Monday, November 16, 2015

स्वच्छता एवं पवित्रता की पारस्परिकता

स्वच्छता एवं पवित्रता की पारस्परिकता
डा राकेश नारायण द्विवेदी
विश्व की सभी सभ्यताओं में स्वच्छता अनिवार्य है। भारतीय संस्कृति में स्वच्छता का अप्रतिम महत्व है। स्वच्छता से ही पवित्रता संभव है। पवित्रता एक ऐसा भाव है, जिसके माध्यम से हम अपने आचार-व्यवहार में छाप छोड़ते हैं। जो व्यक्ति पवित्र होगा, उसका आचरण भी श्रेष्ठ होगा। स्वच्छता पवित्रता की अनिवार्य शर्त है। इसे सीमित अर्थों में नहीं लिया जा सकता। स्वच्छता की व्याप्ति बाहरी साफ-सफाई में तो है ही, भीतरी निर्मलता में भी यह उतने ही सघन रूप में मौजूद है। कभी- कभी निर्मल मन और सद्गुणों की बात करते हैं तो धर्म और अध्यात्म के विषय मानकर कुछ लोग किनारे हो जाना चाहते हैं, पर यह निर्मल मन हमें स्वच्छता की भीतरी और व्यापक अवस्था की ओर ले जाता है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
जिसका मन दूषित न हो, विमल धवल हो, वही मनुष्य प्रभु को प्राप्त कर सकता है। मनकी जो गंदगी है, वह मोह, कपट और छल के रूप में दिखती है। यह भीतर का दूषण है, भारतीय वाड्ंमय जिसका सांगोपांग विवेचन करता है। समूची भारतीय मनीषा इस गंदगी को दूर करने का आह्वान करती है, क्योंकि यह मनुष्य के सारे दुर्गुणों की जननी है।
भक्ति का आधार ही निर्मल मन है, निर्मल मन के लिये स्वच्छ तन का होना नितांत आवश्यक है। स्वच्छ तन और निर्मल मन ही सुंदर जीवन की आधारशिला हैं। स्वच्छ तन और निर्मल मन के बाद व्यक्ति द्वारा अर्जित किए गए धन का उपयोग भलीभांति संभव है। स्वच्छ तन और निर्मल मन से प्राप्त धन शुभता का साधन है। स्वच्छ तन से ही मन पवित्र हो सकता है। मन पवित्र होगा, उदार और सबका हितकामी होगा तो हम अपने आसपास की गंदगी के भी अभ्यस्त नहीं होंगे।
स्वच्छता के बाद मनुष्य सृजनधर्मी बन सकता है। सौंदर्य या कलाओं की सृजनभूमि स्वच्छता ही है, अन्यथा तो हम एक बनी हुई लीक को पीटते भर हैं। हमारे सारे पर्व और त्योहार स्वच्छता एवं पवित्रता को अनिवार्य बनाते हैं। हम देखते हैं अगर दीपावली पर्व न हो तो व्यक्ति घर की सफाई में उदासीनता कर जाएं और तब वह कितनी बीमारियों का घर बन जाए। हिंदुओं में दीवाली के समय, मुसलमानों में ईद के समय, मलयालियों में ओणम के समय तो बंगालियों में दुर्गापूजा के समय अपने-अपने घरों को सिरे से साफ करने और सजाने की परंपरा है। देखा जा रहा है कि व्यक्ति प्राय: अपनी और अपने घर की स्वच्छता पर ध्यान देता है , पर उसके बाहर और आसपास की स्वच्छता से उसे कोई प्रयोजन नहीं होता। होता भी है तो कहने भर के लिए। स्वच्छता रखने के लिए बहुत छोटी-छोटी बातें ध्यान में रखनी आवश्यक होती हैं। यह बातें हर छोटे-बड़े पर लागू होती हैं। पहली आवश्यकता है कि हम स्वयं गंदगी न करें। उदाहरण के लिए हम सड़क पर चलते हुए थूक रहे हैं, फिर सफाई का आह्वान भी कर रहे हैं तो यह निरे पाखंड के अतिरिक्त कुछ नहीं है। हम स्वयं धूम्रपान करके प्रदूषण फैलाएं और दूसरों से ऐसा न करने की अपेक्षा रखें, यह नहीं हो सकता। हम जो आचरण करते हैं, समाज उसे बारीकी से देखता समझता है। आप जब कुछ कहते सुनते हैं, उसे वह अपनी पारखी नज़रों से तौलता है। इसलिए स्वच्छता के संदर्भ में, अगर आप स्वयं स्वच्छ और पवित्र हैं और इसका ध्यान रखते हैं तो आपका परिवेश भी स्वच्छ रखने में आसानी होगी।
