Wednesday, January 31, 2024

जनवरी २४

नववर्ष के आगमन के साथ सीमितताओं के सभी बंद द्वार खोल दिये जाएँगे, और उनसे होकर मैं और विशाल क्षेत्रों में जाऊँगा, जहां मेरे जीवन के सार्थक स्वप्न पूरे होंगे। श्री श्री परमहंस योगानंद अंग्रेज़ी नववर्ष प्रारंभ होने के समय कैलेंडर बदलने का उत्साह देखा जाता है। दिनांक तो हर दिन बदल रहा है, पर नये वर्ष का दिनांक पूरी तरह बदल जाता है। नया कैलेंडर टाँगना और पुराना हटाना प्रतीक है पुराने दुःस्वप्नों से बाहर आने का और नये संकल्प ग्रहण करने का। पुराने से बाहर आने का अर्थ यह नहीं कि वह दूषित था और नये संकल्प के उत्साह का अर्थ भी यह नहीं कि जीवन में सब मनोनुकूल होने वाला है। नए वर्ष में प्रवेश के समय हम अच्छा और सुंदर होने की उम्मीद करने के सुख से जुड़ जाते हैं। अच्छा का अर्थ है, अ इच्छा। इच्छा न होना इसका आशय नहीं। इच्छा न होने का अर्थ है उनका संपूर्ण हो जाना अथवा उनका होना और न होना ; बराबर हो जाना। अच्छा हुए बिना नया कुछ नहीं घटित होता, फिर वह मात्र उम्मीद बनकर रह जाता है। उम्मीद इस नाते संतोषजनक मानी जा सकती है कि उसके बाद कुछ अच्छा घटेगा, उसमें इस विश्वास के उदय की संभावना रहती है। अच्छा घटना ही मुख्य है, वह चाहे नाउम्मीदी में ही क्यों न घटित हो जाए। जो अच्छा है, वह सुंदर है। नया वर्ष हर क्षण है। यह आंग्ल पद्धति का नया वर्ष है, मार्च या अप्रैल में विक्रम वर्ष होता है, जिसे हम संवत्सर कहते हैं, इससे हिंदू त्योहारों का निर्णय होता है, विक्रम संवत् की मान्यता नेपाल में भी है। ९ अप्रैल २०२४ से यह प्रारंभ होगा। पौराणिक काल गणना वैवस्वत मनु के कल्प आधार पर सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग - इन चार भागों में विभाजित है। इसके पश्चात ऐतिहासिक दृष्टि से काल गणना का विभाजन हुआ। युधिष्ठिर संवत्, कलिसंवत्, कृष्ण संवत्, विक्रम संवत, शक संवत, महावीर संवत, बौद्ध संवत, तदुपरान्त हर्ष संवत, बंगला, हिजरी, फसली और ईसा सन भारत में चलते रहे। आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय कैलंडर 'शक संवत' कहलाता है। 1957 में भारत सरकार ने शक संवत् को देश के राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्यता प्रदान की थी। इसीलिए राजपत्र (गजट) , आकाशवाणी और सरकारी कैलेंडरों में ग्रेगेरियन कैलेंडर के साथ इसका भी प्रयोग किया जाता है। शक संवत को शालिवाहन संवत भी कहा जाता है। कालखंड की अपनी-अपनी माप हैं। सब अनुसंधान ही हैं। क्षण की नवता को जब जिसने समझा, उसके लिए वह नया वर्ष हो गया। हम संधि जोड़ को समझते हैं, पर कश्मीर में इसका अर्थ है खोज, जो संध शब्द में झांक रहा है, संधान जैसे शब्दों में स्पष्ट ही। पहले से बाद के बीच का जो क्षण या अंतराल है, उसकी खोज ही संध है। वह सदा नूतन है। नूतन आंग्लवर्ष २०२४ की शुभकामनाएँ। ३/१/२४ अद्वैत जब कहा जाता है तब इसका आशय होता है दो नहीं। इसका अर्थ हुआ दो देखने तक साधक गया है। बिना दो को देखे समझे एक या शून्य का बोध प्राप्त नहीं कर सकता। दो का अर्थ संसार है और एक का अर्थ परमात्मा है। शून्य ब्रह्म को कहेंगे। वैसे शून्य का कोई नाम देंगे वह एक में ही आ जाएगा। शून्य अंक को गिनती में एक ही कहा जाएगा। शून्य का कोई नाम नहीं, कोई रूप नहीं, कोई गुण नहीं, लीला और धाम भी नहीं। उसे नहीं नहीं में ही कहा जा सकेगा, क्योंकि जो है वह एक से आगे की गिनती बनाएगा। सुख पदार्थों के अधीन रहने में नहीं है, उन्हें अधीन कर लेने में है। इसी तरह दुःख विषयों या पदार्थों के अधीन रहने में है। इस प्रकार पदार्थों को मन के भीतर रखा जाये, पदार्थ मन पर हावी न रहें तो व्यक्ति सदा सुखी रह सकता है। सुखी होने की यह कला अर्जित की जाती है। इस कला को विद्या कहते हैं। संसारमोहनाशाय शब्दबोधो नहि क्षमः। न निवर्तेत तिमिरं कदाचिद्दीपवार्तया।। (कुलार्णव तंत्र) संसार रूपी मोह को नष्ट करने में शब्द बोध अर्थात शास्त्र समर्थ नहीं हो सकता। क्या भला दीपक की वार्ता करने से कभी अन्धकार भी नष्ट हो सकता है। Mere knowledge by words [ शब्द बोध ] or shastras are not in a position to destroy this worldly attachments of a person . Can darkness be removed by mere talking [ discussion ] about a lamp ? Jai gurudev. उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वंह्यपीतो भवति ॥ ६.८.१ ॥chhandogya upanishad 1. Uddālaka Āruṇi said to his son Śvetaketu: ‘O Somya, let me explain to you the concept of deep sleep. When a person is said to be sleeping, O Somya, he becomes one with Sat [Existence], and he attains his real Self. That is why people say about him, “He is sleeping.” He is then in his Self’. छाँदोग्य के उक्त श्लोक में निद्रा की महिमा गाई गई है। स्वप्न रहित निद्रा भली प्रकार श्रम करने के बाद आती है। इस श्लोक से प्रकारांतर से श्रम का महत्व प्रतिपादित होता है। सोने के समय हम स्व में विलीन हो जाते हैं। श्रम परिहार का यह प्राकृतिक साधन है। निद्रा की प्राप्ति के लिए शरीर और मन के द्वारा समुचित श्रम किया ही जाना चाहिए। जाग्रत अवस्था में शरीर और मन काम करते हैं, स्वप्न दशा में शरीर नहीं, केवल मन कार्य करता है। स्वप्न रहित निद्रा के समय शरीर और मन कोई काम नहीं करते और तब व्यक्ति अपनी आत्मा तक जा पहुँचता है। अतः निद्रा लेना गंगा नहाने जैसा पवित्र कार्य है। परंतु जैसा रामकृष्ण परमहंस कहते हैं गंगा स्नान के समय अज्ञानी व्यक्ति के दोष निकलकर पास के पेड़ पर बैठ जाते हैं, स्नान करने के बाद वे पुनः उसी व्यक्ति पर कपड़ों की भाँति आ बैठते हैं। ज्ञान रहित निद्रा के साथ भी बिलकुल ऐसा ही है। वास्तव में जो प्राणी सत् से तदाकार हो गया है, उसे ही उक्त श्लोक में पुरुष कहा गया है, पुरुष यानी प्योर, शुद्ध दशा का आत्म। पुर में जो शयन करता हो। पुर यानि हृदय। हृदय हार्ट को या उस स्थान भर को नहीं मानना चाहिए। हृदय का अर्थ है जिसमें सब कुछ घटित हो रहा हो। वहाँ यह पुरुष निवास करता है, इसलिए इसे पुरुष कहा गया है। इस पुरुष में मेल या केवल पुल्लिंग व्यक्ति नहीं आता, वरन उसका अर्थ mindfulness से लगाया जाता है। mindfulness व्यक्ति की निद्रा हो, गंगा स्नान हो, या जो भी कार्य हो, वह सब पुण्य ही है। तभी श्रम करना सार्थक है और गंगा स्नान करना भी। ४/१/२४ बल दिखता है, शक्ति छिपी रहती है। बल से ही बैल बना। यद्यपि बैल केवल बोझा ढोने के अर्थ में एक मुहावरा भी बन गया, पर वह बल का ही द्योतक है। अंग्रेज़ी शब्द भी कैसे अपनी ध्वनियों में सत्य धारण करते हैं। सीक्रेट से क्रियेशन निष्पन्न होता है। क्रिएशन में एस जुड़ जाने से वह सीक्रेट हो गया। secration स्वाभाविक रूप में होने वाले होने वाले रिसाव को कहते हैं तो sacred पवित्रता के अर्थ में चलता है। इन शब्दों से बहने का भाव प्रकट हो रहा है। ५/१/२४ चेतन और प्रकृति दो अलग अलग हैं। कुछ लोग इन्हें मिक्स कर देते हैं और फिर अर्थहीन टिप्पणियां कर देते हैं, उनसे कई बार विवाद उत्पन्न हो जाता है। इससे यह प्रकट हो जाता है कि ऐसे लोग अभी धर्म और अध्यात्म का क ख ग नहीं समझ पाए हैं, जीवन में वे सद्व्यवहार कैसे कर पाएंगे। भगवान कुछ नहीं खाते पीते, न वे कहीं सोते जागते हैं। वस्तुतः उनके बारे में कहा गया कोई कथन संपूर्ण नहीं है, बस उन्हें समझने के लिए वह कथन एक सिरा या माध्यम मात्र हो सकता है। हम अपने जीवन को जैसा देखते सुनते हैं, अपनी बनी बनाई धारणा रखते हैं, उसके अनुरूप सही गलत का निर्णय देने लगते हैं, यही तथ्य भगवान में भी आरोपित कर देते हैं, फिर गड़बड़ शुरू हो जाती है। भक्ति भाव में किया कोई आरोपण ग्राह्य है, क्योंकि वह सही ग़लत से ऊपर चला गया होता है, पर बुद्धि कौशल से किए गये ऐसे आरोपों से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। भगवान प्रकृति के तत्वों या उसकी सामग्री पर आश्रित नहीं है, हां! प्रकृति उनके भीतर अवश्य रहती है। भगवान चिति है, वह चैतन्य दशा में हैं, उस दशा का बोध पहले करना होगा। प्रकृति परिवर्तनशील है, उस परिवर्तनशीलता के चेतन तत्व को हमें पहचानना है। सार सार को गहना है। ६/१/२४ सांख्य बताता है हम इस जीवन की कारागार में कैसे आ फँसे। अद्वैत कहता है इस कारागार से बाहर हमें कहाँ पहुँचना और योग दर्शन बताता है वहाँ पहुँचने का साधन क्या है। योगदा सत्संग सोसाइटी में इन तीनों दर्शनों का समावेश है। ७/१/२४ ध्यान में कोई कीड़ा मकोड़ा चेहरे पर रेंगता रहा, खूब इधर उधर स्वच्छंद घूमा। कूटस्थ पर रहा तो आनंद आया, फिर आँखों और नाक पर चलता रहा, फिर कहाँ गया पता नहीं लगा। अगर व्यक्ति अंतर्मन की गहराइयों से स्वयं को उसी भाँति मसल कर और पकते हुए दूसरे का ग्रास बनने के लिए तैयार है, जैसे वह दूसरे प्राणियों का भक्षण कर लेता है, तो वह क्या खाता है, क्या नहीं, इससे अंतर नहीं पड़ता। यद्यपि गहराई में उतरकर यदि व्यक्ति परम् सत्ता से तदाकार हो गया है तो उसने अन्न प्रक्रिया को समझ लिया है। फिर उसे कुछ खाने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। उसे अपना शरीर चलाने के लिए कुछ भी शाक भाजी मिल जाएगी, उससे उसका काम चल जाएगा। मांसाहार करने वाले जो व्यक्ति विटामिन, वसा, प्रोटीन इत्यादि की आवश्यकता और शौक़ पूरा करने या किसी के प्रभाव के कारण मांस ग्रहण करते हैं, वे यदि ध्यान की अतल गहराइयों में उतर गये तो स्वतः उसे छोड़ देंगे। ऐसा भक्षण आत्यंतिक परिस्थिति में या परमहंसी स्वभाव में ही संभव रह जाएगा। स्वतंत्रता मनोनुकूल किए गए कार्यों के लिए नहीं, अपितु मन के आवेगों से बाहर आकर निर्विकल्प इच्छा के फलस्वरूप किए गए कार्यों के लिए प्राप्त की जाती है। यथा निमीलने काले प्रपञ्चो नैव दृश्यति । तथैवोन्मीलने स्याच्चेदेतद्धयानस्य लक्षणम्।। (श्री कुलार्णव तन्त्र) अर्थात, जैसे व्यक्ति आंखें बंद करने पर बाहर की कोई भी वस्तु देख नहीं पाता,उसी भांति आंख के खुले रहने पर भी साधक को कोई जगत का प्रपञ्च नहीं दिखता। शिव की व्याप्ति ही उसे दिखती है।यही ध्यान का सही लक्षण है। Just as at the time of closing one's eyes the external differentiated world is not seen, so in the same way when,by the Grace of God, while practicing this meditation even though his eyes remain wide open this yogi sees nothing. These are the symptoms of correct meditation. Jai guru dev. मनुष्य अधिकार चाहता है -------------------* जो कुछ भी महान है, उस पर किसी का अधिकार नहीं हो सकता और यह सबसे मूर्ख बातों में से एक है जो मनुष्य करता है - मनुष्य अधिकार चाहता है।ओशो किसी सफलता पर कई दावेदार सामने आ जाते हैं, पर यह तो परम् सत्ता का प्रकटीकरण मात्र है। ११/१/२४ 'इतना अहंकार आदि शंकराचार्य ने भी नहीं किया था' शंकराचार्य परंपरा के प्रति ऐसी अवहेलना सूचक शब्दावली का प्रयोग करना उचित नहीं है। क्या उन्होंने कितना भी अहंकार किया था! क्या कहना चाहते हैं। शकराचार्य परंपरा का योगदान उपनिषद युग के बाद सनातन धर्म के स्वरूप लक्षण निर्धारित करने में सर्वाधिक है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। साधु संतों की विभिन्न परम्पराएँ दशनामी अखाड़ों से आगे बढ़ी हैं। उन्होंने अपने समय में बौद्धों के अतिचारों का सामना किया है। अरुण कुमार उपाध्याय की पोस्ट पर की गई टिप्पणी Desire is the memory of pleasure and fear is the memory of pain. Both make the mind restless. Moments of pleasure are merely gaps in the stream of pain. How can the mind be happy? Nisargadatta, I Am That, Chapter 3 १२/१/२४ जहां शक्ति है, वहाँ इसका दुरुपयोग भी है। लौकिक सुख बिना शक्ति के संभव नहीं। शक्ति के दुरुपयोग की संभाव्यता और सुख की कामना के बीच मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं रह सकता, इसलिए आत्यंतिक आनंद की खोज में व्यक्ति जब जानते हुए खो जाये, वह जीवन को प्रश्न और समस्या न समझे, वरन एक रहस्य जानकर उसे जी ले तो उसे प्राप्तव्य उपलब्ध हो सकता है। भगवान के कितने स्वरूपों का पहले प्रकाश और उनके बदलते स्वरूपों का दर्शन हुआ। भगवान विष्णु के स्वरूप का कृष्ण से मिलता जुलता दर्शन हुआ, उसके बाद रूप बनने बंद हो गए। उससे पहले गर्भ में शिशु बनने की प्रक्रिया और बाद में वह मुस्कुराते हुए दिखाई दिया। उसकी छवियों का भी परिवर्तन होता रहा। कल्पना भी है तो ऐसी कल्पना बनी रहे। भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास-तत्‍व से, प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा। ******************************************** यह विधि पाइथागोरस को दी गई थी। पाइथागोरस इसे लेकर यूनान वापस गए। और वह पश्‍चिम के समस्‍त रहस्‍यवाद के आधार बन गए। पश्‍चिम में अध्‍यात्‍मवाद के वे पिता है। यह विधि बहुत गहरी विधियों में ऐ एक है। इसे समझने की कोशिश करो। ‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर करो।‘’ आधुनिक शरीर-शस्‍त्र कहता है, वैज्ञानिक शोध कहती है कि दो भृकुटियों के बीच में ग्रंथि है वह शरीर का सबसे रहस्‍यपूर्ण भाग है। जिसका नाम पाइनियल ग्रंथि है। यही तिब्‍बतियों की तीसरी आँख है। और यही है शिव का नेत्र। तंत्र के शिव का त्रिनेत्र। दो आंखों के बीच एक तीसरी आँख भी है। लेकिन यह सक्रिय नहीं है। यह है, और यह किसी भी समय सक्रिय हो सकती है। निसर्गत: यह सक्रिय नहीं है। इसको सक्रिय करने के लिए संबंध में तुम को कुछ करना पड़ेगा। यह अंधी नहीं है, सिर्फ बंद है। यह विधि तीसरी आँख को खोलने की विधि है। ‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर.....।‘’ आंखे बंद कर लो और फिर दोनों आंखों को बंद रखते हुए भौंहों के बीच में दृष्‍टि को स्‍थिर करो—मानो कि दोनों आंखों से तुम देख रहे हो। और समग्र अवधान को वही लगा दो। यह विधि एकाग्र होने की सबसे सरल विधियों में से एक है। शरीर के किसी दूसरे भाग में इतनी आसानी से तुम अवधान को नहीं उपलब्‍ध हो सकते। यह ग्रंथि अवधान को अपने में समाहित करने में कुशल है। यदि तुम इस पर अवधान दोगे तो तुम्‍हारी दोनों आंखे तीसरी आँख से सम्‍मोहित हो जाएंगी। वे थिर हो जाएंगी, वे वहां से नहीं हिल सकेंगी। यदि तुम शरीर के किसी दूसरे हिस्‍से पर अवधान दो तो वहां कठिनाई होगी। तीसरी आँख अवधान को पकड़ लेती है। अवधान को खींच लेती है। अवधान के लिए वह चुंबक का काम करती है। इसलिए दुनिया भी की सभी विधियों में इसका समावेश किया गया है। अवधान को प्रशिक्षित करने में यह सरलतम है, क्‍योंकि इसमे तुम ही चेष्‍टा नही करते, यह ग्रंथि भी तुम्‍हारी मदद करती है। यह चुंबकीय है। तुम्‍हारे अवधान को यह बलपूर्वक खींच लेती है। तंत्र के पुराने ग्रंथों में कहा गया है कि अवधान तीसरी आँख का भोजन है। यह भूखी है; जन्‍मों-जन्‍मों से भूखी है। जब तुम इसे अवधान देते हो यह जीवित हो उठती है। इसे भोजन मिल गया है। और जब तुम जान लोगे कि अवधान इसका भोजन है, जान लोगे कि तुम्‍हारे अवधान को यह चुंबक की तरह खींच लेती है। तब अवधान कठिन नहीं रह जाएगा। सिर्फ सही बिंदु को जानना है। इस लिए आँख बंद कर लो, और अवधान को दोनों आंखों के बीच में घूमने दो और उस बिंदू को अनुभव करो। जब तुम उस बिंदु के करीब होगें। अचानक तुम्‍हारी आंखे थिर हो जाएंगी। और जब उन्‍हें हिलाना कठिन हो जाए तब जानो कि सही बिंदु मिल गया। ‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने रखो।‘’ अगर यह अवधान प्राप्‍त हो जाए तो पहली बार एक अद्भुत बात तुम्‍हारे अनुभव में आएगी। पहली बार तुम देखोगें कि तुम्‍हारे विचार तुम्‍हारे सामने चल रहे है, तुम साक्षी हो जाओगे। जैसे कि सिनेमा के पर्दे पर दृश्‍य देखते हो, वैसे ही तुम देखोगें कि विचार आ रहे है, और तुम साक्षी हो। एक बार तुम्‍हारा अवधान त्रिनेत्र-केंद्र पर स्‍थिर हो जाए तुम तुरंत विचारों के साक्षी हो जाओगे। आमतौर से तुम साक्षी नहीं होते, तुम विचारों के साथ तादात्म्य कर लेते हो। यदि क्रोध है तो तुम क्रोध हो जाते हो। यदि एक विचार चलता है तो उसके साक्षी होने की बजाएं तुम विचार के साथ एक हो जाते हो। उससे तादात्‍म्‍य करके साथ-साथ चलने लगते हो। तुम विचार ही बन जाते हो, विचार का रूप ले लेते हो, जब क्रोध उठता है तो तुम क्रोध बन जाते हो। और जब लोभ उठता है तब लोभ बन जाते हो। कोई भी विचार तुम्‍हारे साथ एकात्‍म हो जाता है। और उसके ओर तुम्‍हारे बीच दूरी नहीं रहती। लेकिन तीसरी आँख पर स्‍थिर होते ही तुम एकाएक साक्षी हो जाते हो। तीसरी आँख के जरिए तुम साक्षी बनते हो। इस शिवनेत्र के द्वारा तुम विचारों को वैसे ही चलता देख सकते हो जैसे आसमान पर तैरते बादलों को, या रहा पर चलते लोगो को देखते हो। जब तुम अपनी खिड़की से आकाश कोया रहा चलते लोगों को देखते हो तब तुम उनसे तादात्‍म्‍य नहीं करते। तब तुम अलग होते हो, मात्र दर्शक रहते हो—बिलकुल अलग। वैसे ही अब जब क्रोध आता है तब तुम उसे एक विषय की तरह देखते हो। अब तुम यह नहीं सोचते कि मुझे क्रोध हुआ। तुम यही अनुभव करते हो कि तुम क्रोध से घिरे हो। क्रोध की एक बदली तुम्‍हारे चारो और घिर गई। और जब तुम खुद क्रोध नहीं रहे तब क्रोध नापुंसग हो जाता है। तब वह तुमको नहीं प्रभावित कर सकता। तब तुम अस्‍पर्शित रह जाते हो। क्रोध आता है और चला जाता है। और तुम अपने में केंद्रित रहते हो। यह पाँचवीं विधि साक्षित्‍व को प्राप्‍त करने की विधि है। ‘’भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार को मन के सामने करो।‘’ अब अपने विचारों को देखो, विचारों का साक्षात्‍कार करो। ‘’फिर सहस्‍त्रार तक रूप को श्‍वास तत्‍व से प्राण से भरने दो। वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।