के एक मंदिर में पहुंचकर राग ध्रुपद का गायन करने लगे। बैजू के श्रेष्ठ गायन को सुनकर अपार भीड़ उमड़ने लगी। जब बैजू की ख़बर कश्मीर नरेश के पास पहुंची, तो वे स्वयं भी वहां आए तथा बैजू का स्वागत कर अपने दरबार में ले आए। कश्मीर नरेश ने गोपालदास को पुनः संगीत शिक्षा दिए जाने हेतु बैजू से निवेदन किया। राजा की आज्ञा से उन्होंने गोपाल को पुनः संगीत शिक्षा देकर निपुण किया। कश्मीर के प्रतापी राजा ललितादित्य का नाम विश्रुत ही है। कल्हड़ की राजतरंगिणी में और कश्मीरी साहित्य और दर्शन में उनका नाम जगह जगह आता है। उनके बाद के राजाओं ने उनके नाम पर चंदेरी राज्य के अंतर्गत ललितपुर का नामकरण कराया होगा, ऐसा मानना उस किंवदंती से अधिक तर्कसंगत जान पड़ता है जिसमें कहा जाता है कि गौंड राजा सुमेर सिंह की पत्नी ललितकुंवर के नाम पर इसका नाम ललितपुर हुआ। जनश्रुति के अनुसार राजा सुमेर सिंह चर्म रोग से पीड़ित थे। वह पवित्र गंगाजल में चर्म रोग संबंधी व्याधियों को उपचार की क्षमता को देखने के लिए गंगा स्नान की आकांक्षा लिए जा रहे थे। मार्ग में अधिक अस्वस्थ हो जाने के कारण ललितपुर की सीमा पर शिविर लगा कर ठहर गए। उनकी पत्नी को दिव्य स्वप्न हुआ, जिसमंे उनको यह फरमान दिया गया कि यदि राजा वहां स्थित तालाब में स्नान करें, तो वे ठीक हो जाएंगे। इसके बाद राजा ने तालाब मंे स्नान किया और रोग मुक्त हो गए। उस तालाब का नाम सुमेर तालाब पड़ा। राजा वहां बस गए और इसका नाम अपनी पत्नी ललिता के नाम पर ललितपुर रखा। उसी सिद्ध पोखर का विकसित रूप आज नगर के बीचों-बीच स्थित है, जिसका नाम ‘सुमेरा तालाब’ है। सुमेरा तालाब का संबंध अवश्य सुमेर सिंह के नाम पर हो सकता है। परंतु ललितपुर के नामकरण की संगति सांस्कृतिक परंपरा और इतिहास से मेल नहीं खाती। गोंड शासन का परिक्षेत्र ललितपुर तक नहीं था। राजा सुमेर सिंह की पत्नी ललिता देवी के नाम पर ज़िले का नाम अगर रखा जाता तो अवश्य वह कोई इतिहास प्रसिद्ध नायिका रही होती। पर ऐसा नहीं है। इतिहास में कोई रानी ललिता देवी नाम से नहीं मिलती। रानी अहिल्या बाई होलकर ने देश भर में जगह जगह बड़े मंदिर बनवाये, पर उनके नाम पर स्वयं उनका बनवाया कोई स्मारक नहीं है। रानी दुर्गावती और रानी अवंतिबाई के उदाहरण इतिहास में मिलते हैं, उन्हीं के द्वारा उनके नाम पर बनवाये स्मारक नहीं हैं। समकालीन राजनीति में बसपा सरकार की मुख्यमंत्री मायावती ने जो स्मारक लखनऊ में बनवाये, उनमें स्वयं उनकी मूर्ति तो है, पर उस स्थान या पार्क का नामकरण उनके नाम पर नहीं है। यद्यपि उनके नाम पर राजकीय महाविद्यालय है। किसी के जीवनकाल में स्वयं के द्वारा उसी के नाम पर किया गया कोई सार्वजनिक नामकरण हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं है। पत्नी के नाम पर नगर के नामकरण का उदाहरण अपने यहाँ हमें याद नहीं आता। शाहजहाँ की पत्नी मुमताज़ बानो के नाम पर ताजमहल एक स्मारक भर है। ललितपुर शहर में राजराजेश्वरी माँ ललितेश्वरी देवी का मंदिर कश्मीर में शैव दर्शन के साथ साथ फली फूली शाक्त परंपरा से अनुकृत या उद्गत जान पड़ता है। कन्नौज के मूल निवासी आचार्यों के वंशज कश्मीर के श्रीनगर निवासी आचार्य अभिनवगुप्तपाद कश्मीर के शैव दर्शन के बड़े प्रस्तोता तो हैं ही, वे ही शाक्त दर्शन के भी उद्गाता हैं। ललितापुर नाम का गाँव भी इस जनपद में है। नेपाल के ज़िला ललितपुर का संबंध भी कश्मीर के लोक विश्रुत राजा ललितादित्य के नाम पर रखा गया मालूम होता है। बैजू बावरा पर १९५२ में एक प्रसिद्ध फ़िल्म भी बन चुकी है। ६/५/२४ मन मथुरा दिल द्वारिका काया काशी जान। दशवां द्वारा देहरा तामे जोति पहचान॥ "हर मरें तो हम मरें और हमरी मरे बलाय, साँचे गुरु का बालका मरे ना मारा जाय।" ७/५/२४ तंत्र शास्त्र में मदिरा या शराब का प्रयोग वर्ज्य नहीं है, जैसा कि वैष्णव उपासना का विधान है। व्यक्ति जिस उपाय से तत्व को ग्रहण कर ले, ज्ञान प्राप्त कर ले, उसके ऊपर ही है। हम अपने अनुभव से कह सकते हैं कि हमें हमारे गुरुदेव ने बिना मदिरा सेवन के ही नशा तारी किया हुआ है। मदिरा का नशा उतर जाता है, नाम नशा उतरता ही नहीं। ८/५/२४ ये और बात है कि वो ख़ामोश खड़े रहते हैं लेकिन जो बड़े होते हैं वो बड़े ही होते हैं। ९/५/२४ भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार हैं। वे अकेले हैं जिनका भगवान विष्णु के ही अवतार राम और कृष्ण से अलग अलग कारणों से मिलना हुआ। भगवान परशुराम विष्णु के अवतारों में अकेले हैं जो चिरंजीवी हैं, वर्तमान में ध्यानस्थ होकर हम सबका मंगल कर रहे हैं। अंतिम अवतार भगवान कल्कि के समय भगवान परशुराम उनके गुरुदेव होंगे। भगवान परशुराम का जन्म इंदौर मुंबई हाईवे पर महू ज़िले के एक स्थान जनपाव में हुआ। यहाँ जमदग्नि आश्रम है। मनु और इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रियों की रक्षा करते हुए भगवान परशुराम ने आतताइयों को बार बार नष्ट किया। केरल के साहित्य में भगवान परशुराम का वर्णन बार बार आया है। गोकर्ण और गोमांतक से लेकर केरल और कन्याकुमारी तक परशुराम क्षेत्र माना जाता है। वहीं गुजरात के लोग कहते हैं, दक्षिण गुजरात में वापी से तापी (नदियों) तक का क्षेत्र परशुराम नी भूमि है। समंतपंचक कुरुक्षेत्र में भगवान परशुराम का स्थान है। प्राचीन काल से ही भगवान परशुराम के मंदिर, तीर्थ और सरोवर देश के चारों कोनों में पाये गये हैं। उडुपी के अनन्तेश्वर मंदिर में भगवान परशुराम की पूजा लिंग विग्रह के रूप में होती है। केरल के अतिरिक्त आंध्र प्रदेश के राजम्पेट् में मंदिर है। चीन की सीमा से जुड़ा हुआ सुदूर अरुणाचल प्रदेश है, वहाँ के लोहित ज़िले में परशुराम कुण्ड है। मकर संक्रांति के दिन इसमें स्नान करते हैं। उत्तर भारत में भगवान परशुराम का जन्म दिन अक्षय तृतीया के लोकपर्व के रूप मे मनाया जाता है। महाराष्ट्र के नांदेड में परशुराम भगवान की माता रेणुका का मंदिर है, यह स्थान माहुरगढ़ ५१ शक्तिपीठों में से एक हैं। देवदासियों द्वारा कर्नाटक के लोकगीतों में भगवान परशुराम को येलमा का पुत्र कहा जाता है। नीचे राजा रवि वर्मा द्वारा तैयार चित्र दिया गया है... 