यह बहुत सामान्य, किंतु आवश्यक बात है कि स्वच्छता स्वस्थ तन की अनिवार्य शर्त है। स्वच्छता का महत्व निर्विवाद है, फिर क्या कारण है कि हमारा पर्यावरण इतना दूषित हो गया है। इस प्रश्न के उत्तर में ही हमारे समाज का यथार्थ संनिहित है। हमारे समाज में प्रारंभ से ही शौचालय नहीं थे, किंतु तब जनसंख्या का भी दबाव नहीं था। प्रारंभ में काम के फलस्वरूप होने वाली गंदगी के विभिन्न स्वरूपों को जाति विभाजन का आधार माना गया और फलत: समूची जाति ही उस गंदगी का पर्याय मान ली गई। जाति को उस समय गंदगी का पैमाना बना दिया गया, लेकिन स्वच्छता पर बल नहीं दिया जा सका। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे विकास का नियोजन अव्वल तो हुआ ही नहीं, और जो हुआ भी तो उसमें स्वच्छता पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। महात्मा गांधी विचार और कर्म से स्वच्छता के अप्रतिम पोषक थे। स्वच्छता की शुरूआत मन, विचार और ह्रदय की पवित्रता के साथ होती है। पवित्रता के उदय से भविष्य उज्ज्वल होता है, हम 'उदार चरित' होते हैं, समूची 'वसुधा के कुटुंबी' बनते हैं और निजी और पराए के भेद से ऊपर उठ गए होते हैं। पवित्रता से ही हमारे भीतर यह भाव आता है कि हम जो कुछ अपने समाज और राष्ट्र से प्राप्त करें, उससे कहीं अधिक उसे लौटाएं भी। इस पवित्रता के कारण ही पुजारी और आदिवासी जंगल या प्रकृति से जब कुछ लेते हैं तो उसकी रक्षा का दायित्व भी संभालते हैं। यही नहीं, सुना है बदरीनाथ धाम के पुजारी भगवान की पूजा के लिए पुष्प चुनते या शहद लेते हैं तो उससे अधिक पुष्पों की व्यवस्था वे जंगल में कर देते हैं। आदिवासी भी अपने जंगल से जितना ग्रहण करता उससे अधिक पेड़ लगाकर लौटा देता है।
अर्जन के साथ विसर्जन के द्वारा ही मनुष्य जहॉं अपना जीवन उन्नत, सुखद और प्रेरक बना सकता है, वहीं वह समाज और राष्ट्र को उन्नति की ओर अग्रसर कर सकता है। अर्जन और फिर विसर्जन का यह भाव बहुत बड़ा है, उदात्त है, जिससे व्यक्ति जीवन में संतोष का अनुभव करता है। संतोष नवधा भक्ति में एक है-
आठवं जथालाभ संतोषा। सपनेहुं नहिं देखउं परदोषा।। रामचरितमानस
या
जथा लाभ संतोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो। कवितावली
सफाई रखने में नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है, जैसा हमारे प्रधानमंत्री ने कहा है सफाई की ज़िम्मेदारी एकमात्र सफाई कर्मियों की नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में सफाई और स्वच्छता की कमी के कारण औसतन प्रति व्यक्ति ₹ 6500 बर्बाद होते हैं। स्वच्छ भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य और ग़रीबों की आय की सुरक्षा पर सार्थक प्रभाव डालेगा और अंततोगत्वा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान देगा।
स्वच्छता रखने में जल की वैसी ही भूमिका है, जैसी भूख शांत करने में अन्न की होती है। स्वच्छ पेयजल उदर को दुरुस्त रखता है, उदर से ही मनुष्य के सारे शारीरिक विकार उत्पन्न होते हैं। जल से शरीर की बाहरी शुद्धि भी होती है। जल की गति अधोगामी होती है, इसलिए अशुद्धि को जल बहा देता है, किंतु जनसंख्या असंतुलन और बढ़ते कारखानों से अब हमारी नदियां इस अशुद्धि को वहन करने में दम तोड़ रही हैं। पर्यावरणीय विषमताओं से वर्षा कम होने लगी है, इसलिए जल संरक्षण की आवश्यकता रेखांकित की जा रही है। भारत के बहुत से भागों में पहले भी अल्पवर्षा का सामना करना पड़ता था, किंतु उस समय का जल नियोजन बेहतर था, औद्योगिकीकरण नहीं था और हाथों से ही सारे कार्य-कौशल किए जाते थे। गांधीजी यही सभ्यता प्रिय थी, जिसे उसे उन्होंने सारी दुनिया का पाथेय माना था। गांधी जी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' इस संबंध में पढ़े जाने योग्य है। इस सभ्यता में सरकारी राहत की ओर लोगों को नहीं ताकना पड़ता था। महत्वाकांक्षाएं भी लोगों में नहीं होती थीं। पश्चिमी देशों के विकासवादी माडल पर आधारित हमारी अर्थव्यवस्था में पर्यावरण सुरक्षा पर समुचित ध्यान नहीं जा पा रहा है।
