Tuesday, October 27, 2015

कबीलाई समाज में मातृसत्ता

कबीलाई समाज में मातृसत्ता
डॉ राकेश नारायण द्विवेदी

स्त्री के समर्थन में हमारे यहां इस लोक को संपुट की तरह व्यवहृत किया जाता है
 ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रभंते तत्र देवता।
 यत्रैतास्तु न पूज्यंते सर्वास्तत्राऽफला क्रिया।।’’
अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां ऐसा नहीं होता, वहां किए गए सारे कार्य निफल हो जाते हैं। मनुस्मृति का यह पद वस्तुतः देा के कबीलाई या आदिम संस्कृति के मनुयों को देखकर रचा गया होगा। आदिम संस्कृति आदिवासियों या गिरिजनों की संस्कृति है जो कबीले के रूप में रहते रहे, जिन्हें जनजातीय समाज भी कहा जाता है। इस आदिवासी संस्कृति में स्त्री दुर्दाा उस रूप में नहीं पाई जाती, जिस रूप में यह ोा समाज में विद्यमान है।
भारतीय वाङमय में पाए जाने वाले अनेक उदाहरण यह साफ करते है कि ाुरूआत के मानव समाज में जब ग्राम-नगरों आदि का गठन नहीं हुआ था मानव समूह कबीलों में रह रहे थे तब उनमें मातृसत्ता का पूर्ण प्रभाव था।
आज भी हम देखते हैं कि प्रत्येक गांव में कम से कम एक मातृदेवी की पूजा प्रचलित है। अक्सर ऐसी देवी का कोई ख़ास नाम नहीं होता, इन देवियों के निराले नाम देखकर ऐसा लगता है कि इनका संबंध छोटे-मोटे जनजातीय समूह से रहा है जो अब या तो निःोा है या सामान्य देहाती आबादी मेंे इस कदर घुलमिल गया है कि उसका कोई चिन्ह ोा नहीं है। इन देवियों की पुरातनता इस बात से प्रमाणित होती है कि इनमें से किसी के कोई पुरुा संगी या पति नहीं है। ये देवियां हैं तो माताएं (मात्देवियां) किंतु अविवाहित हैं। जिस समाज में इनका उद्भव था, उसकी दृटि में किसी पिता का होना आवयक नहीं था। आगे चलकर इनका ब्याह किसी पुरुा देवता से होने लगा। मातृदेवियों की पूजा पद्धतियां उस ज़माने की हैं, जब घर बनाने का चलन नहीं था और जब गांव चलते-फिरते हुआ करते थे। प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक ने अपनी पुस्तक ‘स्थान-नाम समय के साक्षी’ में स्थान-नामों के उत्स पर विचार करते समय यह रेखांकित किया है कि आदिवासी लोकमाताओं के नाम पर ही प्रारंभ में स्थानों का नामकरण किया गया।
कबीलाई या आदिवासी समाज में दो ऐसी परंपराएं हजारों र्वाों से चली आ रही हैं, जिन्हें विव में आज के उत्तरोत्तर आधुनिकतावादी समाजों में प्रचलित देखकर अचरज होता है कि यह तो हमारे आदिवासियों में प्रारंभ से ही विद्यमान है। भारत की सभ्यता और संस्कृति को निर्मित और विकसित करने में आदिवासियों का प्रस्थानिक योगदान है। डॉ सुनीति कुमार चाटुर्ज्या मानते थे कि ‘निााद लोगों ने भारत की ग्रामीण सभ्यता की नींव डाली थी। आदिवासियों ने साहित्य-संगीत के ाुद्ध स्वरूप को प्रस्तुत कर आदिमानव के उर्त्का को बहुरूपों में प्रस्तुत किया।
प्राचीन भारत में मातृसत्ता की विद्यमानता इन आदिवासियों के यहां जिन रूपों में पाई जाती है, उसके चिन्हों को हम आदिवासियों की इन दो परंपराओं में देख सकते हैं-
1-भगोरिया- यह पर्व होली के समानांतर होता है, जो भील आदिवासियों में सामुदायिक रूप से मनाया जाता है। युवा-युवतियों के लिए यह पर्व चयन और चुनौती तथा नई फसल की दृटि से उमंग और उल्लास का प्रतीक है। भीलों के आराध्य भगोरदेव के नाम पर संभवतः इसे भगोरिया कहा गया अथवा यह भगोर-गोती भीलों द्वारा आरंभ किए जाने के कारण अथवा भीलों पर ौव प्रभाव (भग अर्थात् ािव एवं गौर अर्थात् पार्वती) के कारण प्रचलित हुआ है।
इस पर्व में चंद्रमुखी प्रेमिका या बलिठ युवक अपने भाग्य की संपन्नता का परीक्षण करते हैं। स्वकीय सौंदर्य और पराक्रम को निखारकर अपने आमोद-प्रमोद को अधिक वाचाल बनाते हैं, जाति-कुल की मर्यादा को जीवित रखते हैं एवं प्रेम-स्नेह जनित भावनाओं को मूर्त रूप देकर सुखद अनुभूतियों को उल्लसित करते रहते हैं। सांसारिक सुखों में डूबकर एक समय वे ऊबकर विरति की देहरी का र्स्पा करने लगते हैं। यही सुख साम्राज्य की चरम परिणति है, जिसे ‘मोक्ष’ कहा गया है। वन-प्रांतर में दैनिक जीवन-यापन करते हुए युवक-युवती पारस्परिक परिचय के माध्यम से कुल आदि का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। वे गंधर्व विवाह की गहरी रेखाएं अंकित कर मनोनुकूल जीवनसाथी का चयन कर लेते हैं। स्वयंवर का यह मनोहारी रूप बड़ा रोचक और स्मरणीय होता है।
इस तरह पर्व के माध्यम से हम जान सकते हैं कि आदिवासियों का जीवन-र्दान एक खुली हुई क़िताब के समान है, जिसमें न किसी प्रकार का दुराव है और न किसी भांति की दुप्रवृत्ति अंकुरण की गुंजाइा। आदिवासी वैवाहिक जीवन की सफलता का यह एक रहस्य भी है कि इसमें पारस्परिक प्रेम (रति) की पूर्णता रहती है, स्त्री को कामवस्तु नहीं समझा जाता, एक-दूसरे की चिर-पहचान कभी आन बनती है तो कभी सम्मान की सिंदूर-सुामा परिवार-समाज की धरोहर बनती है।
होली के ठीक पहले आदिवासी क्षेत्रों में भगोरिया के मेले लगते हैं। भगोरिया की कल्पना मात्र से आदिवासियों का आदिमन स्वतः नाच उठता है। मेले में युवक द्वारा युवती को गुलाल लगाया जाता है और युवती द्वारा पान खाना स्वीकार किया जाता है। स्वयंवर प्रथा का यह प्रारंभिक चरण है, जिसे स्वयंवर में परिणत होने का सूचक माना जाता हैं। एक-दूसरे को चुनने के बाद यह युग्म घर नहीं लौटते, बल्कि कहीं भाग जाते हैं। कुछ दिन स्वच्छंद घूमने के बाद ये जोड़े जब अपने घर लौटते हैं तो कुछ प्रथाओं की पूर्ति करने के बाद इसे विवाह की मान्यता प्रदान कर दी जाती है। विवाह संपन्न होने पर दावत दी जाती है।
समय परिवर्तन के साथ इस पर्व का रूवरूप बदल गया है। एक समय युवक इस पर्व के माध्यम से अपनी जीवन सहचरी को सुगमता से प्राप्त कर लेता था, किंतु अब वधू-मूल्य इतना बढ़ गया है कि धनाभाव से संत्रस्त आदिवासी नौजवान हजारों रुपए की धनरााि को जुटाने में अपनी जवानी के ओज को यों ही खो देते हैं। पलसूद स्थान का भगोरिया सर्वश्रेठ माना गया है। ध्यातव्य है कि आज ोा समाज में दहेज प्रथा इसके विपरीत रूप में प्रचलित है।
2- गोतुलः- गोतुल सांस्कृतिक दृटिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है। इस संस्था से पता चलता है कि आदिवासी अपने युवक-युवतियों की प्रगति के लिए कितने सजग हैं। प्रायः समस्त आदिवासियों में ‘गोतुल’ नामक संस्था की स्थापना का प्रचलन है। बोली की विविधता के कारण विभिन्न आदिवासी समाजों में इस संस्था के भिन्न-भिन्न नाम हैं। मुड़िया (मुरिया) इसे ‘घोटुल’ कहते हैं तो भुइयां समाज में यह ‘धंगर बस्सा’ नाम से पुकारी जाती है। मुंडा एवं हो इसे ‘गतिओरा’ कहकर संबोधित करते हैं। उरांव आदिवासियों में यह संस्था ‘धुमकुरिया’ कही जाती है। इसी प्रकार असम के नागा लोग इसे ‘याकिचुकी’ कहा करते हैं। उत्तर-प्रदेा के वनवासी-समाज ने इस उपयोगी संस्था को ‘रंग-बंग’ नाम से अभिहित किया है। इस संबंध में यह जानना आवयक है कि यह संस्था पूर्णरूपेण अविवाहित कुमारों एवं कुमारियों के लिए ही है। विवाहितों का यहां प्रवेा निािद्ध है। रात में कुमार-कुमारी इस मोहक-गृह में रहकर जीवनोपयोगी कई बातों को सीखते हैं। उन्हें इस गृह में सामाजिक एवं धार्मिक तथ्यों से अवगत कराया जाता है।
कहा जाता है कि यह ‘घोटुल’ आदिवासियों के लिंगो देवता का वरदान है। ‘घोटुल’ डिंडामहल अर्थात् अविवाहितों का राजप्रासाद है।
साधारणतः ‘गोतुल’ गांव के पास हरे-भरे जंगल में बनाए जाते हैं, इन्हें कुमार-कुमारियां बड़े चाव से बनाते हैं। दीवारों पर कई देवी-देवताओं की आकृतियां विविध रंगों में चित्रित की जाती हैं। युवा-गृह में एक बड़ा लंबा कमरा होता है, जो घास-फूस से छाया जाता है। इसमें प्रवेा के लिए एक छोटा सा दरवाजा बनाया जाता है। संध्या होते ही गांव के कुमार एवं कुमारियां इस गृह में जाते हैं और इसकी सफाई करने में लग जाते है। कतिपय आदिवासी जातियों में कुूमारों के लिए पृथक् और कुमारियों के लिए अलग ‘गोतुल’ होते हैं, लेकिन ऐसे भी कई रंगबंग (घोटुल) हैं, जिनमें अविवाहित युवक-युवतियां साथ रहते हैं। यहां नृत्य-गानादि की ािक्षा भी दी जाती है और यौन विायक प्रािक्षण भी इन ‘गोतुलों’ में उपलब्ध होता है। मद्यपान और भोजन के बाद ाीतकाल में युवागृह के प्रांगण में अलाव जलाए जाते हैं, जिनके पास बैठकर कहानियां सुनाकर मनोविनोद किया जाता है। कामाास्त्र की ािक्षा इन गृहों में अनुभवी प्रौढ़-प्रौढ़ाएं ही देती हैं। अपनी इच्छानुसार युवक युवतियों को चुनते हैं और फिर विधिवत् इनका विवाह संपादित किया जाता है। कहा जाता है कि ‘गोतुल’ में गर्भाधान वर्जित है, लेकिन प्रेम स्वातंत्र्य के कारण यहां कभी-कभी चारित्रिक पतन भी हो जाता है।
वरिठ सहायक प्रोफेसर, हिंदी गांधी महाविद्यालय, उरई (जालौन)-285001 मोबाइल 9236114604

सोनी सिंह का कहानी संग्रह 'क्लियोपेट्रा' और स्त्री प्रश्न

युवा लेखिका सोनी सिंह का कहानी संग्रह 'क्लियोपेट्रा' सामयिक प्रकाशन से वर्ष २०१४ में आया है। १७६ पृष्ठ के इस संग्रह में आठ कहानियां हैं।  कहानियों को बहुत ही बोल्ड और बेबाक अंदाज में लिखा गया है। इन कहानियों में स्त्री अपनी देह स्वतंत्रता को हासिल करती है किंतु पुरुष सत्ता की दुरभिसंधियां कैसे उसकी उपलब्धियों का दिवाला निकालती है, इसका सुंदर चित्रण हुआ है।
संग्रह की कहानी चक्रव्यूह में दो बहनें अपने अपने क्षेत्र में शीर्ष स्थान पर अपनी योग्यता से बढती हैं किंतु अंत में दोनों को किस तरह निराशा के गर्त में जाना पडता है। इस कहानी से दो बडी महत्वपूर्ण उद्भावनायें प्रकट होती हैं एक तो यह कि पुरुष सत्ता किस तरह उसे आगे जाने से रोकती है, पराभूत करने में मजा लेती है और सदा अपने अधीन रखना चाहती है, दूसरी व्यंजना यह कि अति महत्वाकांक्षा किस तरह हताशा, कुंठा और अवसाद का कारण बनती है।
'खेल' कहानी में स्त्री और पुरुष का पोर्नोग्राफिक विवरण होते हुये भी वह उत्तेजना और सनसनी नहीं दिखाई गयी है, जैसी इस प्रकार के साहित्य या विजुअल्स में पाई जाती है। वर्जित प्रसंगों को कितनी सहजता से सोनी सिंह कथ्य में बुनती हैं, बिना उन शब्दों का प्रयोग किये, कि सारा दृश्य उपस्थित हो जाता है। सारी कहानी स्त्री पुरुष की मैथुन प्रक्रिया में घूमती है किंतु अंत यहां भी स्त्री की अतृप्ति में होता है।
'देहगाथा' वास्तव में योनिकथा है, जिसका यही नाम लेखिका ने रखा था, जिसे बोल्डनेस और बेबाकी के लिये प्रसिद्ध राजेन्द्र यादव चाहते हुये भी इस नाम के साथ हंस में नहीं छाप सके, क्योंकि लेखिका इसी शीर्षक से कहानी छपवाना चाहती थीं। संग्रह में भी यह देहगाथा के नाम से प्रकाशित है, पर है यह योनि की त्रासद गाथा ही, योनि को केन्द्र में रखकर लेखिका ने स्त्री जाति की अंतर्वेदना को प्रस्तुत किया है।  पुस्तक के कवर पर पीछे योनि चित्र भी दिया हुआ है, चित्र में योनि पर बूंद कमल के ऊपर लगा जाला प्रतीकार्थ में स्त्री की त्रासदियों को व्यक्त करता है। सोनीसिंह ने संग्रह की अन्य कहानियां भी ऐसे प्रतीकों के सहारे लिखी हैं। वह अपने एक अन्य लेख में दास कैपिटल की तरह योनि कैपिटल लिखे जाने के पक्ष में हैं, क्योंकि इसे कुछ शुद्धतावादियों ने नासूर बना दिया है।
'गाडफादर का फेमिनिस्ट फार्म' कहानी में स्त्रियों को महत्वाकांक्षी उडान भरने के लिये कैसे छला जाता है। स्त्री लेखिकाओं और उनके आकाओं पर यह कहानी अच्छा तंज कसती है।
अन्य कहानियों में लिव इन रिलेशनशिप के पहलुओं के वर्णन और स्त्री की उन्मुक्तता है, सोनी सिंह अपनी आकांक्षा सिद्धि में देह को एक उपकरण बनाने वाली स्त्रियों को वीरांगनायें कहती हैं उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं लगता, क्योंकि लेखिका की नजर में स्त्री का व्यक्तित्व जब तक योनि में कैद रहेगा, उसे आजाद होने के लिये संघर्ष ही करना पडेगा। इस बात को उन्होंने 'क्लियोपेट्रा' कहानी, जो संग्रह की प्रतिनिधि कहानी भी है, में भली भांति व्यक्त किया है। क्लियोपेट्रा, जो इजिप्ट की यौन स्वतंत्रता की प्रतिमूर्ति है, इसके बल पर वह वहां की रानी बन जाती है, इसी के समानांतर भारत की सांवरी का चरित्र लेखिका ने गढा है। सांवरी भी यौन स्वतंत्रता के सहारे धनबल से समृद्ध हो जाती है अब वह चुनाव लडने की तैयारी करती है। कहानी में यहां तक तो स्त्रियां आगे जाती हैं, पर इससे आगे जब बढने लगती हैं तो क्लियोपेट्रा द्वारा स्वतंत्र दरबार लगाने पर वहां के राजा द्वारा जहरीले सर्पों से डसवाकर मरवा दिया जाता है, पुस्तक के आवरण पर सर्पों के बीच क्लियोपेट्रा सुशोभित है। वहीं सांवरी को उसके पति द्वारा ही गुंडों को सुपारी देकर मरवा देते हैं, क्योंकि वह अब राजनीतिक इच्छाशक्ति रखने लगी थी।
स्त्री विमर्श में सबसे अधिक जो विवाद का बिंदु है, उसी पर लेखिका की यह कहानियां केंद्रित हैं। इस विमर्श में यह प्रश्न अभी भी विचारणीय बना हुआ है कि सामाजिक तानाबाना और जो अपने देश की विवाह संस्था है, उसका क्या होगा! क्या यह भी एक तरह का भ्रष्टाचार नहीं, जिसमें देह को उपकरण बनाकर स्त्रियां अपनी महत्वाकांक्षा पूरी कर रही हैं। कौन कितनी ज्यादा बोल्ड, बहस भी इसे करार देते हैं। इस पर मुझे यही कहना समीचीन लगता है कि स्त्रियां स्वयं समाज के आधे और महत्वपूर्ण वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, उन्होंने भी राष्ट्र और समाज के उन्नयन की दृष्टि से प्रतिमान बनाये होंगे, उन्हें भी उन्ही जिम्मेदारियों का अहसास होगा, जिनका 'ठेका' पुरुष सत्ता उठाती आई है। फिर इसे हम उस प्रतिक्रिया के रूप में भी ले सकते हैं, जिसमें तमाम मर्द उपदेश देते हैं ये करो वो करो न करो। रात में न निकलो, ऐसे कपडे न पहनो, लडकों से गलती हो जाती है, मेरी कोई होती तो गोली मार देता आदि आदि और दम यह कि हम 'मर्द' हैं तो उसकी प्रतिक्रिया स्त्री समाज से इस तरह आती है तो अचरज क्यों हो!  लेखिका स्त्रीपुरुष के अंतरंगतम प्रसंगों के प्रचंड आवेगों को जो शिल्प देती हैं, वह किसी के लिये आसान नहीं है और इस कृति का इस रूप में स्वागत होना चाहिये। जिस तरह हम पुरुष पर विश्वास करते आये हैं, स्त्रियों पर भी करके देखें, जो निराशा और कमी अब तक देखी गयी, शायद अब वह न रहे, मैं नाउम्मीद नहीं हूं।
डा राकेश नारायण द्विवेदी
वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर, हिंदी
गांधी महाविद्यालय, उरई (जालौन)
मोबाइल 9236114604