14/5/24 इस श्वास का उत्स क्या है। न जाती हुई श्वास का अंत मिलता है और न आती हुई श्वास का उद्गम स्थान ज्ञात हो पाता है। जीवन केवल इस श्वास के संधि स्थान का नाम है। श्वास की संधि में जीवन और मरण घटता रहता है। यह जीवन कहाँ से आता है और कहाँ जाता है, इसे जानना श्वास के उद्गम स्थान और विश्राम स्थान को समझने जैसा है। १५/५/२४ प्राचीन वेदांत संप्रदाय में दो मार्ग प्रचलित थे। एक उपासना–मार्ग और दूसरा विचार–मार्ग। उपासना–मार्ग में भूतशुद्धि और चित्तशुद्धि सम्पूर्ण हो जाने के बाद ज्ञान के उदय होने पर ज्ञान के बाद जीवनमुक्ति आयत्त हो जाती है। उसके बाद काल की प्रतीक्षा नहीं रहती। किन्तु विचार–मार्ग में उच्च अधिकारी का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्ति होने पर भी उस ज्ञान के प्रभाव से, देह–मन शुद्ध न होने तक जीवनमुक्ति सिद्ध नहीं होती। इसलिए तांत्रिक दार्शनिकों ने अज्ञान को बौद्ध और पौरुष अज्ञान के रूप में बांटा है, उसी प्रकार ज्ञान को बौद्ध और पौरुष रूप में बांटा है। पौरुष अज्ञान की निवृत्ति सदगुरु की कृपा से क्षण भर में हो जाती है, किन्तु बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति बौद्ध ज्ञान के उदय के बिना नहीं हो सकती। इसी बौद्ध ज्ञान के विकास के लिए तपस्या, साधना, विचार, योगाभ्यास आदि आवश्यक है। बौद्ध ज्ञान के उदय से बौद्ध अज्ञान निवृत्त हो जाने के बाद पूर्व प्राप्त पौरुष अज्ञान की निवृत्ति पौरुष ज्ञान के उदय रूप में अनुभूत होता है। 🌼🥀🌺🌻 (सनातन साधना की गुप्त धारा) श्री गोपीनाथ कविराज जी १७/५/२४ किसी प्रथा के बाह्य कर्मकांड से चिपके बिना उसमे विद्यमान सत्य के प्रति निष्ठा का होना विवेक है। बिना पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के किसी आध्यात्मिक प्रथा में निष्ठा रखना पाखंड है। किंतु आध्यात्मिक प्रथा, सिद्धांत, गुरु इनमें से किसी के प्रति निष्ठा न होना आध्यात्मिक पतन है। २०/५/२४ 'श्रत्' माने सत्य और 'धा' माने धारण करना होता है। सत् को ही महात्मा लोग छिपाने के लिए श्रत् बोलते हैं। निरुक्त में आया है कि श्रदिति सत्य, सत्य नाम। सत्य का नाम है श्रत्। इस पर किसी ने कहा कि तब सत् ही बोलो न! श्रत् क्यों बोलते हो? बोले कि नहीं, यह बात छिपाने की है। अमुक वस्तु सच्ची है- ऐसा धारण करने का नाम श्रद्धा है। और विश्वास? विगत श्वास हो जाना विश्वास है। उसके लिए मुर्दा सरीखे हो जाना पड़ता है। टारे से न टरे, हटाने से भी नहीं हटना - ऐसी निष्ठा अंतःकरण में हो जाना विश्वास है। - स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती २५/५/२४ संसार समय के माध्यम से देखा गया सत्य है। सत्य, 'समय-शून्य' माध्यम से देखा गया संसार है। ओशो गीता दर्शन २६/५/२४ एक अमर भक्त ऋषभदेव की स्तुति : भक्तामर स्तोत्र ऋषभदेव हिंदू परंपरा के भगवान के चौबीस अवतारों में एक हैं। भागवतम् में इनका वर्णन आया है। ऋषभदेव के बड़े पुत्र का नाम था भरत इसलिए इस अजनाभ खंड का नाम ही भरत पड़ गया, आगे चलके भरत से भारत हुआ।