स्वच्छता रखने के लिए नागरिकों को आगे आना होगा। सरकार अपने नागरिकों को चेतना संपन्न करे, इसके उपाय करने होंगे। जब नदियों में जल घट गया और उनके अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया, फिर भी हम उनमें पूजा के निर्माल्य और देव-देवी मूर्तियां क्यों विसर्जित करें। उन्हें मृदा विसर्जन करना समीचीन होगा। कारखानों के अपशिष्ट को अविलंब नदियों में बहने से रोकना होगा। इसके लिए सरकार और नागरिक समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा। तीर्थ सरोवरों में हमारे भाई-बहिन या बच्चे स्नान करें, लेकिन उसमें मुंह का पानी भी बाहर न करें, सरोवरों में साबुन का प्रयोग न करें, उसमें कपड़े न धोएं। मूत्र उत्सर्ग न करें। सरोवरों में स्नान न करें, अन्यत्र स्नान करके दर्शन-पूजन करें तो भी पुण्यार्जन में कमी न होगी। तीर्थ स्थानों को स्वच्छ रखने में सरकार की भूमिका वैसी नहीं, इसके लिए हमारे धर्माचार्यों और नागिरकों को बढ़ना होगा। मैंने सिखों के कई गुरुद्वारों में जाकर दर्शन किए, वे स्वच्छता के प्रति कितने सतर्क रहते हैं! हमारे जिन तीर्थों में ऐसा नहीं है, वे ऐसे क्यों नहीं हो सकते। एक बार महात्मा गांधी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आए। वहां उन्होंने अपने भाषण मे विश्वनाथ मंदिर और उसकी गलियों की गंदगी के विषय को प्रमुखता से उठाया।
गांधी जी कहते थे 'स्वच्छता स्वतंत्रता से भी अधिक आवश्यक है।' गांधी ने भारतीय समाज का बारीकी से पर्यवेक्षण किया था। वे उच्च शिक्षित थे और विदेशों में रह चुके थे। उन्होंने देश के मिज़ाज को जिस तरह समझा और जो स्थापनाएं दीं, वे आज भी हमारी पाथेय बनी हुई हैं। गांधी ने भारत के समाज शास्त्र को समझा और स्वच्छता के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने पारंपरिक तौर पर सदियों से सफाई के काम में लगे लोगों को गरिमा प्रदान करने की कोशिश की। गांधी जी ने धार्मिकता और धर्मपरायणता से भी अधिक महत्व स्वच्छता और सफाई को दिया। यद्यपि दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं है। धार्मिकता या धर्मपरायणता में स्वच्छता का अनिवार्य सन्निवेश है। किसी देव-देवी के षोडशोपचार पूजन में पाद्य, अर्घ्य, स्नान तथा आचमन जल द्वारा ही संपन्न होता है। इस प्रकार पूजन की एक चौथाई विधि जल द्वारा संभव होती है। भगवान शंकर जल चढ़ाने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं।
मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार हर मानव को है। भारत में मैला प्रथा के समाचार देश की सभ्यता व विकास पर एक बदनुमा दाग की तरह हैं। देश में मल खुले में उत्सर्जित किया जा रहा है। भारत की बड़ी जनसंख्या के पास व्यक्तिगत शौचालय नही हैं। स्कूलों में शौचालय नही? रेलगाड़ियों में मलोत्सर्ग की जो व्यवस्था है, उसे सही किए जाने की आवश्यकता है। हम देश के विकास की बात करते हैं, लेकिन जब तर स्वच्छता के समुचित स्तर को प्राप्त नहीं कर लेते, शेष बातें करना बेमानी है। देश के हर घर में कई-कई मोबाइल हो गए हैं, लेकिन शौचालय नहीं हैं, यह किस तरह का विकास  है!
स्वच्छता का महत्व सभ्यता के प्रारंभिक काल से सर्वविदित है। इसीलिए जनसामान्य में कहा जाता है कुत्ता भी अपनी बैठने की जगह को पूंछ से साफ करके बैठता है। स्वच्छता सुंदरता की पहली सीढ़ी है और ब्रेख्त ने कहा है 'सुंदरता संसार को बचाएगी' अर्जन के साथ विसर्जन के द्वारा ही मनुष्य जहॉं अपना जीवन उन्नत, सुखद और प्रेरक बना सकता है, वहीं वह समाज और राष्ट्र को उन्नति की ओर अग्रसर कर सकता है। अर्जन और फिर विसर्जन का यह भाव बहुत बड़ा है, उदात्त है, जिससे व्यक्ति जीवन में संतोष का अनुभव करता है। संतोष नवधा भक्ति में एक है-
आठवं जथालाभ संतोषा। सपनेहुं नहिं देखउं परदोषा।। रामचरितमानस
या
जथा लाभ संतोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो। कवितावली
