Friday, April 1, 2022

मार्च २०२२

१/३/२२ यत्र सोsस्तमयमेति विवस्वान्श्चंद्रमा-प्रभृतिभिः सह सर्वैः कापि सा विजयते शिवरात्रि स्वप्रभाप्रसरभास्वररूपा! शिवस्तोत्रावली ४/२२ जिस अवस्था में 'सूर्य' अर्थात् प्राण प्रवाह और 'चंद्रमा' अर्थात् अपान प्रवाह सारे 'तारामंडल' अर्थात् विकल्प परंपराओं समेत अस्त हो जाते हैं, उसी अवर्णनीय एवं अपनी हाई चितप्रकाशमयी आभा के विस्फ़ार से चमकती हुयी शिवरात्रि की जय जयकार हो.. रात्रि समस्त व्यापार जगत् को समेट लेती है. इसी तरह सारी अख्याति या अविद्या का संहरण करने से इसे रात्रि कहते हैं. मंगलमय होने से इसे शिवरात्रि कहते हैं. शिवरात्रि यानि शिवसमावेशभूमि wonderful blissful night. विवस्वान् sun-inhaling breath, चंद्रमा मून- exhaling breath अस्तमयं एति has set or absorbed through the junction (संधि). यह संधि या शिवरात्रि भी संक्रांति की भाँति हर माह होती है, पर आज महाशिवरात्रि है, इसे शिव और शक्ति के विवाह के तौर पर भी लिया जाता है. यह विवाह यानि उक्तवत संधि ही है. इस संधि को उपलब्ध हुए व्यक्ति के लिए हर समय शिवरात्रि है. अस्तु! अंतरुल्लसदच्छाच्छभक्ति पीयूष पोषितम्. भवत्पूजोपयोगाय शरीरमिदमस्तु मे.. Call Me by My True Names Thich Nhat Hanh Do not say that I'll depart tomorrow because even today I still arrive. Look deeply: I arrive in every second to be a bud on a spring branch, to be a tiny bird, with wings still fragile, learning to sing in my new nest, to be a caterpillar in the heart of a flower, to be a jewel hiding itself in a stone. I still arrive, in order to laugh and to cry, in order to fear and to hope. The rhythm of my heart is the birth and death of all that are alive. I am the mayfly metamorphosing on the surface of the river, and I am the bird which, when spring comes, arrives in time to eat the mayfly. I am the frog swimming happily in the clear pond, and I am also the grass-snake who, approaching in silence, feeds itself on the frog. I am the child in Uganda, all skin and bones, my legs as thin as bamboo sticks, and I am the arms merchant, selling deadly weapons to Uganda. I am the twelve-year-old girl, refugee on a small boat, who throws herself into the ocean after being raped by a sea pirate, and I am the pirate, my heart not yet capable of seeing and loving. I am a member of the politburo, with plenty of power in my hands, and I am the man who has to pay his "debt of blood" to, my people, dying slowly in a forced labor camp. My joy is like spring, so warm it makes flowers bloom in all walks of life. My pain is like a river of tears, so full it fills the four oceans. Please call me by my true names, so I can hear all my cries and laughs at once, so I can see that my joy and pain are one. Please call me by my true names, so I can wake up, and so the door of my heart can be left open, the door of compassion. श्रीमद्भागवत जैसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुराण में प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा सातवे स्कंध के कई अध्यायों में वर्णन है, पर इसमें होलिका का नाम भी नहीं। कृत्या राक्षसी का उल्लेख इसमें है, पर होलिका जैसी कथा कृत्या के बारे में यहाँ नहीं है। भारत रत्न डॉ पी वी काणे ने अपने धर्मशास्त्र का इतिहास में भी होलिका नामक वरदान प्राप्त स्त्री का उल्लेख नहीं किया। यद्यपि होली पर्व ईसा की कई शताब्दियों पूर्व से ही मनाये जाने के प्रमाण मौजूद हैं। जैमिनी के मीमांसा सूत्र (400-200 ईसा पूर्व की रचना) और काठक गृह्य में इसे होलाका कहा गया, होला अन्न को भी कहते हैं। होरा ज्योतिष गणना में प्रयुक्त होता है. पर यहाँ उसका अर्थ अहोरात्र या दिनरात की गणना से है. भविष्यपुराण की कथा है कि एक ढोंढी नामक राक्षसी को शिव के वरदान से देव और मानव नहीं मार सकते थे, वह केवल बच्चों से डरती। तब फाल्गुन पूर्णिमा को लकड़ी से जलाकर इस राक्षसी का अंत किया गया। बंगाल में होलिका दहन नहीं होता, वहां इस दिन कृष्ण प्रतिमा की दोल (झूला) यात्रा निकलती है। अपनी अपनी परम्परा के अनुरूप यह पर्व मनाया जाता है। होली के अवसर पर दुश्मनी खूब निकालते रहे हैं. वैर भाव का विरेचन भी होता आया है. सबको हार्दिक शुभकामनाएं। फ़ेसबुक पोस्ट ३/३/२२ हम जितना चाहते हैं उतना जान नहीं पाते, जितना जानते हैं उतना बोल नहीं पाते, जितना बोलते हैं उतना कर नहीं पाते, जितना करते हैं उतना हो नही पाता और जितना होता है उसमें संतुष्ट नही रह पाते. इस असंतुष्टि के कारण हम और और नया नया चाहते रहते हैं. यह शृंखला ही संसार का सृजन करती है. यह सब करने में व्यक्ति अपमान और अभिमान में डूबे रहते हैं. बिना किए व्यक्ति रह नही सकता, क्योंकि आनंद पाना उसका मूल स्वभाव है, मनुष्य इस कार्यसंपादन में उक्त व्यतिक्रम के कारण कष्ट उठाता रहता है. संगति उससे एकाकार होने और तादात्म्य स्थापित करने में है. उसकी इच्छा में अपने कर्म को सार्थक करने में है. अन् में अ और न् दो वर्णों का योग है. अ प्रारंभ को कहते हैं. अ अनुत्तर दशा है इसलिए इसका प्रयोग न के अर्थ में होता है, साथ ही वह उत्तर दशा का प्रारंभ भी है. न् ब्रह्मांडीय जल की श्वास का नाम है. प्राण श्वास से जोड़कर चलें तो जल तत्व से प्राण का प्रारंभ माना जाएगा. जल अग्नि में नहीं है, किंतु जल में अग्नि है, इसी तरह वायु और आकाश में भी जल नहीं है, पर जल में ये तत्व उपस्थित हैं. प्राण रूप, स्पर्श और शब्द में हैं, पर उनकी स्थिति पृथ्वी से ऊपर की है. बात अन्न की करने के लिए अन् का उल्लेख हुआ. अन्न का अर्थ है जीवनी शक्ति. अन्न शब्द में यह अन् उल्टे क्रम में भी संयुक्त है अर्थात् अन्न में जीवनी शक्ति आगे-पीछे सभी क्रमों में विद्यमान है. हम अन्न ग्रहण करते हैं, साथ ही दूसरे प्राणियों का आहार भी बनते हैं. इस प्रकार अन्न भोज्य और भोक्ता दोनों है. अस्तु! भोज्य और भोक्ता की इस भुक्ति को देखते रहिए.... बहिर्मुख चेतना मन है, पर वही चेतना जब लौटकर अंतर्मुख होती है तो उसे नमः कहते हैं. मन ही नमः हो जाता है. अतः नमः का अर्थ है मुझमें लौट आना. प्रिया! नमन में हम अपनी ही बुद्धि, मन और आत्मा को प्रणाम करते हैं🙏 करुणा किसी के आंसू पोंछने भर को नहीं कहते, वरन् यह उन आंसुओं में भागीदार बनने की भावना है. करुणा रहम, दया, परोपकार या सहानुभूति नहीं है, अपितु यह पीड़ाजन्य प्रेमोदय है, जिसमें दृष्टि का अनंत विस्तार है. बस करुणा में पीड़ा है और प्रेम में आनंद है. करुणा में दुःख देने वाले के प्रति भी दया होती है, क्योंकि दुःख पाने वाला कर्मफल भोग कर रहा है, पर दुःख देने वाला कर्म संचय कर रहा है..., ४/३/२२ वीरभोग्या वसुंधरा! बलमुपास्व! नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः... आधिभौतिक कष्टों को दूर करने के लिए बल चाहिए, आधिदैविक दुखों से निवृत्ति के लिए भी संसाधन जुटाने ज़रूरी हैं, इसके लिए भी बल आवश्यक है. इनके बाद आध्यात्मिक कष्टों का निवारण करना है तो पहले दो से होकर गुजरना पडेगा, यहाँ पहुँचकर बल और सत्य एक हो जाते हैं. यहाँ बल अप्रासंगिक हो जाता है या वह अविभाज्य हो जाता है. व्यक्ति को बिना इन तीनो दुखों के निवारण के विश्राम प्राप्त होना संभव नहीं है... जब दो पक्ष या व्यक्ति लड़ रहे हों तो वे ही उसे शीघ्रता से और अच्छे ढंग से सुलटा सकते हैं. न्याय की आशा शक्ति के उपयोग और दुरुपयोग के बीच से होकर गुजरती है. हिंसक युद्ध का परिणाम विजय और पराजय में नहीं शोक में प्रकट होता है. शक्ति अगर शिव सायुज्य न हुयी तो दुःखद संहार ही होता है. जीवन अपने आप में आनंद प्राप्ति का प्रेममय संघर्ष है, पर विपक्ष बनाकर हिंसा और प्रतिहिंसा करके लड़ना उसकी आदिम मनोवृत्ति का पुनरोदय है. मनुष्येतर प्राणी अधिकार भावना के कारण हिंसा नहीं करते. कतिपय प्राणियों की हिंसा उनके आहार भर के लिए होती है. हाँ कुछ साँड़ यूँ भी यदा-कदा अपनी ज़ोर आज़माइश कर लेते हैं. मनुष्य ने न्याय पाने की कितनी प्रणालियाँ विकसित की हैं, क्या इन युद्धरत देशों के लिए उन सबसे कोई उम्मीद नहीं. इस हिंसा और प्रतिहिंसा का अंत शोक में ही होना है... ५/३/२२ अनंत का सुख इतना है कि कभी तृप्ति नहीं होती. सरदार पूरन सिंह की स्वामी राम जीवन कथा पढ़ी तो स्वामी रामतीर्थ मिशन की अन्य पुस्तकें जो स्वामी राम के व्याख्यानों के संकलन हैं वे भी आ रही हैं. गोपीनाथ कविराज की पुस्तकें स्वसंवेदन. मृत्यु विज्ञान, परातंत्र साधना पथ इत्यादि आ रही हैं, क्या अच्छा समय बीतेगा. ध्यान के बाद गुरुजी की चैंट्स मंत्र की तरह उठती हैं. यह चैंट्स साधारण गीत या भजन नहीं हैं. समाधि की दशा में यह मंत्रों का असर करती हैं, अन्य कोई मंत्र जानने की ज़रूरत नहीं रह जाती. तुझे पाया प्रभु मन सीमा पर अपनी. छुपो न भग़वन न अब छुपो न . छोड़ो न भग़वन छोड़ो न. ६/३/२२ everything is fare in war and love. यह दरअसल सर्वोच्च तल की सच्चाई है...वहाँ पहुँचकर हुए प्रेमोदय में जीवन संग्राम में सब मरते जीते रहते हैं.. ध्यान में चैंट्स गले से और नाक से ही नही गायी जाती, वरन शरीर का पोर-पोर इसे गाने लगता है और अंत में आंसू भी गाने लगते है, फिर नीरवता गाती है और गान स्वयं ही गाता रहता है. divine gurudeva. I came alone, I go alone, with Thee alone with Thee alone.गुरुदेव ७/३/२२ ....जहां गंगा, वन, हिमालय की कंदराएँ एवं मानव आत्मा का स्वप्न देखते हैं, मैं धन्य हुआ, मेरी काया ने वहाँ का स्पर्श किया...my india मनुष्य परमेश्वर के मन का मूर्त रूप है- गुरुदेव ८/३/२२ एक अपने स्वामी या दाता को पति तो दूसरी पिता मानती/मानता है, तीसरी/तीसरा मित्र मानता है. किसमें निकटता है उसमें जिसमें दोनों के संबंधों में प्रगाढ़ता है, समर्पण है. कोई काम करते समय या ख़ाली क्षण में अकस्मात् हांग सौ होने लगता है. इसमें श्वास रहितता का आनंद मिलने लगता है. यानि श्वास रहित होने को अभिधा में नहीं लिया जाना चाहिए. कश्मीर दर्शन में इसे प्रत्यभिज्ञा कहा गया है. ११/३/२२ घृणा, लज्जा, भय, शोक, जुगुप्सा, जाति का अभिमान, कुल का अभिमान तथा आत्माभिमान यह आठ पाश (बंधन) हैं। जिनका पति यानि धारक मनुष्य है। पशुपति (मनुष्य) के और पशुओं के भी नाथ यानी भगवान शिव की आज की रात्रि, जिनका रुद्र रूप संहारक हैं और शिव रूप कल्याणक हैं। यह दोनों अलग नहीं। वह आशुतोष हैं। बिल्वपत्र अर्पित करने के समय की स्तुति में उन्हें त्रिगुणाकार (सत, रज और तम) और त्रिजन्म (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर) पाप संहारक कहा गया है। शिव भक्त तमाम तरह का नशा करके अपनी भक्ति प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि शिव को धतूरा इत्यादि अर्पित किया जाता है। हमे उनकी भक्ति का नशा नशीले पदार्थों का सेवन करके नहीं, अपितु नाम खुमारी में डूबकर प्राप्त करना चाहिए। फ़ेसबुक पोस्ट अजनाभं नामैतद्वर्षम् भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति। भागवत 5/7/3 तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायण परायणः। विख्यातं वर्षमेतद यन्नाम्ना भारतमद्भुतं 11/2/17 भागवत अर्थात् इस वर्ष को, जिसका नाम पहले अजनाभवर्ष था, राजा भरत के समय से ही 'भारतवर्ष' कहते हैं। यह भरत दुष्यंत और शकुंतला पुत्र नही, वरन् भगवान के चौबीस अवतारो में से एक ऋषभदेव के बड़े पुत्र थे। यही मृगयोनि से होते हुए जड़भरत जब हुए तो इन्होंने राजा रहूगण की पालकी ढोई और राजा को कहा तुम बड़े क्रूर और धृष्ट हो। तुमने इन बेचारे दीन दुखिया कहारों को बेगार में पकड़कर पालकी में जोत रखा है और फिर महापुरुषों की सभा में बढ़कर बाते बनाते हो कि मैं लोको की रक्षा करने वाला हूँ। राजा को चुनौती और उसे तत्वज्ञान देने वाले इन भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत हो सकता था। १२/३/२२ ध्यान में कुछ भी विचार आते हैं, पर थोडे ही अंतराल में वे साक्षी की तरह आने जाने लगते हैं. बिल्कुल वैसे ही जैसे चित्रपट या फ़िल्म चल रही हो, यही चित्रपट कर्म जगत में भी चल रहा है... १३/३/२२ कभी का ज्ञात भी एक समय बाद अज्ञेय बन जाता है। भाषा, कला, संस्कृति, साहित्य इत्यादि जितने विकसित हुए, क्या वे सब जान लिए गए! क्या उन्हें पूरी तरह जाना जा सकता है! क्या उन्हें जानने के क्रम में हम पुनः अज्ञेय तक नहीं पहुँच जाते! स्थान और व्यक्ति नामों का अध्ययन करते समय वर्षो कितना श्रम किया, किंतु अनेक नामों की व्युत्पत्ति और इतिहास ज्ञात नहीं हो सके। जबकि यह सब व्यक्तियों ने ही तो बनाये हैं। इस प्रकार व्यक्ति द्वारा की हुई रचना भी ईश्वर की ही रचना बन जाती है। 