वैदिक देव रुद्र के साथ भी उनका नाम आया है, यहाँ ऋषभ का अर्थ बैल कहा गया है। जैन परंपरा के चौबीस तीर्थंकरों में वे पहले हैं, इसीलिए वे आदिनाथ हैं। उनका नाम ही घोषित करता है कि वे नाथ परंपरा के भी प्रस्तोता स्वीकृत हैं। जैन परंपरा में सतत और सर्वत्र गाया जाने वाला भक्तामर स्तोत्र इन्हीं ऋषभदेव की स्तुति है। यह मूल रूप से संस्कृत भाषा में ४८ गेय श्लोकों में निबद्ध है, जिनका अनुवाद देश की कई भाषाओं में हुआ है। कहते हैं एक क्रुद्ध राजा ने आचार्य मानतुंग को ४८ तालों में बंद करके बंदी बना लिया था। आचार्य श्री भक्तामर स्तोत्र के एक एक श्लोक की रचना करते गये और वे ताले एक एक कर टूटते चले गये। भागवत् कथा श्रवण से भी सात दिन की कथा में बांस की सात गाँठे खुलती जाती हैं। मानतुंग के सारे ताले खुलने पर राजा ने क्षमा याचना की। सातवीं सदी में इस स्तोत्र की रचना वसंततिलका छंद में हुई है। आज यह प्रत्येक जैन परिवार में दिन प्रतिदिन गाया जाने वाला अमर स्तोत्र हो गया है. एक श्लोक देखें... वल्गत्-तुरंग-गज-गर्जित-भीमनाद-�माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्।�उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं�त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति: ॥42॥

Friday, May 3, 2024

अप्रैल २४

अप्रैल २०२४ बृहदारण्यक उपनिषद सबसे पुराने और बड़े उपनिषदों में मान्य है। इसमें संवत्सर का प्रयोग इस प्रकार आया है सोऽकामयत, द्वितीयो म आत्मा जायेतेति; स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनाया मृत्युः; तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत् । न ह पुरा ततः संवत्सर आस; तमेतावन्तं कालमबिभः, यावान्संवत्सरः; तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात्; स भाणकरोत्, सैव वागभवत् ॥ १/२/४ ॥ मृत्यु कुछ और नहीं, वरन् वह हमारी भूख का नाम है। सृष्टि उत्पत्ति के क्रम में मृत्यु ने दूसरा रूप निर्मित करने की इच्छा की, यहाँ से प्रजापति द्वारा संवत्सर का अभ्युदय हुआ, इससे पूर्व वर्ष या सम्वत्सर नहीं था। मृत्यु या हिरण्यगर्भ ने जल प्रक्षेपित करके वर्ष निर्माण किया। इसे संवत्सर कहा गया। विराज भी इसे कहा गया है। जल की उत्पत्ति अग्नि से और अग्नि की उत्पत्ति जल से होने के अलग अलग वर्णन मिलते हैं। जल में अग्नि समाहित है। जन्म और लय उसमे लीन हुए रहते हैं। तज्जलानिति। जल ही किसी रचना का हेतु है। इसीलिए पूजा पद्धति में जल का प्रयोग सर्वप्रथम किया जाता है। संवत्सर या वर्ष जन्म से लेकर मृत्यु तक का कालखंड है। संवत्सर ऊँचा पद है। आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है। चैत्र का अर्थ है चित्त का उन्मेष जो करे और प्रतिपदा का अर्थ प्रतिपादन करने से है। आज नव संवत्सर विक्रम वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा २०८१ आरंभ हो रहा है। आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ। 