मातृभाषा राजभाषा और राष्ट्रभाषा

मातृभाषा राजभाषा और राष्ट्रभाषा
भारतेंदु हरिश्चंद ने कओ है - निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौ मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय कौ सूल ।।
इतै निज भाषा कौ अर्थ मातृभाषा सें है, जौन भाषा जनम के समय से ही बालक सुनत और सीखत हैं, उ भाषा खों मातृभाषा कओ जात है। जा भाषा में जो मिठास और अपनत्व होत है बौ धरतीभर में दुरलभ है । रबींद्रनाथ टैगोर ने मताई के दूद के समान ही मां की बोली खों मानो है। ई तरा से जो आदमी जी बोली के आंचल जनमत है और अपनों कामकाज करत है बा बोली उ के लाने मातृभाषा कई जात है। हमाई मातृभाषा बुंदेली है । बंुदेलखंड भारत को जिउ मानो जात और उ जिउ की जा बोली बुंदेली है।
बोली और भाषा में मुक्ख अंतर उ की ब्यापकता को होत है। बोली को छेत्र सीमित होत जबकि भाषा को छेत्र ब्यापक । बोली को ब्याकरण होबौ जरूरी नइयां लेकिन भाषा को ब्याकरण होबो जरूरी मानो जात है। बोली और भाषा में जे अंतर कैबे सुनबे भरके लानें हैं, काए सें के ब्रज एक बोली है लेकिन उ के संगे हम भाषा लगाउत है । जा बोली में समृद्ध साहित्य रचो गओ है जा सें जा बोली सम्मान पाकें भाषा कई जान लगी। दूसरें, खड.ीबोली जो हमाई सरकार के कामकाज के माध्यम की भाषा है। भारत की राजभाषा जेई है, जीखों बोली कही जात है लेकिन है जा भाषा।
भारत की राजभाषा ऑफिशियल लेंग्वेज संबिधान के अनुच्छेद 343 की उपधारा 1 के अनुसार हिंदी, लिपि देवनागरी और अंकन कौ सरूप अंतरराश्टीय है, जी देश कौ सरकारी कामकाज जौन भाषामें करो जात उएै राजभाषा कई जात है। जबअपने देश  में 14 सितंबर 1949 के दिन हिंदी खों राजभाषा के रूप में मंजूर करो गओ तब पं0 नेहरू जैसे कछू लोगन ने कई कै अबे सरकारी कामकाज निपटाबे के लानें शब्दनके मायने पारिभाषिक शब्दावली को बिकास होबे मेंसमय लगै सो 15 सालके लाने अंगरेजी खों सह राजभाषा बना दओ जाबे। ई तरा हिंदी के संगे अंगरेजी खों  संगलगेठी राजभाषा बना दओ गओ। जबकि अपने देश में जबसे संस्कृत कमजोर होत गई प्राकृत अपभ्रंश सौरसेनी आदि नाव सें भाषा बदलत रई। अपनी बोलचाल की भाषाउ बुंदेली पूरे देश में छाई रई। कछू प्रांत अपवाद हैं। आज दुरभाग्य सें ब्यावहारिक स्थिति जा बन गई है कि सबरौ कामकाज अंगरेजी में निपटाओ जान लगो और हिंदी केवल अनुवाद की भाषा बन कें रे गई। 15 साल के लाने बनी सहराजभाषा अंग्रेजी खों आंगे बनाए रखबे या हटाए रखबे के लाने 1965 में प्रस्तावआओ, ई पै कई राज्यन नें आपत्ति जताई,भौतई मंथन भओ, तबइ पं0 नेहरू ने निष्कर्ष दओ के जब तकदेश कौ एक राज्य  भी हिंदी खों एकमात्र राजभाषा बनाए रखबे में आपति करै, तब तक हिंदी खों अकेली राजभाषा   नई बनाओ जैहै और जा स्थिति ऐसी बन गई कि देश के 29 राज्य जब तक एक साथ हिंदी खों अकेले राजभाषा बनाबे के लाने सहमत नइ हुइएं तबलों हिंदी खों दोयम दरजा दओ जात रैए। नागालैंड जैसे राज्यन में तो बाकायदा अंगरेजियइ खों राजभाषा बना रखो
राश्टभाषा नैशनल लैंग्वेज किसी समूचे राश्ट में बोली और ब्यवहार में जी भाषा खों प्रयोग करो जात उए राश्टभाषा कओ जात है । अपने देश में कैउकन भाषाएं जुदेजुदे अंचलन में प्रयोग में लाई जात                                                                        

'कई चाँद थे सरे आसमां' की समीक्षा

थाइलैंड और उसका जनजीवन

थाइलैंड और उसका जनजीवन

डा राकेश नारायण द्विवेदी

15 से 21 अक्टूबर 2013 को संपन्न मेरी थाइलैंड यात्रा न केवल पहली विदेश यात्रा थी, वरन् यह पहली बार की हवाई यात्रा भी थी । मात्र साढ़े चार घंटे की हवाई यात्रा से दक्षिण पूर्व एशिया के इस सुंदर और संपन्न देश में पहुंचा जा सकता है । दुनिया के कुछ देशों में जाने के लिये अग्रिम वीज़ा लेने की आवश्यकता नहीं है, थाइलैंड भी उनमें से है । यहां पासपोर्ट धारक सीधे पहुंचकर वीज़ा आन अराइवल की सुविधा ले सकते हैं । इसमें भी अगर पंक्ति में खड़े होने की असुविधा से बचना है तो दो सौ बाट अतिरिक्त देकर अलग काउंटर से वीज़ा बनवा सकते हैं । एक हज़ार बाट यहां की वर्तमान वीज़ा फीस है । बाट थाइलैंड की मुद्रा का नाम है, जिसकी दर वर्तमान में दो रुपये में एक बाट की है । अमेरिकन डालर से बाट खरीदे जाते हैं । जिस तरह वर्तमान में अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, उसी तरह अमेरिकन डालर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा है । लगभग तिरसठ रुपये में एक डालर खरीदा गया । नियमानुसार थाइलैंड वीज़ा प्राप्त करने के लिये न्यूनतम पांच सौ डालर या एक हजार पाच सौ बाट अपने साथ रखने आवश्यक होते हैं । जब मुझे यह मेरे टूर निर्देशक और विश्व हिंदी मंच के अध्यक्ष डा प्रणव शर्मा ने बताया तो मेरी प्रतिक्रिया थी कि कदाचित् फोकटिया लोगों की आवश्यकता ऐसे देशों को नहीं है ।

गो इंडिगो के जिस विमान से यात्रा हुयी, उसमें तीन तीन कुर्सियां होती हैं, जो भारतीय रेल के कुर्सीयान का स्मरण कराती हैं । रेलों में एयर होस्टेज की तरह नवयुवतियों की सेवायें उपलब्ध नहीं होतीं, पर विमानों में ये निशुल्क पेयजल देती हैं । शुल्क भुगतान करने पर खानपान की सुविधा भी प्राप्त होती है । विमान में लघुशंका करने के बाद फ्लश चलाने पर पानी नहीं निकलता, वरन् सोख्ता करके कमोड की सफाई होती है । कमोड में पानी से गुदा प्रक्षालन की सुविधा नहीं थी, पानी की खाली बोतल होस्टेज से लेकर काम चलाना पड़ता है । पता नहीं कैसे कुछ व्यक्ति बिना पानी प्रक्षालन किये हुये, टिसू पेपरों से पोंछकर ही काम चला लेते हैं । यह स्थिति बैंकाक के होटल रायल पैलेस में भी रही, जिसमें हम लोग तीन दिन ठहरे । बिहार के एक सज्जन को अत्यधिक परेशानी हुयी, उन्होंने कहा, हम तो पेपर पढ़ते है, उससे यह काम नहीं किया जा सकता ।

