Saturday, September 5, 2026
धर्म की उत्पत्ति भय से या श्रद्धा से
वह प्रश्न जिस पर बहुत से लोग अभी भी अटके हुए हैं कि धर्म की उत्पत्ति भय से हुई या श्रद्धा से। जर्मनी के मैक्समूलर जैसे विद्वान कहते हैं प्रकृति के प्रचंड रूपों को देखकर उससे अपनी रक्षा के लिए धर्म उत्पन्न हुआ। उनके अनुसार भारत के लोग इसीलिए प्रकृति पूजा करते हैं। जबकि श्री अरबिन्दो और दयानंद सरस्वती जैसे विचारकों का कहना है कि प्रकृति में एक निहित व्यवस्था है जिसे ऋत् कहते हैं, धर्म वही है, यहाँ प्रकृति का एक एक तत्व अपनी संगति में चल रहा है, उसकी पहचान करना और उस पर चलना ही धर्म है। स्वभावस्तु प्रवर्तते। प्रकृति संचालन को समझने के क्रम में उसकी उपासना स्वरूप सर्वप्रथम वेद आए, उपनिषद् कहे गए और फिर दर्शन शास्त्र का विकास हुआ।
प्रकृति पूजा के अनेक स्वरूप हमारे समाज में दिखते हैं। निःसंदेह एक रूप प्रकृति से डरने का भी है। हम जिससे डरते हैं, जो हमसे बड़ा है, स्वाभाविक ही हम उसका यशःगान करने लगते हैं, आदिवासियों की पूजा पद्धति को विदेशी विचारक इसी रूप में देखते आए हैं। किंतु धर्म वहाँ से आगे निहित है, जिसका संकेत ऊपर किया गया है।
धर्म का संपूर्ण निरूपण किसी संस्कृति से नहीं समझा जा सकता है। हाँ उस संस्कृति में धर्म के लक्षण अवश्य मिलेंगे। अग्नि और उसकी दाहकता की भाँति वस्तु/व्यक्ति का धर्म जुड़ा रहता है। यह कभी अलग नहीं हो सकता, इसीलिए हमारे यहाँ बार बार धर्मनिरपेक्षता को असंभव रूप में देखा जाता है। धर्म के बिना कुछ होता ही नहीं, हर संस्कृति का धर्म होगा, लेकिन धर्म की संस्कृति नहीं होती है। धर्म तो वह तुरीयावस्था है जो शेष तीनों (जागृत स्वप्न और सुषुप्ति) में विद्यमान रहकर भी पृथक् है। इस प्रकार धर्म से संस्कृति अलग है। भारत में संस्कृति और राजनीति को अलग अलग करके देखने पर बल दिया जाता रहा है, क्योंकि उससे कल्याणकारी राजव्यवस्था के संचालन में व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती हैं। विविधता एक गुण है, जिन देशों में वह नहीं है, इसका महत्व वे लोग अधिक समझते हैं।
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