‘’ जब अवधान भृकुटियों के बीच शिवनेत्र के केंद्र पर स्‍थिर होता है। तब दो चीजें घटित होती है। और यही चीज दो ढंगों से हो सकती है। एक, तुम साक्षी हो जाओ तो तुम तीसरी आँख पर थिर हो जाते हो। साक्षी हो जाओ, जो भी हो रहा हो उसके साक्षी हो जाओ। तुम बीमार हो, शरीर में पीड़ा है, तुम को दुःख और संताप है, जो भी हो, तुम उसके साक्षी रहो, जो भी हो, उससे तादात्‍म्‍य न करो। बस साक्षी रहो—दर्शक भर। और यदि साक्षित्व संभव हो जाए, तो तुम तीसरे नेत्र पर स्‍थिर हो जाओगे। इससे उलटा भी हो सकता है। यदि तुम तीसरी आँख पर स्‍थिर हो जाओ, तो साक्षी हो जाओगे।। ये दोनों एक ही बात है। इसलिए पहली बात: तीसरी आँख पर केंद्रित होते ही साक्षी आत्‍मा का उदय होगा। अब तुम अपने विचारों का सामना कर सकते हो। और दूसरी बात: और अब तुम श्‍वास-प्रश्‍वास की सूक्ष्‍म और कोमल तरंगों को भी अनुभव कर सकते हो। अब तुम श्‍वसन के रूप को ही नहीं, उसके तत्‍व को , सार को, प्राण को भी समझ सकते हो। पहले तो यह समझने की कोशिश करें कि ‘’रूप’’ और ‘’श्‍वास-तत्‍व’’ का क्‍या अर्थ है। जब तुम श्‍वास लेते हो, तब सिर्फ वायु की ही श्‍वास नहीं लेते। वैज्ञानिक तो यही कहते है कि तुम वायु की ही श्‍वास लेते हो। जिसमें आक्‍सीजन, हाइड्रोजन तथा अन्‍य तत्‍व रहते है। वे कहते है कि तुम वायु की श्‍वास लेते हो। लेकिन तंत्र कहता है कि हवा तो मात्र वाहन है, असली चीज नहीं है। असल में तुम प्राण की श्‍वास लेते हो। हवा तो माध्‍यम भर है। प्राण उसका सत्‍व है, सार है। तुम न सिर्फ हवा की, बल्‍कि प्राण की श्‍वास लेते हो। आधुनिक विज्ञान अभी नहीं जान सका है कि प्राण जैसी कोई वस्‍तु भी है। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं ने कुछ रहस्‍यमयी चीज का अनुभव किया है। श्‍वास में सिर्फ हवा हम नहीं लेते, वह बहुत से आधुनिक शोधकर्ताओं ने अनुभव किया है। विशेषकर एक नाम उल्‍लेखनीय है। वह है जर्मन मनोवैज्ञानिक विलहेम रेख का। जिसने इसे आर्गन एनर्जी या जैविक ऊर्जा का नाम दिया है। वह प्राण ही है। वह कहता है कि जब आप श्‍वास लेते है, तब हवा तो मात्र आधार है, पात्र है, जिसके भीतर एक रहस्‍यपूर्ण तत्‍व है, जिसे आर्गन या प्राण या एलेन वाइटल कह सकते है। लेकिन वह बहुत सूक्ष्म है। वास्‍तव में वह भौतिक नहीं है। पदार्थ गत नहीं है। हवा भौतिक है, पात्र भौतिक है; लेकिन उसके भीतर से कुछ सूक्ष्‍म, अलौकिक तत्‍व चल रहा है। इसका प्रभाव अनुभव किया जा सकता है। जब तुम किसी प्राणवान व्‍यक्‍ति के पास होते हो, तो तुम अपने भीतर किसी शक्‍ति को उगते देखते हो। और जब किसी बीमार के पास होते हो, तो तुमको लगता है कि तुम चूसे जा रहे हो। तुम्‍हारे भीतर से कुछ निकाला जा रहा है। जब तुम अस्‍पताल जाते हो, तब थके-थके क्‍यों अनुभव करते हो? वहां चारों ओर से तुम चूसे जाते हो। अस्‍पताल का पूरा माहौल बीमार होता है और वहां सब किसी को अधिक प्राण की, अधिक एलेन वाइटल की जरूरत है। इसलिए वहां जाकर अचानक तुम्‍हारा प्राण तुमसे बहने लगता है। जब तुम भीड़ में होते हो, तो तुम घुटन महसूस क्‍यों करते हो। इसलिए कि वहां तुम्‍हारा प्राण चूसा जाने लगता है। और जब तुम प्रात: काल अकेले आकाश के नीचे या वृक्षों के बीच होते हो, तब फिर अचानक तुम अपने में किसी शक्‍ति का, प्राण का उदय अनुभव करते हो। प्रत्‍येक का एक खास स्‍पेस की जरूरत है। और जब वह स्‍पेस नहीं मिलता है तो तुमको घुटन महसूस होती है। विलहेम रेख ने कई प्रयोग किए। लेकिन उसे पागल समझा गया। विज्ञान के भी अपने अंधविश्‍वास है। और विज्ञान बहुत रूढ़िवादी होता है। विज्ञान अभी भी नहीं समझता है कि हवा से बढ़कर कुछ है; वह प्राण है। लेकिन भारत सदियों से उस पर प्रयोग कर रहा है। तुमने सुना होगा—शायद देखा भी हो—कि कोई व्‍यक्‍ति कई दिनों के लिए भूमिगत समाधि में प्रवेश कर गया। जहां हवा का कोई प्रवेश नहीं था। 1880 में मिस्‍त्र में एक आदमी चालीस वर्षों के लिए समाधि में चला गया था। जिन्‍होंने उसे गाड़ा था वे सभी मर गए। क्‍योंकि वह 1920 में समाधि से बहार आने वाला था। 1920 में किसी को भरोसा नहीं था कि वह जीवित मिलेगा। लेकिन वह जीवित था और उसके बाद भी वह दस वर्षों तक जीवित रहा। वह बिलकुल पीला पड़ गया था, परंतु जीवित था। और उसको हवा मिलने की कोई संभावना नहीं थी। डॉक्टरों ने तथा दूसरों ने उससे पूछा कि इसका रहस्‍य क्‍या है? उसने कहां हम नहीं जानते; हम इतना ही जानते है कि प्राण कही भी प्रवेश कर सकता है। और वह है। हवा वहां नहीं प्रवेश कर सकती, लेकिन प्राण कर सकता है। एक बार तुम जान जाओ कि श्‍वास के बिना भी कैसे तुम प्राण को सीधे ग्रहण कर सकते हो, तो तुम सदियों तक के लिए भी समाधि में जा सकते हो। तीसरी आँख पर केंद्रित होकर तुम श्‍वास के सार तत्‍व को, श्‍वास को नहीं, श्‍वास के सार तत्‍व प्राण को देख सकेत हो। और अगर तुम प्राण को देख सके, तो तुम उस बिंदु पर पहुंच गए जहां से छलांग लग सकती है, क्रांति घटित हो सकती है। सूत्र कहता है: ‘’सहस्त्रार तक रूप को प्राण से भरने दो।‘’ और जब तुम को प्राण का एहसास हो, तब कल्‍पना करो कि तुम्‍हारा सिर प्राण से भर गया है। सिर्फ कल्‍पना करो, किसी प्रयत्‍न की जरूरत नहीं है। और मैं बताऊंगा कि कल्‍पना कैसे काम करती है। तब तुम त्रिनेत्र-बिंदु पर स्‍थिर हो जाओ तब कल्‍पना करो, और चीजें आप ही और तुरंत घटित होने लगती है। अभी तुम्‍हारी कल्‍पना भी नपुंसक है। तुम कल्‍पना किए जाते हो और कुछ भी नहीं होता। लेकिन कभी-कभी अनजाने साधारण जिंदगी में भी चीजें घटित होती है। तुम अपने मित्र की सोच रहे हो और अचानक दरवाजे पर दस्‍तक होती है। तुम कहते हो कि सांयोगिक था कि मित्र आ गया। कभी तुम्‍हारी कल्‍पना संयोग की तरह भी काम करती है। लेकिन जब भी ऐसा हो, तो याद रखने की चेष्‍टा करो और पूरी चीज का विश्‍लेषण करो। जब भी लगे कि तुम्‍हारी कल्‍पना सच हुई है। तुम भीतर जाओ और देखो। कहीं न कहीं तुम्‍हारा अवधान तीसरे नेत्र के पास रहा होगा। दरअसल यह संयोग नहीं था। यह वैसा दिखता है; क्‍योंकि गुह्म विज्ञान का तुमको पता नहीं है। अनजाने ही तुम्‍हारा मन त्रिनेत्र केंद्र के पास चला गया होगा। और अवधान यदि तीसरी आँख पर है तो किसी घटना के सृजन के लिए उसकी कल्‍पना काफी है। यह सूत्र कहता है कि जब तुम भृकुटियों के बीच स्‍थिर हो और प्राण को अनुभव करते हो, तब रूप को भरने दो। अब कल्‍पना करो कि प्राण तुम्‍हारे पूरे मस्‍तिष्‍क को भर रहे है। विशेषकर सहस्‍त्रार को जो सर्वोच्‍च मनस केंद्र है। उस क्षण तुम कल्‍पना करो। और वह भर जाएगा। कल्‍पना करो कि वह प्राण तुम्‍हारे सहस्‍त्रार से प्रकाश की तरह बरसेगा। और वह बरसने लगेगा। और उस प्रकाश की वर्षा में तुम ताजा हो जाओगे। तुम्‍हारा पुनर्जन्‍म हो जाएगा। तुम बिलकुल नए हो जाओगे। आंतरिक जन्‍म का यही अर्थ है। यहां दो बातें है। एक, तीसरी आँख पर केंद्रित होकर तुम्‍हारी कल्‍पना पुंसत्‍व को, शुद्धि को उपलब्‍ध हो जाती है। यही कारण है कि शुद्धता पर, पवित्रता पर इतना बल दिया गया है। इस साधना में उतरने के पहले शुद्ध बने। तंत्र के लिए शुद्धि कोई नैतिक धारणा नहीं हे। शुद्धि इसलिए अर्थपूर्ण है कि यदि तुम तीसरी आँख पर स्‍थिर हुए और तुम्‍हारा मन अशुद्ध रहा, तो तुम्‍हारी कल्‍पना खतरनाक सिद्ध हो सकती है—तुम्‍हारे लिए भी और दूसरें के लिए भी। यदि तुम किसी की हत्‍या करने की सोच रहे हो, उसका महज विचार भी मन में है। तो सिर्फ कल्‍पना से उस आदमी की मृत्‍यु घटित हो जाएगी। यही कारण है कि शुद्धता पर इतना जोर दिया जाता है। पाइथागोरस को विशेष उपवास और प्राणायाम से गुजरने को कहा गया; क्‍योंकि यहां बहुत खतरनाक भूमि से यात्री गुजरता है। जहां भी शक्‍ति है, वहां खतरा है। यदि मन अशुद्ध है तो शक्‍ति मिलने पर आपके अशुद्ध विचार शक्‍ति पर हावी हो जाएंगे। कई बार तुमने हत्‍या करने की सोची है; लेकिन भाग्‍य से वहां कल्‍पना न काम नहीं किया। यदि वह काम करे, यदि वह तुरंत वास्तविक हो जाए तो वह दूसरों के लिए ही नहीं तुम्‍हारे लिए भी खतरनाक सिद्ध हो सकती है। क्‍योंकि कितनी ही बार तुमने आत्‍म हत्‍या की सोची है। अगर मन तीसरी आँख पर केंद्रित है तो आत्‍महत्‍या का विचार भी आत्‍महत्‍या बन जाएगा। तुमको विचार बदलने का समय भी नहीं मिलेगा। वह तुरंत घटित हो जाएगी। तुमने किसी को सम्‍मोहित होते देखा है। जब कोई सम्‍मोहित किया जाता है, तब सम्मोहन विद जो भी कहता है, सम्‍मोहित व्‍यक्‍ति तुरंत उसका पालन करता है। आदेश कितना ही बेहूदा हो तर्कहीन हो असंभव ही क्‍या न हो। सम्‍मोहित व्‍यक्‍ति उसका पालन करता है। क्‍या होता है? यह पांचवी विधि सब सम्मोह न की जड़ में है। जब कोई सम्‍मोहित किया जाता है, तब उसे एक विशेष बिंदू पर, किसी प्रकाश पर या दीवार पर लगे किसी चिन्‍ह पर या किसी भी चीज पर या सम्‍मोहक की आँख पर ही अपनी दृष्‍टि केंद्रित करने को कहा जाता है। और जब तुम किसी खास बिंदू पर दृष्‍टि केंद्रित करते हो, उसके तीन मिनट के अंदर तुम्‍हारा आंतरिक अवधान तीसरी आँख की और बहने लगता है। तुम्‍हारे चेहरे की मुद्रा बदलने लगती है। और सम्‍मोहन विद जानता है कि कब तुम्‍हारा चेहरा बदलने लगा। एकाएक चेहरे से सारी शक्‍ति गायब हो जाती है। वह मृत वत हो जाता है। मानों गहरी तंद्रा में पड़े हो। जब ऐसा होता है, सम्‍मोहक को उसका पता हो जाता है। उसका अर्थ हुआ कि तीसरी आँख अवधान को पी रही है। आपका चेहरा पीला पड़ गया है। पूरी ऊर्जा त्रिनेत्र केंद्र की और बह रही है। अब सम्मोहित करने वाला तुरंत जान जाता है। कि जो भी कहा जाएगा। वह घटित होगा। वह कहता है कि अब तुम गहरी नींद में जा रहे हो, और तुम तुरंत सो जाते हो। वह कहता है कि अब तुम बेहोश हो रहे हो और तुम बेहोश हो जाते हो। अब कुछ भी किया जा सकता है। अब अगर वह कहे कि तुम नेपोलियन या हिटलर हो गए हो तो तुम हो जाओगे। तुम्‍हारी मुद्रा बदल जायेगी। आदेश पाकर तुम्‍हारा अचेतन उसका वास्‍तविक बना देता है। अगर तुम किसी रोग से पीडित हो तो रोग को हटने का आदेश देगा, और मजेदार बात रोग दूर हो जायेगा। या कोई नया रोग भी पैदा किया जा सकता है। यही नहीं, सड़क पर से एक कंकड़ उठा कर अगर सम्मोहन विद तुम्‍हारी हथेली पर रख दे और कहे कि यह अंगारा है तो तुम तेज गर्मी महसूस करोगे और तुम्‍हारी हथेली जल जाएगी—मानसिक तल पर नहीं, वास्‍तव में ही। वास्‍तव में तुम्‍हारी चमड़ी जब लायेगी और तुम्‍हें जलन महसूस होगी। क्‍या होता है? अंगारा नहीं, बस एक मामूली कंकड़ है वह भी ठंडा, फिर भी जलना ही नहीं हाथ पर फफोले तक उगा देता है। तुम तीसरी आँख पर केंद्रित हो और सम्मोहन विद तुमको सुझाव देता है और वह सुझाव वास्‍तविक हो जाता है। यदि सम्मोहन विद कहे कि अब तुम मर गए, तो तुम तुरंत मर जाओगे। तुम्‍हारी ह्रदय गति रूक जायेगी। रूक ही जाएगी। यह होता है त्रिनेत्र के चलते। त्रिनेत्र के लिए कल्‍पना और वास्‍तविकता दो चीजें नहीं है। कल्‍पना ही तथ्‍य है। कल्‍पना करें और वैसा ही जाएगा। स्‍वप्‍न और यथार्थ में फासला नहीं है। स्‍वप्‍न देखो और सच हो जायेगा। यही कारण है कि शंकर ने कहा कि यह संसार परमात्‍मा के स्‍वप्‍न के सिवाय और कुछ नहीं है—यह परमात्‍मा की माया है। यह इसलिए कि परमात्‍मा तीसरी आँख में बसता है—सदा, सनातन से। इसलिए परमात्‍मा जी स्‍वप्‍न देखता है वह सच हो जाता है। और यदि तुम भी तीसरी आँख में थिर हो जाओ तो तुम्‍हारे स्‍वप्‍न भी सच होने लगेंगे। सारिपुत्र बुद्ध के पास आया। उसने गहरा धान किया। तब बहुत चीजें घटित होने लगीं, बहुत तरह के दृश्‍य उसे दिखाई देने लगे। जो भी ध्‍यान की गहराई में जाता है। उसे यह सब दिखाई देने लगता है। स्‍वर्ग और नरक; देवता और दानव, सब उसे दिखाई देने लगे। और वह ऐसे वास्‍तविक थे कि सारिपुत्र बुद्ध के पास दौड़ा आया। और बोला कि ऐसे-ऐसे दृश्‍य दिखाई देते है। बुद्ध ने कहा, वे कुछ नहीं है। मात्र स्‍वप्‍न है। लेकिन सारिपुत्र ने कहा कि वे इतने वास्‍तविक है कि मैं कैसे उन्‍हें स्‍वप्‍न कहूं? जब एक फूल दिखाई पड़ता है, वह फूल किसी भी फूल से अधिक वास्‍तविक मालूम पड़ता है। उसमे सुगंध है। उसे मैं छू सकता हूं। अभी जो मैं आपको देखता हूं वह उतना वास्‍तविक नहीं है; आप जितना वास्‍तविक मेरे सामने है, वह फूल उससे अधिक वास्‍तविक है। इसलिए कैसे मैं भेद करूं कि कौन सच है, और कौन स्‍वप्‍न। बुद्ध ने कहा, अब चूंकि तुम तीसरी आँख में केंद्रित हो, इसलिए स्‍वप्‍न और यथार्थ एक हो गए है। जो भी स्‍वप्‍न तुम देखोगें सच हो जाएगा। और उससे ठीक उलटा भी घटित हो सकता है। जो त्रिनेत्र पर थिर हो गया, उसके लिए स्‍वप्‍न यथार्थ हो जाएगा। और यथार्थ स्‍वप्‍न हो जाएगा। क्‍योंकि जब तुम्‍हारा स्‍वप्‍न सच हो जाता है तब तुम जानते हो कि स्‍वप्‍न और यथार्थ में बुनियादी भेद नहीं है। इसलिए जब शंकर कहते है कि सब संसार माया है, परमात्‍मा का स्‍वप्‍न है, तब यह कोई सैद्धांतिक प्रस्‍तावना या कोई मीमांसक वक्‍तव्‍य नहीं है। यह उस व्‍यक्‍ति का आंतरिक अनुभव है जो शिवनेत्र में थिर हो गया है। अंत: जब तुम तीसरे नेत्र पर केंद्रित हो जाओ तब कल्‍पना करो कि सहस्‍त्रार से प्राण बरस रहा है; जैसे कि तुम किसी वृक्ष के नीचे बैठे हो और फूल बरस रहे है, या तुम आकाश के नीचे हो और कोई बदली बरसने लगी। या सुबह तुम बैठे हो और सूरज उग रहा है और उसकी किरणें बरसने लगी है। कल्‍पना करो और तुरंत तुम्‍हारे सहस्‍त्रार से प्रकाश की वर्षा होने लगेगी। यह वर्षा मनुष्‍य को पुनर्निर्मित करती है, उसका नया जन्‍म दे जाती है। तब उसका पुनर्जन्‍म हो जाता है। ओशो विज्ञान भैरव तंत्र (तंत्र-सूत्र—भाग-1) प्रवचन-5 तंत्र-सूत्र—विधि-05 धर्मशास्त्र की बारीकियों में हमें नहीं जाना कि क्या सही है, क्या नहीं, किंतु पूज्य शंकराचार्य जी द्वारा हाल में की गई टिप्पणियों से यह तो स्पष्ट हुआ ही कि वह ऐसा पद है जिस पर बैठे धर्मज्ञवर सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों को भी ललकार सकते हैं। व्यवस्था निर्माण की दृष्टि से रामजन्मभूमि मंदिर किसी संप्रदाय विशेष का मान्य हो सकता है, परंतु उसमें सनातन धर्म के सभी संप्रदायों का ही नहीं अपितु विश्व भर की परंपराओं का स्थान बनाया जाना चाहिए। भगवान राम को जानने और मानने वालों की दुनिया में कैसी कैसी परम्परायें चलती हैं, हमें विश्वास है उन सबकी एक झांकी इस मंदिर में मिलेगी। एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में लेटा, एक राम है जगत पसारा, एक राम है जगत से न्यारा। तीन राम को सब कोई ध्यावे, चतुर्थ राम को मर्म न पावे। चौथा छाड़ि जो पंचम ध्यावे, कहे कबीर सो हम को पावे।। इससे लोकमानस की आस्था गहरी और व्यापक होगी। राम सबके हैं और सबमें वे हैं, यह उस मंदिर में मूर्तिमान होना चाहिए। इसलिए सबके अभिमत और उनके सुझावों का स्वागत हो और उनका मंदिर में यथोचित सन्निवेश हो। निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। पूज्य शंकराचार्य पीठाधीश्वरों की टिप्पणियों से राजसत्ता पर धर्मसत्ता की वरीयता प्रतिष्ठित होती है, होनी भी चाहिए। धर्मसत्ता अध्यात्म की विरोधी नहीं होती, अपितु किसी व्यक्ति की अध्यात्म तक पहुँच उसे अपने धर्म का बोध होने पर ही हो पाती है। १३/१/२४ योग वासिष्ठ वैज्ञानिक ग्रंथ है। सूक्ष्मता से मंथन किया गया है। कर्मों की गति गहन है, इस पर बहुत से भ्रम समाज में फैले हैं। यह ग्रंथ उनका समुचित निवारण करता है। अपनी इंद्रियों और उनकी प्रवृत्तियों के प्रति अनिच्छा ही स्वच्छता है। श्री श्री रविशंकर राम तथा कृष्ण के ब्रह्म रूप विश्व का मूल एक ही ब्रह्म था, जिसने सृष्टि के लिये २ प्रकार की क्रियायें कीं-(१) भृगु (जबर) = गुरुत्व का आकर्षण, संकोच। इस आकर्षण का केन्द्र क्रीं = कृष्ण है। जब प्रकाश भी आकर्षित होता है, तब वस्तु का कोई रंग नहीं होता, अतः कृष्ण = काला। आकर्षण का क्षेत्र क्लीं = काली है। क्रीं, क्लीं को अरबी में करीम, कलीम कहा गया है, क्योंकि उसमें संयुक्ताक्षर नहीं हैं। (२) अङ्गिरा (अंगारा) = तेज का विकिरण, प्रसार। जब यह प्रकाश रूप में गतिशील होता है, तो रं है- ॐ खं ब्रह्मं, खं पुराणं (पुर में गतिशील प्राण) वायु रं इति ह स्माह-बृहदारण्यक उपनिषद् (५/१/१) प्राणो वै रं, प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ति। (शतपथ ब्राह्मण १४/८/१३/३, बृहदारण्यक उपनिषद् ५/१२/१) रकारो वह्निः, वचनः प्रकाशः पर्यवसति (रामरहस्योपनिषद् ५/४) रं को भाषा में राम या रहीम (अरबी) कहते हैं। ब्रह्म का ३ प्रकार से निर्देश होता है-ॐ, तत्, सत्-गीता (१७/२३)। ॐ गतिशील होने पर रं है, व्यक्ति के लिये तत् या निर्देश नाम द्वारा है, अतः उसका प्राण बाहर निकलने पर कहते हैं-राम-नाम-सत्। राम और कृष्ण मनुष्य रूप में ही थे, पर उनकी समाधि अवस्था में उनकी और ब्रह्म चेतना में कोई अन्तर नहीं था। उस रूप में उन्होंने अपने को ब्रह्म ही कहा है, उनको सामान्य मनुष्य मानना भूल है- मयाध्यक्षेण प्रकृतिं सूयते सचराचरम्। हेतुनानेन कौन्तेय जगद् विपरिवर्तते॥ अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषी तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥ (गीता ९/१०-११) दोनों के बारे में कई बार सन्देह हुआ है कि वे मनुष्य हैं या ब्रह्म हैं। अर्जुन ने कहा कि कृष्ण भी उनके साथ ही पैदा हुये, फिर उन्होंने बहुत पहले विवस्वान् को कैसे ज्ञान दिया? (गीता ४/४)। रामचरितमानस में भी शंकर प्रिया सती को सन्देह होता है कि राम ईश्वर होने पर सीता के वियोग में कैसे रो रहे थे? लेकिन उनके सीता रूप धरने पर भी राम ने उनको पहचान कर नमस्कार किया। कृष्ण का एक अर्थ है कृत्स्न या सम्पूर्ण विश्व। आकर्षण से ही विश्व स्थित है। आकाश में सौर मण्डल से बड़ी रचना अमृत है, सौरमण्डल के अंश मर्त्य हैं- आकृष्णेन रजसा वर्तमानः निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ (ऋक्, १/३५/२, वाज. सं. ३३/४३, ३४/३१, तैत्तिरीय सं. ३/४/१/२, मैत्रायणी सं. १९६/१६) पुराण में सौरमण्डल के भू, भुवः स्वः को कृतक (बनने-मिटने वाले) तथा जनः, तपः, सत्य को अकृतक (स्थायी) कहा है। बीच में महर्लोक है। पादगम्यन्तु यत्किञ्चिद्वस्त्वस्ति पृथिवीमयम्। स भूर्लोकः समाख्यातो विस्तरोऽस्य मयोदितः॥