सफाई रखने में नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है, जैसा हमारे प्रधानमंत्री ने कहा है सफाई की ज़िम्मेदारी एकमात्र सफाई कर्मियों की नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में सफाई और स्वच्छता की कमी के कारण औसतन प्रति व्यक्ति ₹ 6500 बर्बाद होते हैं। स्वच्छ भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य और ग़रीबों की आय की सुरक्षा पर सार्थक प्रभाव डालेगा और अंततोगत्वा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान देगा।
स्वच्छता रखने में जल की वैसी ही भूमिका है, जैसी भूख शांत करने में अन्न की होती है। स्वच्छ पेयजल उदर को दुरुस्त रखता है, उदर से ही मनुष्य के सारे शारीरिक विकार उत्पन्न होते हैं। जल से शरीर की बाहरी शुद्धि भी होती है। जल की गति अधोगामी होती है, इसलिए अशुद्धि को जल बहा देता है, किंतु जनसंख्या असंतुलन और बढ़ते कारखानों से अब हमारी नदियां इस अशुद्धि को वहन करने में दम तोड़ रही हैं। पर्यावरणीय विषमताओं से वर्षा कम होने लगी है, इसलिए जल संरक्षण की आवश्यकता रेखांकित की जा रही है। भारत के बहुत से भागों में पहले भी अल्पवर्षा का सामना करना पड़ता था, किंतु उस समय का जल नियोजन बेहतर था, औद्योगिकीकरण नहीं था और हाथों से ही सारे कार्य-कौशल किए जाते थे। गांधीजी यही सभ्यता प्रिय थी, जिसे उसे उन्होंने सारी दुनिया का पाथेय माना था। गांधी जी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' इस संबंध में पढ़े जाने योग्य है। इस सभ्यता में सरकारी राहत की ओर लोगों को नहीं ताकना पड़ता था। महत्वाकांक्षाएं भी लोगों में नहीं होती थीं। पश्चिमी देशों के विकासवादी माडल पर आधारित हमारी अर्थव्यवस्था में पर्यावरण सुरक्षा पर समुचित ध्यान नहीं जा पा रहा है।
स्वच्छता रखने के लिए नागरिकों को आगे आना होगा। सरकार अपने नागरिकों को चेतना संपन्न करे, इसके उपाय करने होंगे। जब नदियों में जल घट गया और उनके अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया, फिर भी हम उनमें पूजा के निर्माल्य और देव-देवी मूर्तियां क्यों विसर्जित करें। उन्हें मृदा विसर्जन करना समीचीन होगा। कारखानों के अपशिष्ट को अविलंब नदियों में बहने से रोकना होगा। इसके लिए सरकार और नागरिक समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा। तीर्थ सरोवरों में हमारे भाई-बहिन या बच्चे स्नान करें, लेकिन उसमें मुंह का पानी भी बाहर न करें, सरोवरों में साबुन का प्रयोग न करें, उसमें कपड़े न धोएं। मूत्र उत्सर्ग न करें। सरोवरों में स्नान न करें, अन्यत्र स्नान करके दर्शन-पूजन करें तो भी पुण्यार्जन में कमी न होगी। तीर्थ स्थानों को स्वच्छ रखने में सरकार की भूमिका वैसी नहीं, इसके लिए हमारे धर्माचार्यों और नागिरकों को बढ़ना होगा। मैंने सिखों के कई गुरुद्वारों में जाकर दर्शन किए, वे स्वच्छता के प्रति कितने सतर्क रहते हैं! हमारे जिन तीर्थों में ऐसा नहीं है, वे ऐसे क्यों नहीं हो सकते। एक बार महात्मा गांधी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आए। वहां उन्होंने अपने भाषण मे विश्वनाथ मंदिर और उसकी गलियों की गंदगी के विषय को प्रमुखता से उठाया।
भारत स्वच्छ अभियान का मुख्य मुद्दा व्यक्तिगत स्वच्छता से ऊपर उठकर सार्वजनिक स्थलों को उसी तरह से स्वच्छ रखने की भावना का विकास करना है। इस अभियान का लक्ष्य लोगों को यह संदेश पहुंचाना भी है कि परिवेश को स्वच्छ रखे बिना अपनी और अपने घर की स्वच्छता का लाभ दूरगामी नहीं हो सकता। हाल ही में प्रसिद्ध लोकगायिका मालिनी अवस्थी के पति वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अविनाश चंद्र अवस्थी को डेंगू हो गया। अटल जी के मंत्रिमंडल के पी आर कुमारमंगलम मलेरिया से मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। इयये स्पष्ट है कि व्यक्तिगत स्वच्छता काफी नहीं होती।