थाइलैंड के लोग शांत प्रकृति एवं अपने काम से काम रखने वाले होते हैं । धीरे से अपनी बात रखते हैं । चीखने चिल्लाने से दूर रहते हैं । गौर वर्णी, नाटा क़द, चौड़ा माथा, उन्नत उरोज और पुष्ट जंघाओं वाली थाई युवतियों की आंखें कुछ धंसी हुयी होती है, इसीलिये वे अपनी आंखों पर प्राय: आइलिड लगाती हैं । यहां की महिलायें छोटे किंतु निजी अंगों को ढंके हुये वस्त्र पहनती हैं । साड़ी यहां भारतीय स्त्रियां ही पहने हुये मिलेंगी ।  पुरुषों का पहनावा भारतीय पुरुषों से भिन्न नहीं है । ४४अक्षरों वाली थाई यहां की मुख्य भाषा है ।  थाई सर्वाहारी होते हैं । पृथ्वी का हर जीव जंतु इनका खाद्य है । जीवित सफेद झींगा बड़े चाव से ऐसे खाते हैं, जैसे भारत में लाई चना खाये जाते हैं , शाकाहार में इनका विश्वास अल्प ही है । आम तौर पर थाई शाम को सात बजे तक अपना डिनर कर लेते हैं । समय और अनुशासन के धनी थाई खूब मेहनती होते हैं । स्त्रियां अधिक काम करती हुयीं देखी गयीं । हवाई अड्डे पर एक युवती का यही काम था कि आगंतुकों को कोई कठिनाई न होने पाये, वह जा जाकर लोगों को गाइड कररही थी । थाई अपने काम के प्रति बेहद निष्ठावान होते हैं । टूर और ट्रेवल्स को बढ़ाने पर इनका विशेष ज़ोर रहता है । जिस काम के लिये यह धनराशि लेते हैं, उसे संतुष्टिपूर्ण ढंग से संपन्न करते हैं ।  थाइलैंड में आधे से अधिक जन बौद्ध धर्मावलंबी हैं, धर्म का समाज से गहरा नाता होता है । जिस तरह बौद्ध धर्म में बाह्याचारों का स्थान नहीं, उसी प्रकार यहां का समाज कोई क्या कर रहा है, उसे रोकना टोकना ज़रूरी नहीं मानता । पारंपरिक रूप में थाइलैंड की सभ्यता भारत की प्राचीन सभ्यता से भिन्न नहीं है । इस देश का पुराना नाम सियाम है । इसकी रुचियां और संस्कार भारतीयों से भिन्न नहीं है । यहां किंग राम का ही शासन है । हमेशा राम का ही शासन रहता है । इस अर्थ में यहां रामराज्य ही रहता है । नवें राम इस समय यहां के शासनाध्यक्ष हैं । आगे इनकी इकलौती पुत्री इस ज़िम्मेदारी को निभायेंगी । राजकुमारी संस्कृत में उच्च शिक्षित हैं । इनकी शिक्षा दिल्ली से ही पूरी हुयी है । थाइलैंड में अयुध्या है, सीता के नाम पर अनेक स्थान नाम हैं । हवाई अड्डे पर समुद्र मंथन की अप्रतिम शिल्पकारी देखते ही बनती है और यह देखकर लगता ही नहीं कि हम भारत में नहीं हैं । संस्कृत के कई शब्द ध्वनिगत अंतर के साथ थाइलैंड में सुने जाते हैं । स्वागत के लिये स्त्रियों द्वारा कहा जाने वाला "सवातिका" स्वस्तिक से मिलता जुलता है ।

पर्यटन केंद्र कैसे विकसित किये जायें, यह थाइलैंड से अच्छी तरह जाना जा सकता है । इन्होंने बैंकाक शहर के मध्य प्रवाहित हो रही नदी में क्रूज (पानी के जहाज) चला रखे हैं, जिनकी दो मंजिलों पर बैठकर चलते हुये जबाज में लोग डिनर करते हैं, गानों पर जमकर थिरकते हैं । गीत गाने वाली थाई बालायें भारत पाकिस्तान के सद्भाव में जिंदाबाद के नारे लगवातीं हैं । जिस देश के पर्यटक अधिक होते हैं, उस देश के गाने अधिक गाती हैं । भारत के पर्यटक ही अधिक संख्या में देखे जाते हैं । भारत के लोग भी पाकिस्तानियों के आगे नाच गाकर देश भक्ति और सद्भाव का विरल नज़ारा पेश करते हैं । यद्यपि भारत और पाकिस्तान के स्त्री पुरुषों में तनाव की छाया भी झांकती रहती है कि कहीं कोई अवांछित न हो जाये । फोटो खींचकर बेचना यहां हर पर्यटन जगह पर प्रचलित है । वह चाहे पटाया बीच और कोरल आइलैंड पर ग्लाइडिंग करते हुये हो, क्रूज पर सुंदरी के साथ, सफारी वर्ल्ड में सील एवं डाल्फिन मछलियों तथा चिम्पाजियों द्वारा चुंबन करते हुये हो या चाहे स्टंट करते हुये जांबाजों के साथ हो । आइ पैड, मोबाइल और कैमरा के बढ़ते प्रचलन के बीच भी ये लोग अपने फोटो बेच ही लेते हैं, क्योंकि फोटो पेश करने का इनका तरीक़ा आकर्षक होता है । तस्तरी पर, फोल्डर बनाकर, पटाया और बैंकाक की सुंदर प्राकृतिक पृष्ठभूमि में किसी पर्यटक का जब ये फोटो िबना उसकी जानकारी के उसके सामने प्रस्तुत करते हैं तो पर्यटक सहज ही १००-२०० बाट अपनी जेब से निकाल कर दे देते हैं।

थाइलैंड को प्रायः लोग मौज मस्ती के लिये जानते हैं, पर यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि यहां बिना हार्न के ही सारे वाहन दौड़ते हैं । हफ्ते भर के प्रवास में मैंने हार्न नहीं सुना । यदि कोई हार्न बजाता है तो बताया गया कि पुलिस उसे एक इमरजेंसी मानती है । किसी खतरे के बिना यहां हार्न नहीं बजाया जाता और यह यहां के लोगों में सहज अभ्यास में सम्मिलित हो गया है । कोई व्यक्ति गुटखा, पान मसाला चबाते हुये यहां नहीं दिखा । कहीं सार्वजनिक स्थान पर थूकना भी यहां विरल ही है । थाइलैंड के सफारी वर्ल्ड में जंगली जीव जंतु, पशु पक्षी पूर्ण सुरक्षित और हमारे इतने क़रीब हैं कि रोमांच होता है । वाहन सेंसर लगे जालीदार दरवाज़ों को स्वतः खोलकर और बंदकरते हुये प्रवेश एवं निकास करते हैं । वाहन में बैठकर सड़क किनारे बने मचानों पर चीतों, भालुओं और शेरों की मस्ती को देखकर मन भयमिश्रित पुलकायमान हो जाता है । बिना तनाव के हम इन वन्य पशुओं का दीदार बिना जाली के यहां करते हैं । इन पशुओं को भरपूर तृप्तिदायक भोजन मिलता हो, जिससे ये अपने सामने से निकलते पर्यटकों पर हमला नहीं करते । दर्जनों की संख्या में एक साथ ऐसे हिंस्र पशु किसी चिड़ियाघर में अन्यत्र दिखाई नहीं पड़े ।