15/3/22 वैदिक युग में कुछ अवसरों पर अविवाहित कुमारियां अग्नि के चारों ओर एकत्र हुआ करती थीं, वे जाज्वल्यमान अग्नि के सामने हाथ जोड़ा करती, उसकी परिक्रमा किया करती और यह गीत गाया करती थीं.. यही प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र हुआ... ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् || मंत्र का ऐतिहासिक अर्थ आओ हम सब सुगंधित देव, सर्वदृष्टा देव और हमारे पति के ज्ञाता देव की पूजा में निमग्न हो जाएँ. जिस प्रकार से भूसी से दानों को अलग कर दिया जाता है उसी प्रकार हम भी पितृ गृह के बंधनों से मुक्त हों, परंतु कभी, कदापि भी, पति गृह से विरत न हों. Let us be absorbed in the worship of the Fragrant One, the All-seeing One, the Husband-knowing One. As a seed from the husk, so may we be freed from bondage here (the parents' house), but never, never from there (the husband's home). swami ramtirth दूसरा अर्थ - हम त्रिनेत्र को पूजते हैं, जो सुगंधित हैं, हमारा पोषण करते हैं, जिस तरह फल, शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम भी मृत्यु और नश्वरता से मुक्त हो जाएं। वैदिक मंत्र द्वारा गणपति से प्रार्थना की जाती है- ....आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम्॥ As a woman of a man, so shall I learn of Thee, I shall draw Thee closer and closer, I will drain Thy lips and the secret juices of Thy body, I will conceive of Thee, O Law! O Liberty! हे ईश्वर! हे शाश्वत विधान! जिस प्रकार पत्नी अपने पति को जानती है, उसी प्रकार मैं भी आपको जानूँ. मैं आपके निकट से निकटतर होता जाऊँ और आपके शरीर के जीवन-सत्व का रसास्वादन लूँ तथा आपके आत्मज को प्रकट कर सकूँ. 17/3/22 (होलिका दहन) दुनिया में १६ आना व्यक्त अग्नि नहीं है और न १६ आना सुप्त या अव्यक्त अग्नि है. सुप्त आग १५ आना तक रह सकती है. सुप्त आग कम हो तो बाह्य अधिक चाहिए और सुप्त अधिक हो तो बाह्य आग कम चाहिए. लकड़ी जितनी सूखी होगी, बाहरी आग की उतनी कम मात्रा आवश्यकता होगी और जितनी गीली होगी बाहर की मात्रा उतनी अधिक लगेगी. अंदर बाहर की अग्नि एक ही है. लकड़ी में चार आना सुप्त अग्नि है. इसमें बारह आना आवरण की अग्नि मिलाकर जलाना हमारा लक्ष्य होता है. जब इस प्रकार होलिका दहन होगा तब ऐसे रंग उड़ते हैं. उड़ा रहा हूँ मैं रंग भर-भर तरह-तरह की यह सारी दुनिया. चे खूब होली मचा रखी थी, पै अब तो होली यह सारी दुनिया. मैं साँस लेता हूँ रंग खुलते हैं, चाहूँ दम में अभी उड़ा दूँ. अजब तमाशा है रंगरलियाँ है खेल जादू यह सारी दुनिया. पड़ा हूँ मस्ती में गर्को-बेख़ुद न ग़ैर आया, चला न ठहरा. नशे में खर्राटा सा लिया था, जो शोर बरपा है सारी दुनिया(स्वामी रामतीर्थ की कविता) साँस, मन, सूर्य-चंद्र-अग्नि, संसार, जीवन यह सब एक सूत्र में गुँथे हुए हैं. एक से दूसरे जुड़े हुए. एक रुकता है तो दूसरा ठहर जाता है. सूर्य की उपस्थिति जाग्रत अवस्था में है. पति वह जो पत् को धारण करे, पत्नी उस पत् को आगे ले जाती है. पत् अस्तित्व को कहते हैं, लाज, भरोसा, रक्षा, शक्ति इत्यादि उसके बहुत से अर्थ लिए जाते हैं. १८/३/२२ भक्त गाते हैं... हो लाल मेरी पत रखियो बला झूले लालण, क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः अर्थात् जो क्षण-क्षण में नवीनता को प्राप्त हो,वही तो रमणीयता है अर्थात् सुंदरता है । फ़ेसबुक पोस्ट १८ मार्च २१ सौंदर्य चेतना में है या वस्तु में! व्यक्ति वस्तु भी है और चेतना भी। निःसंदेह सौंदर्य चेतना में है। चेतना को उज्ज्वल करने की आवश्यकता है..कुरूपता आगे बढ़ेगी ही नहीं। १८ मार्च 21 की फ़ेसबुक पोस्ट समझ में ज़िंदगी आए कहाँ से सबक़ पड़ता है हर दरमियाँ से! खुलता किसी पे क्यों मेरे दिल का मुआमला शेरों के इंतिख़ाब ने रुसवा किया मुझे! ग़ालिब है अनलहक हक़ मगर कहनी न थी यार की महफ़िल से बाहर यार की महफ़िल की बात. आइना बनकर मक़ाबिल उसके जब आता हूँ मै अपनी सूरत देखता हूँ और इतराता हूँ मैं. आज फ़रीद अयाज़ को सुना १९/३/२२ सत्य, प्रेम और करुणा क्रमशः मुक्ति, आनंद और स्वभाव के परिणाम हैं. सत्य में भाव और अभाव दोनों रहते, आनंद में अभाव रहता है और स्वभाव में न भाव और न अभाव रहता है. बोध तीनों में रहेगा. इश्क़ जब हद से गुज़र जाए तो बीमारी है. और जब हद से न गुज़रे तो अदाकारी है..बुल्ले शाह माला जपूं न कर जपूं और मुख से कहूँ न राम । राम हमारा हमे जपे और हम पायो विश्राम ।।कबीर राम नाम की खूंटी गाडी, सूरज ताना तंता। चढ़ते उतरते दम की खबर ले, फिर नहीं आना बनता कबीरा।। Meaning - Erect the loom of Ram's name, The sun its fibers & threads, Be aware of your breath which is arising and passing, You won't be coming back again अनहद बाजा बजे शहाना मुतरिब सुघड़ा ताल तराना. बुल्ले शाह जनेऊ को यज्ञोपवीत कहने का भाषा वैज्ञानिक आधार तो नहीं बनता. फिर जैसे भी जनेऊ को यज्ञोपवीत कहा जाने लगा हो. जनेऊ कुंडलिनी का प्रतीक है, जनेऊ संस्कार होने पर जातक द्विज कहलाने लगता है. द्विज यानि जिसका दूसरा जन्म हो गया हो. कुंडलिनी जागने पर यही होता है. कुंडलिनी का आवागमन जनेऊ की ही भाँति होता है. जनेऊ में गुँथे तीन धागे इड़ा पिंगला और सुषुम्ना हैं. फिर हर धागे के भी तीन तीन डोरे और होते हैं, वे त्रिगुणात्मिका प्रकृति, त्रिशूल तथा सुषुम्ना के भीतर की तीन नाड़ियों - वज्रा, चित्रा और ब्रह्मनाड़ी- के रूप हैं. ब्रह्म गाँठ भी जनेऊ में होती है. कुंडलिनी विज्ञान में ब्रह्म, विष्णु और रूद्र ग्रंथि का वर्णन मिलता है. ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्या वहो रात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौभ्यात्तम् | इष्णं निखाणा मुम्मऽइखाण सर्भलोकं मऽइखाण || (-यजुर्वेद 22.22) Sriscate Lakshmisca patnyau ahoratre parsve Nakshatrani rupam aswinau vyaattam Ishtam manishaanaam Yajur Meaning:— Success and prosperity are thy maid-servants, day and night thy right and left sides, the splendour in stars thy looks, Heaven and Earth thy lips parted (in smiling). If ye desire anything, desire that. श्री और समृद्धि आपकी सहचरी हैं, वे दिन रात आपके दाएँ बाएँ रहती हैं, तारों की कांति आपकी चितवन है, स्वर्ग और पृथ्वी आपके मुस्कराते खुले अधर हैं, यदि आपको कोई अभिलाषा है तो उसकी कामना भर कीजिए... 20/3/22 bulle shah Alif Allah Chambe de booti Murshid mun vich laee Hu Nafi Asbaat da pani millia si har rage har jaee Hu Andar booti mushk machaya jaan phulan te aee Hu Jeevay Murshid mera kamil Bahu Jain aee booti laee Hu Alif. My Spiritual Guide planted the Love of Allah (all praises due) in my heart just like a jasmine plant. Hu With every vein [of mine] being watered by nothing but [the truth of] negation and affirmation [i.e. La ilaaha illa Allah]. ला यानि नहीं, इलाह ईश्वर, इल्ल लेकिन, अल्लाह ईश्वर there is no god but Allah . Hu This plant has caused much turmoil of fragrance within me upon reaching its full bloom. Hu Bahu! Long live my perfect Spiritual Guide who sowed [within me] this plant of Love of Allah Almighty. Hu. nafi asbat first the negation of everything other than God and second part is the affirmation of the Supreme Being. नफ़्स - वजूद, अस्तित्व, काम वासना, सच्चाई क़ल्ब- हृदय, मन सिर्र- रहस्य, क्रिया (जिसमें हल्की आवाज़ में नमाज़ पढ़ते हैं) खाफ़ी- गुप्त, दिया हुआ अख़्फ़ा- बहुत ज़्यादा गुप्त, सर्वाधिक गुप्त अरबी में पहले ला इलाह दूसरे में इल्लिल्लाह लिखा है, २५/३/२२ न्यूयार्क के एक समाचार पत्र में स्वामी रामतीर्थ के लिए लिखा गया- अमेरिका में एक विचित्र भारतीय साधु आया हुआ है, जो किसी धातु को नहीं छूता, अपने साथ भोजन की कोई सामग्री नहीं रखता. जब सैर करने निकलता है तो एक सामान्य कपड़े में कई कई दिन अत्यंत शीत स्थानों में घूमता रहता है. जब व्याख्यान देता है तो दिन में कई बार, और एक बार में तीन तीन घंटा लगातार बोलता रहता है. उसका रूप और छवि बड़ी ही मनोहर है. इन्हें 'लिविंग क्राइस्ट' कहा गया. स्वामी राम कहते थे भारत की जितनी सभाएँ, समाज और सम्प्रदाय हैं, वे सब राम के हैं और राम उन्हीं के माध्यम से कार्य करेगा. गणित के प्रोफ़ेसर रहे स्वामी जी के व्याख्यान हर किसी को पढने-गुनने चाहिए... भाव मानो फूल की कली है और प्रेम उसी का सुगंधित फूल. भाव परिपक्व होकर प्रेम में परिणति प्राप्त करता है. प्रेम उदय होने पर माँ संतान को गोद में ले लेती है. फिर व्यवधान नहीं रह जाता. अब रस भाव का उदय होता है. भावदेह, प्रेमदह और रसदेह यह क्रम है. भाव के पथ से प्रेम के द्वारा रस में नहीं पहुँच पाने से लीलाराज्य में प्रवेश पाने का अधिकार नहीं मिलता. आत्मा का रसास्वादन रसमय देह से होता है. सिद्धदेह से जागतिक व्यापार संपन्न होता है. गोपीनाथ कविराज भावदेह ज्ञानदेह प्राप्त होने पर मिलती है और ज्ञान स्थूल देह में आएगा. यही त्रिजन्म है. पहला स्थूल, दूसरा ज्ञान और तीसरा भाव देह का जन्म. हमने बेपर्दा तुझे माहजबीं देख लिया अब ना कर पर्दा के ओ पर्दानशीं देख लिया हमने देखा तुझे आंखों की सियाह पुतली में सात पर्दों में तुझे पर्दानशीं देख लिया हम नज़र-बाज़ों से तू छुप ना सका जान-ए-जहां तू जहां जाके छुपा हमने वहीं देख लिया तेरे दीदार की थी हमको तमन्ना, सो तुझे लोग देखेंगे वहां, हमने यहीं देख लिया. २६/३/२२ मन = शक्ति ; आत्मा =शक्तिमान मन जब समसूत्र में आत्मा से मिलित होता है ,तब अद्वैतावस्था होती है ---- सामरस्य । उसमें चैतन्य स्फूर्ति रहती है , मन का लय नहीं होता । उस समय मन आत्मा-कार होता है । इच्छा होते ही मन बाहर निकल सकता है , और बाहर होने से उसे कोई रोकने वाला नहीं । मन आत्मा का समकक्ष है ---तुल्य बल नहीं होने से मिलने पर यह अवस्था नहीं हो सकती । समान बल वाला मल्ल /पहलवान जैसे किसी को अभिभूत नहीं कर सकता , ठीक वैसा ही । यही स्वाधीनता या स्वातंत्र्य है । लेकिन मन का बल यदि कम हो और उस समय यदि आत्मा से मिलन हो तो मन अभिभूत हो जाता है । प्रबल से यदि दुर्बल मिलने जाये तो यही दशा होती है । यह चेतनाहीन जड़ अवस्था है । यह निर्वाण या मोक्ष है । सुतरां , निर्वाण को टालना हो , तो मन की सबलता आवश्यक है । इसीलिए शक्ति की उपासना होती है । जिस अनुपात में मन शक्तिमान होगा ,उसी अनुपात में यह आत्मा से समसूत्र में मिल सकेगा । शक्ति की क्रमिक वृद्धि से मिलन की गम्भीरता सम्पन्न होती है । इसीलिए साम्य अवस्था में भी नित्यक्रम है । चेतना ही शक्ति है । आनन्द ही मिलन है । स्वभाव ही आत्मा है । जीव ही मन है । चैतन्य या शक्ति के संचार -मात्र से ही इस साम्य का उदय होता है । वही शांत भाव । इस संचार के नहीं होने से मन बलहीन होता है ----उस अवस्था में आत्मलाभ नहीं होता । 8 , 12 , 1925 3 , 5, 2021 की पोस्ट आत्मा से यथार्थ साम्य एकमात्र महाशक्ति का है ---- दोनों तुल्यबल हैं, समरस । मन महाशक्ति से उद्भूत है । मन महाशक्ति का जितना ही समीपवर्ती होता है ,उतना ही अधिक रस का आस्वादन होता है । महाशक्ति नित्य सर्वरस का आधार है ,माधुर्य की खान । महाशक्ति की ओर जाने से मन का प्रसार होता है --क्रमशः चैतन्य-विकास होता है । महाशक्ति की ओर न जाकर सीधे आत्मा में जाने का मतलब है विषय का त्याग । विषय त्यागते ही मन आत्मा में लीन होता है । शून्य में लय ,जड़त्व । इसीलिए चैतन्य को पकड़ने के बाद ही विषय को छोड़ना चाहिए --तब फिर शून्य में लय नहीं होता । गीता में है "आत्म संस्थ मनम् कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् "। बिना अवलम्ब के मन नहीं रहता । इसलिए आश्रित भाव -लाभ ही चैतन्य संचार है । महाशक्ति अवश्य ही निराश्रय है , वह स्वयं मन का आश्रय है । इसीलिए उनकी गोद में बैठकर मन आत्मा का रस ग्रहण करता है , स्वच्छंदता पाता है । माँ का आश्रय लिए बिना ज्ञान ,भक्ति --कुछ भी तो नहीं होसकती । कविराज ji 💐💐 इसका मतलब है जिनकी रुलाई छूटती है, वे शक्ति तत्व से वंचित रहते हैं और सीधे शिव तत्व में प्रवेश करते हैं ३०/३/२२ शारीरिक जनक और जननी ही पितर नहीं होते हैं. यह अग्निष्वाता पितर होते हैं. पाँच दिव्य पितर हैं पहला पितर सूर्य और चंद्रमा का जोड़ा है, उष्णता और तरलता का मिलापक. दूसरा पितर सम्वत्सर उत्तरायण और दक्षिणायन से मिलाप पा रहा है, तीसरा पितर मास जो शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष से मिलाप पा रहा है, चौथा पितर दिन रात है, यह प्रकाश और अंधकार से मिलाप पाता है. पाँचवाँ पितर अन्न है जो वीर्य और रज से दम्पित होता है. इनमें हर जोड़े का पहला पिता और दूसरी माता है. पहला प्राण है दूसरा रयि.