वीरेंद्र जैन ने जैसा कहा है 'स्वच्छता एक मनोवृत्ति है और सफाई उसका प्रकटीकरण।' अगर मनोवृत्ति सही नहीं होगी तो प्रकटीकरण केवल दिखावा होकर रह जाएगा। कुत्ते की सफाई के बारे में लोग जानते हैं। और भी ऐसे जानवर हैं जो सफाई के प्रति सतर्क रहते हैं। बिल्ली अपने शरीर की सफाई का विशेष ध्यान रखती है। खुद को चाटकर ये शरीर साफ रखती हैं। बिल्ली सफाई के साथ खाना खाती है। उसका खाना इधर-उधर नहीं गिरता और खाते समय वह कोई आवाज़ नहीं करती। बंदर एक-दूसरे के शरीर पर जमी गंदगी की पपड़ी को साफ करते रहते हैं। वे फल को छीलकर खाते हैं। हाथी प्रतिदिन खुद ही नहाना पसंद करते हैं।
इस बात को जानते हुए भी दोहराए जाने की आवश्यकता है कि स्वच्छता अपनाने से व्यक्ति रोगमुक्त रहता है और वह स्वस्थ राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है। गांधी जी के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति वह है जो सभी तरह की बीमारियों से मुक्त है, जो अपनी नियमित क्रियाएं बिना थकावट के पूरी करता है, जो प्रतिदिन 10 से 12 मील आसानी से चल सकता है, सामान्य भोजन को आसानी से पचा सकता है औक जिसके मन और इंद्रियों के व्यवहार में तालमेल है। स्वस्थ रहने के लिए धूम्रपाम, तंबाकू और शराब से दूर रहना आवश्यक है।
शौचालयों के प्रयोग या बच्चों का मल-मूत्र साफ करने के बाद हाथ धोने और भोजन से पहले हाथों की अच्छी तरह सफाई डायरिया को 33 प्रतिशत कम कर देती है। डायरिया से मरने वाले 90 प्रतिशत पांच वर्ष से कम के बच्चे होते हैं।
अंत में कहा जा सकता है कि स्वच्छता और पवित्रता का संबंध घनिष्ठ है। स्वच्छता के बाद पवित्रता का उदय व्यक्ति में होने से उसके सुपरिणाम सदाचरण के रूप में देखने को मिल सकते हैं, जिनका लाभ संबंधित व्यक्ति के साथ-साथ समाज और राष्ट्र को भी प्राप्त होगा।
एसोसिएट प्रोफेसर, शोध एवं स्नातकोत्तर हिंदी विभाग
गांधी महाविद्यालय, उरई (जालौन)
संबद्ध बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी
मोबाइल 9236114604

Tuesday, October 27, 2015

कबीलाई समाज में मातृसत्ता

कबीलाई समाज में मातृसत्ता
डॉ राकेश नारायण द्विवेदी

स्त्री के समर्थन में हमारे यहां इस लोक को संपुट की तरह व्यवहृत किया जाता है
 ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रभंते तत्र देवता।
 यत्रैतास्तु न पूज्यंते सर्वास्तत्राऽफला क्रिया।।’’
अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां ऐसा नहीं होता, वहां किए गए सारे कार्य निफल हो जाते हैं। मनुस्मृति का यह पद वस्तुतः देा के कबीलाई या आदिम संस्कृति के मनुयों को देखकर रचा गया होगा। आदिम संस्कृति आदिवासियों या गिरिजनों की संस्कृति है जो कबीले के रूप में रहते रहे, जिन्हें जनजातीय समाज भी कहा जाता है। इस आदिवासी संस्कृति में स्त्री दुर्दाा उस रूप में नहीं पाई जाती, जिस रूप में यह ोा समाज में विद्यमान है।
भारतीय वाङमय में पाए जाने वाले अनेक उदाहरण यह साफ करते है कि ाुरूआत के मानव समाज में जब ग्राम-नगरों आदि का गठन नहीं हुआ था मानव समूह कबीलों में रह रहे थे तब उनमें मातृसत्ता का पूर्ण प्रभाव था।
आज भी हम देखते हैं कि प्रत्येक गांव में कम से कम एक मातृदेवी की पूजा प्रचलित है। अक्सर ऐसी देवी का कोई ख़ास नाम नहीं होता, इन देवियों के निराले नाम देखकर ऐसा लगता है कि इनका संबंध छोटे-मोटे जनजातीय समूह से रहा है जो अब या तो निःोा है या सामान्य देहाती आबादी मेंे इस कदर घुलमिल गया है कि उसका कोई चिन्ह ोा नहीं है। इन देवियों की पुरातनता इस बात से प्रमाणित होती है कि इनमें से किसी के कोई पुरुा संगी या पति नहीं है। ये देवियां हैं तो माताएं (मात्देवियां) किंतु अविवाहित हैं। जिस समाज में इनका उद्भव था, उसकी दृटि में किसी पिता का होना आवयक नहीं था। आगे चलकर इनका ब्याह किसी पुरुा देवता से होने लगा। मातृदेवियों की पूजा पद्धतियां उस ज़माने की हैं, जब घर बनाने का चलन नहीं था और जब गांव चलते-फिरते हुआ करते थे। प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक ने अपनी पुस्तक ‘स्थान-नाम समय के साक्षी’ में स्थान-नामों के उत्स पर विचार करते समय यह रेखांकित किया है कि आदिवासी लोकमाताओं के नाम पर ही प्रारंभ में स्थानों का नामकरण किया गया।