थाइलैंड के लोगों में सेक्स बेचने की प्रवृत्ति देखी जाती है । यहां स्त्री पुरुषों के नग्न शो भी होते हैं, कामक्रीड़ा करते हुये शो देखना वीभत्सकारी लग सकता है । मुझे लगता है इसे देखने का एक बार आकर्षण होता ही होगा ।  सेक्स वर्करों की नंबर प्लेट लगाकर नुमाइश होती है, जिनमें से कामातुर पर्यटक चयन कर घंटे भर के ही चार पांच हजार रुपये सहर्ष खर्च कर देते हैं । सेक्स वर्कर सम्मान की जिंदगी जीती हैं । सेक्स जैसे बंद विषय को जानने की दृष्टि से ऐसे शो वयस्क भूमिका का निर्वाह करते हैं । सामाजिक ताने बाने और धर्म की भूमिका इसमें प्रमुख मानी जा सकती है । कहने को तो यहां कहा जाता है, "गुड बायज गो टु टेंपल, बट बेड बायज कम टु पताया", पर साथ ही पर्यटकों को इसके लिये प्रोत्साहित भी किया जाता है । इसके पक्ष में अनेक तर्क दिये जाते हैं कि भारत में काम को ठेंगे पर और सेक्स को दिमाग में रखा जाता है, किंतु इस देश में काम को दिमाग में और सेक्स को समुचित स्थान पर रखा जाता है । भारतीय संस्कार कभी कभी इस देश को चकलाघरी देश के रूप में निरूपित करने की ओर उन्मुख करते हैं । मसाज केंद्रों की यहां भरमार है, आम तौर पर थाइलैंड की महिलायें फुट मसाज, ड्राइ मसाज, आइल मसाज, एरोमाथेरेपी केंद्रों पर परिश्रमपूर्वक मसाज करती हैं । इनके श्रम और समर्पण को देखकर यह कहना ही पड़ता है कि आगंतुक की संतुष्टि इनका सर्वोपरि ध्येय होता है ।
शब्दार्णव, 245 ए, नया पटेल नगर,
​    निकट टाटा टावर, कोंच रोड, उरई (जालौन) उ0प्र0
                                 ई मेलrakeshndwivedi@gmail.com


डा राकेश नारायण िद्ववेदी

भारतीय परंपरा और स्त्री चेतना - परिवेश 19वीं शताब्दी, परिप्रेक्ष्य ‘कई चांद थे सरे आसमां’