१६॥ भूमिसूर्यान्तरं यच्च सिद्धादि मुनिसेवितम्। भुवर्लोकस्तु सोऽप्युक्तो द्वितीयो मुनिसत्तम॥१७॥ ध्रुवसूर्यान्तरं यच्च नियुतानि चतुर्दश। स्वर्लोकः सोऽपु गदितो लोकसम्स्थान चिन्तकैः॥१८॥ त्रैलोक्यमेतत् कृतकं मैत्रेय परिपठ्यते। जनस्तपस्तथा सत्यमिति चाकृतकं त्रयम्॥१९॥ कृतकाकृतकयोर्मध्ये महर्लोक इति स्मृतः। शून्यो भवति कल्पान्ते योऽत्यन्तं न विनश्यति॥२०॥ (विष्णु पुराण, २/८) आकर्षण बल द्वारा सभी ग्रह नक्षत्र शाङ्कव (वृत्त, दीर्घ वृत्त) कक्षाओं में स्थिर हैं। शङ्कु भवत्यह्नो धृत्यै यद्वा अधृतँ शङ्कुना तद्दाधार। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ११/१०/११) तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलासः॥ (ऋक्, १/१६४/४८) ध्यान कुछ भी न होना और होने में रहना है। १५/१/२४ मकर संक्रांति गंगा और गायत्री का पर्व है। गायत्री एक छंद का नाम है। छंद का अर्थ गति भी है। गायत्री आत्मा का छंद है। गायत्री में सूर्य उपासना ही होती है। मकर संक्रांति में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य जो सबका पोषण करता है। वह प्रकृति का प्राण है। संक्रांति पर इसी प्रकृति की खाद्य वस्तुओं गुड और तिल आदि लेने का विधान किया गया है। इस दिन हम गंगा स्नान या बुड़की लेते हैं। यह ज्ञान उपासना है। गंगा ज्ञान की प्रतीक है। ज्ञान उपलब्ध होने पर ही स्वयं के साथ साथ पितरों को भी तृप्ति मिलती है। इसलिए आज के दिन ही राजा भगीरथ के साठ हज़ार पूर्वज मुक्त हुए। इस दिन खिचड़ी खाने की परंपरा है, खिचड़ी यानी प्रकृति के उपयोगी तत्वों का समाहार। दान का भी अर्थ है कि यह सबके लिए हैं। यह सब ज्ञान कराने वाले पुरोहित अग्नि रूप हैं। ऋग्वेद का पहला मंत्र है ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्।। विश्व की सभी सभ्यताओं में अग्नि की उपासना की गई है। अग्नि मनुष्य के बाहर भी है, अग्नि मनुष्य के अंदर भी है। अग्नि सबसे अच्छी मित्र है। अग्नि सबसे बड़ी शत्रु भी है। अतः मनुष्य ने अग्नि को ही अपना पहला देव माना। प्रकृति के कण कण को जिस समाज ने अपने जीवन में जितना स्थान दिया, वह सभ्यता उतनी उन्नत हुई। सनातन का प्रकृति के पोर पोर के प्रति कृतज्ञता का भाव आदिकाल से रहा है। प्रकृति के प्रति यह सभ्य आचरण ही धर्म है। १६/१/२४ प्रकाश एक लोक का नाम है, आकाश की भाँति। व्यक्ति की प्रकृष्ट या विशिष्ट दशा में वह प्रकाश दर्शन करता है। यह प्रकाश बाह्य प्रकाश नहीं है, परंतु उससे भिन्न भी नहीं है। बाह्य प्रकाश बिखरी हुई श्वासों की भाँति है, मूल श्वास ईश्वर की है, जिसमें मन, वाणी और कर्म की एकता है, सामरस्य है, स्वातंत्र्य है, परंतु श्वास के बिखरने पर यह सब खंड खंड हो जाते हैं और प्राणी भटक जाते हैं। तब वे अपनी मनोवृत्तियों और आदतों के चंगुल में घिरे रहते हैं। प्राण या स्रोत से जुड़े रहना प्रकाश के क्षेत्र में बने रहना है। शंकराचार्यों पर लांछन लगाना सही नहीं है। उनका आशीर्वाद पाने की कामना करते रहना उचित है। शंकराचार्यों से राजनीति के प्रश्नों को हल करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, अपितु वे एक समृद्ध और सुदीर्घ परंपरा के प्रतीक हैं, उनका कहा और किया उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए। १७/१/२४ उस परम् का साक्षात्कार हो जाने पर जाने माने वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग की बात कि 'ब्रह्मांड प्रकृति के सिद्धांतों पर चलने वाली मशीन है' भी ग़लत नहीं लगेंगी। वे वैज्ञानिक थे, उन्होंने अनुभूत करके कोई बात कही है। ईश्वर मानने के बाद होने वाले साक्षात्कार में पतन की आशंका नहीं रहेगी, अन्यथा वहाँ से गिरने की संभावना रहती है। रमेश पाराशर की पोस्ट पर १९/१/२४ प्रभु श्री राम जन्म भूमि पर उनकी प्रतिष्ठा का आयोजन जारी है। २२ जनवरी को उनके चक्षु खुल जाएँगे। उससे पहले अहंकार, मन, बुद्धि, चित्त और फिर पंच महाभूतों में से आकाश और वायु में प्राण का अधिवास हो रहा है। चक्षु एक ज्ञानेंद्रिय है, जिसकी कर्मेंद्रिय पाद या पैर हैं। चक्षु ज्ञानेंद्रिय की तन्मात्रा रूप है और इसका महाभूत अग्नि है। संसार इसी महाभूत से शुरू होता है, इससे पूर्व तो आकाश और वायु की सत्ता रहती है। अग्नि के बाद जल और फिर पृथ्वी पर आरोहण होता है। अग्नि की तन्मात्रा रूप से ही रस का उद्भव होता है और रस से गंध का। प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान सृष्टि रचना का आयोजन है। हम सब इसे आत्मसात् करें, जो नहीं कर पा रहे होंगे, उनके भीतर राम को अव्यक्त रूप में समझना चाहिए। ऐसे भी जन हो सकते हैं जो इसे आत्मसात् किए हों और व्यक्त न कर रहे हों। २०/१/२४ जगत् प्रभु की लीला है। लीला का संवरण भी तो वही करते हैं। लीला का निर्देशन और व्यवस्थापन उन्हीं के द्वारा हो रहा है। वे स्वयं लीलामय भी हैं और लीला के बाहर उसके नियंता हैं। मनुष्य द्वारा किए जा रहे कार्य प्रभु की लीला के भाग हैं। मनुष्य को यह सदा स्मरण रखना है। लीला का उपराम भी होता है, मनुष्य को भी प्रभु लीला के साथ साथ उसका हिस्सा होने की स्मृति जागती है, वह उस लीला में ऐसा निमग्न भी होता है जिसमें वह एक पार्ट है, यह वह भूल जाता है। उस समय प्रभु उसे नियंत्रित करते हैं। यदि वह प्रभु के घेरे में न रहा तो भटकता रहेगा। २१/१/२४ वैज्ञानिकों ने प्राणियों और विशेषतः मनुष्यों की श्वास पर क्या प्रयोग किये और उनसे क्या निष्कर्ष निकले हैं, हमें ज्ञात नहीं है। इस दिशा में वैज्ञानिकों को उतरना चाहिए। हमारी श्वास के तौर तरीक़ों से बहुत से महत्वपूर्ण और मानवता के लिए सर्वथा उपयोगी निष्कर्ष मिल सकते हैं। यह क्षेत्र ऐसा है, जिससे स्पष्ट तौर पर विज्ञान और अध्यात्म के सिरे जुड़ते हुए मिलेंगे। अग्नि से जल की उत्पत्ति हुई है, जल से पृथ्वी की। यह स्वाभाविक विधान है। अपने भीतर इस क्रम का उदय हो जाए, इसका पता लग जाए, इसके लिए हमें उल्टे क्रम से जाना होता है। पृथ्वी के गुण गंध से, रस और रस से रूप की यात्रा होती है। अग्न्याधान की प्राप्ति सहज नहीं है। एतदर्थ गुरु कृपा और साधना की आवश्यकता है। गोरख – मन का स्वरूप क्या है? श्वांस का आकार क्या है? दस दिशाएं कौनसी हैं और किस उपाय के द्वारा इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है?.....हरि ॐ मछेन्द्र – शून्य ही मन का स्वरूप है, श्वांस का आकार निराकार है, दशों दिशाओं का वर्णन नहीं किया जा सकता और दसवां द्वार ही इन्हें नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है।.....हरि ॐ गोरख – मूल (जड़) क्या है और शाखा क्या है? कौन गुरु और कौन शिष्य है, किस तत्व के सहारे साधक अकेला अपने मार्ग पर चल सकता है?......हरि ॐ मछेन्द्र – मस्तिष्क ही मूल है और श्वांस शाखा हैं। शब्द ही गुरु है और ध्यान ही शिष्य है। और खुद को जानना ही वह ज्ञान है जिसके सहारे साधक अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।......हरि ॐ गोरख – बीज क्या है, क्षेत्र क्या है? स्तवन क्या है? दृश्य क्या है? जोग (योग) क्या है और किस उपाय (जुगती) के सहारे किया जाता है? मोक्ष क्या है? और मुक्ति क्या है?.....हरि ॐ मछेन्द्र – मंत्र ही बीज है, मति (भाव) ही भूमि है। ध्यान (सूरति) ही स्तवन है, सबसे अलग होना ही (अर्थात निवृत्ति) ही दृश्य है। सागर (उरम) ही जोग है और पृथ्वी (धरम) ही उपाय है। अखंड ज्योति ही मोक्ष है और ज्योति का प्रकाशपुंज ही मुक्ति है।.......हरि ॐ २२/१/२४ राम में जीव और परम का लीला विहार है. निशब्द से शब्द का और शब्द से ओंकार का उद्भव हुआ है. ॐ से रा और म अक्षर उत्पन्न होते हैं. त्रितत्व हैं जीव, परमात्मा तथा हरे राम कृष्ण अथवा गुरु शिष्य और भगवान। राम का दर्शन मंदिर में कैसे! मन के अंदर जो है, वह मंदिर कहा जाता है। मन के भीतर के तत्व का दर्शन मंदिर में होता है। एक बार दर्शन मन में या मंदिर में हो जाए तो फिर सर्वत्र होता है। ध्यानमंगलम् स्वरूप है भगवान श्री राम का... इसमें सब अंतर्लीन हो जाता है। इसे शांभवी और भैरवी मुद्रा भी कहा गया है... अंतर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टि निमेषोन्मेष वर्जिता। इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतंत्रेषु गोपिता।। ध्यानमंगलम् बड़ा मूल्यवान शब्द है, इस पर फिर कभी... 👉 निस्पंद मन की भाषा है ध्यान ध्यान मन का स्नान है, चित्त की शुद्धि व परिष्कृति है, यह आत्मा का भोजन है। ध्यान में हम स्थिर होते हैं, एकाग्र होते हैं। ध्यान के द्वारा अपने अस्थिर व उद्वेलित मन को शांत करके हम उसे ऊर्जावान बना सकते हैं। ध्यान के माध्यम से हम अपनी मानसिक क्षमता को भी बढ़ा सकते हैं। **गहरा ध्यान उस प्रकाश की तरह होता है, जो कुसंस्कार रूपी अंधकार को तिरोहित कर सकता है। संस्कार ही होते हैं.. जो चित्तभूमि में कर्मबीज के रूप दबे होते हैं और समयानुसार परिपक्व होकर अंकुरित होते हैं, उभरते और विकसित होकर अपना प्रभाव दिखाते हैं। **ध्यान में तल्लीन हुए, व्यक्ति का शरीर भले ही निष्क्रिय हो, लेकिन उसका मन होश में रहता है, स्वप्न के सदृश्य वह अपने चित्त का दर्शन करता है, लेकिन वह स्वप्न नहीं होता, बल्कि जाग्रत अवस्था में पूर्ण होश के साथ देखा गया दृश्य होता है। ध्यान वह प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को उनसे मुक्त करता है, जिनसे वह आसक्त है। यदि वह स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहा तो ध्यान भी नहीं कर सकता। प्रायः हमारी यह प्रवृत्ति है कि उत्तेजक, नकारात्मक भावों पर हमारा अधिक ध्यान जाता है और सुख की अपेक्षा दुःख को हम अधिक याद करते हैं। **हम अपने सुखद मनोभावों को छोड़कर दुःखद मनोभावों से गहराई से चिपके होते हैं और उनके कारण प्रताड़ित रहते हैं, परंतु ध्यान के माध्यम से जब चेतना इन सभी भावों से मुक्त होती है तो व्यक्ति वर्तमान में जीने लगता है और अतीत के बंधनों से मुक्त होने लगता है। इन बंधनों से मुक्त होना ही ध्यान है। सामान्य तौर पर व्यक्ति अपने अतीत और भविष्य से मुक्त नहीं हो पाता और न ही वह अपने वर्तमान का सदुपयोग कर पाता है, क्योंकि अधिकांशतः उसके वर्तमान में या तो अतीत की यादें होती हैं या फिर भविष्य की योजनाएँ। जब भी कोई व्यक्ति योजनाएँ बनाता है तो वे योजनाएँ व्यक्ति को ध्यान की गहराई में डूबने से रोकती हैं। इसी तरह अतीत की यादें भी उन जंजीरों की तरह होती हैं, जो व्यक्ति को ध्यान की गहराई में उतरने नहीं देतीं; जबकि ध्यान तो वर्तमान में जीने, उसे स्वीकारने का नाम है। ध्यान के माध्यम से व्यक्ति अपने वर्तमान में स्थिर व एकाग्र होता है, अपनी ऊर्जा का संग्रह करता है और उस संगृहीत ऊर्जा के माध्यम से अपना सर्वोत्तम कार्य करता है। ध्यान व्यक्ति के मन को पूर्ण संतुष्टि व बृहत्तर अंतर्ज्ञान की ओर ले जाता है। ध्यान के माध्यम से ब्रह्मांडीय चेतना से एकाकार हुआ जा सकता है और संपूर्ण ब्रह्मांड से स्वयं के तादात्म्य को अनुभव किया जा सकता है। **ध्यान के अभ्यास से, इसकी गहराई में उतरने से हमारे शरीर, मन, प्राण व स्नायुतंत्र का संवर्द्धन होता है। शरीर की प्रत्येक कोशिका में प्राण का संचार होता है, मनः शक्ति का विकास होता है और आत्मिक प्रसन्नता हस्तगत होती है। **ध्यान के समय 'मैं कुछ भी नहीं हूँ (अकिंचन), ' का भाव होना चाहिए, किसी भी चीज की चाहत व्यक्ति के ध्यान को डगमगा सकती है। **ध्यान कभी भी करने से नहीं होता, बल्कि स्वतः हो जाता है। जब व्यक्ति ध्यान में कुछ करने का प्रयास करता है तो वह वास्तविक रूप से ध्यान की गहराई में नहीं उतर सकता। **ध्यान में किसी तरह की सक्रियता के बजाय एक तरह की सजगता और जागरूकता लिए हुए अक्रियता होती है। ध्यान हमारे अंतर्मन की यात्रा है और यह एक ऐसी यात्रा है, जिस पर हमें अकेले ही चलना होता है, **केवल अपना मन ही साथी- सहयोगी की तरह होता है। यदि हमारा यह मन स्थिर, शांत व एकाग्र है तो अपना पूरा सहयोग दे पाता है और यदि मन अस्थिर, अशांत व उद्वेलित है तो एक कदम भी साथ नहीं चल सकता। **मन की अशुद्धि व विकृतियाँ इस मार्ग पर बिछे हुए उन नुकीले काँटों की तरह होती हैं, जो ध्यान में जाने पर चुभती हैं व आगे नहीं बढ़ने देतीं। अतः ध्यान उन व्यक्तियों का सरलता से लगता है, जो सात्त्विक प्रकृति के होते हैं और जिनका अंतःकरण शुद्ध, निर्मल होता है। **ध्यान करने से पूर्व धारणा व अन्य यौगिक प्रक्रियाओं का अभ्यास करना चाहिए। महर्षि पतंजलि ने इसलिए अष्टांग योग में ध्यान को सातवें स्थान पर रखा है, इसके पूर्व में क्रम से- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा को रखा है और ध्यान के बाद समाधि को रखा है, जो कि योग-साधना का शिखर है। यदि ध्यान से पूर्व अन्य क्रमों की उपेक्षा करके ध्यान तक पहुँचने करने का प्रयास किया जाएगा तो असफलता मिलती है और यथेष्ट लाभ भी नहीं मिल पाता। ध्यान करने वाले व्यक्तियों को यौगिक जीवनशैली का अभ्यास करते रहना चाहिए।**सामान्य व्यक्ति भी ध्यान के लाभों को प्राप्त करने के लिए अपने दैनंदिन जीवन में थोड़ी देर के लिए ध्यान का अभ्यास कर सकते हैं। यह अभ्यास किसी भी समय किया जा सकता है, जैसे- सूर्योदय के समय अथवा रात्रिकाल में या किसी भी अन्य समय, जब मन ध्यान में उतरना चाहता हो। यदि ध्यान करने का अभ्यास जीवन में डाला गया तो निश्चित रूप से इसके लाभ हमें अपने जीवन में देखने को मिलते हैं।🙏 ---वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड ज्योति : अक्टूबर, २०१५ से साभार संकलित व संपादित!🍂💥🍂💥🍂💥🍂💥 २६/१/२४ गौतमबुद्ध कहते हैं - परमात्मा को . ख़ुद में देखना “ध्यान” है, दूसरों में देखना “प्रेम” और सबमें देखना “ज्ञान” है.. २८/१/२४ "Often man does not cognize even things that his senses are able to perceive. Those persons who have perceptive eyes enjoy beauty everywhere.” - Paramahansa Yogananda इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति। न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥केन० २/५ यदि व्यक्ति यहीं (इसी लोक में) उस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तो व्यक्ति का अस्तित्व सार्थक है, यदि यहीं उस ज्ञान की प्राप्ति नहीं की, तो महाविनाश है। ज्ञानीजन विविध भूत-पदार्थों में 'उस' का विवेचन कर, इस लोक से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं। 5. If he knows Him here, then there is good for him. If he knows Him not here, then there is great loss. The wise knowing Him in all beings, going out of this world, after getting full knowledge from Guru, become immortal. योग वासिष्ठ में वसिष्ठ राम से कहते हैं यह सृष्टि 76 बार बनी है और तुम भी 76वे राम हो। योग वासिष्ठ के आधार पर हॉलीवुड में एक फ़िल्म 1999 में The Matrix बनी है। इसमें आता है Let me tell you why you are here. You are here because you know something. What you know you can’t explain, but you feel it. You felt it your entire life. You don’t know what it is, but it is there, like a splinter in your mind. It is this feeling that has brought you to me. Do you know what I’m talking about? The Matrix. Do you want to know what it is? The Matrix is everywhere, all around us, even now in this very room. Unfortunately no one can be told what the Matrix is. You have to see it for yourself.. इच्छाओं के रहते प्राण चले जायें तो मृत्यु है और प्राण के रहते हुए इच्छायें चली जायें तो वह हुयी मुक्ति। ३०/१/२४ कौरव प्रतीक हैं उन दोषों के जो हमें ईश्वर से या आत्मज्ञान से दूर ले जाते हैं, जबकि पांडव प्रतीक हैं उन गुणों के जो हमें आत्मज्ञान कराने के समीप ले जाते हैं। भीष्म अहंकार के प्रतीक हैं, जो गुणों को अपना मानते तो हैं पर वे कौरवों के पक्ष में ही खड़े होते हैं। इन गुणों और दोषों का सतत् युद्ध जहां चलता है, वह कुरुक्षेत्र कहलाता है। इस युद्ध को जीतने के लिए एक आदर्श शिष्य बनना पड़ता है, जिससे कृष्ण जैसे सद्गुरू प्राप्त हों। प्रणवादिसमुच्चारात्
प्लुतान्ते शून्यभावनात् ।
शून्यया परया शक्त्या
शून्यतामेति भैरवि ॥ praṇavādisamuccārāt
plutānte śūnyabhāvanāt /
śūnyayā parayā śaktyā
śūnyatāmeti bhairavi // Bhairavi, O Pārvatī, praṇavādi samuccārāt, . . .
There are three kinds of praṇavas–Vedic praṇava, Śiva praṇava, and Māyā praṇava. Vedic praṇava is “oṁ”; Śiva praṇava is “hūṁ”; Māyā praṇava is “hrīṁ”. Hrīṁ is called Māyā praṇava from our Shaiva point of view; and hūṁ is called Śiva praṇava; and oṁ is called Veda praṇava. Just recite these, any of these. You may recite oṁ, you may recite hūṁ, or you may recite hrīṁ–Veda praṇava, Śiva praṇava, or Māyā praṇava. . . . praṇavādi samuccārāt, you must recite it in this way–plutānte. You must not recite just like “oṁ”; not like that. Plutānte, you must end it in pluta. “Ooooooooooooooṁṁṁ”, like this [Swamiji demonstrates]. In the same way, you must recite hūṁ and you must recite hrīṁ. Any of these mantras you may recite. When you recite it, in the end you must concentrate on the voidness of that sound, where this sound merged in the end. The sound is finished afterwards, and there you must concentrate, there you must contemplate.
Śūnya bhāvanāt parayā śūnyayā śaktyā, and, by that supreme awareness of voidness, he enters in the transcendental void state of Śiva. Śūnyatāmeti bhairavi, he enters in the transcendental state of Lord Śiva, transcendental void state, voidness.