10/4/24 भागवत में आया है- सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में अर्चा-पूजा से जो फल मिलता है, कलियुग में वह केवल भगवन्नाम से मिलता है। इससे स्पष्ट है कि अपने स्वरूप को जानने के लिए ध्यान सर्वोत्तम साधन है। अपना स्वरूप जानना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। ध्यान की अलग अलग विधियां हमारे संत महापुरुष देते हैं, जिन विधियों में ध्यान के तरीके शास्त्र सम्मत ढंग से दिए गए हैं, वे सब उपयोगी हैं, बस उनमें से जो हमें गुरुदेव बताएं उस पर श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ते रहें। गुरु को ध्यानमूल कहा गया है ध्यानमूलं गुरुः मूर्ति। वैसे अगर शांतचित्त होकर सिर और रीढ़ सीधी करके ही बैठने का अभ्यास बना लिया जाए तो भी बहुत उपयोगी है, अच्छे अर्थों में रीढ़ सीधी रखने का मुहावरा यूं ही नहीं चल रहा है। ध्यान की कुछ तकनीकें अवश्य ऐसी हैं, जिन पर चलने से व्यक्ति गन्तव्य तक शीघ्र पहुँचता है... मनुष्यों के लिए जितनी बातें सुनने, स्मरण करने या कीर्तन करने की हैं, उन सबमें ध्यान की विधियों को जानने का राजा परीक्षित का प्रश्न श्री शुकदेव स्वामी ने सर्वोत्तम बताया है। आगे श्री शुकदेव जी ने कहा है.. अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम्। मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन्।।2/1/17 फ़ेसबुक से २०२० में आज की पोस्ट ११/४/२४ भेद से अभेद दशा का नाम मोक्ष है। भेद से अभेद को प्राप्त होकर भेद में होना प्रेम है। अर्थात् प्रेम बिना मुक्ति के संभव नहीं है। गुरु व्यक्ति नहीं, न कोई व्यक्ति ही गुरु हो सकता है। अखंड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरं। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥ १६/४/२४ सापेक्ष जगत् में वस्तु, व्यक्ति और परिस्थिति निरपेक्ष होकर रहना वस्तुतः जीवन का रहस्य है। ध्यान में बैठे बिना व्यक्ति को वास्तव में समस्या क्या है! इसी का पता नहीं चल पाता है। जब तक समस्या ज्ञात नहीं होगी, उसका निदान कैसे संभव है! १७/४/२४ रामचरित चिंतामणि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥ जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥ श्री रामचन्द्रजी का चरित्र सुंदर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर शृंगार है। श्री रामचन्द्रजी के गुण-समूह जगत्‌ का कल्याण करने वाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधाम के देने वाले हैं॥ सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥ भावार्थ- ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोग का नाश करने के लिए देवताओं के वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये सीताराम के प्रेम के उत्पन्न करने के लिए माता-पिता हैं और संपूर्ण व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं। We often translate Rashtra as a nation. But these are not the same. Our concept of Rashtra has evolved over a period of 7,000 years or more. For us, Rashtra is not defined or determined by mundane political or territorial boundaries. Rashtra is a cultural and spiritual entity that transcends beyond the political boundaries. Rashtra etymologically means an instrument or tool to attain moksha. It has a universal purpose also. नाध्यात्मेन विना बाह्यं नाध्यात्मं बाह्यवर्जितं ।