भारतीय परंपरा और स्त्री चेतना - परिवेश 19वीं शताब्दी, परिप्रेक्ष्य ‘कई चांद थे सरे आसमां’
डॉ राकेश नारायण द्विवेदी
स्त्री चेतना समकालीन हिंदी लेखन की केंद्रीय विषय-वस्तु है। जबकि इस विषय पर प्रचुरता से लिखा जा रहा है, तब इसमें पिष्टपेषण न हो और नए संदर्भों में बात की जाए, ऐसी रचनाओं पर पाठकों की दृष्टि गड़ना स्वाभाविक है। यहां बात एक ऐसी ही रचना की हो रही है, जिसका प्रथम संस्करण 2010 में हिंदी में पेंगुइन बुक्स इंडिया द्वारा प्रकाशित हुआ है। उपन्यास के रूप में यह रचना शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी द्वारा उर्दू में की गई, जो नरेश ‘नदीम’ द्वारा हिंदी में रूपांतरित होकर आई है। शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी ने मूलतः यह विशालकाय उपन्यास उर्दू में लिखा, जिसे अंग्रेजी में भी उन्होंने ही ‘द मिरर आफ ब्यूटी’ के नाम से पुनर्सृजित किया। फ़ारुक़ीजी भारतीय डाक विभाग से अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं। 15 जनवरी 1935 को जन्मे शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी को उर्दू साहित्य का टी एस इलियट कहा जाता है। वे उर्दू के शीर्षस्थ आलोचक हैं। आज़मगढ़ के मूल निवासी फ़ारुक़ीजी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम ए हैं। उन्होंने उर्दू की ‘शबख़ून’ मासिक पत्रिका का 40 वर्षों तक संपादन किया। उन्हें 1986 में उर्दू आलोचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। वह पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय अध्ययन केंद्र में अंशकालिक प्रोफेसर रहे। मीर तक़ी ‘मीर’ के बारे में आपकी चार भागों में uuप्रकाशित पुस्तक ‘शेर-ए-शोर-अंगेज़’ को 1996 में उपमहाद्वीप के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार ‘सरस्वती’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पद्मश्री फ़ारुक़ीजी को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से डी लिट् की मानद उपाधि प्राप्त हुई। यही नहीं आपको पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा पुरस्कार ‘सितारा-ए-इम्तियाज़’ भी प्राप्त हुआ।
        फ़ारुक़ीजी का हिंदी रूपांतरित उपन्यास ‘कई चांद थे सरे आसमां’ 748 पृष्ठों में प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय परंपरा की विविध विशेषताआंे को विवरण शैली में लिपिबद्ध किया है। उन्होंने 18वीं-19वीं शताब्दी के भारत में संगीत, चित्रकारी, शिल्पकारी, बुनकरी, भाषा-विज्ञान एवं साहित्य की विविधवर्णी प्रचलित परंपराओं को सामने लाती हुई ग़ालिब, जौक़, दाग़ जैसे नामचीन शायरों की शायरी से सजी कथा को विस्तार से अपने उपन्यास में रखा है। इस उपन्यास में एक जगह फ़ारुक़ीजी लिखते हैं कि आज के लोग बहुत कुछ भूलते जा रहे हैं, कदाचित् इसीलिए वह विस्तार से वर्णन करते हुए उपन्यास में उपस्थित हुए हैं। इस कथा में तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक चेतना का सुंदर संगुंफन हुआ है, किंतु कथा में वर्णनाधिक्य के कारण कहीं-कहीं पुनरावृŸिा हो गई है। जब वह उर्दू के ललित गद्य में हिंदी बोलियों का समाहार करते हुए लिखते हैं तो पाठक कथा के साथ-साथ नायाब गद्य से रूबरू होता हुआ चलता है। उपन्यास में आए हिंदी-उर्दू के प्रचलित मुहावरे और प्रसंगवश आए कुछ शब्दों की व्युत्पŸिा करते हुए उपन्यास की कथा बुनी गई है। उपन्यास में 50 वर्षों की कथा का क्षेत्र राजपूताना से लोकर कश्मीर, लाहौर, फ़र्रुख़ाबाद एवं दिल्ली तक फैला हुआ है। कथा का समय मुग़ल काल के पतन और ईस्ट इंडिया कंपनी के मज़बूत होने के संक्रमण काल तक फैला हुआ है। यह कथा केवल काल्पनिकता की उड़ान नहीं भरती, वरन् यह समसामयिक विमर्शों में से एक स्त्रीवादी लेखन में छाए हुए स्त्री प्रश्नों को लेकर ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से पाठक के सम्मुख उपस्थित होती है। उपन्यास की कथा नायिका प्रधान है। कथा नायिका वज़ीर ख़ानम विलक्षण सौंदर्य की धनी एवं सुरुचि साहित्य संपन्न है। उपन्यास की यह प्रधान पात्र वस्तुतः प्रसिद्ध उर्दू शायर दाग़ देहलवी की मां थी। वज़ीर के पूर्वज किशनगढ़ राजपूताना में रहते थे, जहां से उसके पूर्वजों में से मियां मख्सूसुल्ला बडगाम कश्मीर चले गए थे। मियां मख्सूसुल्लाह मुसलमान थे या हिंदू, कथाकार के लिए यह कहना मुश्किल था। मियां के दो पौत्र दाऊद और याक़ूब फ़र्रुख़ाबाद और दिल्ली आकर बस गए और जेवर बनाने का काम करने लगे लेकिन ये भाई मराठा फ़ौज के साथ लड़ाई में कहीं खो गए। इनका एक बेटा यूसुफ बचा रहा, जिसका विवाह अक़बरी बाई की बेटी असग़री से हुआ। मुग़लों का सूर्य अवसान पर था और दिल्ली में ईस्ट इंडिया कंपनी अपने पैर पसार चुकी थी, तब 1811 ई में तीसरी और सबसे छोटी बेटी के रूप में इन्हीं मुहम्मद यूसुफ नाम के सुनार के यहां वज़ीर ख़ानम का जन्म हुआ। कथाकार इस उपन्यास को किसी कथा से अधिक इतिहासकार की भांति कथा का आरंभ करता है। फ़ारुक़ीजी लिखते हैं ‘पर्दानशीन मुसलमान लड़की जो बज़ाहिर कहीं कस्बन (गणिका) या पेशेवर नचनी न थी, किस तरह और क्यों एक अंग्रेज के अधिकार तक पहुंची, इसके बारे किसी लिखित परंपरा या किसी चश्मदीद गवाह के बयान की बुनियाद पर तैयार किया हुआ ब्योरा नहीं मिलता।’  वज़ीर ख़ानम अपने जीवन में अपनी इच्छा और शर्तों से विवाह अथवा बिना विवाह किए हुए वर्तमान में चल रहे लिवइनरिलेशनशिप की तरह चार पुरुषों के साथ रही और चारों असमय कालकवलित हो गए। सर्वप्रथम वह एक अंग्रेज अधिकारी मार्स्टन ब्लेक के साथ रही, जिससे उसके दो बच्चे हुए। ‘ज़्यादा संभावना यह है कि मार्स्टन ब्लेक उनकी ज़िंदगी में पहला मर्द था और उससे वज़ीर ख़ानम की मुलाक़ात देहली में हुई।’ वज़ीर के पिता और बड़ी बहिन स्वतंत्र विचारों के कारण उससे रुष्ट रहते, पर वह ब्लेक के साथ जयपुर में बिना विवाह किए रहकर दो बच्चों की मां बनी। वहां महाराजा की हत्या के संदेह में भीड़ ने ब्लेक को मार दिया। बच्चों को ब्लेक की बहिन ने वज़ीर को नहीं दिया। वज़ीर जयपुर से दिल्ली आ गई। उसका दूसरा साहचर्य उर्दू के प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा ग़ालिब के निकट संबंधी नवाब शमसुद्दीन अहमद खां से हुआ। वज़ीर नवाब के साथ विवाह करते हुए रही। उपन्यासकार ने जगह-जगह कथा में पात्रों द्वारा और कथा-वर्णन में संगीत की विविध राग-रागिनियों का नामोल्लेख करते हुए शे‘र और पद उद्धृत किए हैं। वह बड़ी बारीक़ी और विस्तार से वर्णनपरक कथा बुनते हुए कहता है ‘तालीम को समझना उसे ईजाद करने से कुछ ही कम बारीक़ी मांगता है।’  फ़ारुक़ीजी शिक्षा को बहुआयामी बनाने पर ज़ोर देते हैं, वे कहते हैं ‘तालीमनवीस को शायर, मुसव्विर, नर्तक, गायक सब कुछ होना चाहिए।’ शिक्षा के विविध स्वरूप हैं, किसी भी क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है। वह एक पात्र से कहलवाते हैं ‘क्या तुम जानते हो कि जो सुन नहीं सकता, वह ज़्यादा अच्छा देख सकता है? लेकिन जो सुन नहीं सकता वह बोल नहीं सकता? और जो बोल नहीं सकता वह गा नहीं सकता, लेकिन वह नाच सकता है?’
        उपन्यास में आशा-निराशा, प्रगतिशीलता और नारी संवेदना का प्रभावशाली अंकन ललित गद्य में किया गया है। उपन्यास में दृष्टव्य है कि ऊंचे दर्जे़ की कारीगरी विविध क्षेत्रों में उस समय देश में होती थी और उन सबका समाज में सम्मान था। आशावाद का एक उदाहरण दृष्टव्य है ‘ज़िंदगी के समंदर की लहरें हर जगह मोती बिखेरती हैं और इन आबदार मोतियों को मुट्ठियों को बटोर लेने वाले हुनरमंद नक़्क़ाश भी हर जगह हैं।’ निराशा - ‘शायरी जितनी मीठी और सजिल, ज़िंदगी उतनी ही कड़वी और कठिन है।’ उपन्यास में हिंदू और मुस्लिम संस्कृति का पार्थक्य नहीं है। सर्वत्र हिंदुस्तानी संस्कृति में पात्र रचे-बसे हैं। मुस्लिमों के साफ-सुथरे रहन-सहन से हिंदू तो हिंदुओं के देवी-देवताओं का प्रभाव मुस्लिमों पर हुआ दिखाया गया है। उपन्यास मेें फ़र्रुख़ाबाद के मुसलमान रस्मों और आदतों में हिंदुओं के बहुत क़रीब थे। हबीबा के एक भाई को सीतला मां अपनी गोद में चिरनिद्रा में सुला लेती है। उपन्यास में चित्रित प्रगतिशीलता याक़ूब के इस कथन में दृष्टव्य है ‘इन लड़कियों पर तुम्हारा कोई हक़ नहीं। ये बालिग़ हैं और अपनी मर्ज़ी की मालिक। तुम इन्हें अपनी हवस का शिकार बनाकर कोठे पर बेचना चाहते हो तो यह हम न होने देंगे।’  दिल्ली में अपनी सबसे बड़ी बहिन द्वारा विवाह करने की बात पर वज़ीर कहती है ‘...बच्चे पैदा करें, शौहर और सास की जूतियां खाएं, चूल्हे-चक्की में जल-पिसकर वक़्त से पहले बूढ़ी हो जाएं।’  वज़ीर की बाज़ी कहती है ‘जबसे दुनिया बनी है औरतें इन्हीं कामों में लगाईं गईं हैं। एक शरीफ़ाना राह है, एक कमीनों की राह है।’ वज़ीर जवाब देती है ‘बस भी करो ये शरीफ़ों, कमीनों की बातें। मर्द कुछ भी करते फिरें, उन्हें कोई कुछ भी न कहे और हम औरतें ज़रा ऊंचे सुर मंे भी बोल दे ंतो ख़ैला छŸाीसी कहलाएं।’ बाज़ी द्वारा महिलाओं का शर्म, हया, ममता, क़ुर्बानी देने का वास्ता देने पर वज़ीर कहती है ‘मेरी सूरत अच्छी है, मेरा ज़हन तेज है, मेरे हाथ-पांव सही हैं। मैं किसी मर्द से कम हूं? जिस अल्लाह ने मुझमें ये सब बातें जमा कीं, उसको कब गवारा होगा कि मैं अपनी काबिलियत से कुछ काम न लूं, बस चुपचाप मर्दों की हवस पर भेंट चढ़ा दी जाऊं?’