 व्यक्ति की कोई एक इंद्रिय काम न करे तो उसमें कोई अलग कौशल और कार्य करने में एक तीक्ष्णता आ जाती है। सोचिए! अगर पाँचों इंद्रियों का हम प्रत्याहरण कर पाएँ तो कितनी ऊर्जा का संग्रहण और केंद्रीकरण हो जाएगा।

Thursday, November 30, 2023

नवंबर २३

१/११/२३ महाभारत के शान्‍ति पर्व में वर्णित है - ‘‘ मैं रुद्र नारायण स्‍वरूप ही हूँ। अखिल विश्‍व का आत्‍मा मैं हूँ और मेरा आत्‍मा रुद्र है। मैं पहले रुद्र की पूजा करता हूँ। आप अर्थात्‌ शरीर को ही नारा कहते हैं। सब प्राणियों का शरीर मेरा ‘अयन' अर्थात्‌ निवास स्‍थान है, इसलिए मुझे ‘नारायण' कहते हैं। सारा विश्‍व मुझमें स्‍थित है, इसी से मुझे ‘वासुदेव' कहते हैं। सारे विश्‍व को मैं व्‍याप लेता हूँ, इस कारण मुझे ‘विष्‍णु' कहते हैं। पृथ्‍वी, स्‍वर्ग एवं अंतरिक्ष सबकी चेतना का अन्‍तर्भाग मैं ही हूँ, इस कारण मुझे ‘दामोदर' कहते हैं। मेरे बाल सूर्य, चन्‍द्र एवं अग्‍नि की किरणें हैं, इस कारण मुझे ‘केशव' कहते हैं। गो अर्थात्‌ पृथ्‍वी को मैं ऊपर ले गया इसी से मुझे ‘गोविन्‍द' कहते हैं। यज्ञ का हविर्भाग मैं हरण करता हूँ, इस कारण मुझे ‘ हरि' कहते हैं। सत्‍वगुणी होने के कारण मुझे ‘सात्‍वत' कहते हैं। लोहे का काला फाल होकर मैं जमीन जोतता हूँ और मेरा रंग काला है, इस कारण मुझे ‘कृष्‍ण' कहते हैं। '' 4/11/23 परमपिता अव्यक्त है, वह काम तत्व है, इच्छा में निवास करता है, परंतु उसे मूर्तमान् होने के लिए माता के गर्भ से आना होगा, इसलिए वैयाकरणों ने पितासूचक शब्दों को पहले स्थान दिया है। पुलिंग सूचक शब्द व्याकरण में पहले गिने गये हैं, स्त्रीलिंग शब्द बाद में। काम तत्व के बाद विष तत्व आता है। विष वह जो व्याप्त हो। काम जब सिर चढ़ जाता है तो वह विष बन जाता है, पर इस विष में जो सदा अवस्थित हो जाए, वह निरंजन हो जाता है, अन्यथा विष रूपी विश्व में ही रहने को विवश रहता है। ५/११/२३ Rashmi Bhardwaj की पोस्ट पर ... एक साधक और उपासक के भीतर क्षमा भाव होना अत्यावश्यक है, अन्यथा अहिंसा की रक्षा नहीं होगी और अहिंसा के बिना सत्य की उपलब्धि नहीं होगी। हाँ! डॉक्टर की गलती अवश्य है, पर उसका निर्णय सभ्य समाज को करना चाहिए। ७/११/२३ रात्रि में लगा एक सर्प अंडरवियर में अंडकोष से सटकर घुस गया। उसकी ठंडक का अहसास हुआ, अब उसके डसने की आशंका होने लगी, अपने को ध्यान में समय की अवस्था में ले जाने लगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। फिर सो गया। जाग़ने पर अंडरवियर से ही कागज का गत्ता निकाला, उसमे से सर्प बाहर निकल गया। वास्तव में ऐसा कुछ नहीं था। स्वप्निक अनुभूति , पर ध्यानमय। ध्यानमंगलम्। ८/११/२३ ध्यान अवस्था से पूर्व या उसके दौरान कभी कभी विचारों के प्रवाह के क्रम में हल्की सी घुटन, संत्रास या मानसिक पीड़ा होने लगती है, पर यह स्थिति आँख खोलने पर जाती रहती है और ध्यान जैसा आनंद आँख खुले होने पर मिलता है। अतएव ध्यान में आँख खुली रह सकती है, बंद रह सकती है। ध्यान एक अवस्था है, जिसमें हम काम करते हुए, उससे उपराम होकर किसी भी स्थिति में रह सकते हैं, किंतु होश रहना अपरिहार्य है। जागरण के बिना ध्यान का ज्ञाता और भोक्ता कौन होगा, भुक्ति या दृश्य कैसे निर्मित होगा। यह दृश्य लीला है, अहैतुक आनंद है। १०/११/२३ दुनिया भर के लिए काम ऊर्जा एक टैबू बना हुआ है, यह एक ऐसा कौतुक है, जिसके घेरे में मनुष्य घिरा ही रहता है। इससे बाहर आने के लिए काम शिक्षा पर बल दिया जाता है, वह बस इतनी ही है न कि स्त्री और पुरुष के समागम से संतान का जन्म तय होता है। xx गुणसूत्र से पुत्री और xy से पुत्र निर्धारित होता है, परंतु इन गुणसूत्रों को नियंत्रित या परिवर्तित नहीं किया जा सकता। समागम का डिटेल पढ़ाने की आवश्यकता नहीं है, वह प्रकृति स्वयमेव ज्ञात करा देती है। अपने प्राकृत रूप में यह काम ऊर्जा बड़ी रहस्यपूर्ण है। यह वह राधा है, जिसकी धारा में व्यक्ति को बहना होता है। इस प्रवाह में विष है जिससे विश्व बनता है और वह व्याप्ति भी है, जो ज्ञान का हेतु बनता है। इस रहस्य में विश्व और ब्रह्मचर्य दोनों निहित हैं। विश्व में यह विष व्याप्त हो रहा है और यही विष ब्रह्ममय होकर व्यक्ति को ब्रह्मचारी बनाता है। काम सर्वथा जैविक नहीं है। अगर यह भूख प्यास की भाँति होता तो इसके बिना व्यक्ति के प्राण छूट जाने चाहिए, परंतु ऐसा नहीं देखा जाता। भूख और प्यास के कारण व्यक्ति कालकवलित हो जाते हैं। पश्चिमी जगत ने इसे जैविक मानकर हल्का करने का प्रयत्न किया है, परंतु यह उतना हल्का भी नहीं है, न यह इतना त्याज्य विषय ही है कि इसे गर्हित मान लिया जाये। काम पुरुषार्थ चतुष्ट्य में आता है। इस चातुष्ट्य में काम की व्याप्ति सेक्स जैसी सीमित नहीं है। सेक्स को काम का अनुवाद के रूप में लिया जाता है, पर यह अनुवाद पूरा अर्थ व्यक्त नहीं करता है। हिंदी के कतिपय शब्दों के अनुवाद अंग्रेजी में यथारूप नहीं जा पाते हैं, रस , धर्म, ध्यान इत्यादि ऐसे ही शब्द हैं। काम वह ऊर्जा है, जो व्यक्ति को संचालित करती है, गतिमान रखती है। निर्माण प्रक्रिया का यह प्रथम सोपान है, उद्गम है। हिंदी के ही इच्छा शब्द के माध्यम से इसे अधिक निकट भाव में समझा जा सकता है। शैव ग्रंथों में आता है इच्छा कामं विषं ज्ञानं क्रिया देवी निरंजनम्। यह काम जब अहैतुक हो जाए तब प्रेम का उदय होता है। प्रेम की आत्यंतिक शर्त अहैतुक होना ही है। असल प्रेम के बाद ही आनंद प्राप्त होता है। जिसमें किसी पर कब्ज़ा करने का भाव भी नहीं रह जाता। यहाँ पहुँचने पर सब जैविक मात्र रह जाता है। मात्र दर्शन ही बचता है। दृष्टा और दृश्य उसमें अंतर्लीन हो जाते हैं। अपितु कौन दृष्टा है, कौन दृश्य है और क्या दर्शन है, इसका भेद भी नहीं रहता। धन वही जो हमें धन्य करे। अर्थ वह जो शब्द को प्रकाशित करे। वित्त जो चित्र वितान का प्रसार करे। मुद्रा वह जो चित्त को मुदित करे। धातु व्यक्ति को धारण करने वाला तत्व है। जो समस्वर करे, वह संपदा है। सम में हमें जो स्थापित करे, वह संपत्ति है। श्री, लक्ष्मी आदि भी धन के रूप हैं। अष्ट संपदा कही गई है... १-हमारे मूल का ज्ञान, स्रोत का ज्ञान हो जाना ही आदि लक्ष्मी है। २-धन का सदुपयोग करके उसका सम्मान होता है। यह धनलक्ष्मी है। ३-आप लक्ष्मी और सरस्वती के चित्र देखते हैं तो आप देखेंगे कि लक्ष्मी को ज्यादातर कमल में पानी के उपर रखा है। पानी अस्थिर है यानी लक्ष्मी भी पानी की तरह चंचल है। विद्या की देवी सरस्वती को एक पत्थर पर स्थिर स्थान पर रखा है। विद्या जब आती है तो जीवन में स्थिरता आती है। विद्या का भी हम दुरुपयोग कर सकते हैं। सिर्फ पढ़ना ही किसी का लक्ष्य हो जाए तब भी वह विद्या लक्ष्मी नहीं बनती। पढ़ना है, फिर जो पढ़ा है उसका उपयोग करना है तब वह विद्या लक्ष्मी है। ४-धन तो है मगर कुछ खा नहीं सकते - रोटी, घी, चावल, नमक, चीनी खा नहीं सकते। इसका मतलब धन लक्ष्मी तो है मगर धान्य लक्ष्मी का अभाव है। गांवों में आप देखें खूब धान्य होता है। वे किसी को भी दो-चार दिन तक खाना खिलाने में संकोच नहीं करते। धन भले ही ना हो पर धान्य होता है। ५-जिस मात्रा में धैर्य लक्ष्मी होती है उस मात्रा में प्रगति होती है। चाहे बिजनेस में हो, चाहे नौकरी में हो। धैर्य लक्ष्मी की आवश्यकता होती ही है। ६- जिस संतान से तनाव कम होता है या नहीं होता है वह संतान लक्ष्मी है। ७- कुछ लोगों के पास सब साधन, सुविधाएँ होती हैं, फिर भी किसी भी काम में उनको सफलता नहीं मिलती। सब-कुछ होने के बाद भी किसी भी काम में वो हाथ लगाएं, वह चौपट हो जाता है। काम होगा ही नहीं। यह विजय लक्ष्मी की कमी है। ८- कुछ लोगों के पास सब साधन, सुविधाएँ होती हैं, फिर भी किसी भी काम में उनको सफलता नहीं मिलती। सब-कुछ होने के बाद भी किसी भी काम में वो हाथ लगाएं, वह चौपट हो जाता है। काम होगा ही नहीं। यह विजय लक्ष्मी की कमी है। यह आठ प्रकार के धन सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं प्रत्येक व्यक्ति में यह आठ धन अधिक या कम मात्रा में होते हैं। १२/११/२३ सूर्य, चंद्र और तारे प्रकाश देते हैं, सदा अस्तित्वमान रहते हैं. पर दीपक अनथक प्रकाश देता है और प्रकाश देते हुए वह स्वयं को अर्पित कर देता है. यह जलता हुआ दीपक जीवन का प्रतीक है. जलते हुए दीपक में जैसी अस्थिरता है, उसी की भाँति हमारा जीवन चलता है.  दीपक की बाती इच्छा का प्रतीक है. दीपक की लौ का शीर्ष भाग ज्ञान का तो उसका ऊष्म भाग प्रेम और भक्ति का प्रतीक है. यह ऊष्मा दीपक में तेल या घी के स्नेह से आती है। ज्ञान भाग में ही हमारे गुरुदेव निवास करते हैं. चिंगारी लगाने वाले तो वही हैं। दुष्यंत कुमार कहते हैं.... एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो इस दिए में तेल से भीगी हुयी बाती तो है! सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्ति: क्षमाशिखा । अंधकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन वार्यताम् ॥ दिए की दीवट सत्य की हो, उसमें तेल तप का हो, उसकी बत्ती दया की हो और लौ क्षमा की हो। दीपक को यत्न पूर्वक वारना है, क्योंकि उसे अंधकार में प्रविष्ट होना है। दिया बारा जाता है, यह बारने की क्रिया विलक्षण है, यह अंग्रेज़ी में बर्न हो गई, बिहार में गाते हैं जगदंबा घर में दियरा बार अईनी हे! बुंदेली ब्रज में गाया जाता है गिरधारी मोरो बारो गिर न परे, इसमें बारो का अर्थ छोटा है, जिससे उसे संभालने का आशय इस पद में है। तिब्बतियों के यहाँ बारदो अनोखा कर्मकांड है। मृत्यु के समय आत्मा का संक्रमण इस विधि से कराया जाता है। बुंदेली में दिया को उजियारना कहते है, यह अधिक समीप का भाव है, उज्ज्वल करने का आशय इससे ग्रहण होता है। जलाने की क्रिया तो नष्ट करने के लिए भी प्रयुक्त होती है, उजियारना नष्ट करना नहीं, वरन् आलोकित होना है। राम-नाम-मनि-दीप धरु, जीह देहरी द्वार। ‘तुलसी’ भीतर बाहिरौ, जौ चाहसि उजियार॥ p दीपपर्व हम सबको आलोकित करे। शुभकामनाएँ🙏🌹 बहिरंतः स्फुरज्ज्योतीरत्न कुंभ प्रदीपवत्। स्वप्रकाशात् यथैवैकं स्वरूपमात्मनस्तथा॥ यो वा ९-१८ Just as a big lamp kept inside a vessel made of precious stones illumines by its light both outside and inside, so also the one Self illumines (everything). श्रीराम-सदृश:शिष्य: वशिष्ठ-सदृशो गुरु:। वाशिष्ठ-सदृशं ज्ञानं न भूत़ो न भविष्यति।। बहिः कृत्रिम-संरम्भो हृदि संरम्भवर्जितः। कर्ता बहिरकर्तांतर्लोके विहर राघव ॥ यो वा ७-१ interpretation1- Dear Raghav! you roam around the world being free from effort inwardly while apparently energetic outside, keeping the strong conviction of non-doership within while behaving outwardly as doer. 2 O Raghava, be outwardly active but inwardly inactive, outwardly a doer but inwardly a non-doer, and thus play your part in the world. अंतः संत्यक्तसर्वाशो वीतरागो विवासनः । बहिः सर्वसमाचारो लोके विहर राघव॥ यो वा ७-२ interpretation 1- Dear Raghav, you roam around in this world performing all types of actions outwordly, being free from all types of hankering, bereft of longing for all worldly objects, and devoid of all desires inwardly. 2- O Raghava, abandon all desires inwardly, be free from attachments and latent impressions, do everything outwardly and thus play your part in the world. योग वासिष्ठ प्रथमा प्रतिमापूजा जपस्तोत्राणि मध्यमा। उत्तमा मानसी पूजा सोsहँ पूजोत्तमोत्तमा॥ उत्तमो ब्रह्मसद्भावो ध्यानभावस्तु मध्यमः। स्तुतिर्जपोsधमो भावो बाह्यपूजाsधमाधमा॥ तत्व निर्णय उत्तमा तत्वचिन्तैव मध्यमं शास्त्रचिन्तनम्। अधमा मंत्रचिंता च तीर्थ-भ्रांत्यधमाधमा॥ मैत्रेयी उपनिषद् १३/११/२३ कर्मफल सिद्धांत भारतीय चिंतन की विश्व को अपूर्व देन है। इसे प्रकारांतर से सभी स्वीकार करते हैं। अगर यह न हो तो जीवन निरुद्देश्य हो जाये, भीतर के कार्यकारण सिद्धांत की आधारभूमि ही तिरोहित हो जाएगी। यह कुछ उदाहरणों में स्पष्ट दिखता है, जब छोटे बच्चे अपनी आयु से अधिक ज्ञान ता कौशल धारणकरते हैं। कुछ उदाहरण अनुभूतियों में भी उतरते हैं। कर्मफल सिद्धांत पर संदेह करना नहीं बनता। संदेह कर भी लें और फिर भी उस पर विश्वास करें तो भी लाभ ही है, क्योंकि यह नैतिकता के लिए बहुत आवश्यक है। बाहरी विधिजन्य नैतिकता उतनी असरकारी नहीं है। १४/११/२३ अनंत रूपी अस्तित्व प्रकट होने के कारण व्यक्ति अलग या विलक्षण होने के सौंदर्य का सदा आकांक्षी बना रहता है। कुछ भी उपलब्ध हो, उसे उसमें या उससे फिर अलग होने का सुख दिखायी देने लगता है। यह अस्तित्व के अनंत होने के कारण है। वह सदा और प्रतिक्षण नये नये रूप में व्यक्त होता रहता है, व्यक्ति इसे लेकर चमत्कृत हो जाता है। व्यक्ति को कुछ तो अवश्य मिलता ही है दुनिया में आकर, वह मिला हुआ कुछ ही बड़ा चमत्कारी है, फिर वह चमत्कारों की भूलभुलैया में खोया रहता है। अगर वह इसमें खो न जाये, बेहोश न बना रहे, जाग्रत दशा में रहे तो आनंद को उपलब्ध हो जाता है। फिर वह स्थायी हो जाता है और उसका हर सुख और हर दुःख उस आनंद में पर्यवसित होने लगता है। १८/११/२३ साक्षी भाव या ऑब्सर्व्ड माइंड अहंकार से रहित होने की दशा है। यह संसार में रहने की सर्वोत्तम दशा है। इससे आगे तथाता अवस्था है, जिसमें व्यक्ति काष्ठवत् या लोष्ठवत् हो जाएगा। सा काष्ठा सा परमगति। उस दशा में रहकर संसार का निर्वाह नहीं हो पाएगा। पर यह अंतिम और प्राप्य दशा है। संसार में जब तक हम हैं, साक्षी दशा में रहें। साक्षी भाव में रहना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। जितनी देर हम अ साक्षी होकर रहते हैं, उतनी देर भगवान से विलग रहते हैं। जितनी देर भगवान से विलग रहेगे, उतने समय अहंकारी होकर रहेंगे। सुविधा और मानसिक स्थिति को देखते हुए अहंकार को महात्माओं ने दो प्रकार से विभाजित किया है। एक अहं से व्यक्ति पर कर्ता भाव आच्छन्न रहता है, दूसरे में व्यक्ति का कर्तृत्व विलीन होकर वह ईश्वर मय हो जाता है। अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥ आगे, जब यह दूसरे प्रकार का अभिमान भी विगलित हो जाये तो फिर अस्तित्व है या नहीं, इसका भी बोध नहीं रहेगा। यह बोध रहित, अव्यक्त और आदिम अवस्था है। यहाँ कल्पना और यथार्थ एक हो जाते हैं। व्यक्त दशा में ही लीला है, करुणा है, शांति, प्रेम और आनंद है। अव्यक्त दशा अगोचर, अनाविल और अनिर्वचनीय है। 22/11/23 प्रकाश भी पीड़ा ही है, क्योंकि वह उसी से होकर आता है। इसीलिये सत्व में भी नहीं रहना। अव्यक्त से निष्पन्न होने वाला तत्व मात्र अग्राह्य है। तत्व से होकर गुजरना अवश्य पड़ता है, अतत्व होने के लिए। होने के लिए भी क्या, वही तो अंतिम गति है तत्व की। एक नशा तारी होता रहता है, लोग कहते हैं यह सीधापन है, इसका कुटिलजन अनुचित लाभ उठाते हैं, उन्हें क्या पता यह आनंद और आह्लाद के उस सरोवर में रहना है, जिसमें हम सराबोर रहकर करुणामय हो जाते हैं। २३/११/२३ अगर कोई इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा का उदय नहीं होता तो ऐसी इच्छा स्वीकार्य है। त्रयोदशी क्या है.... सृष्टि के भीतर सृष्टि, स्थिति, संहार और तुरीय- ये चार अवस्थाएँ हैं. इसी प्रकार स्थिति और संहार - इनमे भी प्रत्येक में ये चारों अवस्थाएँ रहती हैं. इस प्रकार सब मिलाकर बारह शक्ति या देवी के खेल दिखलाई पड़ते हैं. ये बारह शक्तियाँ जिस महाशक्ति से निकलती हैं तथा जिनमें लीन होती हैं उन्ही को त्रयोदशी कहते हैं. वस्तुतः यह त्रयोदशी सबमें अनुस्यूत तुरीय के साथ सम्मिलित भासा के सिवा और कुछ नहीं है. आलेख - 'तांत्रिक पूजा का परम आदर्श' महमहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज २३/११/२१ की फ़ेसबुक पोस्ट २४/११/२३ गुरुदेव ने कहा है अपने जीवन के उद्यान में प्रतिदिन किसी आध्यात्मिक पुष्प की अपेक्षा न रखें। इसलिए प्रतिदिन दैनंदिनी नहीं लिखी जा पाती है। जिन दिनों में कुछ आशीर्वाद पाया, उनमें से जो लिखना संभव हुआ, वही पुष्प इस दैनंदिनी में आये हैं। यह पुष्प सुबासित हों, यह भी आवश्यक नहीं, पर आप इन्हें देखने के अपने सुख से जुड़कर और उन पर अपनी प्रतिक्रिया देकर सुबास अवश्य भर सकते हैं। दैनंदिनी के किसी किसी दिन एक से अधिक अलग अलग प्रकार की अनुभूतियां आई हैं। भावशबलता के कारण अथवा आगे वे अनुभूतियाँ हम भूल न जाएँ, उस मोह से एक दिन की दैनंदिनी में पृथक पृथक् भाव अनुस्यूत हुए हैं। श्रीमद्भागवतम का सार है दशम स्कंध के पूर्वार्ध के रास पंचध्यायी के वे पाँच अध्याय, जिनमें महारास का वर्णन एक अपूर्व साहित्यिक कौशल और भावोद्रेकी दशा में हुआ है। इस वर्णन की भाषा को समाधि भाषा और संध्या या संधा भाषा कह सकते हैं। समाधि में जाए बिना केवल कला प्रदर्शन के लिए इस प्रकार के भाव और शैली नहीं बन सकती है। संध्या में समय के दो अंतरालों का मिलन होता है। लौकिक संसार और पारलौकिक जगत् के आनंद को समेटे हुए इन अनुभूतियों को कश्मीर में संध कहा जाता है, संध का अर्थ संधि नहीं, जो संध्या में समझा जाता है, अपितु उसका अर्थ है संधान या खोज। यह खोज करते करते व्यक्ति खो जाता है, खोने से पूर्व जानने योग्य विषय जान लिया जाता है, पर उस तत्व को अज्ञेय ही कहना पड़ता है, क्योंकि वह पूरा नहीं जाना जा पाता। अंतरालों में यह खोज हो पाती है, प्राणायाम भी अंतराल में रहकर ही किया जाता है। मध्यम प्रतिपदा बुद्ध दर्शन का सूत्र है। मध्य में रहना, असाध्य वीणा में अज्ञेय दिखाते हैं, जो बुद्ध ने कहा कि हम वीणा के तारों को इतना न खींचें कि वे टूटने लगे। और इतना ढीला भी न छोड़ें कि उनसे स्वर न उत्पन्न हो। बिटवीन द लाइंस का महत्व एक पाठक के लिए सर्वाधिक है, वह अंतराल तुरीयावस्था है, जो सर्वत्र होते हुए भी दिखाई नहीं देती, परंतु असर उसी का सब अवस्थाओं पर रहता है। रास पंचध्यायी में सबसे प्रमुख गोपी गीत है। गोपी गीत भागवतम का सर्वस्व है, इस गोपी गीत में भी बीज शब्द देखना हो तो वह है ध्यानमंगलम्। यहीं से सब कुछ दिखना प्रारंभ होता है। यही हमारे जीवन का ध्येय है। Lord Make Me an Instrument of Thy Peace( प्रभु मुझे अपनी शांति का एक साधन बनायें) सेंट फ़्रांसिस २५/११/२३ संसार अगर निर्वाह करना हो तो उसकी शून्यता का अनुभव करना ही होगा। अन्यथा भटकते रहेंगे। शून्यता का अनुभव करने के बाद उसकी पूर्णता प्रतीत होने लगेगी। उससे पहले अधूरापन लगता रहेगा। उर्ध्वे बिंद्वावृतिर्दीप्ता तत्र पद्मं शशिप्रभम्। शांत्यतीतः शिवस्तत्र तच्छक्त्युत्संगभूषितः॥ तंत्रालोक ८/३२ बिंदु अनंत सूचक है। पंक्ति का अंत सुनिश्चित है। पंक्ति बिंदु में पर्यवसित होती है। बिंदु में सब सम्मिलित है। पंक्ति में मात्र पंक्ति है। पंक्ति में बिंदु उपस्थित अवश्य है, और वह हर क्षण मौजूद है। पंक्ति शक्ति है और बिंदु शिव है। शक्ति गति है, शिव मौन है। संसार पंक्ति है, मौन बिंदु है। संसार शक्ति है और मौन शिव है। २६/११/२३ महाकाली का लौकिक विज्ञान ******************************** महाकाली रूप को भयानक असुर विनाशक माना जाता है। क्यूँ ? काली नाम ध्यान आते लगता है अब तो कोई असुर नहीं बचेगा और काली आती भी हैं और सभी असुरों को मार देती हैं। रक्तबीज जैसे असुरों को भी मार दिया। रक्तबीज अर्थात उसका रक्त जहाँ जहाँ गिरता था था वहाँ वहाँ रक्त से असुर उत्पन्न हो जाते थे। परन्तु काली रूप असुर को भी मारती हैं और रक्त से उत्पन्न होने वाले सभी असुरों को भी मार देती हैं। काली हैं कौन ? काली पार्वती जी की एक अवस्था हैं ,पार्वती ही क्रोध में काली बन जाती हैं। पार्वती कौन हैं ? पार्वती जी एक आध्यात्मिक साधिका हैं ,महादेव को पाने निकली हैं ,सिर्फ पाना ही नहीं उनसे विवाह करना है उन्हें। पहले जब साधना कर रही थीं तब उन्हें चण्ड मुंड परेशान कर रहे थे अर्थात चाह मोह (चाह अंधे = चण्ड ,मोह अंधे = मुण्ड ) परेशान कर रहे थे जिन्हें उन्होंने दुर्गा रूप से मारा अब और असुर परेशान कर रहे हैं ये असुर कोई भौतिक देहधारी असुर नहीं हैं ये आध्यात्मिक असुर हैं। आध्यात्म मन में उत्पन्न होता है अतः ये असुर भी साधिका अर्थात पार्वती जी के मन में उत्पन्न हो रहे हैं। ये असुर कह रहे हैं यह ले आ , वह ले आ इससे साधिका की साधना बाधित हो रही है अतः साधिका काली रूप धरती है और कहती है "का ली " क्या लूँ ,क्या लूँ..... का ली ? क्या लिया जाय ,इस संसार में महादेव के सिवा कुछ भी पाने योग्य नहीं है। जब मन में ऐसा भाव आता है अर्थात काली रूप आता है तो समस्त असुर जो कह रहे थे यह ला वह ला स्वतः ही मर जाते हैं। अतः काली रूप भयानक असुर विनाशक है ,काली भाव समस्त इच्छाओं का नाश कर देती है जिससे धरती पर जीवन ही प्रभावित हो सकता है ,लोग जीने की इच्छा ही छोड़ देंगे यदि उनमे कोई इच्छा ही न हो तो अतः लोग मरने लगेंगे और सृष्टि ही समाप्त होने लगेगी अर्थात महादेव ही मरने लगेंगे तभी महादेव को उनके पाओं के नीचे दिखाते हैं जिससे उन्हें अनुभव होता है नहीं नहीं सभी इच्छाओं को नहीं मारना है ,यदि सभी इच्छाओं को मार दिया (अर्थात सभी असुरों को मार दिया ) तो महादेव ही संकट में आ जायेंगे अतः उन्हें अपराध बोध होता है और जीभ बाहर निकल आती है। अतः काली का पांव महादेव पर दिखाते हैं तब वो शान्त होती हैं। तो काली रूप लगभग सभी इच्छाओं का नाश है इससे मन में उत्पन्न होने वाले सभी असुर मरने लगते हैं। असुर जो मन को परेशान करते हैं यह ले आ यह बड़ा अच्छा है ,वह ले आ वह बड़ा अच्छा है और काली कहती हैं का ली ? क्या लिया जाय। जब मन में भाव उत्पन्न किया कि कुछ भी लेने योग्य नहीं तब ये मन के असुर स्वतः ही मर गए। परन्तु सबको न मारो ,जीवन ही नष्ट हो जायेगा ,जीने का उद्देश्य ही मिट जायेगा। यह संसार कुछ न कुछ पाने की इच्छा से ही बना हुआ है ,यदि कुछ भी पाने की इच्छा रोक दोगे तो संसार ही समाप्त हो जायेगा। महादेव काली के पैर के नीचे आ जायेंगे । अचानक काली को बोध होता है समस्त इच्छाएं छोड़ने पर तो महादेव (अर्थात उनकी सृष्टि ) ही संकट में आ जायेंगे अतः पश्चाताप में जीभ बाहर निकल आयी। समस्त इच्छाओं को न मारो ,कुछ आवश्यक इच्छाओं को जीवित रहने दो। यदि धरती के सारे लोग नंगे रहने लगें तो करोड़ों लोग जो कपडे के धंधे से जुड़े हैं भूंख से मर जायेंगे। अतः कपड़े की इच्छा को नियंत्रित करो ,अत्यधिक महंगे कपड़े के पीछे न भागो पर कपडे पहनने की इच्छा को न मिटाओ। हमारी परस्पर इच्छाओं से इस संसार में रोजगार उतपन्न हो रहा है जिससे हम सब जी रहे हैं हाँ ऐसा न हो कि इतनी इच्छाएं पाल लो कि वो इच्छाएँ महादेव की साधना ही न करने दें। काली का अर्थ है सभी इच्छाओं को मारना जिससे सभी प्रकार के रोजगार नष्ट हो सकते हैं अतः उनकी कमर पर कटे हाथों की माला है।