कबीलाई या आदिवासी समाज में दो ऐसी परंपराएं हजारों र्वाों से चली आ रही हैं, जिन्हें विव में आज के उत्तरोत्तर आधुनिकतावादी समाजों में प्रचलित देखकर अचरज होता है कि यह तो हमारे आदिवासियों में प्रारंभ से ही विद्यमान है। भारत की सभ्यता और संस्कृति को निर्मित और विकसित करने में आदिवासियों का प्रस्थानिक योगदान है। डॉ सुनीति कुमार चाटुर्ज्या मानते थे कि ‘निााद लोगों ने भारत की ग्रामीण सभ्यता की नींव डाली थी। आदिवासियों ने साहित्य-संगीत के ाुद्ध स्वरूप को प्रस्तुत कर आदिमानव के उर्त्का को बहुरूपों में प्रस्तुत किया।
प्राचीन भारत में मातृसत्ता की विद्यमानता इन आदिवासियों के यहां जिन रूपों में पाई जाती है, उसके चिन्हों को हम आदिवासियों की इन दो परंपराओं में देख सकते हैं-
1-भगोरिया- यह पर्व होली के समानांतर होता है, जो भील आदिवासियों में सामुदायिक रूप से मनाया जाता है। युवा-युवतियों के लिए यह पर्व चयन और चुनौती तथा नई फसल की दृटि से उमंग और उल्लास का प्रतीक है। भीलों के आराध्य भगोरदेव के नाम पर संभवतः इसे भगोरिया कहा गया अथवा यह भगोर-गोती भीलों द्वारा आरंभ किए जाने के कारण अथवा भीलों पर ौव प्रभाव (भग अर्थात् ािव एवं गौर अर्थात् पार्वती) के कारण प्रचलित हुआ है।
इस पर्व में चंद्रमुखी प्रेमिका या बलिठ युवक अपने भाग्य की संपन्नता का परीक्षण करते हैं। स्वकीय सौंदर्य और पराक्रम को निखारकर अपने आमोद-प्रमोद को अधिक वाचाल बनाते हैं, जाति-कुल की मर्यादा को जीवित रखते हैं एवं प्रेम-स्नेह जनित भावनाओं को मूर्त रूप देकर सुखद अनुभूतियों को उल्लसित करते रहते हैं। सांसारिक सुखों में डूबकर एक समय वे ऊबकर विरति की देहरी का र्स्पा करने लगते हैं। यही सुख साम्राज्य की चरम परिणति है, जिसे ‘मोक्ष’ कहा गया है। वन-प्रांतर में दैनिक जीवन-यापन करते हुए युवक-युवती पारस्परिक परिचय के माध्यम से कुल आदि का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। वे गंधर्व विवाह की गहरी रेखाएं अंकित कर मनोनुकूल जीवनसाथी का चयन कर लेते हैं। स्वयंवर का यह मनोहारी रूप बड़ा रोचक और स्मरणीय होता है।
इस तरह पर्व के माध्यम से हम जान सकते हैं कि आदिवासियों का जीवन-र्दान एक खुली हुई क़िताब के समान है, जिसमें न किसी प्रकार का दुराव है और न किसी भांति की दुप्रवृत्ति अंकुरण की गुंजाइा। आदिवासी वैवाहिक जीवन की सफलता का यह एक रहस्य भी है कि इसमें पारस्परिक प्रेम (रति) की पूर्णता रहती है, स्त्री को कामवस्तु नहीं समझा जाता, एक-दूसरे की चिर-पहचान कभी आन बनती है तो कभी सम्मान की सिंदूर-सुामा परिवार-समाज की धरोहर बनती है।
होली के ठीक पहले आदिवासी क्षेत्रों में भगोरिया के मेले लगते हैं। भगोरिया की कल्पना मात्र से आदिवासियों का आदिमन स्वतः नाच उठता है। मेले में युवक द्वारा युवती को गुलाल लगाया जाता है और युवती द्वारा पान खाना स्वीकार किया जाता है। स्वयंवर प्रथा का यह प्रारंभिक चरण है, जिसे स्वयंवर में परिणत होने का सूचक माना जाता हैं। एक-दूसरे को चुनने के बाद यह युग्म घर नहीं लौटते, बल्कि कहीं भाग जाते हैं। कुछ दिन स्वच्छंद घूमने के बाद ये जोड़े जब अपने घर लौटते हैं तो कुछ प्रथाओं की पूर्ति करने के बाद इसे विवाह की मान्यता प्रदान कर दी जाती है। विवाह संपन्न होने पर दावत दी जाती है।