        स्त्री और पुरुष के शाश्वत संबंधों को लेकर हुई बातचीत में उपन्यासकार कई प्रश्नों को उठाता है और उनके उŸारों को खोजने का प्रयास करता है। पुरुष के लिए स्त्री इज़्ज़त है और स्त्री के लिए पुरुष वारिस, लेकिन वारिस बनाने के लिए विवाह कहां आवश्यक है। इन शाश्वत सामाजिक प्रश्नों की कथाकार ने उपेक्षा नहीं की है। वज़ीर और उसकी बाज़ी में हुए वार्तालाप में आखि़रकार चिढ़ते हुए वज़ीर अपना निर्णय देती है ‘मुझे जो मर्द चाहेगा उसे चखूंगी; पसंद आएगा तो रखूंगी नहीं तो निकाल बाहर करूंगी।  इसके बाद वह ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी मार्स्टन ब्लेक के साथ रहने लगती है। वज़ीर के एक अंग्रेज के साथ के अनुभवांे का वर्णन इस प्रसंग में हुआ है। पुरुषों के बारे में आमधारणा होती है कि उन्हें अपनी इच्छा सर्वोपरि होती है, किंतु किसी स्त्री की इच्छा और सुविधा का ध्यान रखने में अंग्रेज हिंदुस्तानियों से कहीं आगे हैं। ब्लेक के साथ रहकर वज़ीर में खुलापन आ जाता है, वह ब्लेक के साथ एक ही थाली में भोजन करती है। हिंदुस्तानी पुरुष जहां स्त्री से माफी मांगने में अपना अनादर मानते हैं, वहीं जब ब्लेक वज़ीर से अम सारे रे (आइ एम सारी) कहता तो वज़ीर को बहुत भला लगता। कथाकार ने इसी प्रसंग में कई शब्दों का अंग्रेज उच्चारण दिया है।
        वज़ीर अपने बच्चांे की शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हुए अपनी शर्तों पर ब्लेक का घर छोड़ देती है। जयपुर से दिल्ली आकर वह सन् 1830 में विलियम फ्रेजर के यहां एक कवि सम्मेलन में जाती है। वहां देखकर फ्रेजर वज़ीर पर आसक्त हो जाता है, किंतु वज़ीर उसके लिए उदासीन है, जिससे फ्रेजर नाराज़ हो जाता है किंतु वज़ीर को इसकी परवाह नहीं। वह कहती है ‘वो अंखमुंदी और होंगी जो दो वक़्त की रोटी पर आबरू बेच देती हैं।’ इसी कवि सम्मेलन में मौजूद मिर्ज़ा ग़ालिब के रिश्तेदार नवाब अहमद खां से वज़ीर विवाह कर लेती है। वज़ीर और नवाब का शायराना संवाद चलता रहता है। नज़ाकत और नफ़ासत भरे वातावरण में दोनों की ज़िंदगी बसर हो रही होती है। मुग़लकालीन स्त्री की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का जो ध्यान इस कथा में देखा गया, वह विरल है। वज़ीर सोचती है ‘मुझे जो मर्द चाहेगा कोई ज़रूरी नहीं कि मैं भी उसे चाहूं। उपन्यास में जगह-जगह सुने हुए किंतु अबूझे से शब्दों के अर्थ उपन्यासकार ने खोले हैं जैसे लनक्लॉट अंग्रेजी के लॉंग क्लाथ का भाषारूप है।
        हिंदुस्तानी और अंग्रेजी परंपरा के अंतर को उपन्यास में रेखांकित किया गया है। अंग्रेज नज़रें झुकाकर बात करने वालों को दग़ाबाज़ या बेईमान समझते हैं, वहीं हिंदी तहज़ीब में बड़ों से, अजनबियों से, क़रीबी अज़ीज़ों से आंख मिलाकर बात करने को असभ्य कहा जाता है। अंग्रेज पुरुष-स्त्री जहां कभी-कभी स्नानागार में एक साथ स्नान कर लेते हैं लेकिन हिंदुस्तानी परंपरा में यह ऐब है। अंग्रेज अपने नौकरों का कभी शुक्रिया अदा नहीं करते, जबकि हिंदुस्तानियों में पुराने नौकरों का शुक्रिया; बल्कि उनके पूरे सम्मान की रस्म हुआ करती थी। नवाब शम्सुद्दीन और वज़ीर के हमबिस्तरी प्रसंग में कथाकार ने हिंदुस्तानियों और अंग्रेजों के तौर-तरीक़ों को अलग-अलग दिखाया है। फ़ारुक़ीजी कामक्रिया के अंग-प्रत्यंगों का बिना सनसनी पैदा किए ऐसा बारीक़ वर्णन करते हैं कि पाठक के सामने समूचा दृश्य चित्र उपस्थित हो उठता है। दर्शक कैमरे से निकले फोटो और वीडियो के दृश्यों को तो ओझल कर सकता है, पर इन वर्णनों को पढ़ने में पाठक तनिक भी बेख्याल नहीं होता। नवाब साहब से वज़ीर के दैहिक संबंध बनाने के बाद ही साथ रहने संबंधी भविष्य की योजनाएं तय होती हैं। वज़ीर ख़ानम से नवाब साहब का एक पुत्र 25 मई 1831 को पैदा हुआ, जिसे नवाब मिर्ज़ा नाम दिया गया और जो बाद में वास्तविक रूप में दाग़ देहलवी के नाम से प्रसिद्ध शायर हुए।
        विलियम फ्रेजर वज़ीर पर बुरी निगाह रखता, वह उसे बाज़ारू औरत समझता था। इससे नाराज़ होकर नवाब ने उसका क़त्ल करा दिया। इस अपराध में नवाब को फांसी दे दी जाती है।
        स्त्री जीवन की विडंबना और विवशता तथा पारंपरिक छबि के बरक्स कथाकार ने वज़ीर के रूप में उसकी मज़बूती, स्वनिर्णय और आत्मनिर्भरता में चित्रित किया है। खालिस अरबी-फारसी के शेरों का अर्थ उपन्यास में जगह-जगह दिया गया है, फिर भी अनेक शब्दों का अर्थ पाठक को खोजना पड़ता है। इसका आशय है कि पाठक को हिंदुस्तानी शब्दों से सामान्यतः परिचित होना ही चाहिए। भाषा की रवानगी उपन्यास से जाती न रहे, शायद अनुवादक नरेश ‘नदीम’ ने इसीलिए मूल गद्य से छेड़खानी उचित न समझी हो।
        विलियम फ्रेजर की हत्या होने के प्रसंग में फ़ारुक़ीजी बंदूकों का वर्णन करने लगते हैं। बंदूकों की कील और पुर्जों का वर्णन वे ऐसे करते हैं जैसे कोई आयुध निर्माणी कार्यशाला से होकर आए हों। संक्षिप्ताक्षरों का विस्तार करते हैं यथा डीबीबीएल का पूरा रूप है डबल बैरल्ड ब्रीच लोडिंग। हिंदी में जिसे दोनाली, क़राबीन या रिफल या दोगाड़ा कहते थे। बेधरमी इसे अंग्रेजो द्वारा भारत लाए जाने के कारण कहा गया। ‘भरमारू’ बंदूक में बारूद और गोली नाली की राह से भरी जाती थी। क़राबीन फ्रांसीसी बंदूक थी, जिसे अंग्रेजी और फ्रेंच में कारबाइन कहा जाता है। इन हथियारों को चलाने और उनकी मारक क्षमता सहित अन्य गुण-दोषों का वर्णन कथाकार ने इस प्रसंग में किया है। जिस क़रीमखां से नवाब शमसुद्दीन ने विलियम फ्रेजर की हत्या करवाई, उसे अंग्रेजों ने थर्ड डिग्री दी, फिर भी क़रीमखां ने शमसुद्दीन का नाम नहीं लिया। यद्यपि अंग्रेजों की अदालत ने 26 वर्षीय शमसुद्दीन अहमद को फांसी की सज़ा दे दी।
        वज़ीर ख़ानम एक बार फिर विधवा हो गई। वह सोचती है यह दुनिया पुरुष की दासी और स्त्री की शत्रु है। यह ऐसा भंवरजाल है जिससे निकल पाना असंभव है। इस निराशा के बीच उसकी मंझली बाज़ी उम्दा ख़ानम उसको शिया समुदाय के आग़ा मिर्ज़ा तुराब अली के साथ रखना चाहती है। इस प्रसंग में उम्दा का वज़ीर के साथ जो संवाद चलता है, वह स्त्री चेतना को मज़बूत तर्काें के साथ पाठक के सामने लाता है। वज़ीर, मंझली बाज़ी, जहांगीरा बेगम और आग़ा साहब की इच्छा और शर्तों से नहीं, अपितु वह किस मिज़ाज के हैं और नवाब मिर्ज़ा के लाड़-प्यार में कमी तो न रखेंगे की आशंकाओं को दूर कर लेना चाहती है। आग़ा शिया हैं और वज़ीर सुन्नी। वज़ीर आग़ा से होने वाली संतान को अपने रंग-ढंग से पालने की शर्त लगाती है। वज़ीर का मानना है कि दुनिया में प्यार स्त्री के लिए ही है। पुरुष चाहे जाने से अधिक उसके अहसास की दीवाने हैं। प्रेम की कसौटी स्त्री द्वारा पुरुष में चाहे जाने का अहसास पैदा करना है। उम्दा द्वारा स्त्री को पुरुष के शरीर की चादर, सर के ऊपर की छत और बुढ़ापे का सहारा बताने पर वज़ीर कहती है ‘अब तक मुझे मर्दों से कौन सा सहारा मिला है कि अब मिल जाएगा।’ वज़ीर अपनी बहिन, पति और रिश्तेदारों की सलाह और इच्छा से नहीं, वरन् अपने पुत्र की सुविधा और भविष्य का ध्यान रखती है, पर पुत्र की भी हिम्मत नहीं कि वज़ीर के आगामी जीवन का वह निर्णय करे, वह अपनी मां को उसके जीवन के बारे में कोई निर्णय देने में अपने को समर्थ नहीं पाता। इस तरह की राय मां से व्यक्त करने में ही एक प्रसिद्ध शायर दाग़ देहलवी चकरा जाते हैं। वज़ीर कहती है मेरी जगह यदि तुम्हारे पिता होते तो तुम क्या उन्हें सलाह देते? तुम यह निर्णय कैसे निकाल सकते हो कि मेरी समस्या का समाधान करना तुम्हारा कर्तव्य है? वज़ीर किसी दलील की मोहताज नहीं होती। अंतिम निर्णय वज़ीर का ही होता है। वज़ीर अपना पुनर्विवाह आग़ा से अपनी शर्तों पर करती है, जिससे 1843 में एक पुत्र का जन्म हुआ। इसके बाद आग़ा मिर्ज़ा तुराब अली सोनपुर में ठगों द्वारा मार दिए जाते हैं। ठगों में हिंदू मुस्लिम दोनों शामिल थे और सभी एक विशेष बोली ‘रमासी’ का प्रयोग करते। वे जय देवीमाई के भक्त थे। वज़ीर जब आग़ा के निधन के बाद तीसरी बार वैधव्य को प्राप्त हुई, तब कथित शरीफ घरानों की बेटियों के हिसाब से उसके विवाह की आयु निकल चुकी थी।