रोजगार नष्ट होना अर्थात हाथ काट देना। इच्छाओं को मिटाओ नहीं नियंत्रित करो ,साधना भी बाधित न हो संसार भी चलता रहे। गले में नर मुंड की माला है अर्थात इस रूप के कारण लोग मरने लगे, जब सभी लोग सभी इच्छाएँ मिटा देंगे तो रोजगार नहीं रहेंगे ,रोजगार नहीं रहे अर्थात हाथ काट गये ,लोग मरने लगे अतः गले में नर मुंड की माला। चरणों में महादेव का आ जाना यह भी दर्शाता है, कि मन के सभी असुर न मारो , महादेव तमोगुणी सृष्टि का निरूपण भी करते हैं ,तमोगुण में ही असुर जन्म लेते हैं। सबको न मिटाओ। अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन मन की गति और उसकी वक्रता ध्यान के दौरान स्पष्ट देखी जाती है। आँखें बंद हैं, पर मन चलता जा रहा है, नहीं रुक रहा, सरपट भाग रहा, फिर आँख खोली तो मन में चल रहे दृश्य स्वप्नवत् तिरोहित और अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित। जी हाँ! जो काम आँख बंद करने पर प्रायः होता है, वह आँख खुले होने पर भी होता है। आँख खुले होने पर संसार का आकर्षण प्रत्यक्ष हुआ रहता है, उसमे विचलन बढ़ा रहता है, पर यही विचलन आँख बंद करने पर भी होता रहता है, ध्यान में तब वह विचलन आँख खोलने पर जाता रहता है। ध्यान करने के बाद संसार में रहने पर स्वरूप में प्रतिष्ठित रहने की स्थिति जब तब याद आती रहती है। किसी कठिनाई में तो अक्सर। आपका क्रोध और लिप्सा न्यूनतम हो जाता है। 27/11/23 उत्तर से दक्षिण तक कार्तिक परंपरा के कतिपय सूत्र... दक्षिण भारत में प्रत्येक माह को मासिक कार्तिगाई का व्रत रखा जाता है और दीप जलाकर भगवान कार्तिकेय और शिव को प्रसन्न किया जाता है। कार्तिकेय को मरुगन भी कहते हैं। हिंदी क्षेत्र में ये गणेश के बड़े भाई स्वामी कार्तिक नाम से जाने जाते हैं। कार्तिक दीपम को कार्तिकेय के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।इस पर्व को ब्रह्मोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ तो शिवने ज्योति स्तंभ रूप में प्रकट होकर दोनों से इसके प्रारंभ और अंत को खोजने को कहा था। कार्तिगाई दीपम पर भगवान शिव के इसी ज्योति स्वरूप का पूजन किया जाता है। हर माह जब भी कृतिका नक्षत्र आता है तब यह पर्व मनाया जाता है। कृतिका नक्षत्र के नाम पर ही इसका नाम कार्तिगेय रखा गया है। कार्तिकाई तिपम तमिल लोगों द्वारा मनाए जाने वाले सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। शिव ने अपनी तीसरी आंख से कार्तिकेय (मुरुगन) को बनाया , या उनके छह प्राथमिक चेहरे (तत्पुरुषम- छुपी हुई कृपा का चेहरा, अघोरम- विनाश का मुख, सद्योजातम- सृष्टि का चेहरा, वामदेवम- संरक्षण/उपचार/विघटन/कायाकल्प का चेहरा, ईशानम्- द फेस ऑफ रिवीलिंग ग्रेस और अधोमुखम- द फेस ऑफ़ कंसीलिंग। ऐसा माना जाता है कि ये छह चेहरे छह बच्चों में बदल गए, और उनमें से प्रत्येक को छह कार्तिक अप्सराओं (शिव, संभूति, प्रीति, सन्नति, अनसूया, और क्षमा) द्वारा पाला गया, इन्हें दुला, नितातनी, अभ्रयंती, वर्षयंती मेघयंती, और चिपुनिका के नाम से भी जाना गया है। बाद में यह अप्सराएँ उनकी मां पार्वती में विलीन हो गईं । इन छह अप्सराओं को कार्तिक नक्षत्र बनाने वाले छह सितारों के समूह का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है । जैसा कि छह अप्सराओं ने बच्चे के पालन-पोषण में मदद की थी, कहा जाता है कि शिव ने छह अप्सराओं को अमरता प्रदान की। इन छह सितारों की की गई कोई भी पूजा स्वयं मुरुगन की पूजा के बराबर मानी जाती है, और इसलिए ये शैवों के लिए पवित्र हैं। कार्तिक पूर्णिमा से ठीक पहले के पाँच दिन भीष्म पंचक कहे जाते हैं। कार्तिक नहान करने वाली स्त्रियाँ और बहनें इन पाँच दिनों में और कठिन व्रत करती हैं। किरकिचियाँ उक्त अप्सराओं और मुरूगन या कार्तिकेय के छः रूप हैं। कश्मीर शैवों में षड्कंचुक होते हैं, जो अंतस्थ वर्णों य र ल एवं व मातृका वर्णों से व्यक्त होते हैं। यह कंचुक कतकारियों की किरमिचियाँ ही हैं। इस प्रकार कतक्यारियों के यहाँ तमिल और समूचे दक्षिण भारत की ढाई हज़ार वर्ष पुरानी परंपरा से लेकर धुर उत्तर में स्थित कश्मीर की परंपरा मिलती है। कार्तिक माह की यह समृद्ध परंपरा की सूत्रबद्धता चतुर्दिक भारत में विद्यमान है। कार्तिक शुक्ल एकादशी तुलसी शालग्राम विवाह का दिन है। कुशध्वज की पुत्री तुलसी हरि की परम भक्त थी, उनका विवाह जलंधर नाम के दैत्यगुणी राजा से हुआ, जो जल में निवास करने वाले समस्त जलचर प्राणियों पर अपना आधिपत्य जमाता था, इसे लेकर देवता परेशान हुए। वे जलंधर को युद्ध में उसकी हरिभक्त पत्नी के तप के कारण शंकर के साथ मिलकर भी नहीं हरा पाये तो भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु ने जलंधर का छलरूप धारण कर तुलसी के सतीत्व को स्खलित करने की कोशिश की और तब जलंधर को पराजित किया जा सका। पर तुलसी ने विष्णु को शाप दिया कि इस छल के कारण तुम पत्थर हो जाओगे। तब से विष्णु शालग्राम के रूप में पूजे गए हैं। नेपाल की गंडकी नदी में उनका वास होगा। विष्णु ने तुलसी को पौधे के रूप में बन जाने का प्रतिशाप दे दिया, पर यह वरदान भी दिया कि इस पत्र के बिना हमें (हरि को) नैवेद्य स्वीकार नहीं होगा। बैकुंठ में तुलसी सदा विष्णु के साथ रहती हैं। कार्तिक पूर्णिमा सिख धर्म के लिए भी बहुत महत्व का दिन है। इस दिन सिखों के प्रथम गुरु गुरुनानक का जन्म हुआ। सिख यानि शिष्य, यह शिष्य का धर्म है, जो अपने गुरुग्रंथ और उसकी बानियों से चलता है। यह दिन देव दीपावली या छोटी दिवाली के रूप में भी मान्य है। १९९९ में सद्गुरू ने इसी दिन दुनिया को ध्यानलिंग अर्पित किया। कार्तिक पूर्णिमा के दिन, पहाड़ी पर (तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई या अरुणाचलम शिखर, जिस पर रमण महर्षि रहे हैं और श्रीलंका के कोणेश्वरम मंदिरों में) एक विशाल अग्नि दीपक जलाया जाता है, जो आसपास कई किलोमीटर तक दिखाई देता है। अग्नि (दीपम) को महादीपम कहा जाता है। बहिरंतः स्फुरज्ज्योतीरत्न कुंभ प्रदीपवत्। स्वप्रकाशात् यथैवैकं स्वरूपमात्मनस्तथा॥ Just as a big lamp kept inside a vessel made of precious stones illumines by its light both outside and inside, so also the one Self illumines (everything). यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् । स्पंद कारिका में कहा गया है: यस्मात्सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात्।
तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः॥३॥
तस्माच्छब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न या शिवः।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः॥४॥Because (yasmāt) the individual soul (jīvaḥ) is identical (mayaḥ) with all (sarva) since all entities arise (sarva-bhāva-samudbhavāt) (from him, and) inasmuch as he has the feeling or perception (pratipattitaḥ) of identity (tādātmya) (with those entities) due to the knowledge (saṁvedanarūpeṇa) of them all (tad), therefore (tasmāt), there is no (na) state (sā avasthā) that (yā) is not (na) Śiva (śivaḥ), (whether) in word (śabda), object (artha) (or) thought --cintā-- (cintāsu). The experient (bhoktā) himself (eva), always (sadā) (and) everywhere (sarvatra), remains (saṁsthitaḥ) in the form (bhāvena) of the experienced (bhogya)||3-4|| (jaideva) - Since the limited individual Self is identical with the whole universe, inasmuch as all entities arise from him, and because of the knowledge of all subjects, he has the feeling of identity with them all, hence whether in the word, object or thought, there is no state which is not Siva. It is the experient himself who, always and everywhere, abides in the form of the experienced i.e. it is the Divine Himself who is the essential Experient, and it is He who abides in the form of the universe as His field of experience. यदुक्तं श्रीविज्ञानभैरवे यत्र यत्र मनो याति बाह्ये वाभ्यन्तरे प्रिये।
तत्र तत्र शिवावस्था व्यापकत्वात्क्व यास्यति॥ (११६) Chanakya Neeti - Chapter 13 - Shlok 13 देहाभिमाने गलितं ज्ञानेन परमात्मनि । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥ जो आत्म स्वरुप का बोध होने से खुद को शरीर नहीं मानता, वह हरदम समाधि में ही रहता है भले ही उसका शरीर कही भी चला जाए. ग्राह्य-ग्राहक-सम्बन्धे ........सामान्ये सर्वदेहिनाम्। योगिन:सावधानत्वं ........ यत् तदर्चनमात्मन:।। .. -योगवासिष्ठ आशय यह है कि ग्राह्य(ग्रहण करने योग्य-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध गुणों)का ग्राहक(ग्रहण करने वाली --कर्ण,त्वचा, नेत्र,जिह्वा और नासिका इन्द्रियों)से जो सम्बन्ध है-वह सभी जीवों में एक सा होता है। परमाणुओं का मूल स्थान जैसे सूर्य है , वैसे ही अणुओं का मूल स्थान वही चन्द्र है । परमाणु योगनिद्रा में पतित होकर अणुओं के संसर्ग से अपने उज्जवल भाव और आत्मबोध को आच्छन्न कर लेता है । वास्तव में चित् - रूप इस भूमि में आकर जड़ के वेष्टन से घिरकर सुप्तवत और आत्मविस्मृत हो जाता है । जीवभाव का उदय वस्तुतः यहीं होता है । बहुत से लोग जिसे कारणदेह कहते हैं , चैतन्य के साथ उसका योग यहीं होता है । इसके बाद योगनिद्रा से परमाणु मातृगर्भ में प्रवेश करता है । जीवत्व जा आवेष्टन उसके साथ ही रहता है । इस प्रकार जीव काया सम्पन्न नहीं हो सकने से परमाणु के लिए मातृगर्भ में प्रविष्ट होना कठिन है । मातृगर्भ में मनोमय आवरण से वेष्टित होकर प्राण का अंश अणु सम्बद्ध रूप में प्रविष्ट होता है और वहाँ माता पिता के देहांश द्वारा अर्थात रज - वीर्य से पुष्ट होकर क्रमशः परिणत अवस्था में गर्भ से बाहर होता है । खण्डमाता मोहमाया स्वरूप है । जीव योगनिद्रा से मोहमाया में आश्रय लेता है और मातृगर्भ से प्रसव के बाद बाहरी जगत में आता है यह कालरात्रि का राज्य है । साधक और योगी पृष्ठ 8 इस प्रकार , यह देखने में आता है कि प्रत्येक मनुष्य का विश्लेषण करने से उसमें कई पृथक पृथक अंशों का पता चलता है -- परमाणु , मन , अणु और काया । अणु एवं काया से काल का घनिष्ठ संबंध है । अणु स्वरूपतः एक होने पर भी कार्यतः विभिन्न प्रकार का है । जिस अणु को जीव अपने साथ लाता है और जो प्रत्येक जीव में जीवत्व का सम्पादक है , उसकी संख्या उननचास 49 है । वायु उननचास हैं , इसीलिए अणु भी उननचास हैं । इन अणुओं की समष्टि जीव के जीवत्व -सम्पादक अंतरतम कोष - रूप में विद्यमान रहती हैं । साधक और योगी // पृष्ठ 8 शाक्तों के अनुसार - यं वायु बीज पाप पुरुष का शोषण रं अग्नि बीज पाप पुरुष का दहन वं जल बीज रेचन या प्लावन लं पृथ्वी बीज- जिसमें पाप पुरुष भस्मीभूत किया जाता है। फिर महदादि क्रम से दिव्य देह का निर्माण होता है। २८/११/२३ The universe does not speak any language, it speaks frequency. शान्तितुल्यं तपो नास्ति ,तोषान्न परमं सुखम् । नास्ति तृष्णापरो व्याधि: ,न च धर्मो दया पर: ।। -विदुर नीति शान्ति के समान कोई तप नहीं है । संतोष के समान कोई सुख नहीं है । तृष्णा के समान कोई व्याधि नहीं है । दया के समान कोई धर्म नहीं है । २९/११/२३ "Think of God all the time. You must not let your life run in the ordinary way; do something that nobody else has done, something that will dazzle the world. Show that God's creative principle works in you. Making others happy, through kindness of speech and sincerity of right advice, is a sign of true greatness."--- Paramhansa Yogananda-- ब्रह्मचर्य है सदा संभोगी होना। शिव शक्ति साहचर्य जैसे। प्रत्यक्ष में भी निर्माण और ध्वंस साथ साथ चलता हुआ दिखता है पोर पोर में, कण कण में। जो मनुष्य के प्रजनन अंगों तक सीमित रहकर ब्रह्मचर्य समझता है, वह एकांगी दृष्टि का शिकार है। अन्यथा तो बारिश भी ईश्वर के वीर्य की भाँति लगती है, जिसका पृथ्वी के गर्भ में निश्चेषन होता है और हम सब जीवन पाते हैं। कुमार ही मूल है। कुमार का अर्थ खेलना है, या 'कू' का अर्थ माया की स्थिति हो सकता है जो अंतर की भावना लाता है और मारी का अर्थ वह हो सकता है जो नष्ट कर देता है, अर्थात, जो माया की शक्ति को फैलने नहीं देता है। कुमारी (कुंवारी) वह है जो हमेशा भोक्ता की स्थिति में रहती है, भोक्ता को कभी भी दूसरों द्वारा आनंद नहीं मिलता है। कुंवारापन एक रहस्य है। रहस्य का उत्तर खोजना होता है उसमे रहकर, कोई बताएगा तो सीधे उतरेगा नहीं। कुंवारापन या ब्रह्मचर्य एक समस्या नहीं, जिसका समाधान हो, यह एक रहस्य है, जिसे जीकर उपलब्ध हुआ जाता है। इसका अर्थ किसी व्यभिचारी वृत्ति से न लगाया जाए। व्यभिचार तो मन की यायावरी है, इससे जितने जल्दी बाहर आ जाएँ, उतना अच्छा। कामवासना बड़ी ही निर्दयी है!* *जो मरे को भी मारती है* 🔥 कृशः काणः खञ्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो व्रणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः॥ क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककपालार्पितगलः शुनीमन्वेति श्वा! हतमपि च हन्त्येव मदनः॥ _~ ऋषि भर्तृहरि, श्रृंगार शतकम (63)_ काना, लंगड़ा, कनकटा और दुमकटा कुत्ता, जिसके शरीर में अनेक घाव हो रहे हैं, दुर्गन्ध का ठिकाना नहीं है, घावों में हजारों कीड़े पड़े हैं, जो भूख से व्याकुल हो रहा है और जिसके गले में ज़ंजीर पड़ी हुई है, वासना में अँधा होकर कुतिया के पीछे-पीछे दौड़ता है। धर्म का सार दान है और दान का मूल है प्रेम। प्रेम का अर्थ है निरहंकार। दान का अर्थ है जीवन को बाँटो। दान का कोई अनिवार्य संबंध धन से नहीं है। दान का संबंध जीवन की एक शैली से है। जीवन को सिकोड़ो मत, फैलाओ। जीवन की प्याली से दूसरे की प्याली में जितना रस बाहर, बहने दो।कृपण न हो।हंसी दे सकें, हंसी दो। नाच दे सको नाच दो। आलिंगन दे सकते हो, आलिंगन दो। किसी का हाथ हाथ में लेकर बैठ सकते हो और उसे राहत मिलेगी तो राहत दो। किसी के दुःख में रोओ, दो आंसू गिराओ। किसी की ख़ुशी में नाचो, मगन हो जाओ। यह सब दान है। दान की अनंत संभावनाएँ हैं। उक्त रीति से किए गये दान में ज़बरदस्ती नहीं होती। ऐसे किया गया दान हमें प्रफुल्लित करता है। ३०/११/२३ कंदुक क्रीड़ा का खेल आज ध्यान के बाद उतरा। हम गेंद हैं, विश्व भी एक गेंद है। विश्व की आकृति भी कंदुकवत् ही है। इस कंदुक से भगवान और उनके सखा खेल रहे हैं। किंतु वे इसकी रक्षा भी कर रहे हैं। गेंद अगर कालियनाग के राज्य में पहुँच गई है तो भी वहाँ से निकाल लाते हैं। यह गेंद खेलने के लिए बनी है। परवाह क्या कि यह कहाँ गिरती है, जहां वह गिरेगी, गोपों पर अनुग्रह और उनके आग्रह से वह निकाल लाएँगे। फ़िक्र क्या करनी! बस खेलते जाएँ, खिलते जाएँ। खिलना यानि खेल का उपकरण बनना है। तभी पुष्प आएँगे, प्रेम का उदय होगा। शांति छाएगी, करुणा बरसेगी, आनंदमग्न होंगे। 🙏मंत्र' का अर्थ होता है मन को एक तंत्र में बांधना। यदि अनावश्यक और अत्यधिक विचार उत्पन्न हो रहे हैं और जिनके कारण चिंता पैदा हो रही है, तो मंत्र सबसे कारगर औषधि है। हम जिस भी ईष्ट की पूजा, प्रार्थना या ध्यान करते हैं उसी के नाम का मंत्र जपा करें।।🙏 डॉ इंदुशेखर उपाध्याय

Tuesday, October 31, 2023

अक्टूबर २३

१/१०/२३ यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।

योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।6.19।। जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए यतचित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।। परमार्थसार दर्पण बिंबे यद्वन् नगरग्रामादि चित्रमविभागि। भाति विभागेनैव च परस्परं दर्पणं च॥१२ विमलतम परम भैरव- बोधात् तद्वद् विभागशून्यमपि। अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत्॥ १३ One sloka-in this, there are two Slokas-one sloka is the example, and the other sloka is the actual state of Parabhairava, how the actual state of Parabhairava is existing. And, for this, he gives an example. Darpana bimbe yadvat. Take an outside mirror, keep the mirror in your room here, darpana bimbe, and see-but keep well-cleaned mirror-nagaragramadi citram avibhagi, nagar-gram, whatever is reflected in it, you see everything is reflected in the mirror, which is only two feet by two feet-two feet length and two feet height, bas,only this much-and inthis [mirror, will feel the reflection of this house, the reflection of that house, the reflection of those trees, big trees, the reflection of everything, whatever you . . . it is reflected on this. Citram me [that the various reflections are] not put in one ball there [in the mirror], because the dimension of this mirror is only two feet howo feet. [The actual objects that are reflected] can't come in two feet by two feet. It seems separate; bhâti vibhagenaiva ca, and it seems separate. Nacaya etat dharmanasya prasyato yujyate. You can't [understand even] after investigation what has happened to this, hiw these trees seem to exist away from the [surface] of the mirror, back [i.e., behind the mirror]. But, after investigating what it he back, there is nothing, There is nothing. Only distance seen, distance is observed. And, at the same time, there is also no weight in this [reflection]. For instance, a big tree trunk been] reflected in this mirror. If the weight of the m i r r o r was one kilo, after the reflection of this tree of a hundred kilos, it does not create .. . JONATHAN: Extra weight. SWAMIJI: .. . extra weight. [The mirror remains] the same weight. [Otherwise] you couldn't move [the mirrorl; then you couldn't move it [laughter]. Dharmano'pi achalasyat, he has said Abhinavagupta has said, that dharmano 'pi achalasyat, you could not move it! In weight also, [the mirror remains] the same weight. It is only one kilo. So this is the glamour of reflection. [The reflections] are separate from each other and separate from the mirror also what[ever] is reflected in this. This is an example. Now, the main thing which is to be understood: In the same way, vimalatama-parama-bhairava- bodhätt a t u a d vibhāga-sünyam-api /1 3 a [repeated] In the same way, that which is absolutely most pure, the purest element, i.e., Parabhairava (Parabhairava is the purest element of the supreme mirror), and in that supreme mirror, which is the purest element of Bhairava, in that Bhairava, vibhaktamajagad eat, [all of] this from Siva to prthur (earth), all of this universe, you perceive that universe absolutely separate from Bhairava, from that mirror, from Parabhairava. It [seems] absolutely separate from Parabhairava. And not only that. It is separate from each other; prthur (earth) is separated from jala (water),jala is separated from agni (fire), agni is separated from vayu(wind), vayu is separate, akasa (ether) is separate,the antahkaranas (mind, intellect, and ego) are separate, sabda (sound), sparsa (touch), rüpa (form), rasa (taste), and gandha (smell) a r e separate; prakrti, prthur, jala, and maya, sud- dhavidya, isvara, and sadâsiva are all separate. Vibhaktamäb- hati, in the same way, this whole universe shines in the mirror of Parabhairava. "Just as in a clear mirror, varied images of city, village etc. appear as different from one another and from the mirror though they are non-different from the mirror, even so the world, though non-different from the purest consciousness of Parama Siva, appears as different both in respect of its varied obiects and that Universal Consciousness.' जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिम्बित प्रतिबिम्ब दर्पण से किसी भी प्रकार भिन्न नहीं होते, बल्कि दर्पण और एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देते हैं, उसी प्रकार ये आभास पराशिव या सार्वभौमिक चेतना से भिन्न नहीं होते हुए भी भिन्न प्रतीत होते हैं। अथवा इस प्रकार सार्वभौम चेतना के दर्पण में प्रतिबिम्बित संपूर्ण विश्व ऐसा प्रतीत होते हुए भी उससे भिन्न नहीं है। उक्त विवेचन के बाद अब बृहदारण्यक उपनिषद के इस श्लोक ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ का अर्थ ग्रहण हो पाएगा। २/१०/२३ महात्मा गांधी सदा सत्य बोले, उस पर चले और उसी के कारण एक दिन उनकी हत्या भी हुई। गांधी के सत्य से कोई सहमत या असहमत हो, पर उन्होंने जिसे सत्य समझा, उस पर वे आजीवन चलते रहे। उनका सत्य किसी के आड़े नहीं आता था। सत्य किसी के आड़े आता भी नहीं, कोई सत्य के आड़े खूब आ जाए। यह भी सही है कि आड़े खूब कोई आ जाए, अंततः सत्य ही भासमान होता है। भारत के राष्ट्रीय पर्व के रूप में गांधी जयंती उनकी ७५ वर्ष पूर्व हुई मृत्यु के बाद भी मनाई जा रही है। गांधी ने अहिंसा को परमधर्म स्वीकार किया, वास्तव में अहिंसा ही सत्य की रक्षक और प्रकाशक होती है। लोग ईश्वर को सत्य कहते हैं, उन्होंने सत्य को ही ईश्वर समझा। उन्होंने स्वच्छता का संदेश दिया, इसे भी उन्होंने मन, वचन और कर्म से करके दिखाया। सत्याग्रह का मारक अस्त्र प्रदान किया। स्वावलंबन का मार्ग दिखाया। यह सब ऐसे दाय हैं, जो कभी फीके नहीं पड़ेंगे। जयंती पर उन्हें नमन🌹🌹 “Truth resides in every human heart, and one has to search for it there and to be guided by truth as one sees it. But no one has a right to coerce others to act according to his own view of truth.” — Mahatma Gandhi परं परस्थं गहनाद् अनादिम् एकं निविष्टं बहुधा गुहासु। सर्वालयं सर्व चराचकस्थं त्वामेव शंभुं शरणं प्रपद्ये॥ ४/१०/२३ आख़िर लोक का भी कोई पाथेय होता है, श्रीविद्या उस पाथेय की प्राप्ति के लिए सहायक है। नाम कुछ भी लें, श्री विद्या, आत्मविद्या, ब्रह्मविद्या; लोकालोकगमन के लिए ही हैं, लोक और इन विद्याओं में कोई परस्पर विरोध नहीं, अपितु एक संगति ही है। ध्यानमंगलम् viharanam cha te dhyaana Mangalam Your intimate pastimes with us (viharanam), and Your loving talks with us in solitary places fills our hearts with pain. viharanam means ‘a special kind of theft.’ The Sanskrit verb hå means ‘to steal.’ According to this specific definition, viharanam refer to stealing the heart. In this connection viharanam also denotes ‘to walk with friends’ and ‘to walk with a lady.’ In this instance, Krishna casually walks along with His friends, and His walking like this is only to show His desire to meet with them. He ambles along, nonchalantly resting one hand on the shoulder of a friend and twirling a lotus in the other. In this way, He intentionally pulls at their hearts. Seeing this, they lose awareness of everything else and thus become mad with love. Dyaana is ‘Meditation’.  The Gopis’ remembrance is not like a yogi’s meditation. When they remember Krishna, they forget everything else. Whatever they are doing, whether it is walking, talking or cooking, they are always immersed in sahaja-samädhi, a natural, deep absorption in Sri Krishna. The word sahajäyate means ‘to come naturally, from birth.’ Their full absorption in anything related to Krishna comes automatically and naturally. They never come out of samädhi; they simply go deeper and deeper into it. Their samädhi deepens when they see Krishna, and it further deepens as they remember Him when He is out of sight. विराट पुरुष हजारों साल पहले भारत की मेधा ने विराट-पुरुष की संकल्पना की थी >.. जो सहस्रशीर्ष है , सहस्रनेत्र है , सहस्रबाहु है , सहस्रपाद है ।उसमें कोटि-कोटि युगों का अन्तर्भाव है ।विभिन्न जाति, वर्ग, वर्ण , धर्म आदि उसके हाथ-पैर, नाक-कान -आंख ,पेट इत्यादि अंग-प्रत्यंग हैं परन्तु वे सभी अंग अविच्छिन्न हैं और एक-दूसरे के लिये हैं । वे सब के लिये सब हैं ।इस >सब < के बीच जो नाम-रूप का भेद और असमानता है, वह दृश्यमान है, तात्विक नहीं ।उसकी एकात्मसत्ता ही सर्वजन सत्ता है , जिसे हम लोक कहते हैं । व्यक्ति, वर्ग, राज्य आदि आज हैं किन्तु लोक कल भी था , आज भी है और कल भी रहेगा ॥ वह निरन्तरता है । ६/१०/२३ पितृदेवो भव! परमहंस योगानंद द्वारा लिखित विश्व-प्रसिद्ध पुस्तक *“योगी कथामृत”,* मूल अंग्रेजी पुस्तक Autobiography of a Yogi का हिन्दी अनुवाद है। इसमें परमहंस योगानन्द कहते हैं कि *मेरे गुरुदेव परमसमाधि लेने के बाद एक दिन रक्त- मांस के (दिव्य) शरीर में मेरे सामने प्रकट हुए।उन्हें देखकर मैं हर्षोन्मत्त हो उठा।उनके पूछने पर गुरुदेव ने कहा कि मैंने महाव्योम परमाणुओं से ठीक उसी प्रकार के नये शरीर की सृष्टि की है। तुम्हारी दृष्टि में यह रक्त- मांस का भौतिक शरीर है, यद्यपि मेरी दृष्टि में सूक्ष्म है।* उन्होंने आगे कहा कि जिस प्रकार कर्मभोग में सहायता करने के लिए महापुरुषों को पृथ्वी पर भेजा जाता है, उसी प्रकार मुझे एक सूक्ष्म जगत् में त्राता के रूप में कार्य करने के लिए ईश्वर से आदेश मिला है।उस जगत् का नाम हिरण्यलोक है। *पृथ्वी पर मनुष्य भौतिक इन्द्रियानुभूतियों से युक्त रहता है।सूक्ष्म पुरुष चैतन्य भावनाओं और प्राणकणिकाओं (Lifetrons) से निर्मित शरीर लेकर कार्य करता है।* उस जगत् के निवासी एक ग्रह से दूसरे ग्रह की यात्रा के लिए सूक्ष्म वाहनों या आलोक पुंज का उपयोग करते हैं। ये साधन विद्युत या तेजसक्रिय (रेडियोधर्मी) शक्तियों से भी अधिक द्रुतगति वाले हैं। परमहंस योगानंद के गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरी महावतार बाबा के प्रत्यक्ष शिष्य लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे, जिन्होंने प्रत्यक्षदर्शी गुरु के रूप में विभिन्न लोकों का विस्तार से वर्णन किया है। इससे यह प्रमाणित होता है कि *सूक्ष्म शरीरधारी जीव अनेक लोकों में गमन करता है।उसके उर्ध्वगमन के अनेक माध्यम हैं। किसी मनुष्य को स्वयं ही अपने जीवन में स्थूल से होकर सूक्ष्म और कारण जगत् की यात्रा कर लेनी चाहिए। कोई अगर ऐसा नहीं कर पाता तो उसे अपनी संतति से ऐसी उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे यह यात्रा कराएंगे। किंतु संतति को अपने पितरों के प्रति श्रद्धा भाव अवश्य रखना चाहिए। पितर किसी भी रूप में मौजूद हो सकते हैं। इसलिए श्रद्धा के उदय से व्यक्ति अंतर्यामी होकर परम् विस्तार को उपलब्ध हो जाता है। श्रद्धा और विश्वास के बिना अंतःकरण में मौजूद ईश्वर का दर्शन नहीं किया जा सकता। संतति यदि आत्मदर्शन कर ले तो उसके पितर अपनी संतति के लिए दोष नहीं दे सकेंगे, क्योंकि पितर संतति के आत्म के बाहर नहीं हैं। असल बात आत्मदर्शन की है। इसके बिना कोई चारा नहीं। पितरों की वासना बिना उन्हें भोगे क्षीण कैसे हो और संतति यदि वासना और भोग के मूल में सन्निविष्ट हो जाये तो पितरों की वासना पूरी कैसे हो! यह एक यक्ष प्रश्न है। इस दृष्टि से पूरे जगत् की दो ही कोटियाँ हैं- एक पितरों की और दूसरी उसकी संतति की। एक वसन की और दूसरी निर्वसन की। पितृदेवो भव! ८/१०/२३ विराट शब्द भंडार को ज्ञान समझने की भूल न करें। यदि एक एक श्लोक को धीरे धीरे समझकर आत्मसात किया जाए तो धर्मशास्त्र अंतरानुभूति की इच्छा को प्रेरित करने की दृष्टि से लाभकर होते हैं, अन्यथा अनवरत बौद्धिक अध्ययन से मिथ्याभिमान, झूठा संतोष और अपरिपक्व ज्ञान से अधिक कुछ और प्राप्त नहीं होता। स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि जी। पीड़ा के माध्यम से प्रकाश का उदय होता है, इसीलिए संतजन पीड़ा को गर्हित और वर्जित नहीं, अपितु आवश्यक मानते हैं। कुंती ने कृष्ण से सदा दुःख पाने की बात कही, जिससे वे कृष्ण को कभी न भूलें। सुख में जो प्रकाश उदय हो सकता है, उसे हम प्रायः भूल जाते हैं। जिनके भीतर सुखावस्था के दौरान प्रकाश फैला रहता है, वे उस सुख को भी दुःखरूप ही ग्रहण करते रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हम सुविधाओं को त्याज्य कहकर एक निर्वासित जीवन बिताने लगें। हमें बस सुख के पीछे के दुःख को विस्मृत नहीं करना है। फिर सुख में हम पाथेय को याद करते रहेंगे। जर्मनी के दार्शनिक कांट का अपने नौकर को निर्देश था कि रात दस से चार के बीच नहीं उठाना, भूकंप आये तो भी। एक रात साढ़े ग्यारह बजे तार आया कि उन्हें कुलपति नियुक्त किया गया है, नौकर फूला न समाया, उसने सोचा भूकंप के लिए न जगाने के लिए कहा था, उसने इमैनुअल कांट को उसी समय जगा दिया। कांट को यह नागवार गुजरा, उन्होंने उसे चाँटा मारा और फिर सो गए। सुबह नौकर से कहे, और फिर नियुक्ति प्राधिकारी को लिखे कि ऐसी चीज के प्रति सतर्क रहो, जो तुम्हें भ्रमित कर दे। जिसने केवल नियुक्ति मात्र से रात की नींद भंग कर दी हो, उस काम में कितना उद्वेलन न होगा। उन्होंने कुलपति पद लेने से अस्वीकार कर दिया। ९/१०/२३ श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं ऐसे में श्राद्ध को लेकर अजीब अजीब बातें सुनने को मिलती हैं कोई इसे अंधविश्वास बोलता है तो कोई श्रद्धा, कोई कौओं को पूर्वज बोलता है तो कोई पूर्वजों को छोड़ जीवित माता पिता पर ध्यान देने को कहता है, तर्क कोई भी हों फिर वे भले पक्ष में दिए जाएं या विपक्ष में परन्तु इनसब में असली बात कहीं छूट ही जाती है। अगर आप चाहो तो अपने जिंदा पड़ोसी को भी श्राद्ध जैसी किसी प्रक्रिया से लाभ पहुंचा सकते हो पर हम ऐसा नहीं करते, यह किसी खाते पीते व्यक्ति को ग्लूकोज की इंट्रा वेनस ड्रिप लगाने जैसा होगा जिसकी उसे जरूरत नहीं है, पर ऐसा किया जरूर जा सकता है, क्योंकि उस इनसान के पास पहले से एक शरीर है और शरीर मे होना भर काफी है कर्मों को खत्म करते रहने के लिए, वह इनसान अनेक अनुभव सुख दुख रोग आदि भोग कर अपने कर्म स्मृति अनुभवों को खत्म करता रहेगा और साथ ही साथ कुछ कर्म इकट्ठे भी करेगा पर चूंकी अभी वह सक्षम है तो हम किसी की जीवन प्रक्रिया के साथ कोई छेड़खानी नहीं करते हैं। चूंकि एक जीवित व्यक्ति के पास एक शरीर होता है तो ऐसे में उसके पास मौका है कि वह खुद को अशांति से मुक्त कर ले परन्तु शरीर छूट जाने के बाद बात इतनी आसान नहीं रह जाती, आपके अंदर चित्त परिवर्तन कर सकने की क्षमता शरीर छोड़ने के साथ ही नष्ट हो जाती है, ऐसे में जो भी आप अनुभव कर रहे हो उसे आप बस भोग सकते हो परन्तु अपनी इच्छा से उसमें कोई परिवर्तन आप नहीं कर सकते ऐसे में अगर अशांति अधिक हो तो अगला शरीर मिलना मुश्किल हो जाता है औऱ ऐसे में दिवंगत की प्रवर्ति नुकसान पहुचाने की रही हो तब उस ऊर्जा का नकारात्मक प्रभाव पहले उस ऊर्जा से जुड़े व्यक्तियों पर ही होगा। अगर कोई व्यक्ति ध्यान करता है तो यह प्रयोग करके देखा जा सकता है कि किसी दिन चित्त अशांत हो तो शांत बैठ कर अपने गुरु या मित्र से ऊर्जा ग्रहण करने पर मिनिटों में मनःस्तिथि में परिवर्तन कर सकता है, अशांति और अवसाद का सीधा सा मतलब है कि प्राण ऊर्जा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है बस पितरों के लिए भी यही सिद्धांत काम करता है और इस एनर्जी ट्रांसमिशन का माध्यम बनती हैं कुछ सामग्रियां और प्रक्रियाएं, एक जीवित व्यक्ति चाहे तो कुछ प्रक्रियाओं द्वारा अशांत जीव को प्राण ऊर्जा प्रेषित कर सकता है जिससे उस जीव के कुछ कर्म जल जाएंगे और वह पहले से थोड़ी बेहतर स्तिथि में होगा, बाकी कर्मानुसार जो यात्रा उसे करनी है वह तो करनी ही पड़ेगी, यह ऐसा है कि आपका कोई रिश्तेदार जनरल का टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गया है तो आप उसके लिए खाने पीने का इंतजाम कर दो जिससे उसे असुविधा कम से कम हो। यानी श्राद्ध द्वारा वह भोजन किसी तक नही पहुचता और न ही किसी दिवंगत के पसन्द का भोजन बनाने से कुछ होने वाला है असली बात है प्राण ऊर्जा की कि उसे आप कितनी अच्छी तरह से प्रेषित कर सकते हो, यदि आप कोई शक्तिशाली साधना रोज कर रहे हो तब आपके बिना कुछ करे ही आपके अशांत पितरों को इस ऊर्जा का भाग मिल जाता है। यह सब विज्ञान के नियमों की तरह ही काम करता है बस फर्क इतना है कि आप इसे बाहरी रूप से गणितीय सिद्धांतों के द्वारा सार्वजनिक रूप सिद्ध नहीं कर सकते क्योंकि सब लोगों की ग्रहणशीलता वैसी नहीं होती। आपके सम्पर्क में आने वाली हर वस्तु आपकी विशिष्ट ऊर्जा से युक्त हो जाती है जैसे कपड़े, वस्तुएं आदि, लोग अभिचार आदि ऊर्जा के दुरुपयोग ऐसे ही करते हैं, तो ऐसे में आप जिस कुल में पैदा हुए हो तो उस कुल की ऊर्जा से आपका अस्तित्व प्रभावित रहता ही है बस ऐसे में ध्यान यह रखना है कि ऊर्जा और कर्मों की इस साझेदारी का ऋण आपके ऊपर न चढ़े । जहां तक कौओं की बात है तो किसी के पितर कौए बन कर नहीं आते, जिन्हें उस कष्टकारी अवस्था से मुक्ति के लिए बाहरी सहायता चाहिए वे इतने समर्थ नहीं होते कि कुछ बन कर आ सकें, पितरों की ऊर्जा से युक्त अन्न को कौओं और गायों को खिलाने का उद्देश्य कुछ अलग होता है, ये दोनों ही जीव अति नकारात्मक ऊर्जा से युक्त भोजन नहीं करते, अगर आपने इन्हें वह अन्न खिलाना चाहा और इन्होंने वह नहीं खाया तो इसका अर्थ है कि पितर बहुत अधिक अशांति में हैं तो ऐसे में आपको उन्हें ऊर्जा प्रेषित करने हेतु अतिरिक्त श्रम करना पड़ेगा। लोग बोलते हैं कि जिन देशों या समुदायों में श्राद्ध नहीं होते तो उनके यहां क्या पितृ दोष नहीं होते फिर हम क्यों ये सब करें ? तो बात यह है कि जब अस्पताल आदि नहीं थे स्वास्थ्य सुविधाएं कम थीं जीवन तब भी चलता था, नजर के चश्मों के आविष्कार से पहले भी लोगों को दृष्टि दोष होता था तो वे बस इसे झेलते थे, तो बस बात इतनी है कि आपके पास एक सुविधा है अब ये आपके ऊपर है कि आप इसका उपयोग करो या न करो, बाहर देशों में खासकर यूरोप में भयंकर नकारात्मक जगहें आज भी हैं, लोग उनसे प्रभावित भी होते हैं पर जीवन चलता रहता है, लोग अशांत बने रहते हैं पैसे कमाते हैं और जैसे तैसे जीवन काट लेते हैं उनमें से कुछ अतिरिक्त विकल्पों को भी चुनते हैं, बस इतनी सी बात है। तो श्राद्ध का अर्थ बस पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति अपनी श्रद्धा भर व्यक्त करना नहीं है, सही से की जाए तो यह अनेआप में एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है जीवन के उस पार के आयाम को सहायता पहुचाने की, और पितर केवल पितृ लोक में फस कर ही नही रहते उनमें से अधिकांश पुनर्जन्म ले लेते हैं और कुछ उच्च लोकों में भी पहुंचते हैं जो वास्तव में उल्टे आपके लिए सहायक हो सकते हैं बाकी जो अक्षम हैं उनकी सहायता तो एक सभ्य समाज के तौर पर हमें अवश्य करनी चाहिए। केवल भौतिक शरीर और विचारों को स्वयं मान लेना यानी जीवन के एक बड़े भाग से अनिभिज्ञ रह आधा अधूरा जीवन जीना, दरसल हम अपने अस्तित्व अपने वजूद के एक महत्वपूर्ण भाग को बहुत बुरी तरह से भुला बैठे हैं इसलिए हमें श्राद्ध या पूजापाठ या तो केवल परम्परा भर लगती है या फिर अंधविश्वास, हम अपने बाकी क्रिया कलाप जैसे काम पर जाना, पार्टी करना, इलाज करवाना आदि को परम्परा या अंधविश्वास नहीं मानते क्योंकि ये चीजें हमारे अपने अनुभव में हमारे शरीर और मन के द्वारा आसानी से आजाती हैं, पर हम शरीर और मन से परे भी बहुत कुछ हैं, हमारी हालात ऐसी है जैसे कोई अंधा प्रकाश के आस्तित्व को विश्वास या अंधविश्वास में वर्गीकृत कर दे, यहां यह दोनों ही विकल्प गलत होंगे, यह न तो श्रद्धा है और न ही अंधविश्वास, हम अपने अस्तित्व के ऊर्जा आयाम के प्रति अंधे हो चुके हैं और इसीलिए हमें जीवंत अनुभव को छोड़ मान्यताओं की बैसाखियों की आवश्यकता महसूस होती है। ~ अनिरुद्ध ११/१०/२३ राम नाम की खूँटी गाड़ी सूरज ताना तंता। चढ़ते उतरते दम की ख़बर ले फिर नहीं आना बनता॥ Meaning - Erect the loom of Ram's name, The sun its fibers & threads, Be aware of your breath which is arising and passing, You won't be coming back again. अलिफल्ला चंबे दी बूटी मेरे मुर्शिद मन बिच लाई हू। नफ़ी अस्बात द पानी मिल्या हर रगे हरजाई हू। अंदर बूटी मुश्क मचाया जान फुलन ते आई हू। जीवे मुर्शिद कामिल बाहू जे बूटी मन लाई हू। "माला जपूँ ना कर जपूँ ,मुख से कहूँ ना राम राम हमारा हमें जपे है , हम पायो विश्राम ।" -कबीर साहब हद हद करते सब गए बेहद गयो न कोई अरे अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोये हद हद जपे सो औलिये, बेहद जपे सो पीर हद अनहद दोनों जपे सो वाको नाम फ़कीर १३/१०/२३ अर्थ के तल पर कोई अभिव्यक्ति शब्द को खोलती हुई सर्वथा निर्दोष और निरापद नहीं हो सकती। उसमें कई अर्थ व्यंजित होंगे। इसमें सही और ग़लत जैसा निर्णय नहीं निकल पाता। पर कोई योगी जब कुछ व्यक्त करता है तो वह दर्पण की भाँति होता है, जिस्में अपना आत्म दिख जाता है। अपना आत्म देखने की ही हर किसी को आवश्यकता है। यही ओशो के कथन का आशय है, जिसमें वे ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी के बारे में अपना मंतव्य व्यक्त कर रहे हैं कि योगी की आत्मकथा हो ही नहीं सकती, क्योंकि वह तो समग्र होता है, उसे व्यक्त किया ही नहीं जा सकता। १४/१०/२३ पितृपक्ष अनुपस्थित की उपस्थिति है। अस्तित्व के बाद का काव्यात्मक नैरन्तर्य । एक डोर जो टूटती नहीं, एक धारा जो अजस्र है। जो नहीं रहे, वे रहते हैं। वे प्रतीक्षा करते हैं। वे आते हैं। देह नहीं रहती । सम्बन्ध रहते हैं। कर्त्तव्य रहते हैं। अपेक्षाएँ रहती हैं। जीवन के बाद एक लोकोत्तर जीवन रहता है। प्यास रहती है। जल रहता है। आशुतोष दुबे https://cinemanthan.com/2013/10/14/tumekgorakhdhandha/ १५/१०/२३ ईसा मसीह यहूदी थे और यहूदियों ने ही उन्हें कठोरतम यातनाएँ देकर सलीब पर लटकाकर मार दिया। यहूदियों और ईसाइयों का यही झगड़ा है। ईसा मसीह को मारने के पाप से यहूदी तभी मुक्त होंगे, जब ईसा मसीह के संदेश को वे धारण करेंगे। किंतु जब अरबों या इस्लाम से उनका झगड़ा होता है तो यहूदी और ईसाई एक हो जाते हैं। यही कारण है कि अत्यंत सीमित संख्या में होने के बाद भी इज़राइल के यहूदियों के साथ समूची ईसाई दुनिया खड़ी रहती है। इसके पीछे ईसाइयों की एक और धारणा है कि ईसा का जन्म एक बार और यरूशलम में ही होगा, जिससे पूरी ईसाईयत स्वर्ग में पहुँच जाएगी। यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों एक ही देवदूत इब्राहिम से निकले अलग अलग संप्रदाय हैं। इन्हें सामी धर्म कहा गया है। इब्राहिम के पुत्र इस्माइल या इशाक के पैर से आबे जमज़म का झरना फूटा, जो इस्लाम के अनुयायियों के लिए गंगाजल के समान है। इब्राहिम के बाद अलग अलग कबीलों में बंटे समाज को पहले ईसा मसीह ने और फिर पैग़म्बर मोहम्मद ने इकट्ठा किया। ईदुलज़ुहा इन तीनों धर्मों में अपनी अपनी तरह से मनायी जाती है। फ़िलिस्तीन की जगह इन तीनों धर्मों के लिए भगवान की जन्मभूमि के समान महत्व रखती है, इसलिए इज़राइल और फ़िलिस्तीन का संघर्ष कभी समाप्त होता नहीं दिखता, जिसका जब ज़ोर होगा, वह वहाँ कब्ज़ा करना चाहेगा। यही अब तक वहाँ के इतिहास में होता आया है। किंतु इस ज़मीन के क़ब्ज़े से स्वर्ग पहुँचने की मान्यता खोखली है। ईसाई लोग इस झगड़े से थोड़ा दूर रहते हैं, इसलिए वे अपना उत्थान करते आये हैं। आज वे दुनिया में सर्वाधिक हैं और सबसे अधिक शक्ति धारण करते हैं। यहूदी ईसाइयों के पूर्वज हैं। वे भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सबसे पहले और फिर ७० ईसवी से आकर यहाँ रह रहे हैं। भारत को वसुधैव कुटुंबकम् का नेता और विश्व गुरु यूँ ही नहीं कहा गया है। यहूदियों को सबसे पहले मिस्र से मोसेस के समय से निर्वासित किया गया है। यहूदियों का अस्तित्व बना रहना आवश्यक है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे संप्रदाय की क़ीमत पर ऐसा करना पड़े। यरूशलम की उस भूमि पर सात परिक्रमा का बड़ा महत्व है, यह सात की संख्या सनातन धर्म में विशेष स्थान रखती है। यह सांकेतिक और रहस्यात्मक संख्या और तौर तरीक़े हैं, इन्हें मात्र उस ज़मीन में ही देखने से बचना चाहिए। सभी संप्रदायों का जब योग होगा, तब वास्तव में धर्म का उदय होगा। यह धर्म सनातन है। मेधा ऋषि राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य को भगवती की महिमा बताते हुए मधु कैटभ वध का प्रसंग सुनाते हैं। देवी भगवती महिषासुर की सेना और उसका वध करती हैं। फिर भगवती घोषणा करती है- जो मुझे संग्राम में जीत लेगा, मेरा दर्प दूर करेगा, मेरे समान बलवान होगा, वही मेरा भर्त्ता होगा। अतः शुम्भ या निशुम्भ कोई भी आकर मुझे जीतकर पाणिग्रहण कर ले”- “यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्प व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्त्ता भविष्यति।। इसके बाद भगवती शुंभ निशुंभ के सेनानी धूम्रलोचन, चंड और मुंड, रक्तबीज, निशुंभ एवं शुंभ आदि असुरों का संहार करती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि मनुष्य के विकार रूप बड़े - बड़े असुर भी सूर्य, चंद्र और अग्नि नेत्र रूपा भगवती को परास्त नहीं कर सकते। मां के साथ सहचर हुआ जा सकता है बस, शिव बनकर। कथा के अनुसार देवी के वरदान से यह सुरथ (यानि अच्छे रथ पर सवार) क्षत्रिय ही सावर्णि (यानि स (उस) वर्ण के) मनु हुए। नवरात्रोपासना के उपरांत जब दस रथ की सवारी करके अर्थात् दशद्वार से उत्पन्न राम की चेतना मनुष्य में जाग्रत होती है तभी रावण जैसे महा असुर का संहार होता है। इनमे से किसी पात्र को इतिहास और जाति में मत खोजिए। यह सब हर मनुष्य के भीतर उपस्थित अंतर्द्वंद्व हैं. वैश्य उदर चेतना तो क्षत्रिय कर्म चेतना को अभिव्यक्त करने वाले वर्ग हैं। मंत्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी । यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ॥ आप सबको नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएँ... १७/१०/२३ संकल्प कामनाओंका कारण है और कामना संकल्पोंका कार्य है। संकल्प और कामना--ये दोनों कर्मके बीज हैं। संकल्प और कामना न रहनेपर कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् कर्म बाँधनेवाले नहीं होते। विषयोंका बार-बार चिन्तन होनेसे, उनकी बार-बार याद आनेसे उन विषयोंमें 'ये विषय अच्छे हैं, काममें आनेवाले हैं, जीवनमें उपयोगी हैं और सुख देनेवाले हैं'--ऐसी सम्यग्बुद्धिका होना 'संकल्प' है और 'ये विषय-पदार्थ हमारे लिये अच्छे नहीं हैं, हानिकारक हैं'--ऐसी बुद्धिका होना 'विकल्प' है। ऐसे संकल्प और विकल्प बुद्धिमें होते रहते हैं। जब विकल्प मिटकर केवल एक संकल्प रह जाता है, तब 'ये विषय-पदार्थ हमें मिलने चाहिये, ये हमारे होने चाहिये'--इस तरह अन्तःकरणमें उनको प्राप्त करनेकी जो इच्छा पैदा हो जाती है, उसका नाम 'काम' (कामना) है। कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें संकल्प और कामना--दोनों ही नहीं रहते अर्थात् उसमें न तो कामनाओंका कारण संकल्प रहता है और न संकल्पोंका कार्य कामना ही रहती है। अतः उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं, वे सब संकल्प और कामनासे रहित होते हैं। त्यागी शोभा जगतमें करता है सब कोय।
हरिया गृहस्थी संतका भेदी बिरला होय।। नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।। हनुमानजी ने कहा- आपका नाम रात-दिन पहरा देने वाला है, आपका ध्यान ही किवाड़ है। नेत्रों को अपने चरणों में लगाए रहती हैं यही ताला लगा है, फिर प्राण जाएं तो किस मार्ग से? शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषाम् निधान- मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् । देवि त्रयी भगवती भवभावनाय वार्ता च सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री ॥ शब्दात्मिका = शब्दों की आत्मा सुविमलर्ग्यजुषाम् सुविमल ऋग् यजुषाम् = अत्यंत निर्मल ऋग्वेद और यजुर्वेद निधानम् = निधि, खजाना उद्गीथ रम्यपद पाठवतां = उद्गीथ के मनोहर पदों के पाठों च = और साम्नाम् = सामवेद देवि = देवी त्रयी = त्रयी (तीनों वेद ) भगवती = भगवती हैं भवभावनाय = संसार के पालन के लिए वार्ता = वार्ता (खेती और आजीविका ) च = और सर्वजगतां = सारे संसार की परम आर्तिहन्त्री= पीड़ाओं को हरने वाली हे देवी आप अत्यंत निर्मल ऋग्वेद और यजुर्वेद के शब्दों की आत्मा उद्गीथ के मनोहर पदों के पाठों और सामवेद का खज़ाना ,संसार के पालन के लिए वार्ता (खेती और आजीविका ), सारे संसार की पीड़ाओं को हरने वाली त्रयी (तीनों वेद ), भगवती हैं । १८/१०/२३ Ana Means -> In Breathe Apana Means -> Out Breathe Sati Means -> Be with it as one. In the begining, before the world was created, was HE, who is the WORD. HE was near to GOD and in everything equal to god. From the begining he was with GOD. Through HIM everything was created; nothing was created without HIM. In all created things he was the life, and for the people HE was the light. The light shines in the darkness, and the darkness has not been able to extinguish is. (Gosple of John, 1,1-5 ) "In the beginning PTAH spoke words, und the world was created.....Thus Ptah was satisfied after he had made all things and all divine words. " (Antique nubian stone-board with hyroglyphs.) (Prajapati vai idam agre asit tasya vak dvitiya asit vak vai param brahma ) or : "In the begining was Prajapati. With HIM was VAK (the WORD), and VAK was verily the highest Brahman."(Rig Veda) Ann.: In Hinduism the Sabda or pranava is the highest origin of the Mantras. शब्द साउंड को कह सकते हैं। अव्यक्त से साउंड या स्वर निकला, उससे फिर वर्ण बना, अक्षर हुआ, फिर पद और आगे वाक्य। शब्द भाषा नहीं है, भाषाएं अलग अलग हैं, क्योंकि उस अनंत रूप शब्द को हम समग्र में ग्रहण नहीं कर पाते हैं, पर भाषाओं के मूल में शब्द ही हैं। शब्द सृष्टि का मूल है। शब्द प्रकाश है, जिसके आलोक में छवियां तिरती हैं। इन छवियों को हम अर्थ कहेंगे। शब्द और उनके अर्थ अलग अलग दिखने का कारण है मूल शब्द, जो अनंत रूप व्यक्त हो रहा है। कोई सिरा पकड़ें, मूल तक जा सकते हैं। है सिरा पूर्ण है, जिसमे वह पूर्व उपस्थित है और पूर्ण ही व्यक्त हो रहा है। अनंत का हर अंश पूर्ण है, उसके किसी अंश में विरोध नहीं है। बस उनमें विरोधाभास होता है। अनंत के अंश व्यक्त ही क्यों होते हैं, क्या वे खंड खंड होने को अभिशप्त हैं, नहीं। वह परम तत्व अनंत में व्यक्त होकर लीला विनोद कर रहा है, इस लीला का सहभागी होकर हमें उसी लीला स्वभाव से रहना है। दुर्गा सप्तशती का आध्यात्मिक विज्ञान *************************** श्री दुर्गा सप्तशती के सात सौ मन्त्र ब्रह्म की शक्ति चण्डी के मंदिर की सात सौ सीढियाँ है, जिन्हें पारकर साधक मंदिर में पहुँचता है। मार्कण्डेय पुराणोक्त 700 श्लोकी श्री दुर्गा सप्तशती मुख्यतः 3 चरित्रों में विभाजित है- 1. प्रथम चरित्र ( मधु-कैटभ-वध) 2. मध्यम चरित्र ( महिषासुर वध) 3. उत्तम चरित्र (शुम्भ-निशुम्भ-वध) ये तीनो चरित 3 प्रकार के कर्म संस्कारो या वासनाओं - 1.सञ्चित 2.प्रारब्ध 3.भविष्यत् अथवा तीन गुणों - 1.सत्व 2.रज 3. तम अथवा तीन ग्रंथियों - 1.ब्रह्म ग्रन्थि 2. विष्णु ग्रन्थि 3. रूद्र ग्रन्थि के प्रति न केवल हमारा ध्यान आकर्षित करते है अपितु एक सुंदर कथा के माध्यम से इनके मूल में हमारा प्रवेश भी करा देते है और जैसे ही मनुष्य उक्त तीनो के मूल में पहुँचता है, वैसे ही वह ब्रह्म की शक्ति भगवती चण्डिका के मन्दिर अर्थात सान्निध्य में पहुँच जाता है। सप्तशती के 700 श्लोक रुपी सीढियाँ ब्रह्म की शक्ति भगवती चण्डिका के पास पहुँचने के माध्यम है। श्री दुर्गा सप्तशती के तीनों चरितो के विनियोग से ही इस विषय का स्पष्ट आभास होता है। प्रथम चरित (मधु कैटभ वध) के ऋषि ब्रह्मा है। जिस मन्त्र के जो प्रथम द्रष्टा होते है, वे ही उस मन्त्र के ऋषि होते है। इस प्रकार "मधु कैटभ वध" रुपी प्रथम चरित के मन्त्रो के प्रथम द्रष्टा श्री ब्रह्मा है। "मधु-कैटभ-वध" अथवा "सतो गुण" का प्रलय विराट मन में ही संघटित होता है। मन के ही द्वारा सृष्टि होती है। विराट मन ब्रह्मा है और यही विराट मन अर्थात सृष्टि कर्ता ब्रह्मा प्रथम चरित के प्रथम दर्शक है। कथा में भी ऐसा वर्णित है कि ब्रह्मा ही मधु कैटभ वध के प्रथम कारण है।"महाकाली" देवता है। प्रलयंकारी तामसी शक्ति के अंक में ही सत्त्वादि गुणों का अवसान होता है। "गायत्री"- छंद है। प्राण का प्रवाह अथवा स्पंदन ही छंद कहलाता है। "प्रथम चरित" में प्रविष्ट साधक का प्राण स्पंदन ठीक वेद- माता गायत्री के समान होता है, इसीलिए इसका छंद गायत्री है। नन्दा या ह्लादिनी इसकी शक्ति है- यह विष्णु की शक्ति है जिसके द्वारा विष्णु ने "मधु कैटभ का वध" किया था। रक्त दन्तिका अर्थात परा-प्रकृति का रक्त- वर्णात्मक रजो- गुणात्मक चित्त ही इसका बीज है। रजो गुण की क्रियाशीलता द्वारा ही सतो गुण का लय होता है। अग्नि या तेजस तत्व में ही सभी भावो का लय होता है, अतः अग्नि ही इसका तत्व है। अग्नि या तेजस से ऋक या वाक् का आविर्भाव होता है। अतः ऋग्वेद इसका स्वरुप है। महाकाली प्रीत्यर्थे अर्थात प्रलयंकारी तामसी मूर्ति में साधक की प्रीति या आसक्ति के लिए ही प्रथम चरित का पाठ रूप कार्य अथवा विनियोग है। क्रमशः ..... दुर्गा सप्तशती का आध्यात्मिक विज्ञान - २ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※ गतांक से आगे... मध्यम चरित ( महिषासुर-वध) के ऋषि विष्णु है। जिस समष्टि प्राण के कारण यह विराट ब्रह्माण्ड स्थित है, वे ही विष्णु है। रजो गुण का बहिर्मुख विक्षेप रूप "महिषासुर" इसी महाप्राण के अंक में विलय को प्राप्त होता है, अतः विष्णु ही मध्यम चरितके द्रष्टा या ऋषि है। "महालक्ष्मी" देवता है। लक्ष्मी प्राण शक्ति का दूसरा नाम है। जब तक देह में प्राण शक्ति विराजित रहती है, तभी तक हम सबके नामो के आगे लक्ष्मी का दूसरा पर्याय श्री शब्द प्रयुक्त होता है। व्यष्टि प्राण शक्ति का नाम लक्ष्मी है एवं समष्टि प्राण शक्ति का नाम महालक्ष्मी है। यह ब्रह्म की शक्ति भगवती चण्डिका की रजो-गुणात्मिका महती शक्ति है। इन्ही के द्वारा विषयासक्ति रूप विक्षेप नियंत्रित अथवा निहत होता है।इसलिए "महालक्ष्मी" ही मध्यम चरित की देवता है। उष्णिक इसका छंद है। इस चरित में प्रविष्ट साधक का प्राण प्रवाह उष्णिक नामक छन्द के समान स्पन्द युक्त होता है। शाकंभरी मध्यम चरित की शक्ति है। शाकम्भरी के संबंध में श्री दुर्गा सप्तशती में माँ स्वयं कहती है -- ततो$हमखिलं लोकमात्म-देह-समुद्भावै:। भरिष्यामि सुरा: शकीरावृषटे: प्राण धारकै:।। शाकम्भरीति विख्यातिं, तदा यास्याम्यहं भुवि । अर्थात जगत में एक ऐसा समय आयेगा जब अनावृष्टि से अर्थात ब्रह्म रस धारा के अभाव में जीव गण अतिशय दुखित और संतप्त हो पड़ेंगे, जब स्थूल जगत आत्म रस को खोज नहीं पायेगा, आत्मा को जगदातीत कह कर पूर्ण रूप से बहिर्मुखी हो जाएगा, तब मेरा आविर्भाव शाकंभरी मूर्ति में होगा। यह विश्व ही हमारा देह है, इसे जीव गण को समझा दूंगी । विश्व का प्रत्येक पदार्थ प्राणमय है, एक मात्र चैतन्य वस्तु ही इस विश्व का उपादान है, यह उस समय जीव गण सहज ही अनुभव करने लगेंगे। एक मात्र सर्व व्यापी चैतन्य शक्ति को खोज कर ही तब मनुष्य स्वयं को पुष्ट कर सकेंगे। शाकंभरी मूर्ति के अवतरण का यही रहस्यार्थ है। मध्यम चरित का बीज दुर्गा है। इस संबंध में भी "श्री दुर्गा सप्तशती" में स्वयं भगवती उक्त श्लोक के बाद कहती है - तत्रैव च वदिष्यामि, दुर्गमाख्यं महा$सुरम् । दुर्गा देवीति विख्यातं, तन्मे नाम भविष्यति ।। अर्थात शाकंभरी मूर्ति से ही दुर्गम नामक असुर का वध कर मैं दुर्गा देवी नाम से विख्यात होऊँगी। जो संपूर्ण दुर्गति का हरण करती है, वे ही दुर्गा है। इस प्रकार दुर्गति हरण ही मध्यम चरित का बीज या मूल कारण है। वायु तत्व अर्थात प्राणशक्ति जब आत्म प्रकाश करती है तब वायु रूप में उसकी अभिव्यक्ति होती है और वायु तत्व की अनुभूति होने पर ही यजुर्वेद रूप यज्ञ मय शब्द राशि का प्रादुर्भाव होता है। इसीलिए वायु देवता के मन्त्र से ही यजुर्वेद का आरंभ होता है। संक्षेप में महालक्ष्मी की प्रीति अर्थात महाप्राण मयी माँ के प्रति महती प्रीति प्राप्त करने का उद्देश्य ही मध्यम चरित का विनियोग है। दुर्गा सप्तशती का वैदिक विज्ञान *************************************** ब्रह्म सत्-चित् और आनन्द रूप से त्रिभाव द्वारा माना जाता है | जिस प्रकार कारण ब्रहम में तीन भाव हैं उसी प्रकार कार्य ब्रह्म भी त्रिभावात्मक है | इसीलिये वेद और वेदसम्मत शास्त्रों की भाषा भी त्रिभावात्मक ही होती है | इसी परम्परा के अनुसार देवासुर संग्राम के भी तीन स्वरूप हैं | जो दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्रों में वर्णित किये गए हैं | देवलोक में ये ही तीनों रूप क्रमशः प्रकट होते हैं | पहला मधुकैटभ के वध के समय, दूसरा महिषासुर वध के समय और तीसरा शुम्भ निशुम्भ के वध के समय | वह अरूपिणी, वाणी मन और बुद्धि से अगोचरा सर्वव्यापक ब्रह्म शक्ति भक्तों के कल्याण के लिये अलौकिक दिव्य रूप में प्रकट हुआ करती है | ब्रह्मा में ब्राह्मी शक्ति, विष्णु में वैष्णवी शक्ति और शिव में शैवी शक्ति जो कुछ भी है वह सब उसी महाशक्ति का अंश है | त्रिगुणमयी महाशक्ति के तीनों गुण ही अपने अपने अधिकार के अनुसार पूर्ण शक्ति विशिष्ट हैं | अध्यात्म स्वरूप में प्रत्येक पिण्ड में क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियों का संघर्ष, अधिदैव स्वरूप में देवासुर संग्राम और अधिभौतिक स्वरूप में मृत्युलोक में विविध सामाजिक संघर्ष तथा राजनीतिक युद्ध – सप्तशती गीता इन्हीं समस्त दार्शनिक रहस्यों से भरी पड़ी है | यह इस कलियुग में मानवपिण्ड में निरन्तर चल रहे इसी देवासुर संग्राम में दैवत्व को विजय दिलाने के लिये वेदमन्त्रों से भी अधिक शक्तिशाली है | दुर्गा सप्तशती उपासना काण्ड का प्रधान प्रवर्तक उपनिषद ग्रन्थ है | इसका सीधा सम्बन्ध मार्कंडेय पुराण से है | सप्तशती में अष्टम मनु सूर्यपुत्र सावर्णि की उत्पत्ति की कथा है | यह कथा कोई लौकिक इतिहास नहीं है | पुराण वर्णित कथाएँ तीन शैलियों में होती हैं | एक वे विषय जो समाधि से जाने जा सकते हैं – जैसे आत्मा, जीव, प्रकृति आदि | इनका वर्णन समाधि भाषा में होता है | दूसरे, इन्हीं समाधिगम्य अध्यात्म तथा अधिदैव रहस्यों को जब लौकिक रीति से आलंकारिक रूप में कहा जाता है तो लौकिक भाषा का प्रयोग होता है | मध्यम अधिकारियों के लिये यही शैली होती है | तीसरी शैली में वे गाथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं जो पुराणों की होती हैं | ये गाथाएँ परकीया भाषा में प्रस्तुत की जाती हैं | दुर्गा सप्तशती में तीनों ही शैलियों का प्रयोग है | जो प्रकरण राजा सुरथ और समाधि वैश्य के लिये परकीय भाषा में कहा गया है उसी प्रकरण को देवताओं की स्तुतियों में समाधि भाषा में और माहात्म्य के रूप में लौकिक भाषा में व्यक्त किया गया है | राजा सुरथ और समाधि वैश्य को ऋषि ने परकीय भाषा में देवी के तीनों चरित्र सुनाए | क्योंकि वे दोनों समाधि भाषा के अधिकारी नहीं थे | तदुपरान्त लौकिक भाषा में उनका अधिदैवत् स्वरूप समझाया | और तब समाधि भाषा में मोक्ष का मार्ग प्रदर्शित किया : ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा, बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति || तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्, सैषा प्रसन्ना वरदा नृणाम् भवति मुक्तये || सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी, संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी || प्रथम चरित्र में भगवान् विष्णु योगनिद्रा से जागकर मधुकैटभ का वध करते हैं | भगवान् विष्णु की यह अनन्त शैया महाकाश की द्योतक है | इस चरित्र में ब्रह्ममयी की तामसी शक्ति का वर्णन है | इसमें तमोमयी शक्ति के कारण युद्धक्रिया सतोगुणमय विष्णु के द्वारा सम्पन्न हुई | सत्व गुण ज्ञानस्वरूप आत्मा का बोधक है | इसी सत्वगुण के अधिष्ठाता हैं भगवान् विष्णु | ब्राह्मी सृष्टि में रजोगुण का प्राधान्य रहता है और सतोगुण गौण रहता है | यही भगवान् विष्णु का निद्रामग्न होना है | जगत् की सृष्टि करने के लिये ब्रह्मा को समाधियुक्त होना पड़ता है | जिस प्रकार सर्जन में विघ्न भी आते हैं उसी प्रकार इस समाधि भाव के भी दो शत्रु हैं – एक है नाद और दूसरा नादरस | नाद एक ऐसा शत्रु है जो अपने आकर्षण से तमोगुण में पहुँचा देता है | यही नाद मधु है | समाधिभाव के दूसरे शत्रु नादरस के प्रभाव से साधक बहिर्मुख होकर लक्ष्य से भटक जाता है | जिसका परिणाम यह होता है कि साधक निर्विकल्पक समाधि – अर्थात् वह अवस्था जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय में भेद नहीं रहता – को त्याग देता है और सविकल्पक अवस्था को प्राप्त हो जाता है | यही नादरस है कैटभ | क्योंकि मधु और कैटभ दोनों का सम्बन्ध नाद से है इसीलिये इन्हें “विष्णुकर्णमलोद्भूत” कहा गया है | मधु कैटभ वध के समय नव आयुधों का वर्णन शक्ति की पूर्णता का परिचायक है | यह है महाशक्ति का नित्यस्थित अध्यात्मस्वरूप | यह प्रथम चरित्र सृष्टि के तमोमय रूप का प्रकाशक होने के कारण ही प्रथम चरित्र की देवता महाकाली हैं | क्योंकि तम में क्रिया नही होती | अतः वहाँ मधु कैटभ वध की क्रिया भगवान् विष्णु के द्वारा सम्पादित हुई | क्योंकि तामसिक महाशक्ति की साक्षात् विभूति निद्रा है, जो समस्त स्थावर जंगमादि सृष्टि से लेकर ब्रह्मादि त्रिमूर्ति तक को अपने वश में करती है | दूसरे चरित्र में सतोगुण का पुंजीभूत दिव्य तेज ही तमोगुण के विनाश का साधन बनता है | महिषासुर वध के लिये विष्णु एवं शिव समुद्यत हुए | उनके मुखमण्डल से महान तेज निकलने लगा : “ततोऽपिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वद्नत्ततः, निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च |” और वह तेज था कैसा “अतीव तेजसः कूटम् ज्वलन्तमिव पर्वतम् |” तत्पश्चात् अरूपिणी और मन बुद्धि से अगोचर साक्षात् ब्रह्मरूपा जगत् के कल्याण के लिये आविर्भूत हुईं | यह है शक्ति का अधिदैव स्वरूप | यों पाप और पुण्य की मीमांसा कोई सरल कार्य नहीं है | जैव दृष्टि से चाहे जो कार्य पाप समझा जाए, किन्तु मंगलमयी जगदम्बा की इच्छा से जो कार्य होता है वह सबी जीव के कल्याणार्थ ही होता है | इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देवासुर संग्राम है | युद्ध प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया है | यह देवासुर संग्राम प्राकृतिक शृंखला के लिये इस चरित्र का आधिभौतिक स्वरूप है | सर्वशक्तिमयी के द्वारा क्षणमात्र में उनके भ्रूभंग मात्र से असुरों का नाश सम्भव था | लेकिन असुर भी यदि शक्ति उपासना करें तो उसका फल तो उन्हें मिलेगा ही | अतः महिषासुर को भी उसके ताप के प्रभाव के कारण स्वर्ग लोक में पहुँचाना आवश्यक था | इसीलिये उसको साधारण मृत्यु – दृष्टिपात मात्र से भस्म करना – न देकर रण में मृत्यु दी जिससे कि वह शस्त्र से पवित्र होकर उच्च लोक को प्राप्त हो | शत्रु के विषय में भी ऐसी बुद्धि सर्वशक्तिमयी की ही हो सकती है | युद्ध के मैदान में भी उसके चित्त में दया और निष्ठुरता दोनों साथ साथ विद्यमान हैं | इस दूसरे चरित्र में महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी की रजःप्रधान महिमा का वर्णन है | इस चरित्र में महाशक्ति के रजोगुणमय विलास का वर्णन है | महिषासुर का वध ब्रह्मशक्ति के रजोगुणमय ऐश्वर्य से किया | इसीलिये इस चरित्र की देवता रजोगुणयुक्त महालक्ष्मी हैं | इस चरित्र में तमोगुण को परास्त करने के लिये शुद्ध सत्व में रज का सम्बन्ध स्थापित किया गया है | पशुओं में महिष तमोगुण की प्रतिकृति है | तमोबहुल रज ऐसा भयंकर होता है कि उसे परास्त करने के लिये ब्रह्मशक्ति