Wednesday, March 2, 2022

डायरी फ़रवरी २०२२


अनंत संसार समुद्र तार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्यां।

वैराग्य साम्राज्यद् पूजनाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥१॥


उन गुरू की जो संसार रूपी अनंत समुद्र को पार करने के लिए

महानभक्ति रूपी नौका प्रदान करते हैं,

या अनंत संसार रूपी समुद्र को तारने वाली जो नौका की तरह है उस गुरू की,

जो वैराग्य रूपी साम्राज्य को प्रदान करने वाले हैं,

जो वैराग्य रूपी साम्राज्य में जो पूजनीय हैं उन गुरूओं की

हम चरण वंदना करते हैं।

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इस संसार रूपी अनंत समुद्र को गुरूभक्ति् रूपी नौका से पार करने योग्य बनाने वाले

और अमूल्य वैराग्य के साम्राज्य की राह दिखाने वाले गुरू के चरण वन्दना। गुरु पादुका स्तोत्र



श्रीशैलशृंगे विबुधातिसंगे तुलाद्रितुंगेऽपि मुदा वसन्तम्।

तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम्।।2।।

ऊंचाई की तुलना में जो अन्य पर्वतों से ऊंचा हैजिसमें देवताओं का समागम होता रहता हैऐसेश्रीशैलश्रृंग में जो प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैंऔर जो संसार सागर को पार करने के लिए सेतुके समान हैंउन्हीं एकमात्र श्री मल्लिकार्जुन भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ। द्वादश ज्योतिर्लिंगस्तोत्र


अपार संसार समुद्र मध्ये

निमज्जतो मे शरणं किमस्ति 

गुरो कृपालो कृपया वदैत-

द्विश्वेश पादाम्बुज दीर्घ नौका  १॥


प्रश्न :- हे दयामय गुरुदेव ! कृपा करके यह बताइये कि अपार संसाररूपी समुद्र में मुझ डूबते हुए काआश्रय क्या है ?