सिद्धये ज्ञानक्रियाभ्यां तद्द्वितीयं संप्रकाशते ॥ पादांगुष्ठाग्रतो व्यक्ता नाभितो हृदयं गता ।
सुषुम्ना नाम सा ज्ञेया ब्रह्मरन्ध्राब्ज निर्गता ॥ अनायासेन मरणम्, बिना दैन्येन जीवनम्। देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्।। अनायास ही मृत्यु, बिना दैन्य(दीनता,गरीवी,किसी चीज की कमी) अर्थात् दैन्यहीन जीवन हो। और जब भी मृत्यु आये तो वह भी आपके सानिद्य में आये। हे प्रभु!यह मुझे प्रदान करें। १८/४/२४ गोरखपुर का गोरखनाथ के नाम से चाहे जितना नाम हो, पर योग को पश्चिमी जगत् में पहुँचाने का श्रेय परमहंस योगानंद जी को ही जाता है। गोरखपुरवासी नागरिकों को चाहिए कि देशवासी उनके सपूत के इस अवदान को याद करें। उनकी योगी कथामृत जब से छपी है, श्रेष्ठ और बेस्ट सेलर में बनी हुयी है। गोरख बाबा के योग को दुनिया से व्यावहारिक रूप में परिचय तो वस्तुतः योगानंद जी ने ही कराया है। बहुत कम ऐसा देखा जाता है, उनकी पद्धति उनके जाने के बाद भी व्यवस्थित ढंग से चल रही है। 🙏 १९/४/२४ आत्मा की परमात्मा से मिलन की आकांक्षा को सूफ़ी संतों ने कितने ढंग से उकेरा है कि वे लोकगीत बन गए....आज भी जगह जगह गाए जा रहे हैं। फ़िल्मों से होते हुए वे विवाह गीत बन गए हैं। काहे कों ब्याही रे बिदेस रे सुन बाबुल मोरे। हम तौ बबुल तोरे अंगना कौ कूरा झरि-पुछि कें फिक जांय रे । सुन बाबुल मोरे। हम तौ बबुल तोरे बाग की कोयल कूकत पर घर जांय रे । सुन बाबुल मोरे। हम तौ बबुल तोरे खूंटा की गैयां, जित हांकौ हंकि जांय रे । सुन बाबुल मोरे। हम तौ बबुल तोरे खेत की चिरियां,चुगि-चुगि कें उड जांय रे । सुन बाबुल मोरे अमीरखुसरो २१/४/२४ सफलता वास्तव में क्या है! यह है जो कार्य अधूरे हैं, जिनका अंतराल है, उन्हें पूरा करना। 22/4/24 अनुत्तराष्टिका सङ्क्रामोऽत्र न भावना न च कथायुक्तिर्न चर्चा न च ध्यानं वा न च धारणा न च जपाभ्यासप्रयासो न च । तत्किं नाम सुनिश्चितं वद परं सत्यं च तच्छ्रूयतां न त्यागी न परिग्रही भज सुखं सर्वं यथावस्थितः ॥ १॥ संसारोऽस्ति न तत्त्वतस्तनुभृतां बन्धस्य वार्तैव का बन्धो यस्य न जातु तस्य वितथा मुक्तस्य मुक्तिक्रिया । मिथ्यामोहकृदेष रज्जुभुजगच्छायापिशाचभ्रमो मा किञ्चित्त्यज मा गृहाण विलस्वस्थो यथावस्थितः ॥ २॥ पूजापूजकपूज्यभेदसरणिः केयं कथानुत्तरे सङ्क्रामः किल कस्य केन विदधे को वा प्रवेशक्रमः । मायेयं न चिदद्वयात्परतया भिन्नाप्यहो वर्तते सर्वं स्वानुभवस्वभावविमलं चिन्तां वृथा मा कृथाः ॥ ३॥ आनन्दोऽत्र न वित्तमध्यमदवन्नैवाङ्गनासङ्गवत् दीपार्केन्दुकृतप्रभाप्रकरवत् नैव प्रकाशोदयः । हर्षः सम्भृतभेदमुक्तिसुखभूर्भारावतारोपमः सर्वाद्वैतपदस्य विस्मृतनिधेः प्राप्तिः प्रकाशोदयः ॥ ४॥ रागद्वेषसुखासुखोदयलयाहङ्कारदैन्यादयो ये भावाः प्रविभान्ति विश्ववपुषो भिन्नस्वभावा न ते । व्यक्तिं पश्यसि यस्य यस्य सहसा तत्तत्तदेकात्मता- संविद्रूपमवेक्ष्य किं न रमसे तद्भावनानिर्भरः ॥ ५॥ पूर्वाभावभवक्रिया हि सहसा भावाः सदाऽस्मिन्भवे मध्याकारविकारसंकरवतां तेषां कुतः सत्यता । निःसत्ये चपले प्रपञ्चनिचये स्वप्नभ्रमे पेशले शङ्कातङ्ककलङ्कयुक्तिकलनातीतः प्रबुद्धो भव ॥ ६॥ भावानां न समुद्भवोऽस्ति सहजस्त्वद्भाविता भान्त्यमी निःसत्या अपि सत्यतामनुभवभ्रान्त्या भजन्ति क्षणम् । त्वत्संकल्पज एष विश्वमहिमा नास्त्यस्य जन्मान्यतः तस्मात्त्वं विभवेन भासि भुवनेष्वेकोप्यनेकात्मकः ॥ ७॥ यत्सत्यं यदसत्यमल्पबहुलं नित्यं न नित्यं च यत् यन्मायामलिनं यदात्मविमलं चिद्दर्पणे राजते । तत्सर्वं स्वविमर्शसंविदुदयाद् रूपप्रकाशात्मकं ज्ञात्वा स्वानुभवाधिरूढमहिमा विश्वेश्वरत्वं भज ॥ ८॥ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादैर्विरचितानुत्तराष्टिका समाप्ता ॥ 23/4/24 शास्त्र से ज्ञात होता है कि ब्रह्म एक , अखण्ड और अद्वैत होने पर भी परब्रह्म और शब्दब्रह्म इन दो विभागों में कल्पित होता है । शब्दब्रह्म को भलीभाँति जान लेने से परब्रह्म की प्राप्ति होती है । " शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्मादिगच्छति ।" शब्दब्रह्म का स्वरूप जानना और उसे जानकर उसका अतिक्रमण करना , यही मुमुक्षु का एकमात्र लक्ष्य है । उसका अतिक्रमण किये बिना विशुद्ध परमतत्व रूप चैतन्य का साक्षात्कार सम्भव नहीं है । जिसे प्रणव या ॐकार कहते हैं , यही शब्दब्रह्म है । उपनिषद , शाक्त - शैवागम योग शास्त्र आदि में लिखा है कि प्रणव को भलीभाँति जानना आवश्यक है , क्योंकि वह परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय तो है ही , साथ ही परब्रह्म से अभिन्न रूप भी है । माण्डूक्योपनिषद में इसका काफी वर्णन है । ॐकार में मात्राएँ हैं और उसका अमात्रक अर्थात मात्राहीन शुद्ध रूप भी है । उसकी मात्रायुक्त अवस्था के भी दो भेद हैं -- एक शुद्ध , दूसरा अशुद्ध । उसके मात्रायुक्त शुद्ध -रूप का परिचय योगियों को मिलता है । अमात्रक -अवस्था अप्रमेय , अखण्ड है , उसके आदि अन्त का निर्णय नहीं हो सकता । ॐकार - साधन पृष्ठ 414 भारतीय संस्कृति और साधना ३०/४/२४ " भारत दार्शनिक देश है "यानी भारत का अत्यन्त साधारण आदमी भी चाहे जितना व्यभिचारी , इन्द्रिय-लोलुप क्यों न हो,पुराने जमाने से चली आयी विचारमालिका को दुहराता रहता है। 'जीवन क्या है ?मृगतृष्णा है' ;'जीवन क्या है ?आखिर मरना है!'- इस तरह के उदगार यदि आत्मा की सफलता के चिह्न हैं तो उनकी कीमत भी है।परन्तु साधारणतःवे साधारण दार्शनिक वाक्य जन-साधारण के लिए ऐसे नहीं होते। उनका अर्थ अनुभूति द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता। ऐसी परिस्थिति में फिलासफी कभी भी जन-साधारण को सत्पथ पर नहीं चला सकती,ऐसा मेरा ख्याल है।"- मुक्तिबोध