        वज़ीर जानती है कि वह बदनाम है, लेकिन उसने अपनी स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया। वह अपने भाग्य को कोसती है कि मुझे ऊपर वाले ने क्या बच्चे पैदा करके और उनसे बिछुड़ने के लिए ही भेजा है। वह अपने शायर बेटे से कहती है ‘मर्द जात समझती है कि सारी दुनिया के भेद और तमाम दिलों के छुपे कोने उस पर ज़ाहिर हैं, या अगर नहीं भी हैं तो न सही लेकिन वह सबके लिए फैसला करने का हक़दार है। मर्द ख़्याल करता है कि औरतें उसी ढंग और मिज़ाज की होती हैं जैसा उसने अपने दिल में, अपनी बेहतर अक्ल और समझ के बल पर गुमान कर रखा है...।’  वज़ीर का पुत्र नवाब मिर्ज़ा शरीअत का हवाला देकर कहता है कि मर्द औरत से बरतर (श्रेष्ठ) है। वज़ीर पुरज़ोर मुख़ालफत करती हुई कहती है ‘आपकी क़िताबों के लेखक सब मर्द, आपके क़ाजी, मुफ़्ती-बुज़ुर्ग भी कौन, सबके सब मर्द! मैं शरई हैसियत नहीं जानती, लेकिन मुझे बाबा फ़रीद साहब की बात याद है कि जब जंगल में शेर सामने आता है तो कोई यह नहीं पूछता कि शेर है या शेरनी। आखि़र हज़रत राबिया बसरी भी तो औरत थीं।’  उपन्यास की पूरी कथा इस प्रश्न का उŸार खोजने में बुनी गई है कि पुरुष क्या है और स्त्री क्या है। उपन्यासकार चाहता है कि स्त्रियां मजबूरी से बाहर निकलें और स्वतंत्र होकर अपने फैसले लेकर समृद्ध और सशक्त बनें। दुनिया की वास्तविकता से कथाकार बाख़बर है कि ‘दुनिया सŸाा वालों के आगे खु़द-ब-ख़ुद झुकती है और कमज़ोरों, ख़ासकर वह औरतों को वह कभी माफ नहीं करती।’  वज़ीर भले ही बदनाम हो कि जिसने चार पैसे दिखाए उसी की हो रहीं किंतु उसका दरवाज़ा किसी के लिए खुला नहीं होता, वह एक बार ऐसा कहते हुए नवाब जियाउद्दीन अहमद को झिड़क देती है।
        वज़ीर की चौथी शादी की बात मिर्ज़ा फ़तहुल मुल्क बहादुर से चलती है तो वज़ीर डरती है कि बार-बार चार दिन की खुशी के बाद मुद्दतों रोना पड़ता है, किंतु फिर वह सोचती है कि कभी के दिन बड़े तो कभी की रात बड़ी। इस बीच नवाब मिर्ज़ा (दाग़ देहलवी) भी उम्तुल फ़ातिमा से आंखें चार कर लेते हैं। वज़ीर की शर्तों के अनुसार फ़तहुल मुल्क बहादुर उर्फ़ फ़खरू बहादुर वज़ीर के बेटों नवाब मिर्ज़ा और मोहम्मद आग़ा को अपने साथ रखने को तैयार हो जाते हैं। ज्योतिषी विवाह की तिथि तय करते हैं और जनवरी 1845 को दोनों का विवाह हो जाता है। उपन्यास में कथाकार ने स्त्री और उसके अंतर्मन को गहराई में जाकर झांका है, स्त्री संवेदना का कदाचित् कोई कोना अछूता न रहा जहां कथाकार ने दस्तक न दी हो। मिर्ज़ा के साथ हमबिस्तर होने पर वज़ीर सोचती है कि मर्द को सिर्फ अपनी गरज़ से काम है। मतलब पूरा होने के बाद वह इस बात से बेताल्लुक़ हो जाता था कि मेरा शरीके-बिस्तर किस हाल में है। अक्टूबर 1845 को वज़ीर ने एक बेटे खु़र्शीद मिर्ज़ा को जन्म दिया, किंतु जुलाई 1856 में वज़ीर ख़ानम के इस चौथे पति की भी स्वास्थ्य बिगड़ने से मृत्यु हो गई। वज़ीर को क़िला छोड़ना पड़ता है। क़िले से निकलते समय वज़ीर कहती है ‘हक़ क्या चीज है साहिबे-आलम? सारी ज़िंदगी मैं हक़ की तलाश में रही हूं। वह पहाड़ों की किसी खोह में मिलता हो तो मिलता हो, वरना आसमान तले तो देखा नहीं गया।’ यह पंक्ति इस उपन्यास की फलश्रुति मानी जा सकती है।
        उपन्यास के आभार भाग में फ़ारुक़ीजी ने इच्छा व्यक्त की है कि इस उपन्यास को 18वी-19वीं सदी की हिंद-इस्लामी तहज़ीब और इंसान के साहित्यिक सांस्कृतिक सरोकारों का चित्रण समझकर पढ़ा जाए, किंतु उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर ब्रियाना ब्लास्को द्वारा बनाए चित्र में एक सुंदर स्त्री शोभायमान है, जिससे इसकी केंद्रीय विषय-वस्तु स्वतःस्पष्ट हो जाती है। उपन्यास का शीर्षक शायर अहमद मुश्ताक़ के इस शेर के एक मिसरे पर रखा गया है-
कई चांद थे सरे-आसमां कि चमक-चमक के पलट गए
न लहू मेरे ही जिगर में था न तुम्हारी ज़ुल्फ सियाह थी।
        उपन्यास के अंत में उर्दू-फ़ारसी और अंग्रेजी के उन दुर्लभ ग्रंथों की सूची भी दी गई है, जिनसे उपन्यासकार ने सहायता ली है। फ़ारुक़ीजी ने विभिन्न शब्दकोशों का उल्लेख करते हुए उनके बीच के अंतर को रेखांकित किया है। आमतौर पर उपन्यासों में ग्रंथ-सूची नहीं दी जाती है, पर कथा की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता के लिए फ़ारुक़ीजी ने ऐसा करना उचित समझा होगा। प्रसिद्ध प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास में हुई कुछ मामूली वर्तनी त्रुटियां अगले संस्करण में सुधार दी जाएंगी। सात सौ अड़तालीस पृष्ठों में फैले इस महाकाव्यात्मक उपन्यास को बहत्तर शीर्षकों में बांटा गया है। हर शीर्षक अपनी कहानी कहता है किंतु शीर्षक स्वतःपूर्ण नहीं होता और यह किसी कहानी के लिए उचित भी नहीं। उपन्यास के आवरण पृष्ठ के दोनों ओर प्रसिद्ध साहित्यकारों की टिप्पणियां प्रकाशित हैं। इसे कोई विक्रय प्रोत्साहन के लिए भी कहे, पर इससे पाठक के मन में उपन्यास को जानने की उत्कंठा हो जाती है। ओरहान पामुक ने इसे ‘अद्भुद उपन्यास’ कहा तो मोहम्मद हनीफ इसे भारतीय उपन्यासों का कोहिनूर कहते हैं। असलम फर्रूखी कहते हैं यह इक्कीसवीं सदी की ही नहीं, उर्दू फिक्शन की बेहतरीन क़िताब है, वहीं इंतिज़ार हुसैन देहली की मिटती हुई बादशाहत के साए में फलने-फूलने वाली इस तहज़ीब का मंज़रनामा ग़ालिब, ज़ौक, दाग़, घनश्यामलाल आसी, इमामबख़्श सहबाई, हकीम अहसनुल्लाह ख़ां के साथ-साथ बहादुरशाह ज़फ़र, मलिका ज़ीनतमहल और नवाब शमसुद्दीन अहमद ख़ां जैसे बहुत से वास्तविक किरदारों से भी जगमगा रहा है। इस उपन्यास को उस सदी की हिंद-इस्लामी तहज़ीब में कौमी एकजुटता, जिं़दगी, मुहब्बत और फ़न की तलाश की दास्तान कहें तो सही होगा। आलोचक और कवि अशोेेक वाजपेयी ने कहा है कि अठारहवीं-उन्नीसवीं सदियों में जीवन, समाज, साहित्य, कलाओं आदि के क्षेत्रों में व्यापक रचनात्मकता, बहुत कुछ को बचाने की इच्छा और जतन, अनेक नवाचार, समाज के कई वर्गों के बीच संवाद आदि सब बहुत सक्रिय थे। उन्होंने अपनी टिप्पणी में उपन्यास में छायी स्त्री कथा को सुंदरता से व्याख्यायित किया है और ‘सुंदर अंततः बच नहीं पाता, वह बराबर वेध्य है। उसकी भंगुरता मानो उसके होने की अनिवार्य परिणति है।’ वाजपेयीजी ने इस उपन्यास को सुंदरता की विफलता की गाथा कहा है।  इंडिया टुडे हिंदी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार मनीषा पांडेय ने इस उपन्यास की प्रशंसा करते हुए लिखा है ‘हिंदी में जाने कितने बरसों बाद एक ऐसी क़िताब आई जो पन्ना दर पन्ना आपको चकित करती है। यह क़िताब इतिहास के गलियारों में ले जाती है, भाषा के चमत्कार से चकित करती है, रुलाती है, अवसाद में डुबो देती है और मुहब्बत के सबसे बीहड़ बियावानों में अकेला भटकने के लिए छोड़ देती है। इस भटकन का सुख वहीं जानते हैं जो क़िताबों के संग-संग भटके हैं।’  वहीं वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने इस कृति पर अपनी टिप्पणी दी कि जब कोई विद्वान रचनात्मक कृति रचता है तो अपने समय के ज्ञान को कथानक में कैसे ढालता है। हिंदी में ऐसी क्षमता हजारी प्रसाद द्विवेदी में थी।
        अंत में कहा जा सकता है कि कोई बड़ा रचनाकार अपने समय के टुकड़ा-टुकड़ा विमर्शों का समाहार और अतिक्रमण अपनी विराट कृति के सम्यक् कथानक में कैसे संभव कर दिखाता है, यह उपन्यास इसका विरल उदाहरण है जिसमें वर्तमान में प्रचलित विमर्शों पर समय और उसका अवदान भारी पड़ गया है।
                                        शब्दार्णव, नया पटेल नगर, कोंच रोड, उरई (जालौन)