उत्तर :- विश्वपति परमात्मा के चरणकमलरूपी जहाज | प्रश्नोत्तरमणि माला



अहो निसर्ग गंभीरो घोर संसार सागरः.

अहो तत्तरणोपायः परः कोsपि मकेश्वरःस्तव चिंतामणि



तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।12.7।।

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka


।।12.7।।उनका क्या होता है --, हे पार्थ मुझ विश्वरूप परमेश्वरमें ही जिनका चित्त समाहित है ऐसेकेवल एक मुझ परमेश्वरकी उपासनामें ही लगे हुए उन भक्तोंका मैं ईश्वर उद्धार करनेवाला होता हूँ।किससे ( उनका उद्धार करते हैं ) सो कहते हैं कि मृत्युयुक्त संसारसमुद्रसे। मृत्युयुक्त संसारका नाममृत्युसंसार हैवही पार उतरनेमें कठिन होनेके कारण सागरकी भाँति सागर हैउससे मैं उनकाविलम्बसे नहींकिंतु शीघ्र ही उद्धार कर देता हूँ।



नलिनीदलगतजलवत्तरलं

तद्वज्जीवनमतिशयचपलम् 

क्षणमपि सज्जनसंगतिरेका

भवति भवार्णवतरणे नौका 

कमलपत्र पर पानी जैसा चंचल यह जीवन अतिशय चपल है  इसलिए एक क्षण भी की हुईसज्जनसंगति भवसागर को पार करनेवाली नौका है 


संसार क्यों है ! ओशो 

यह संसार क्यों है?” –  ओशो 

                                  

बहुत बार यह प्रश्न उठा है तुम मेंः ‘यह संसार क्यों हैइतनी ज्यादा पीड़ा क्यों हैयह सब किसलिएहैइसका प्रयोजन क्या है? ’ बहुत से लोग मेरे पास आते हैं और वे कहते हैं, ‘यह मूलभूत प्रश्न है किहम आखिर हैं ही क्योंऔर अगर जीवन इतनी पीड़ा से भरा हैतो प्रयोजन क्या है इसकायदिपरमात्मा हैतो वह इस सारी की सारी अराजकता को मिटा क्यों नहीं देताक्यों नहीं वह मिटा देताइस सारे दुख भरे जीवन कोइस नरक कोक्यों वह लोगों को विवश किए चला जाता है इस में जीनेके लिए? ’

योग के पास उत्तर है।


पतंजलि कहते हैं, ‘द्रष्टा को अनुभव उपलब्ध हो तथा अंततः मुक्ति फलित होइस हेतु यह होता है।


यह एक प्रशिक्षण है। पीड़ा एक प्रशिक्षण हैक्योंकि बिना पीड़ा के परिपक्व होने की कोई संभावनानहीं। यह आग हैसोने को शुद्ध होने के लिए इसमें से गुजरना ही होगा। यदि सोना कहेक्योंतोसोना अशुद्ध और मूल्यहीन ही बना रहता है। केवल आग से गुजरने पर ही वह सब जल जाता है जोकि सोना नहीं होता और केवल शुद्धतम वर्ण बच रहता है। मुक्ति का कुल मतलब इतना ही हैः एकपरिपक्वताइतना चरम विकास कि केवल शुद्धताकेवल निदाक्रषता ही बचती हैऔर वह सब जोकि व्यर्थ थाजल जाता है।


इसे जानने का कोई और उपाय नहीं है। कोई और उपाय हो भी नहीं सकता इसे जानने का। यदि तुमजानना चाहते हो कि तृप्ति क्या हैतो तुम्हें भूख को जानना ही होगा। यदि तुम बचना चाहते हो भूखसेतो तुम तृप्ति से भी बच जाओगे। यदि तुम जानना चाहते हो कि गहन तृप्ति क्या होती हैतो तुम्हेंजानना होगा प्यास कोगहन प्यास को। यदि तुम कहते हो, ‘मैं नहीं चाहता मुझे प्यास लगे’, तो तुमप्यास के बुझने कीउस गहन तृप्ति की सुंदर घड़ी को चूक जाओगे। यदि तुम जानना चाहते हो किप्रकाश क्या हैतो तुम्हें गुजरना ही पड़ेगा अंधेरी रात से। अंधेरी रात तुम्हें तैयार करती है जानने केलिए कि प्रकाश क्या है। यदि तुम जानना चाहते हो कि जीवन क्या हैतो तुम्हें गुजरना होगा मृत्यु से।मृत्यु तुम में जीवन को जानने की संवेदनशीलता निर्मित करती है।


वे विपरीत नहीं हैंवे परिपूरक हैं। ऐसा कुछ नहीं है संसार में जो कि विपरीत होहर चीज परिपूरकहै। ‘यह’ संसार अतित्व रखता है ताकि तुम जान सको ‘उस’ संसार को। ‘इसका’ अतित्व है ‘उसको’ जानने के लिए। भौतिक है आध्यात्मिक को जानने के लिएनरक है वर्ग तक आने के लिए। यही हैप्रयोजन। और यदि तुम एक से बचना चाहते हो तो तुम दोनों से बच जाओगेक्योंकि वे एक ही चीजके दो पहलू हैं। एक बार तुम इसे समझ लेते हो तो कोई पीड़ा नहीं रहतीः तुम जानते हो कि यह एकप्रशिक्षण हैएक अनुशासन है। अनुशासन कठिन होता है। कठिन होगा हीक्योंकि केवल तभी उससेसच्ची परिपक्वता आएगी।

योग कहता है कि यह संसार एक ट्रेनिंग स्कूल की भांति हैएक पाठशाला। इससे बचो मत औरइससे भागने की कोशिश मत करो। बल्कि जीओ इसेऔर इसे इतनी समग्रता से जीओ कि इसे फिरसे जीने को विवश  होना पड़े तुम्हें। यही है अर्थ जब हम कहते हैं कि एक बुद्ध पुरुष कभी वापस नहींलौटता। कोई जरूरत नहीं रहती। वह गुजर गया जीवन की सभी परीक्षाओं से। उसके लौटने कीजरूरत  रही।


तुम्हें फिर-फिर उसी जीवन में लौटने को विवश होना पड़ता हैक्योंकि तुम सीखते नहीं। बिना सीखेही तुम अनुभव की पुनरुक्ति किए चले जाते हो। तुम फिर-फिर दोहराते रहते हो वही अनुभववहीक्रोध। कितनी बारकितने हजारों बार तुम क्रोधित हुए होजरा गिनो तो। क्या सीखा तुमने इससेकुछ भी नहीं। फिर जब कोई स्थिति  जाएगी तो तुम फिर से क्रोधित हो जाओगेबिल्कुल उसीतरह जैसे कि तुम्हें पहली बार क्रोध  रहा हो!


कितनी बार तुम पर कब्जा कर लिया है लोभ नेकामवासना नेफिर कब्जा कर लेंगी ये चीजें। औरफिर तुम प्रतिक्रिया करोगे उसी पुराने ढंग सेजैसे कि तुमने  सीखने की ठान ही ली हो। और सीखनेके लिए राजी होने का अर्थ है योगी होने के लिए राजी होना। यदि तुमने  सीखने का ही तय करलिया हैयदि तुम आंखों पर पट्टी ही बांधे रखना चाहते होयदि तुम फिर-फिर दोहराए जाना चाहतेहो उसी नासमझी कोतो तुम वापस फेंक दिए जाओगे। तुम वापस भेज दिए जाओगे उसी कक्षा मेंजब तक कि तुम उत्तीर्ण  हो जाओ।


जीवन को किसी और ढंग से मत देखना। यह एक विराट पाठशाला हैएकमात्र विश्वविद्यालय है।विश्वविद्यालय’ शब्द आया है ‘विश्व’ से। असल में किसी विश्वविद्यालय को स्वयं कोविश्वविद्यालय नहीं कहना चाहिए। यह नाम तो बहुत विराट है। संपूर्ण विश्व ही है एकमात्रविश्वविद्यालय। लेकिन तुमने बना लिए हैं छोटे-छोटे विश्वविद्यालय और तुम सोचते हो कि जब तुमवहां से उत्तीर्ण होते हो तो तुम जान गए सबजैसे कि तुम बन गए ज्ञानी!


नहींये छोटे-मोटे मनुष्य-निर्मित विश्वविद्यालय  चलेंगे। तुम्हें इस विराट विश्वविद्यालय से जीवनभर गुजरना होगा।


      ओशो


यत् दृश्य तत् अल्प तत् नश्यदृग दृश्य विवेक That which is perceived is finite and perishable. 



2/2/22


शुद्धोसि बुद्धोसि निरँजनोऽसि

सँसारमाया परिवर्जितोऽसि

सँसारस्वप्नँ त्यज मोहनिद्राँ

मँदालसोल्लपमुवाच पुत्रम्।।मार्कण्डेय पुराण



एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूलश्चतूरसः पञ्चविधः षडात्मा।

सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो दशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्षः॥२७॥

भागवत १०..२७

भागवत १०..२७

भावार्थ:- यह संसार क्या है -

  • एक सनातन वृक्ष। इस वृक्ष का आश्रय है - प्रकृति।
  • इसके दो फल हैं - सुख और दुःख;
  • तीन जड़ें हैं - सत्त्वरज और तम;
  • चार रस हैं - धर्मअर्थकाम और मोक्ष।
  • इसके जानने के पाँच प्रकार हैंश्रोत्रत्वचानेत्ररसना और नासिका।
  • इसके छः स्वभाव हैं - पैदा होनारहनाबढ़नाबदलनाघटना और नष्ट हो जाना।
  • इस वृक्ष की छाल हैं सात धातुएँ - रसरुधिरमांसमेदअस्थिमज्जा और शुक्र।
  • आठ शाखाएँ हैं - पाँच महाभूतमनबुद्धि और अहंकार।
  • इसमें मुख आदि नवों द्वार खोड़र हैं।
  • प्राणअपानव्यानउदानसमाननागकूर्मकृकलदेवदत्त और धनंजय - ये दस प्राण हीइसके दस पत्ते हैं।
  • इस संसार रूपी वृक्ष पर दो पक्षी हैं - जीव और ईश्वर।



त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिस्त्वं सन्निधानं त्वमनुग्रहश्च।

त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां पश्यन्ति नाना  विपश्चितो ये॥२८॥

भागवत १०..२८

भावार्थ:- इस संसार रूप वृक्ष की उत्पत्ति के आधार एकमात्र आप ही हैं। आपमें ही इसका प्रलय होताहै और आपके ही अनुग्रह से इसकी रक्षा भी होती है। जिनका चित्त आपकी माया से आवृत हो रहा हैइस सत्य को समझने की शक्ति खो बैठा है - वे ही उत्पत्तिस्थिति और प्रलय करने वाले ब्रह्मादिदेवताओं को अनेक देखते हैं। तत्त्वज्ञानी पुरुष तो सबके रूप में केवल आपका ही दर्शन करते हैं।


संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय

श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌  छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद  वेदवित्‌ गीता १५/
भावार्थ : श्री भगवान बोलेआदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले (आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवानही नित्य और अनन्त तथा सबके आधार होने के कारण और सबसे ऊपर नित्यधाम में सगुणरूप सेवास करने के कारण ऊर्ध्व नाम से कहे गए हैं और वे मायापतिसर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इससंसाररूप वृक्ष के कारण हैंइसलिए इस संसार वृक्ष को 'ऊर्ध्वमूलवालाकहते हैंऔर ब्रह्मारूपमुख्य शाखा वाले (उस आदिपुरुष परमेश्वर से उत्पत्ति वाला होने के कारण तथा नित्यधाम से नीचेब्रह्मलोक में वास करने के कारणहिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा को परमेश्वर की अपेक्षा 'अधःकहा है औरवही इस संसार का विस्तार करने वाला होने से इसकी मुख्य शाखा हैइसलिए इस संसार वृक्ष को'अधःशाखा वालाकहते हैंजिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी (इस वृक्ष का मूल कारणपरमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती हैइसलिए इस संसार वृक्षको 'अविनाशीकहते हैंकहते हैंतथा वेद जिसके पत्ते (इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होनेवाले और यज्ञादि कर्मों द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वालेहोने से वेद 'पत्तेकहे गए हैंकहे गए हैंउस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानताहैवह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। (भगवान्‌ की योगमाया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुरनाशवान और दुःखरूप हैइसके चिन्तन को त्याग कर केवल परमेश्वर ही नित्य-निरन्तरअनन्य प्रेमसे चिन्तन करना 'वेद के तात्पर्य को जाननाहै)1



Saṃsāra is a journey of the Atman.