समय परिवर्तन के साथ इस पर्व का रूवरूप बदल गया है। एक समय युवक इस पर्व के माध्यम से अपनी जीवन सहचरी को सुगमता से प्राप्त कर लेता था, किंतु अब वधू-मूल्य इतना बढ़ गया है कि धनाभाव से संत्रस्त आदिवासी नौजवान हजारों रुपए की धनरााि को जुटाने में अपनी जवानी के ओज को यों ही खो देते हैं। पलसूद स्थान का भगोरिया सर्वश्रेठ माना गया है। ध्यातव्य है कि आज ोा समाज में दहेज प्रथा इसके विपरीत रूप में प्रचलित है।
2- गोतुलः- गोतुल सांस्कृतिक दृटिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है। इस संस्था से पता चलता है कि आदिवासी अपने युवक-युवतियों की प्रगति के लिए कितने सजग हैं। प्रायः समस्त आदिवासियों में ‘गोतुल’ नामक संस्था की स्थापना का प्रचलन है। बोली की विविधता के कारण विभिन्न आदिवासी समाजों में इस संस्था के भिन्न-भिन्न नाम हैं। मुड़िया (मुरिया) इसे ‘घोटुल’ कहते हैं तो भुइयां समाज में यह ‘धंगर बस्सा’ नाम से पुकारी जाती है। मुंडा एवं हो इसे ‘गतिओरा’ कहकर संबोधित करते हैं। उरांव आदिवासियों में यह संस्था ‘धुमकुरिया’ कही जाती है। इसी प्रकार असम के नागा लोग इसे ‘याकिचुकी’ कहा करते हैं। उत्तर-प्रदेा के वनवासी-समाज ने इस उपयोगी संस्था को ‘रंग-बंग’ नाम से अभिहित किया है। इस संबंध में यह जानना आवयक है कि यह संस्था पूर्णरूपेण अविवाहित कुमारों एवं कुमारियों के लिए ही है। विवाहितों का यहां प्रवेा निािद्ध है। रात में कुमार-कुमारी इस मोहक-गृह में रहकर जीवनोपयोगी कई बातों को सीखते हैं। उन्हें इस गृह में सामाजिक एवं धार्मिक तथ्यों से अवगत कराया जाता है।
कहा जाता है कि यह ‘घोटुल’ आदिवासियों के लिंगो देवता का वरदान है। ‘घोटुल’ डिंडामहल अर्थात् अविवाहितों का राजप्रासाद है।
साधारणतः ‘गोतुल’ गांव के पास हरे-भरे जंगल में बनाए जाते हैं, इन्हें कुमार-कुमारियां बड़े चाव से बनाते हैं। दीवारों पर कई देवी-देवताओं की आकृतियां विविध रंगों में चित्रित की जाती हैं। युवा-गृह में एक बड़ा लंबा कमरा होता है, जो घास-फूस से छाया जाता है। इसमें प्रवेा के लिए एक छोटा सा दरवाजा बनाया जाता है। संध्या होते ही गांव के कुमार एवं कुमारियां इस गृह में जाते हैं और इसकी सफाई करने में लग जाते है। कतिपय आदिवासी जातियों में कुूमारों के लिए पृथक् और कुमारियों के लिए अलग ‘गोतुल’ होते हैं, लेकिन ऐसे भी कई रंगबंग (घोटुल) हैं, जिनमें अविवाहित युवक-युवतियां साथ रहते हैं। यहां नृत्य-गानादि की ािक्षा भी दी जाती है और यौन विायक प्रािक्षण भी इन ‘गोतुलों’ में उपलब्ध होता है। मद्यपान और भोजन के बाद ाीतकाल में युवागृह के प्रांगण में अलाव जलाए जाते हैं, जिनके पास बैठकर कहानियां सुनाकर मनोविनोद किया जाता है। कामाास्त्र की ािक्षा इन गृहों में अनुभवी प्रौढ़-प्रौढ़ाएं ही देती हैं। अपनी इच्छानुसार युवक युवतियों को चुनते हैं और फिर विधिवत् इनका विवाह संपादित किया जाता है। कहा जाता है कि ‘गोतुल’ में गर्भाधान वर्जित है, लेकिन प्रेम स्वातंत्र्य के कारण यहां कभी-कभी चारित्रिक पतन भी हो जाता है।
वरिठ सहायक प्रोफेसर, हिंदी गांधी महाविद्यालय, उरई (जालौन)-285001 मोबाइल 9236114604

सोनी सिंह का कहानी संग्रह 'क्लियोपेट्रा' और स्त्री प्रश्न

युवा लेखिका सोनी सिंह का कहानी संग्रह 'क्लियोपेट्रा' सामयिक प्रकाशन से वर्ष २०१४ में आया है। १७६ पृष्ठ के इस संग्रह में आठ कहानियां हैं।  कहानियों को बहुत ही बोल्ड और बेबाक अंदाज में लिखा गया है। इन कहानियों में स्त्री अपनी देह स्वतंत्रता को हासिल करती है किंतु पुरुष सत्ता की दुरभिसंधियां कैसे उसकी उपलब्धियों का दिवाला निकालती है, इसका सुंदर चित्रण हुआ है।
संग्रह की कहानी चक्रव्यूह में दो बहनें अपने अपने क्षेत्र में शीर्ष स्थान पर अपनी योग्यता से बढती हैं किंतु अंत में दोनों को किस तरह निराशा के गर्त में जाना पडता है। इस कहानी से दो बडी महत्वपूर्ण उद्भावनायें प्रकट होती हैं एक तो यह कि पुरुष सत्ता किस तरह उसे आगे जाने से रोकती है, पराभूत करने में मजा लेती है और सदा अपने अधीन रखना चाहती है, दूसरी व्यंजना यह कि अति महत्वाकांक्षा किस तरह हताशा, कुंठा और अवसाद का कारण बनती है।