को रजोमयी ऐश्वर्य की सहायता लेनी पड़ी | तमोगुण रूपी महिषासुर को रजोगुण रूपी सिंह ने भगवती का वाहन बनकर (उसी सिंह पर शुद्ध सत्वमयी चिन्मयरूपधारिणी ब्रह्मशक्ति विराजमान थीं) अपने अधीन कर लिया | तृतीय चरित्र में रौद्री शक्ति का आविर्भाव कौशिकी और कालिका के रूप में हुआ | वस्तुतः सत् चित् और आनन्द इन तीनों में सत् से अस्ति, चित् से भाति, और आनन्द से प्रिय वैभव के द्वारा ही विश्व प्रपंच का विकास होता है | इस चरित्र में भगवती का लीलाक्षेत्र हिमालय और गंगातट है | सद्भाव ही हिमालय है और चित् स्वरूप का ज्ञान गंगाप्रवाह है | कौशिकी और कालिका पराविद्या और पराशक्ति हैं | शुम्भ निशुम्भ राग और द्वेष हैं | राग और द्वेष जनित अविद्या का विलय केवल पराशक्ति की पराविद्या के प्रभाव से ही होता है | इसीलिये शुम्भ और निशुम्भ रूपी राग और द्वेष महादेवी में विलय हो जाते हैं | राग द्वेष और धर्मनिवेशजनित वासना जल एवम् अस्वाभाविक संस्कारों का नाश हो जाने पर भी अविद्या और अस्मिता तो रह ही जाती है | यह अविद्या और अस्मिता शुम्भ और निशुम्भ का आध्यात्मस्वरूप है | देवी के इस तीसरे चरित्र का मुख्य उद्देश्य अस्मिता का नाश ही है | अस्मिता का बल इतना अधिक होता है कि जब ज्ञानी व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त करने लगता है तो सबसे पहले उसे यही भान होता है कि मैं ही ब्रह्म हूँ | उस समय विद्या के प्रभाव से “मैं” इस अस्मिता के लोकातीत भाव तक को नष्ट करना पड़ता है | तभी स्वस्वरूप का उदय हो पाता है | निशुम्भ के भीतर से दूसरे पुरुष का निकलना और देवी का उसे रोकना या इसी भाव का प्रकाशक है | निशुम्भ के साथ उस पुरुष तक को मार डालने से अस्मिता का नाश होता है | और तभी देवी के निशुम्भ वध की क्रिया सुसिद्ध होती है | यही शुम्भ निशुम्भ वध का गूढ़ रहस्य है | वास्तव में यह युद्ध विद्या और अविद्या का युद्ध है | इस तीसरे चरित्र में क्योंकि देवी की सत्वप्रधान लीला का वर्णन है | इसलिए इस चरित्र की देवता सत्वगुणयुक्त महासरस्वती बताई गई हैं | इस चरित्र के सत्वप्रधान होने के कारण ही इसमें भगवती की निर्लिप्तता के साथ साथ क्रियाशीलता भी अलौकिक रूप में प्रकट होती है | सूक्ष्म जगत् और स्थूल जगत् दोनों ही में ब्रह्मरूपिणी ब्रह्मशक्ति जगत् और भक्त के कल्याणार्थ अपने नैमित्तिक रूप में आविर्भूत होती है | राजा सुरथ और समाधि वैश्य के हेतु भक्त कल्याणार्थ आविर्भाव हुआ | तीनों चरित्रों में वर्णित आविर्भाव स्थूल और सूक्ष्म जगत् के निमित्त से हुआ | वह भगवती ज्ञानी भक्तों के लिये ब्रह्मस्वरूपा, उपासकों के लिये ईश्वरीरूपा, और निष्काम यज्ञनिष्ठ भक्तों के लिये विराट्स्वरूपा है : त्वं सच्चिदानन्दमये स्वकीये ब्रह्मस्वरूपे निजविज्ञभक्तान् | तथेशरूपे विधाप्य मातरुपासकान् दर्शनामात्म्भक्तान् || निष्कामयज्ञावलिनिष्ठसाधकान् विराट्स्वरूपे च विधाप्य दर्शनम् | श्रुतेर्महावाक्यमिदं मनोहरं करोष्यहो तत्वमसीति सार्थकम् || शक्ति और शक्तिमान में अभेद होता है | सृष्टि में शक्तिमान से शक्ति का ही आदर और विशेषता होती है | किसी किसी उपासना प्रणाली में शक्तिमान को प्रधान रखकर उसकी शक्ति के अवलम्बन में उपासना की जाती है | जैसे वेद और शास्त्रोक्त निर्गुण और सगुण उपासना | इस उपासना पद्धति में आत्मज्ञान बना रहता है | कहीं कहीं शक्ति को प्रधान मानकर शक्तिमान का अनुमान करते हुए उपासना प्रणाली बनाई गई है | यह अपेक्षाकृत आत्मज्ञानरहित उपासना प्रणाली है | इसमें आत्मज्ञान का विकास न रहने के कारण साधक केवल भगवान् की मनोमुग्धकारी शक्तियों के अवलम्बन से मन बुद्धि से अगोचर परमात्मा के सान्निध्य का प्रयत्न करता है | लेकिन भगवान् की मातृ भाव से उपासना करने की अनन्त वैचित्र्यपूर्ण शक्ति उपासना की जो प्रणाली है वह इन दोनों ही प्रणालियों से विलक्षण है | इसमें शक्ति और शक्तिमान का अभेद लक्ष्य सदा रखा गया है | एक और जहाँ शक्तिरूप में उपास्य और उपासक का सम्बन्ध स्थापित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर शक्तिमान से शक्तिभाव को प्राप्त हुए भक्त को ब्रह्ममय करके मुक्त करने का प्रयास होता है | यही शक्ति उपासना की इस तीसरी शैली का मधुर और गम्भीर रहस्य है | विशेषतः भक्ति और उपासना की महाशक्ति का आश्रय लेने से किसी को भी निराश होने की सम्भावना नहीं रहती | युद्ध तो प्रकृति का नियम है | लेकिन यह देवासुर संग्राम मात्र देवताओं का या आत्मोन्मुखी और इन्द्रियोन्मुखी वृत्तियों का युद्ध ही नहीं था, वरन् यह देवताओं का उपासना यज्ञ भी था | और जगत् कल्याण की बुद्धि से यही महायज्ञ भी था | और इस सबके मर्म में एक महान सन्देश था | वह यह कि यदि दैवी शक्ति और आसुरी शक्ति दोनों अपनी अपनी जगह कार्य करें, दोनों का सामंजस्य रहे, एक दूसरे का अधिकार न छीनने पाए, तभी चौदह भुवनों में धर्म की स्थापना हो सकती है | और बल, ऐश्वर्य, बुद्धि और विद्या आदि प्रकाशित रहकर सुख और शान्ति विराजमान रह सकती है | भारतीय मनीषियों ने शक्ति में माता और जाया तथा दुहिता का समुज्ज्वल रूप स्थापित कर व्यक्ति और समाज को सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया है | शक्ति, सौन्दर्य और शील का पुंजीभूत विग्रह उस जगज्जननी दुर्गा को कोटिशः नमन् | अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन २०/१०/२३ क्या खोया क्या पाया, हम उसके हमसाया। सदा अतः हर्षाया। कुछ न जाया माया। क्या खोया क्या पाया। जीना और होना। होना और जीना। यही तो हम हैं ना!🙏 यह जानना ही तो सुख है कि जीवन दुःख है। जानने के बाद न सुख है, दुःख है। प्यारीजू! आप ये अनुभूतियाँ पहले पाती हैं, फिर फैलाती हैं, बहुत सुंदर। महामुद्रा तिरोहिता की पोस्ट पर 🙏🙏 २१/१०/२३ 💥A rare conversation between *Ramkrishna Paramahansa* & *Swami Vivekananda* 🔶 *1. Swami Vivekanand*:- I can’t find free time. Life has become hectic. *Ramkrishna Paramahansa*:- Activity gets you busy. But productivity gets you free. *2. Swami Vivekanand:-* Why has life become complicated now? *Ramkrishna Paramahansa:-* Stop analyzing life... It makes it complicated. Just live it. *3. Swami Vivekanand*:- Why are we then constantly unhappy? *Ramkrishna Paramahansa:*- Worrying has become your habit. That’s why you are not happy. *4. Swami Vivekanand:-* Why do good people always suffer? *Ramkrishna Paramahansa*:- Diamond cannot be polished without friction. Gold cannot be purified without fire. Good people go through trials, but don’t suffer. With that experience their life becomes better, not bitter. *5. Swami Vivekanand:*- You mean to say such experience is useful? *Ramkrishna Paramahansa*:- Yes. In every term, Experience is a hard teacher. She gives the test first and the lessons later. *6. Swami Vivekanand:-* Because of so many problems, we don’t know where we are heading… *Ramkrishna Paramahansa:-* If you look outside you will not know where you are heading. Look inside. Eyes provide sight. Heart provides the way. *7. Swami Vivekanand:-* Does failure hurt more than moving in the right direction? *Ramkrishna Paramahansa:*- Success is a measure as decided by others. Satisfaction is a measure as decided by you. *8. Swami Vivekanand:*- In tough times, how do you stay motivated? *Ramkrishna Paramahansa:*- Always look at how far you have come rather than how far you have to go. Always count your blessing, not what you are missing. *9. Swami Vivekanand:-* What surprises you about people? *Ramkrishna Paramahansa:*- When they suffer they ask, "why me?" When they prosper, they never ask "Why me?" *10. Swami Vivekanand:-* How can I get the best out of life? *Ramkrishna Paramahansa*:- Face your past without regret. Handle your present with confidence. Prepare for the future without fear. *11. Swami Vivekanand:*- One last question. Sometimes I feel my prayers are not answered. *Ramkrishna Paramahansa:*- There are no unanswered prayers. Keep the faith and drop the fear. Life is a mystery to solve, not a problem to resolve. Trust me. Life is wonderful if you know how to live. २१/१०/२३ देहोत्सर्ग ही बलि नहीं है। देह तो बलि चढ़ाने का स्थूल रूप है। दूसरे शब्दों में, बलि देह चढ़ा कर ही नहीं दी जाती। अतः देह उत्सर्ग केवल हाड़मांस के शरीर को प्राणविहीन कर देने भर का नाम नहीं है। बलि पूजा पर्व का समय चल रहा है। वास्तविक अर्थों में बलि करना यही है... मुक्तिबोध बहुत गहरे तल के कवि हैं, द्रष्टा हैं। उनकी एक कविता है - एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन, उसका अंश नीचे द्रष्टव्य है। यही एक आशा है कि मिट्टी के अंधेरे उन इतिहास-स्तरों में तब हमारा भी चिह्न रह जाएगा। नाम नहीं, कीर्ति नहीं, केवल अवशेष, पृथ्वी के खोदे हुए गड्ढों में रहस्यमय पुरुषों के पंजर और ज़ंग-खाई नोकों के अस्त्र!! xxx लेकिन, दबी धुकधुकियों, सोचो तो कि अपनी ही आँखों के सामने ख़ूब हम खेत रहे! ख़ूब काम आए हम!! आँखों के भीतर की आँखों में डूब-डूब फैल गए हम लोग!! आत्म-विस्तार यह बेकार नहीं जाएगा। ज़मीन में गड़े हुए देहों की ख़ाक से शरीर की मिट्टी से, धूल से। खिलेंगे गुलाबी फूल। सही है कि हम पहचाने नहीं जाएँगे। दुनिया में नाम कमाने के लिए कभी कोई फूल नहीं खिलता है ह्रदयानुभव-राग अरुण गुलाबी फूल, प्रकृति के गन्ध-कोष काश, हम बन सकें!- मुक्तिबोध 22/10/23 जिस भाषा में मूल रूप से जो कथन व्यक्त हुआ, उसी भाषा में वह अच्छी तरह ग्रहण होता है। आजकल माई के गीत गाए सुनाए जा रहे हैं, वे अगर बुंदेली में हों, या क्षेत्रीय भाषा में हों, उसी की लय और वाद्य संगीत हो तो अधिक प्रभाव पैदा करते हैं। यही स्थिति विवाह और अन्य अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों की है, हमे पंजाबी या फिल्म के गीतों को क्या उधार लेना! वस्तुतः फिल्म जगत में बोलियों से ही गीत संगीत उठाए जाते हैं, बस उन्हें वे अपने ढंग से संयोजित और परिष्कृत करते हैं। बुंदेलखंड में जवारे बोए जाते हैं, उनके गीत सुनना भी एक अलग अनुभव से गुजरना है। अनेक पर्वों के अपने अपने गीत हैं, उनके तरीके हैं, उन्हें स्वाभाविक रूप में चलते रहने देना अच्छा है। उनमें रमना रुचिकर लगता है। तुलनात्मक रूप से नगरीय संस्कृति अनुकरण पर आधारित होती है, वह अधिक से अधिक परिष्कार किया करते हैं। ग्रामीण संस्कृति के पास अनुकरण करने के लिए अवकाश कम रहता है, इसलिए अनगढ़ ही सही, पर उनके माध्यम से नया सृजन होता आया है। यह नवता ही परिष्कृत होकर आगे जायेगी, अनुकरण छूट जायेगा। २३/१०/२३ ऊर्जा का रूपान्तरण चेतना में जब होता है, तब सभी चेतना संपन्न व्यक्ति एक धरातल पर आ जाते हैं। तभी ऐक्य की बात सही हो पाती है। उससे पहले खंड खंड एकतायें हैं, जिनमे मात्र क्षणिक सुख है, आनंद चेतनगत एकता के बाद ही संभव है। 🙏🙏 २४/१०/२३ ज्ञान एवं कर्म की दस इंद्रियां हैं और उनके दस देवता हैं- कान के देव दिशा, चक्षु के सूर्य, नासिका के अश्विनी कुमार, रसना के वरुण, त्वचा के वायु, वाणी के अग्नि, हस्त के इंद्र, चरण के उपेंद्र (विष्णु), उपस्थ के प्रजापति, निवृत्ति इंद्रिय के मृत्यु। यह दस देवताओं का योग करने और दसों इंद्रियों का निग्रह करने के कारण भगवान को हृषिकेश कहा जाता है। दसों इंद्रियों का निरोध करने के कारण दशहरा पर्व हुआ। इस अवसर पर राम चेतना का उदय और रावण वृत्तियों का शमन होता है। दशहरा पर्व नव रात्र साधना के पश्चात् आता है, अर्थात् नव द्वारों से पार कर दशम द्वार तक पहुँचा जा सकता है। दशम द्वार में प्रविष्ट होने ही बाद ही बीस दिन बाद दीप ज्योति प्रकाशित होती है यानि दीपावली आती है। आप सबको दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ🌹🙏 योग वासिष्ठ भारतीय वांगमय की अद्भुत रचना है। आध्यात्म जगत् के जितने पुरस्कर्ता हुए हैं, यह रचना उन सबमें समादृत है। कहते हैं इसे वाल्मीकि ने लिखा, आठ वर्ष के राम के प्रश्नों के उत्तर देने के फलस्वरूप महर्षि वशिष्ठ द्वारा मूल रूप से इसकी रचना हुयी है। महर्षि वशिष्ठ की इस रचना का संकलन महर्षि वाल्मीकि द्वारा किया गया। इसे महारामायण कहा गया है। रामायण में जो बात प्रबंध गाथा के माध्यम से समझायी गई है, उसे इसमें छोटी छोटी कथाओं के माध्यम से दिया गया है। भगवान राम और सीता की कथा इसमें नहीं है, परंतु दो पंक्तियों में निबद्ध गूढ़ ज्ञान को सरलता से प्रस्तुत किया गया है। इसमें कोई योग संबंधी आसन और प्राणायाम की विधियाँ नहीं हैं, फिर भी इसे योग कहा गया। इस रामायण का जन सामान्य में वाल्मीकीय या तुलसी रामायण की भाँति प्रचार प्रसार न हो सका। पर यही रामायण हिंदी गद्य की जनक बनी। रामप्रसाद निरंजनी ने पटियाला की देसो रानी को सुनाने के बाद भाषा योग वासिष्ठ नाम से १७४१ में इसे प्रकाशित कराया। यह हिंदी की पहली गद्य रचना है। एक और रामप्रसाद बंगाल में हुए, अद्भुत गीतकार, उनके रचे गीत वहाँ के लोक में लोकगीतों और भजनों की तरह गाये जाते हैं। वहाँ के अन्य संत रामप्रसाद जी को उल्लिखित करते हुए माता के गीत गाते हैं। फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना सन् १८०० से पूर्व और लल्लू जी लाल की प्रसिद्ध रचना प्रेमसागर से पूर्व भाषा योग वासिष्ठ लिखा गया। योग वासिष्ठ संस्कृत में ३० हज़ार श्लोकों में निबद्ध बहुत बड़ी रचना है। यह रामायण से भी बड़ी रचना है। मूल महाभारत (जय) में भी २४ हज़ार श्लोक ही थे। अब महाभारत में एक लाख श्लोक हो गए हैं। देश की उत्तर से लेकर दक्षिण तक की अन्य भाषाओं और दुनिया के देशों तक यह योग वासिष्ठ प्रसारित हुई, पर हिंदी समाज में यह उतनी नहीं जानी जा पायी। योग वासिष्ठ की ही तरह अष्टावक्र गीता को भी हिंदी पट्टी समाज में उतना स्थान नहीं मिल पाया है। दोनों ग्रंथ पाठक को समृद्ध करते हैं। २६/१०/२३ और गहरी और गहरी उतरी हो बाबुशा। द्रष्टा या साक्षी भी कहाँ रहेगा! दृश्य या हुब्ब ही जब हो रहा हो। दृश्य में ही जब द्रष्टा सिमट गया हो। यह तथाता है, सा काष्ठा सा परमगति। तुम्हारी गति प्रणम्य है, स्तुत्य है🌹🙏❤️ २७/१०/२३ बाह्य कर्मकांड अज्ञान का विनाश नहीं कर सकता, क्योंकि ये दोनों परस्पर विरोधी नहीं हैं। शंकराचार्य अपरोक्षानुभूति में लिखते हैं `केवल अनुभूत ज्ञान ही अज्ञान को नष्ट करता है...प्रश्न विचार के अतिरिक्त किसी और उपाय से ज्ञान नहीं मिलता। मैं कौन हूं? यह सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई? इसका सृष्टा कौन है? इसका भौतिक कारण क्या है? इस प्रकार के प्रश्नों से यहां तात्पर्य है। बुद्धि के पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है, इसीलिए ऋषियों ने ऐसे आध्यात्मिक प्रश्न विचार के लिए योग को विकसित किया। भगवद्गीता में जिस यज्ञ की महिमा का वर्णन किया गया है, वह यज्ञ क्रियायोग ही है। एकमेव अद्वितीय ईश्वर को समर्पित अद्वैत के हवन में योगी अपनी समस्त मानवीय इच्छा वासनाओं की आहुति डाल देता है, यही वस्तुतः सच्चा यज्ञ है जिसमें ईश प्रेम की ज्वाला में सारी गत वर्तमान इच्छा वासनाऐं जलकर राख हो जाती हैं। “ ‘‘परम ज्वाला’’ सभी मानवीय पागलपनों की आहुति स्वीकार कर लेती है और मनुष्य मलरहित होकर शुद्ध हो जाता है। लाक्षणिक तौर पर कहा जाय तो उसकी अस्थियों से वासनाओं का सारा मांस अलग हो जाता है, उसके कर्मों का अस्थिपंजर ज्ञानसूर्य की निर्जीवाणुकारी किरणों में सूखकर साफ हो जाता है और अंतत: पूर्ण शुद्ध-स्वच्छ बनकर वह मानव एवं भगवान की दृष्टि में निरापद बन जाता है।” क्रियायोग विज्ञान, अध्याय २६ योगी कथामृत यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ What is here, the same is there and what is there, the same is here. He goes from death to death who sees any difference here. 
  'जो परब्रह्म यहां (है), वही वहां (परलोक में भी है)। जो वहां (है), वही यहां (इस लोक में) भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को (अर्थात बारंबार जन्म-मरण को) प्राप्त होता है, जो इस जगत में (उस परमात्मा को) अनेक की भांति देखता है। हम इस जगत को अनेक की भांति देखते हैं। वृक्ष, पत्थर अलग, आप अलग, मैं अलग, पड़ोसी अलग; सब अलग; सब टूटे हुए, खंड-खंड। हमारी हालत ऐसी है जैसे रात चांद निकले और जमीन पर हजारों डबरे हैं, झीलें हैं, पानी के सरोवर हैं, और सब में चांद दिखाई पड़ता है। एक ही चांद होता है आकाश में, लेकिन सब पानी में हजारों-लाखों प्रतिबिंब बनते हैं, और हम एक-एक प्रतिबिंब को गिनते फिरें, और सोचें कि कितने चांद हैं! और नजर न उठाएं उस एक की तरफ, जिसके सब प्रतिबिंब हैं। इस जगत में जितना भी अस्तित्व है, जितने रूप हैं, वे एक के ही प्रतिबिंब हैं। आपके भीतर, एक सरोवर की भांति आपकी चेतना में, उस एक की ही छाया बनी है। यह सूत्र कहता है, जो यहां अनेक की भांति देखता है, वह भटकता है जन्म-मरण में। जो यहां भी एक की भांति देख लेता है उसे, वह तत्क्षण मुक्त हो जाता है। एक को पहचान लेना परम ज्ञान है। अनेक को देखते रहना अज्ञान है। पूजा वह, जो पवित्रता या प्यूरिटी उत्पन्न करे। प्रसाद का अर्थ है, जिसे प्रभु के सम्मुख रखा जाए। प्र का अर्थ है पार होना। पु स्वच्छ या पवित्र करने के आशय में आता है, पुष्प में पुस है, यानि जो पवित्रता को पोषण दे। पुण्य में भी पवित्रता ही झांक रही है। पुत्र यानि जो पवित्रता का रक्षण करता है। सभी पूर्णिमा और उनका प्रयोजन आश्विन पूर्णिमा - शरद पूर्णिमा, कोजागरी लक्ष्मी पूजा, टेसू पूनै, वाल्मीकि जयंती, कुमार पूर्णिमा, मीराबाई जयंती कार्तिक पूर्णिमा - देव दिवाली, पुष्कर मेला, गुरुनानक जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा - अन्नपूर्णा जंयती, दत्त जयन्ती पौष पूर्णिमा स्नानदान और सूर्य को अर्घ्य माघ पूर्णिमा - रविदास जयंती, ललिता जयंती, मासी मागम, श्री भैरव जयंती फाल्गुन पूर्णिमा - होली / चैतन्य महाप्रभु जयंती / गौर पूर्णिमा, वसंत पूर्णिमा चैत्र पूर्णिमा - श्री हनुमान जन्मोत्सव वैशाख पूर्णिमा - बुद्ध पूर्णिमा ज्येष्ठ पूर्णिमा भगवान विष्णु चंद्र और बरगद के पेड़ की पूजा का दिन आषाढ़ पूर्णिमा - गुरू पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा श्रावण पूर्णिमा - रक्षाबन्धन, नारली पूर्णिमा भाद्रपद पूर्णिमा पितृ पक्ष आरंभ पाप का अर्थ होता है, जो आपके मार्ग को अवरुध्द कर दे, आपके जीवन की प्रगति रोक दे। मनुष्य पाँच तत्वों से बना है, भूत प्रेत चार तत्वों से बने होते हैं, इनमें पृथ्वी तत्व नहीं होता है। देवताओं का शरीर तीन और दो तत्वों से बना होता है। परमात्मा सिर्फ आकाश तत्व से बना होता है। परमात्मा को आकाश तत्व में निबद्ध मानते हैं, पर वह देखने की अभीप्सा के कारण है। वह आकाश से बाहर भी है। अदृश्य, उस आकाश के अन्यान्य नाम दिये जाते हैं, चिदाकाश, अन्तराकाश आदि। २९/१०/२३ what is love? love is the absence of judgement.. dalai lama आचार्य प्रशांत और सद्गुरू जग्गी वासुदेव द्वारा मंत्र पर... प्रशांत जी मंत्र के अर्थ को जानने पर बल देते हैं और सद्गुरू मंत्र के अर्थ को जानना आवश्यक नहीं कहते हैं। दोनों सही हैं। कोई ग़लत नहीं। मंत्र का अर्थ जानना प्रारंभिक प्रक्रिया है, फिर उस मंत्र में प्रविष्ट होने के बाद उसके अर्थ में बाहर भीतर कुछ बचता नहीं। शब्द एक है, अर्थ अनेक। आप अर्थ के सहारे शब्द तक पहुँचें या शब्द सत्ता में प्रवेश कर जाएँ, अपनी अपनी सामर्थ्य और गुरु कृपा है। ३०/१०/२३ कर्मकांड निष्णात आचार्यों के पास बहुमूल्य धरोहर है, उन्हें इसका पता हो, न हो। नौकरी की उपाधियाँ तभी महत्वपूर्ण हैं, जब उनसे आत्म का आलोचन होता हो। नौकरी तो इस उद्देश्य से की जा रही है कि ऊपर से कितना कमा लिया जाता है, ऐसे लोग स्वयं और समाज दोनों के लिए सिरदर्द हैं। जब तक व्यक्तित्व का रूपांतरण नहीं होता, कुछ उपयोगी नहीं रहेगा। संसार जैसा सब सरकता ही रहेगा। गौ और गंगा गाय और एक नदी में आरोपित किए गए, क्या भाषा के प्रभाव से। चाहे जिस प्रभाव से ऐसा हुआ हो, पर योग के बल से यह समझ आता है कि गं का अर्थ चलने से है, सदा गंतव्यमुखी चलने का नाम चिति है। यह चिति या जिसे दूसरे शब्दों में चेतना कहते हैं, मनुष्य को मनुष्य बनाती है। इसके प्रतीक ही गंगा, गो, गया और गायत्री हैं। इन्हें भौतिक प्रतीकों में तभी जान सकते हैं, जब वे अनुभव में उतर गए हों। अनुभव में उतार लेना ही ज्ञान की परिणति है, उसका सुफल है। तभी व्यक्ति भक्ति को प्राप्त होगा और तभी वह कर्मयोगी बन पाएगा।