Saṃsāra in Jainism represents the worldly life characterized by continuous rebirths and suffering in various realms of existence.


Samsara is considered permanent in Buddhism, just like other Indian religions. Karma drives this permanent Samsara in Buddhist thought, states Paul Williams, and "short of attaining enlightenment, in each rebirth one is born and dies, to be reborn elsewhere in accordance with the completely impersonal causal nature of one's own karma.


Sikhism, like the three ancient Indian traditions, believes that body is perishable, there is a cycle of rebirth, and that there is suffering with each cycle of rebirth.[123][127] These features of Sikhism, along with its belief in Saṃsāra and the grace of God, is similar to some bhakti-oriented sub-traditions within Hinduism such as those found in Vaishnavism.



संसार (संसारएक संस्कृत / पाली शब्द है जिसका अर्थ है "दुनिया" [1] [2] यह पुनर्जन्म कीअवधारणा और "सभी जीवनपदार्थअस्तित्व की चक्रीयताभी हैजो कि अधिकांश भारतीय धर्मोंका एक मौलिक विश्वास है  [3] [4] लोकप्रिय रूप सेयह मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्र है  [2] [5]संसार को कभी-कभी शब्दों या वाक्यांशों के साथ संदर्भित किया जाता है जैसे कि स्थानांतरगमनकर्म चक्र, पुनर्जन्म या पुनर्जनमन , और "उद्देश्यहीन बहावभटकने या सांसारिक अस्तित्व का चक्र"[2] [6]


बौद्ध धर्म में भावचक्र संसार का वर्णन करते हैं

संसार की अवधारणा की जड़ें उत्तर वैदिक साहित्य में हैं ; वेदों में स्वयं सिद्धांत की चर्चा नहीं की गईहै  [7] [8] प्रारंभिक उपनिषदों में यह विकसित रूप में दिखाई देता हैलेकिन यंत्रवत विवरण केबिना  [9] [10] संसार के सिद्धांत की पूरी व्याख्या बौद्ध धर्म और जैन धर्म जैसे श्रमणिक धर्मों केसाथ - साथ पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य में हिंदू दर्शन के विभिन्न स्कूलों में पाई जाती है।[10] [11] संसार का सिद्धांत कर्म से जुड़ा हुआ हैहिंदू धर्म का सिद्धांत , और संसार से मुक्ति भारतीयपरंपराओं की आध्यात्मिक खोज के साथ-साथ उनकी आंतरिक असहमति के मूल में रहा है। [12] [13] संसार से मुक्ति को मोक्ष , निर्वाण , मुक्ति या कैवल्य कहा जाता है 


संसार शब्द कई उपनिषदों में मोक्ष के साथ आता हैजैसे कि कथा उपनिषद के श्लोक 1.3.7 में , [26]श्वेताश्वतर उपनिषद के 6.16 , [27] मैत्री उपनिषद के छंद 1.4 और 6.34 में  


संसार कहीं बाहर नहीं है तुम्हारे रस में हैइसी तरह मोक्ष भी तुम्हारे विरस हो जाने में है...


साधना का आरम्भ संकल्प से होता है तथा समर्पण में इसका अंत होता है...


जीव के कर्मों और मन के अवसान को संध्या कहते हैंयहाँ ध्यान समाप्त हो जाता हैप्रार्थना हीएकमात्र मार्ग रह जाता हैधर्ममेघ समाधि की दशा यही है.


4/2/22

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणश्चोत्तरेण

अधश्चोर्ध्वं  प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्मुंडक उप /११

यह अमृत स्वरूप परब्रह्म ही सामने हैब्रह्म ही पीछे हैब्रह्म ही दाएँ और बाएँ हैनीचे और ऊपर भीफैला हैयह जो सम्पूर्ण जगत है वह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है.


अग्नि अन्नाद है जो ईंधन रूपी अग्नि का भक्षण करके जीवित रहती हैजो कुछ भक्षण किया जाता हैवह सब अन्न है



ब्राह्मण अग्नि मुखी कहे गएदेवता सूक्ष्म आहार ग्रहण करते हैंसूक्ष्म आहार अग्नि के माध्यम सेलिया जाता हैस्थूल आहार लेने के चार तरीक़े हैं.

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।गीता 15.14।।


मैं हीपेटमें रहनेवाला जठराग्नि होकर अर्थात् यह अग्नि वैश्वानर है जो कि पुरुषके भीतर स्थित हैऔर जिससे यह ( खाया हुआ ) अन्न पचता है इत्यादि श्रुतियोंसे जिसका वर्णन किया गया हैवहवैश्वानर होकरप्राणियोंके शरीरमें स्थित -- प्रविष्ट होकर प्राण और अपानवायुसे संयुक्त हुआभक्ष्यभोज्यलेह्य और चोष्य -- ऐसे चार प्रकारके अन्नोंको पचाता हूँ। वैश्वानर अग्नि खानेवाला हैऔर सोम खाया जानेवाला अन्न है। सुतरां यह सारा जगत् अग्नि और सोमस्वरूप हैइस प्रकारदेखनेवाला मनुष्य अन्नके दोषसे लिप्त नहीं होता। (हरिकृष्ण गोयनका द्वारा व्याख्यायित)




सूक्ष्म आहार अग्नि में भस्मीभूत होकर ग्रहण होता हैयज्ञ कार्यों के पीछे का यही रहस्य हैयद्यपि यज्ञकी अग्नि एक प्रकार की हैअग्नियाँ भी पाँच अलग अलग प्रकार की हैंपंचाग्नि उपासना का वर्णनउपनिषदों में हुआ हैकठोपनिषद में नचिकेता अग्नि कही गयी हैपृथ्वी पर रहने पर स्थूल आहार सेकाम चलता हैपर स्वर्ग में यह आहार नहीं होतापंचमहाभूत ही वहाँ आहार होते हैंब्राह्मणों को दानदेने का कारण यह आहार व्यवस्था हैअग्निमुखी ब्राह्मण को अन्न दान और अन्य दान करने सेव्यक्ति पर देवताओं की कृपा होगी और दानकर्ता व्यक्ति स्वर्ग में ब्राह्मण को प्रदत्त आहार काप्रतिदान लेंगे.

अग्नि की सूर्य से भी उच्चतर दशा हैअग्नि का ईंधन है सूर्य इस अग्निमुखता के कारण ब्राह्मण वर्णोंमें अग्रगण्य हुआ.


//२२


 विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः . प्रधान क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशःसंसारमोक्षस्थितिबंध हेतुःश्वेताश्वतर उप /१६

वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा सर्वसृष्टासर्वज्ञस्वयं ही अपने प्राकट्य का हेतुकाल का भी महाकालसम्पूर्ण दिव्य गुणों से संपन्न और सबको जानने वाला हैजो प्रकृति और जीवात्मा का स्वामीसमस्तगुणों का शासक तथा जन्म-मृत्यु रूप संसार में बांधनेस्थित रखने और मुक्त करने वाला है


स्वस्ति  इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाःवृद्धश्रवा इंद्र (सुयश वालेहमारा मंगल करेसमस्त विश्व (ज्ञानके आधार पूषा हमारा मंगल करेअथर्ववेदीय शांतिवचन


सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायतेसर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठतिसर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यतिसर्वं जगदिदंत्वयि प्रत्येतित्वं भूमिरापोsनलोsनिलो नभःत्वं चत्वारि वाक्पदानिगणपत्यथर्वशीर्षोपनिशत्  

यह समस्त संसार आपसे उत्पन्न होता हैयह समस्त संसार आपसे ही अस्तित्व में आया हैयहसमस्त संसार आपमें ही लय को प्राप्त होगायह समस्त संसार आप में ही लौट आता हैआप पृथ्वीजलअग्निवायु तथा आकाश होआप चतुष्पाद वाणी (परापश्यंतीमध्यमा तथा वैखरीहो.


विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिल भयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्

जो विश्व के आदि हैं, , विश्व ke बीज (कारणहैंजो अशेष भयनाशक हैंपंचमुख तथा त्रिनयन हैंउन महेश का नित्य ध्यान करो


संसार रोगहरमौषधमद्वितीयम्संसार रूपी रोग के नाशक अद्वितीय औषधस्वरूप हैंउनको मैंप्रातःकाल नमन करता हूँ.


संसार दुःखगहनाज्जगदीश रक्षहे जगदीश संसाररूपी अरण्य से मुझ अनाथ की रक्षा करो

विश्वनाथ नाम ही उनका विश्वअधिपति होने के कारण है.


संसार सागरनिमग्नमनंतदीनम्

उद्धर्तुमर्हसि हरे पुरूषोत्तमोsसिसंसारसागर में निमग्न होकर मैं चिरकाल se कष्ट पा रहा हूँअतः हेपुरुषोत्तमहे सर्वसंतापों का हरण करने वालेमुझ पर कृपा करके मेरा उद्धार करो.


तं संसारध्वांतविनाशं हरिमीडेसंसार के अज्ञान -अंधकार के नाशक हरि की मैं स्तुति करता हूँ.


ऋग्वेद १०/९० और तैत्तिरीयआरण्यक /१२ में पुरुषसूक्त में संसार रचना का पूरा विवरण मिलता है...


सहस्त्रशीर्षा पुरुष:सहस्राक्ष:सहस्रपात् |


 भूमि सर्वतस्पृत्वाSत्यतिष्ठद्द्शाङ्गुलम् ||||

जो सहस्रों सिरवालेसहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैंवे सारे ब्रह्मांड को आवृतकरके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ||||

पुरुषSएवेदं सर्व यद्भूतं यच्च भाव्यम् |


उतामृतत्यस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ||||

जो सृष्टि बन चुकीजो बननेवाली हैयह सब विराट पुरुष ही हैं | इस अमर जीव-जगत के भी वे हीस्वामी हैं और जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैंउनके भी वे ही स्वामी हैं ||||

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः |


पादोSस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ||||

विराट पुरुष की महत्ता अति विस्तृत है | इस श्रेष्ठ पुरुष के एक चरण में सभी प्राणी हैं और तीन भागअनंत अंतरिक्ष में स्थित हैं ||||

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुष:पादोSस्येहाभवत्पुनः |


ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशनेSअभि ||||

चार भागोंवाले विराट पुरुष के एक भाग में यह सारा संसारजड़ और चेतन विविध रूपों में समाहित हैइसके तीन भाग अनंत अंतरिक्षमें समाये हुए हैं ||||

ततो विराडजायत विराजोSअधि पूरुषः |


 जातोSअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुर: ||||

उस विराट पुरुष से यह ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ | उस विराट से समष्टि जीव उत्पन्न हुए | वही देहधारी रूपमें सबसे श्रेष्ठ हुआजिसने सबसे पहले पृथ्वी कोफिर शरीरधारियों को उत्पन्न किया ||||


या वर्णपदवाक्यार्थस्वरूपेण एव वर्तते.

अनादिनिधनानंता सा मां पातु सरस्वती..


जो (क्रमशः उत्तरोत्तरप्रत्येक वर्णपद तथा वाक्य द्वारा प्रतिपादित अर्थ के स्वरूप में विद्यामान हैंवेआदिअंतहीना एवं अनंत सरस्वती मेरी रक्षा करें.


//२२

सुखमापतितं सेव्यं दु:खमापतितं तथा 

चक्रवत् परिवर्तन्ते दु:खानि  सुखानि  

जीवन में आनेवाले सुख का आनंद ले, , तथा दु: का भी स्वीकार करें 

सुख और दु: तो एक के बाद एक चक्रवत आते रहते है 


जान-ना

 

नीम का पेड़ नहीं जानता कि नीम है उसका नाम

 पीपल के पेड़ को पता कि वह पीपल है

यह तो आदमी है जो जानता है कि उसका नाम

बाँकेबिहारी दुबे है और उसके पड़ोसी का 

शेख़ रहीम.

आदमी अपने नाम के गौरव के बारे में जानता है.

 

और भी बहुत कुछ जानता है वह-

नामों की उत्पत्ति और नीति-वचनों के बारे में

इतिहास और न्याय के बारे में

तत्त्व-मीमांसा और वेदांत के बारे में

रामायणहदीस और क़ुरआन के बारे में

रहीम की दूसरी जोरू और तीसरी सन्तान के बारे में

पर आदमी यह नहीं जानता कि रहीम के बारे में जानना;

और रहीम को जानना-

दो अलग बातें हैं

 

आदमी यह भी नहीं जानता-

कि अतिरिक्त जानना एक तरह की अश्लीलता है.

 

आदमी केवल पेड़ों के नाम  जानता है

पेड़ों को नहींबाबुशा कोहली

-भाषा में

बाबुषा कोहली










लोग अपनी भाषा में क्या कहते हैंउसका बहुत अर्थ नहीं मेरे लिए। 

जो वे कहते नहींमेरे कानों से बच कर निकलता नहीं। 

सीखी नहीं

साध ली जीवन के लिए तरंग की भाषा। 

भाषाएँ उपयोग में लाती हूँ केवल कार्यालयीन अनुष्ठान संपन्न करने के लिए। 

काट देती हूँ कविता में भाषाशनिवार के नाख़ून की तरह

मन से निषेध के दिनों में। 

बचपन से लेकर अब तक गिनती के बीस मित्र हुए मेरे। 

एक नदीएक घाटदो वनदो सितारेएक कुत्ता और तेरह मनुष्य। 


//२२


आज स्वप्न आया कि अपने आश्रम में बारह-पंद्रह भक्तों के साथ बैठे हैंवहाँ एक बड़ी नागिन नागिनअलमारी में अपनी शक्ति से झूम झूम कर नृत्य कर रही हैउसकी नृत्य करते समय बंद अलमारी केकपाटों से टकराहट को देखकर स्वामीजी ने दरवाज़ा खोल दियावह बाहर आकर उन्मुक्त होकरनृत्य कर रही हैहम भक्तों के पीछे से वह सरककर जा रही हैआख़िर में यह शरीर बैठा थावहनागिन घूमकर आती है और मेरे घुटने से होकर शरीर से होकर गुजरती हैमेरी समाधि लग जाती हैमाँ माँ की पुकार करता हूँ और पता नहीं रहता क्या मेरे भीतर घटित हो रहा हैफिर वह नागिन अलगहोकर  दिखती है...




//२२



संसारवृक्ष-भवबीजमनन्तकर्म-शाखाशतं करणपत्रमनंगपुष्पम्‌।

आरुह्य दुःखफलित पततो दयालो लक्ष्मीनृसिंहम देहिकरावलम्बम्‌॥6

 हे कृपालुअघ जिसका मूल बीज हैअनगिनत कर्म शाखाएँ हैंअनंग फूल है और दुःख कष्ट हीजिसका फल हैऐसे संसार रूपी वृक्ष पर आरूढ़ होकर मैं अधःपतित हो रहा हूँहे लक्ष्मीनृसिंह ! मुझेअपने करकमल का अवलंब दीजिए.


१४//२२


गांधी कोई अवतार नहीं थेपर उनमें भारतीयता उतरी हुयी थीइसी कारण वे भारत के प्रतिनिधि हुएऔर पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को प्रभावित करते रहेअसल में जब से पैसे से सब विनिमय होने लगावहीमहत्वपूर्ण हो गया हैवरना जिसके यहाँ जो होता उससे जो अति आवश्यक वस्तु चाहिएउसे लेलिया जाता धन संग्रह की आवश्यकता रहती त्याग का आदर्श बघारने की मनःस्थितिअब जबआर्थिक ढाँचा बदल गया तो भारतीय समाज उसके अनुरूप अपने को जितना जल्दी ढाल ले उतनाअच्छापर फिर भी गांधी प्रासंगिक बने रहेंगे क्योंकि वे कोई व्यक्ति नहीं थेविचार भी नहींवरन वेजीवन जीने का एक सलीका थे...🙏


शब्द या आकाश में वायुअग्निजल और पृथ्वी नहींवायु में अग्निजल और पृथ्वी नहींअग्नि मेंजल और पृथ्वी नहीं एवं जल में पृथ्वी तत्व नहीं होतापर पृथ्वी में सभी पाँच महाभूतजल में अग्निवायु और शब्दअग्नि में शब्द और वायुवायु में शब्द और शब्द में मात्र शब्द रहता हैहर तत्व मेंअपना विषय रहेगा हीपर उससे नीचे के महाभूतों के विषय नहीं होतेपृथ्वी सबसे अंत का महाभूत हैइसलिए उसमें सभी महाभूत मिलते हैंअनुपात सबमें सबका अलग अलग रहता हैपृथ्वी तत्व में आधेहिस्से में गंध तो बचे आधे हिस्से में से बचे चारों विषय - शब्द स्पर्श रूप और रस बराबर बराबर होतेहैं.


१५//२२


All my questions have been answered, not through man but through God. He is, He is. It is His spirit that talks to you through me. It is  His love that I speak of. Thrill after thrill Like gentle zephyrs His love comes over the soul. Day and night, week after week, year after year, it goes on increasing you don't know where the end is. And that is what you are seeking, every one of you. You think you want  human love and prosperity, but behind these it is your Father who is calling you. If you realize He is greater than all His gifts, you will find Him.


~ Sri Sri Paramahansa Yogananda, 

"The Divine Romance"




इस विषय में हमें जो लगता है आदरणीया तुहिना कि संभोग तो हम पाँचों इंद्रियों का उनके विषयों सेमहाभूतों में रहकर निरंतर होते हुए देख ही रहे हैं तभी तो वह संभोग कहा गयाअच्छा शब्द चयन है. . पर उपस्थ इंद्रिय क्रीड़ा को मानव ने अधिक महत्वपूर्ण समझ लिया हैअनंत को किसी छोर सेपकड़ेंगेबोध होने पर ज्ञात हो ही जाएगा.



महाभारत हो सकता है किसी युद्ध को देखकर प्रेरित होकर लिखा गया होपर वह व्यक्ति कीआंतरिक वृत्तियों की द्वंद्व कथा है। व्यक्ति के भीतर ही वे विरोधी वृत्तियां मौजूद रहती हैंउनसे संघर्षऔर विजय की कथा है महाभारत। 

भाइयों/बहनों या परिवारों के बीच संघर्ष होता हैपर अगर बात उतनी ही होती तो यह महाकाव्य ही बन पातावह एक घटनाक्रम या इतिहास बनकर रह जाता। वह कालजयी महाकाव्य है क्योंकि वहप्रत्येक व्यक्ति को उसके अंतर्मन में ले जाने की कथा है। युधिष्ठिरअर्जुनदुर्योधन इत्यादि जितनेपात्र हैंउन सबके प्रतीकार्थ हैंवे व्यक्ति के अंदर ही हैं। १५//२१


विवादों से परे होना नेता का गुणधर्म नहींवरन उसमें नीति और न्याय क्या है उसके पक्ष में खड़ादिखना उसका कर्तव्य हैऔर कोई विवाद छोटा या बड़ा अथवा निजी या सार्वजनिक नहीं होताउसेहम कैसे लेते हैंमहत्वपूर्ण वही हैएक के निपटारे में कितनों के समाधान निहित होते हैं🙏



16/2/22

बेगमपुरा सहर को नाउदुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।

ना तसवीस खिराजु  मालुखउफुन खता  तरसु जुवालु।

अब मोहि खूब बतन गह पाईऊहां खैरि सदा मेरे भाई।

काइमु-दाइमु सदा पातिसाहीदोम  सोम एक सो आही।

आबादानु सदा मसहूरऊहाँ गनी बसहि मामूर।

तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावैमहरम महल  को अटकावै।

कह ‘रविदास’ खलास चमाराजो हम सहरी सु मीतु हमारा।


रैदास साहेब इस पद के द्वारा बताना चाहते हैं कि उनका आदर्श देश बेगमपुर हैजिसमें ऊंच-नीचअमीर-गरीब और छूतछात का भेद नहीं है। जहां कोई टैक्स देना नहीं पड़ता हैजहां कोई संपत्ति कामालिक नहीं है। कोई अन्यायकोई चिंताकोई आतंक और कोई यातना नहीं है। रैदास साहेब अपनेशिष्यों से कहते हैं- ‘ मेरे भाइयोमैंने ऐसा घर खोज लिया है यानी उस व्यवस्था को पा लिया हैजोहालांकि अभी दूर हैपर उसमें सब कुछ न्यायोचित है। उसमें कोई भी दूसरेतीसरे दर्जे का नागरिकनहीं हैबल्किसब एक समान हैं। वह देश सदा आबाद रहता है। वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहेंजाते हैं। जो चाहे कर्म (व्यवसायकरते हैं। उन पर जातिधर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंधनहीं है। उस देश में महल (सामंतकिसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं। रैदास चमार कहते हैंकि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक हैवही हमारा मित्र है।


१७//२२


महावीर से उलट बुद्ध ने मांसाहार पर व्यावहारिक रूख अपनाया थाबुद्ध अपनी मौत से मरे हुएपशुओं का मांस खाना निषिद्ध नहीं मानते थेइसी मान्यता के कारण आज भी बुद्ध से प्रभावित देशोंजापानकम्बोडिया इत्यादि में तख़्तियाँ लगीं मिलती हैं कि यहाँ अपने से मरे जानवरों का मांसमिलता हैयद्यपि आश्चर्य है कि मांसाहारियों को सुलभ प्रचुर मांस की तुलना में कितने पशु सहजरूप में मरते होंगेफिर बूचड़खाने कैसे चल रहे हैं


अपनी मौत से मरे हुए पशुओं का मांस खाने वाली अकेली चमार जाति रही हैजो भारत में प्राचीनकाल से निवास कर रही हैइसी आधार पर डॉक्टर आम्बेडकर ने स्थापना दी थी कि चमार पहले केबौद्ध हैं



कोई एक जाति देखें तो सबसे अधिक चमार जाति ही भारत में मिलती है और यह भारत में सर्वत्रपायी जाती है



१९//२२


शिव संसार सार हैंस्थूलसूक्ष्म और कारण शरीरमनकामसमय और कार्य कारणता संसार हीहैशेष दृश्यमान जगत उक्त के कारण ही अस्तित्वमान हैविश्व नाम की भ्रांति केवल मलदोष सेआती हैस्वशक्तिप्रचयोsस्य विश्वंशिवसूत्रयह सर्व विश्व मेरा ऐश्वर्य हैयह विश्वात्म भाव उदितहोने पर भेदरूप विकल्प तिरोहित हो जाते हैंअनहद ध्वनि विश्व का कुल योग हैपरम ज्योति में यहसब समाया हुआ हैजगत ब्रह्म विलास हैजल की शीतलता का स्पर्श जल से भिन्न नहीं होताप्रत्यभिज्ञा हृदयम् में कहा गया है-

श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण-विश्वात्मक-परमानंदमय-प्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादि-धरण्यंतं अख़िलं अभेदेनैव स्फ़ुरति तु वस्तुतः अन्यत् किंचित् ग्राह्यं ग्राहकं वाअपि तुश्रीपरमशिवभट्टारक एव इत्थं नाना वैचित्र्यसहस्रैह स्फ़ुरति.

अर्थात् भगवान परशिव या पराशक्ति के लिए विश्व नाम की कोई वस्तु नहीं हैवे केवलसत्यनिर्गुणनिराकारव्यापक और पूर्ण हैंउनको शिव से लेकर पृथ्वी तक यानी स्थावर-जंगमात्मकदिखने वालाप्रकट अप्रकट सभी जगत अभेद रूप से परमानंदमय प्रकाशरूप अपने जैसा ही प्रतीतहोता हैवस्तुतः उनके सिवा अन्य कुछ भी नहीं हैदृष्टा-दृश्य भाव भी नहीं हैग्राह्य-ग्राहक भाव भीनहीं हैजीव शिव भाव भी नहीं हैजड़ चेतन भाव भी नहीं हैअपितु श्रीमत् परमशिव परमेश्वर अकेलाहाई इस जगत के चित्रविचित्र अनेक रूपों में स्फ़ुरता हैयह विश्व भगवान का शरीर है और विश्वरूपमें परमशिव अपनी आत्मस्थिति में खड़ा है

हरिरेव जगत

इति वा यस्य संवित्तिः क्रीड़ात्वेनाखिलं जगत्जो परशिव की पराशक्ति हैउसी संवित्ति की क्रीड़ाअथवा विलास यह सारा जगत हैस्पंदशास्त्र

इसीलिए स्तुतियाँ गायी गयीं हैं-

नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकंपे

नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे

नमस्ते जगद्वंद्यपादारविंदे

नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे.. 


२०//२२


आती और जाती श्वास के साथ संसार हैअकस्मात् ठहरी हुयी श्वास में उससे उपरामता हैइस क्षणमें संसार के होने और  होने का दर्शन हो जाता है.

असल में संसार शब्द बौद्ध दर्शन के प्रभाव से चलन में आयाउससे पहले वेदों और उपनिषदों मेंइसके लिए विश्व और जगत शब्द प्रचलित थे



सृष्टि प्रकाश और छाया दोनों ही हैअन्यथा कोई चित्र सम्भव नहीं हो सकतामाया के भले एवं बुरेगुण बारी बारी से एक दूसरे पर हावी होते रहते हैंयोगी कथामृत पृष्ठ ३७२


सृष्टि का मूल ताना बाना ही माया हैउसकी मूल रचना माया हैस्वयं प्रकृति माया है.xxxअपने क्षेत्रमें प्रकृति शाश्वत और अपार हैभावी वैज्ञानिक उसकी विविधरूपी अनंतता के एक के बाद एकपहलू की खोज करते जाने से अधिक कुछ नही कर पायेंगेब्रह्मांड के नियमों का पता लगाने की तोउसमें क्षमता है परंतु उसके विधाता और जगन्नियंता को ढूँढ पाने में वह असमर्थ हैपृष्ठ ३६१

न्यूटन का गति का सिद्धांत माया का ही एक नियम है 'प्रत्येक क्रिया के लिए उसके समतुल्य विपरीतप्रतिक्रिया होती हैकिन्ही भी दो पिंडों की एक दूसरे पर क्रियाएँ सदैव समतुल्य और परस्पर विरोधीदिशाओं में लक्षित होती है.

परस्पर विरोधी शक्तियों की जोड़ी या धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा के बिना अणु गति नहीं करसकताअणु पदार्थ नहीं वरन शक्ति हैआण्विक ऊर्जा का स्वरूप मूलतः मनोमय है

विश्व माया मनुष्यों में अविद्या (अज्ञानभ्रमके रूप में प्रकट होती हैमाया या अविद्या को बौद्धिकविश्वास या विश्लेषण के द्वारा कभी नष्ट नहीं किया जा सकताकेवल निर्विकल्प समाधि कीआंतरिक स्थिति की प्राप्ति से ही उसे नष्ट किया जा सकता है.

दुर्बोध और शाश्वत समझे गए समय और दूरी (काल और देशभी सापेक्ष और सीमित हैंउनके मापका औचित्य केवल प्रकाश गति के संदर्भ में है.


भौतिक विज्ञान केवल परछाइयों के जगत से सम्बंधित हैमेरे हाथ की छाया टेबल की छाया परटिकी हुयी है और स्याही की छाया काग़ज़ की छाया पर अंकित हो रही हैयह सब प्रतीकात्मक हैरसायनशास्त्री प्रतीकों को उनके मूल स्वरूप में परिवर्तित कर देता हैनिष्कर्ष यह कि जगत का साराप्रपंच केवल मनोमय (मन जिस तत्व से बना हैउसी तत्व से बनाहै.

अस्तु परमहंस योगानंद कहते हैं यदि आध्यात्मिक शिक्षा द्वारा नहीं तो विज्ञान द्वारा ही सहीमनुष्यको यह दार्शनिक सत्य समझ लेना चाहिए कि भौतिक जगत नाम की कोई चीज़ ही नहीं हैउसकाताना बाना भी केवल। हराम हैमाया है.

आइंस्टाइन ने सुविख्यात समीकरण में सिद्ध किया है कि पदार्थ के किसी भी कण में निहित ऊर्जाuske वस्तुमान (mass) या वज़न के साथ प्रकाशगति के वर्ग के गुणनफल के बराबर होती है

केवल ऐसा पदार्थ पिंड की गति के साथ जा सकता है जिसका वस्तुमान अनंत हो.

सिद्ध योगी की चेतना उसके छोटे से शरीर से बंधी  रहकर अनायास ही ब्रह्मांड की रचना के साथतद्रूप हो जाती हैयहाँ गुरुत्वाकर्षण का नियम काम नहीं करता.


सृष्टि प्रकाश से ही बनी हैसृष्टि का मूलतत्व प्रकाश हैसृष्टि एक ही शक्ति की विविधअभिव्यक्तियाँ मात्र हैसारी अभिव्यक्तियाँ ईश्वरीय प्रज्ञा से युक्त प्रकाश की हैंजिस प्रकार सिनेमाके चित्र वास्तविक प्रतीत होते हैंपरंतु होते हैं मात्र प्रकाश और छाया के मिले जुले चित्रउसी प्रकारसृष्टि की विविधता भी एक भ्रम मात्र हैइसी संसार में यदि अखंड आनंद प्राप्त हो जाए तो क्यामनुष्य किसी दूसरे लोक की कामना करेगादुःख उसे याद दिलाने के लिए चुभोया जाने  वाला एकशूल हैदुःख से बचने का उपाय ज्ञान हैमृत्यु की विभीषिका मिथ्या हैअवास्तविक है



इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो

यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवाः भागवतम //२०

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान स्वयं विश्व स्वरूप हैं तथापि उससे निर्लिप्त भी हैंउन्हीं से यह दृश्य जगतउत्पन्न हुआ हैउन्हीं पर टिका है और संहार के बाद उन्हीं में प्रवेश करता है


द्वैते भद्राभद्र ज्ञान सब मनोधर्म

एइ भाल एइ मंद  एइ सब भ्रम..श्री चैतन्य चरितामृत /१७६


२१//२२


गति के बिना संसार नहीं रहताअंधेरे में हम अपने ही पैर नहीं बढ़ा पातेप्रकाश में हाथ पैर चलाने परतो वाक्चक्षु इत्यादि शेष कर्मेंद्रियाँ मानो स्वतः चलने लगती हैंश्रोत्र इंद्रिय ही अंधेरे में काम करपाती हैशब्द इसका विषय हैशब्दार्थ पर एक लम्बा आलेख पहले दिया गया हैआकाश काघनीभूत रूप ही हम सब हैंआकाश सब में सर्वत्र har काल में उपस्थित है


संसार की भीषण विकरालता पर हर जगह और हर सम्प्रदाय में कहा गया हैगुर्वाष्टक का पहलाश्लोक है-

संसार-दावानल-लीढ-लोक-

त्राणाय कारण्य-घनाघनत्वम्

प्राप्तस्य कल्याण-गुणार्णवस्य

वंदे गुरोः श्रीचरणारविंदम्

श्री गुरुदेव कृपासिंधु से आशीर्वाद प्राप्त करते हैंजिस प्रकार वन में लगी दावाग्नि को शांत करने हेतुबादल उस पर जल की वर्षा कर देता हैउसी प्रकार श्री गुरुदेव भौतिक जगत् की धधकती अग्नि कोशांत करकेभौतिक दुःखों से पीड़ित जगत् का उद्धार करते हैंशुभ गुणों के सागरऐसे श्री गुरुदेव केचरणकमलों में मैं सादर नमस्कार करता हूँ.


जीवन ईश्वर का नाटक हैइसका अंतिम अध्याय अधिक महत्वपूर्ण हैनायक और खलनायकस्वास्थ्य और रोगसुख और दुःखयह सब उसके प्रकाश और छाया के नाटक हैंजीवन में फ़िल्म कीभाँति ईश्वर प्रकाश बीम या पुंज हैद्वैत चल रही फ़िल्म है और हम सब उसके चित्रप्रकाश पुंज केसाथ एक हो जाने से कोई दुःख व्याप्त नहीं रहता


२२//२२

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥

जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥1


जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता हैजैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता हैऔर जिसके जान लेने पर जगत का उसी तरह लोप हो जाता हैजैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम जातारहता है।



जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।। नहिं तब आदि मध्य अवसाना। अमितप्रभाव बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभव कारिनि। विश्व विमोहिनि स्ववश विहारिनि।।कृष्णकोश पर दिए व्वरन में स्वामी करपात्री जी ने कहा हैब्रह्म का लक्षण है, ‘जन्माद्यस्य यतः’, ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्तेयेन जातानि जीवन्तियत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म’ जिससेसम्पूर्ण प्रपन्च उत्पन्न होता हैजिसमें सम्पूर्ण प्रपन्च स्थित रहता है और जिसमें सम्पूर्ण प्रपन्च लीन होजाता है वही ब्रह्म है। गौरी भी ‘भव भव विभव पराभव कारिणी’ हैं अतः गौरी भी ब्रह्म है। तात्पर्य किजैसे कोई नट लीलार्थ अनेक वेष धारण कर अनेक भावों का प्रदर्शन करता है तथापि वह वैसे हीपरात्पर परब्रह्म ही लीलार्थ अनेकधा प्रकट होते हैं तथापि अपने मूल स्वरूप में तटस्थ है। 



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यहाँ पहले भव का अर्थ संसार है तो दूसरे भव का अर्थ जन्म से हैजीव का अर्थ भी जन्म लेने से ही है.

ब्रह्मविषयक जिज्ञासा के बाद ब्रह्मसूत्र के पहले अध्याय के पहले पाद का दूसरा सूत्र  है जन्माद्यस्ययतःइस जगत् के जन्म आदि जिससे होते हैंवह ब्रह्म हैयह सूत्र ही भागवतम् के पहले श्लोक कापहले चरण का हिस्सा बना हैजन्माद्यस्य यतोsन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् 

बोलेपहले ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करो। ब्रह्म क्या हैजिससे सारे जगत की उत्पत्ति होती हैस्थितिहोती हैऔर जिसमें जगत का लय होता है वह ब्रह्म है। हम उस परम सत्य का ध्यान करते हैं।अर्थेष्वभिज्ञः स्वराट्’ - अभिज्ञ का अर्थ होता है चैतन्यस्वरूपतो वह सत्य चैतत्यस्वरूप है और वहीइस जगत का कारण है। जगत का जो भी कारण होगा , वह असत् तो नहीं हो सकता। उसकोसत्तास्वरूप होना चाहिए। ‘अभिज्ञ’ से बताया कि वह चैतन्यस्वरूप हैऔर ‘स्वराट्’ शब्द से यहदर्शाया गया कि वह स्वयं चैतन्यस्वरूप हैकिसी और के कारण चेतन नहीं हुआ है।


संसारांकुरकारणमाणवं....छः कंचुकों का समूह मिलकर अणु बनता हैइस आणव मल के कारणसंसार का उन्मेष होता है.


प्रत्यभिज्ञाहृदयं का कथन है बललाभे विश्वं आत्मसात्करोतिजो चिति का बल प्राप्त कर लेता है वहजगत् को आत्मात कर लेता है


स्वामी रामतीर्थ ने कहा है ब्रह्मभाव में स्थित होने पर यह सारा संसार ही सौंदर्य का स्फुरणआह्लादका प्रकाशआनंद की बाढ़ सा बन जाता हैजब दृष्टि की ससीमता नष्ट हो गयी तब फिर हमारे लिएअसुंदर कुछ भी नहीं रह जातासारा संसार ही निर्मल और सुंदर हो उठता हैरामपत्रों की झांकीपृष्ठ २७० स्वामी राम जीवन कथा 



२४//२२


संसार में सदा उथल पुथल एवं परेशानी रहेगीआप किस बात से चिंतित हैंईश्वर की शरण में जाएँजहां गुरुजन गए हैं और जहां से वे संसार को देख रहे हैं और उसकी सहायता कर रहे हैं परमहंसयोगानंद



२५//२२



बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।
लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥14

भावार्थ : मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिए कि ये रघुकुल के शिरोमणि श्री रामचंद्रजी विश्व रूप हैं- (यह सारा विश्व उन्हीं का रूप है) वेद जिनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं॥14

चौपाई :

पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥
भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥1

भावार्थ : पाताल (जिन विश्व रूप भगवान्‌ काचरण हैब्रह्म लोक सिर हैअन्य (बीच के सबलोकोंका विश्राम (स्थितिजिनके अन्य भिन्न-भिन्न अंगों पर है। भयंकर काल जिनका भृकुटि संचालन(भौंहों का चलनाहै। सूर्य नेत्र हैंबादलों का समूह बाल है॥1

जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा॥
श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी॥2

भावार्थ : अश्विनी कुमार जिनकी नासिका हैंरात और दिन जिनके अपार निमेष (पलक मारना औरखोलनाहैं। दसों दिशाएँ कान हैंवेद ऐसा कहते हैं। वायु श्वास है और वेद जिनकी अपनी वाणीहै॥2

अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला॥
आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा॥3

भावार्थ : लोभ जिनका अधर (होठहैयमराज भयानक दाँत हैं। माया हँसी हैदिक्पाल भुजाएँ हैं।अग्नि मुख हैवरुण जीभ है। उत्पत्तिपालन और प्रलय जिनकी चेष्टा (क्रियाहै॥3

रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा॥
उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना॥4

भावार्थ : अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैंपर्वत अस्थियाँ हैंनदियाँ नसोंका जाल हैसमुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचे की इंद्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैंअधिककल्पना (ऊहापोहक्या की जाए?4

दोहा :

अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।
मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥15 क॥

भावार्थ : शिव जिनका अहंकार हैंब्रह्मा बुद्धि हैंचंद्रमा मन हैं और महान (विष्णुही चित्त हैं। उन्हींचराचर रूप भगवान श्री रामजी ने मनुष्य रूप में निवास किया है॥15 ()


संसार में रहो पर उसके होकर नहीं....संसार में जब हम आए तो गर्भ में सबसे पहले रीढ़ बनीउससेहमारी मूल चेतना भटक गयीक्रिया योग से यह चेतना वापस सहस्रार में जब जाती है तो पुनः हमेंआनंद और प्रेम उपलब्ध हो जाता है.


२६//२२


सृष्टि निर्माण कैसे होता है...

रहस्यमय सिद्धभूमि तथा सूर्यविज्ञान।


• डॉ पंगोपिनाथ कविराज

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सूर्य से जो उत्पन्न होते हैं

वे हैं वैवस्वत्।


 ये कौन हैंवैवस्वत्  

यम = काल = अग्निरुद्र (कालाग्नि रुद्र)


 'काल:पचति भूतानिइससे विदित होता है कि काल है अग्निस्वरूप। 


ये संहारक रुद्र हैं। 

ये जगत् के परिणाम साधक हैं। 


पुनः सूर्य से उत्पन्न होते हैं सोम तथा चन्द्र। 

तभी सूर्य हैं सविता। 


सोम = सूतजो जलस्वरूप है। अतः सूर्य सृष्टिसाधक हैं।

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एक वस्तु को यदि धूप में रखा जाये तब उसकी छाया पड़ती है। 


जितना ही सूर्य के निकट ले जाया जाये

उतनी ही छाया होती जायेगी। 


अन्त में छाया भी आलोक में विलीन हो जाती है।


 *यदि उस वस्तु को सूर्यगत कर देंतब जहाँ-जहाँ सूर्य का आलोक हैवहाँ उस वस्तु की छाया रहेगीतथापि दृष्टिगोचर नहीं होगी।*


 अतः सूर्य में जो कुछ हैवही उसके आलोक में है।

 मान लें वह वस्तु है ''

 उसकी छाया है  


सूर्य है बिन्दु। 

सूर्य प्रभा है प्रभा अथवा चक्र। वास्तव में  को आत्मा कहेंतब है स्थूल। 


 

(सभी वस्तुसभी आत्मासूर्य में है। 


सूर्यवत् समभावेन है। 

सभी सूर्य प्रभा में है।

 वहीं पाई जा सकती हैं। 


' को नीचे उतारने पर

 'घनीभूत हो जाता है।


जब समस्त प्रभामण्डल से किरणें एक स्थान पर जमती हैं,

तब सृष्टि होती है।

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स्वामी राम तीर्थ ने सूर्य की छाया हिमखंड पर पड़ने के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया हैजब यह नदीबनती है तब उस पर प्रतिबिंब बनना प्रारंभ होता है..



27/2/22


27, 7 , 1938


आँख बंद करने से जो अंधकार है ,वही कलियुग का चिन्ह  वही शूद्रवर्ण है  उसके बाद जोपूर्णप्रकाश होता है ,वही सत्ययुग है  वही ब्राह्मण वर्ण है  

कलियुग में जन्म लेकर थोड़ी या सटीक साधना द्वारा , कोई  या विशेष चेष्टा के बिना किये हीसत्ययुग तक जाया जा सकता है  इसीलिए ,हम जितने लोगों को देखते हैं ,सभी कलियुग में वासकरते हैं ,ऐसा नहीं  कोई द्वापर ,कोई त्रेता ,कोई सत्य में भी वास करता है  लेकिन यह सत्य है किअधिकांश लोग कलि में वास करते हैं 

जो इच्छानुसार कलि से सत्य तक -जा सकता है , वह चार युग की लीला देख पाता है  

सत्ययुग में निद्रा नहीं है ,आलस्य नहीं है , अंधकार या अज्ञान नहीं है --अवश्य बीज है  कारण कालका व्यापार  है 

 स्व संवेदन पृष्ठ 246 गोपीनाथ कविराज



बीज एक होता है पर उसमें दो दल होते हैंयह द्वैत बीज में ही हैपर बीज जब गल जाता है और तनापत्तीपुष्प और फल बनता हैवह बंट जाता हैसबके लिए अपनी अपनी तरह से उपयोगी बनता हैफिर वह बीज बनता है और दो दलों को अपने में समेट लेता है....

२८//२२


योग सिखाता है कि सृष्टि की मौलिक संरचना ईश्वर का विचार है xxxx ब्रिटिश वैज्ञानिक सर जेम्सजींस ने लिखा विश्व एक मशीन की अपेक्षा एक महान विचार प्रतीत होने लगा है.

आइंस्टाइन ने कहा था मैं जानना चाहता हूँ कि ईश्वर ने यह संसार कैसे बनायामेरी इस या उसघटना मेंइस या उस तत्व के वर्णक्रम में रुचि नहीं हैमैं ईश्वर के विचारों को जानना चाहता हूँ बाक़ीसब तो विवरण हैजहां है प्रकाश परमहंस योगानंद पृष्ठ ११४११५ की पादटिप्पणी

अस्तु

संसारैकनिमित्ताय संसारैकविरोधिने

नमः संसाररूपाय निःसंसाराय शंभवेशिवस्तोत्रावली /


हम जितना चाहते हैं उतना जान नहीं पातेजितना जानते हैं उतना बोल नहीं पातेजितना बोलते हैंउतना कर नहीं पातेजितना करते हैं उतना हो नही पाता और जितना होता है उसमें संतुष्ट नही रहपातेइस असंतुष्टि के कारण हम और और नया नया चाहते रहते हैंयह शृंखला ही संसार का सृजनकरती हैयह सब करने में व्यक्ति अपमान और अभिमान में डूबे रहते हैंबिना किए व्यक्ति रह नहीसकताक्योंकि आनंद पाना उसका मूल स्वभाव हैमनुष्य इस कार्यसंपादन में उक्त व्यतिक्रम केकारण कष्ट उठाता रहता हैसंगति उससे एकाकार होने और तादात्म्य स्थापित करने में हैउसकीइच्छा में अपने कर्म को सार्थक करने में हैतत्सुखे सुखित्वं.


संसार  की सीमा को समझने  के लिए गोस्वामी तुलसीदास की यह चौपायी आसान है

गो गोचर जंह लग मन जाई

सो  सब माया जानेहु भाई।