'खेल' कहानी में स्त्री और पुरुष का पोर्नोग्राफिक विवरण होते हुये भी वह उत्तेजना और सनसनी नहीं दिखाई गयी है, जैसी इस प्रकार के साहित्य या विजुअल्स में पाई जाती है। वर्जित प्रसंगों को कितनी सहजता से सोनी सिंह कथ्य में बुनती हैं, बिना उन शब्दों का प्रयोग किये, कि सारा दृश्य उपस्थित हो जाता है। सारी कहानी स्त्री पुरुष की मैथुन प्रक्रिया में घूमती है किंतु अंत यहां भी स्त्री की अतृप्ति में होता है।
'देहगाथा' वास्तव में योनिकथा है, जिसका यही नाम लेखिका ने रखा था, जिसे बोल्डनेस और बेबाकी के लिये प्रसिद्ध राजेन्द्र यादव चाहते हुये भी इस नाम के साथ हंस में नहीं छाप सके, क्योंकि लेखिका इसी शीर्षक से कहानी छपवाना चाहती थीं। संग्रह में भी यह देहगाथा के नाम से प्रकाशित है, पर है यह योनि की त्रासद गाथा ही, योनि को केन्द्र में रखकर लेखिका ने स्त्री जाति की अंतर्वेदना को प्रस्तुत किया है।  पुस्तक के कवर पर पीछे योनि चित्र भी दिया हुआ है, चित्र में योनि पर बूंद कमल के ऊपर लगा जाला प्रतीकार्थ में स्त्री की त्रासदियों को व्यक्त करता है। सोनीसिंह ने संग्रह की अन्य कहानियां भी ऐसे प्रतीकों के सहारे लिखी हैं। वह अपने एक अन्य लेख में दास कैपिटल की तरह योनि कैपिटल लिखे जाने के पक्ष में हैं, क्योंकि इसे कुछ शुद्धतावादियों ने नासूर बना दिया है।
'गाडफादर का फेमिनिस्ट फार्म' कहानी में स्त्रियों को महत्वाकांक्षी उडान भरने के लिये कैसे छला जाता है। स्त्री लेखिकाओं और उनके आकाओं पर यह कहानी अच्छा तंज कसती है।
अन्य कहानियों में लिव इन रिलेशनशिप के पहलुओं के वर्णन और स्त्री की उन्मुक्तता है, सोनी सिंह अपनी आकांक्षा सिद्धि में देह को एक उपकरण बनाने वाली स्त्रियों को वीरांगनायें कहती हैं उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं लगता, क्योंकि लेखिका की नजर में स्त्री का व्यक्तित्व जब तक योनि में कैद रहेगा, उसे आजाद होने के लिये संघर्ष ही करना पडेगा। इस बात को उन्होंने 'क्लियोपेट्रा' कहानी, जो संग्रह की प्रतिनिधि कहानी भी है, में भली भांति व्यक्त किया है। क्लियोपेट्रा, जो इजिप्ट की यौन स्वतंत्रता की प्रतिमूर्ति है, इसके बल पर वह वहां की रानी बन जाती है, इसी के समानांतर भारत की सांवरी का चरित्र लेखिका ने गढा है। सांवरी भी यौन स्वतंत्रता के सहारे धनबल से समृद्ध हो जाती है अब वह चुनाव लडने की तैयारी करती है। कहानी में यहां तक तो स्त्रियां आगे जाती हैं, पर इससे आगे जब बढने लगती हैं तो क्लियोपेट्रा द्वारा स्वतंत्र दरबार लगाने पर वहां के राजा द्वारा जहरीले सर्पों से डसवाकर मरवा दिया जाता है, पुस्तक के आवरण पर सर्पों के बीच क्लियोपेट्रा सुशोभित है। वहीं सांवरी को उसके पति द्वारा ही गुंडों को सुपारी देकर मरवा देते हैं, क्योंकि वह अब राजनीतिक इच्छाशक्ति रखने लगी थी।
स्त्री विमर्श में सबसे अधिक जो विवाद का बिंदु है, उसी पर लेखिका की यह कहानियां केंद्रित हैं। इस विमर्श में यह प्रश्न अभी भी विचारणीय बना हुआ है कि सामाजिक तानाबाना और जो अपने देश की विवाह संस्था है, उसका क्या होगा! क्या यह भी एक तरह का भ्रष्टाचार नहीं, जिसमें देह को उपकरण बनाकर स्त्रियां अपनी महत्वाकांक्षा पूरी कर रही हैं। कौन कितनी ज्यादा बोल्ड, बहस भी इसे करार देते हैं। इस पर मुझे यही कहना समीचीन लगता है कि स्त्रियां स्वयं समाज के आधे और महत्वपूर्ण वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, उन्होंने भी राष्ट्र और समाज के उन्नयन की दृष्टि से प्रतिमान बनाये होंगे, उन्हें भी उन्ही जिम्मेदारियों का अहसास होगा, जिनका 'ठेका' पुरुष सत्ता उठाती आई है। फिर इसे हम उस प्रतिक्रिया के रूप में भी ले सकते हैं, जिसमें तमाम मर्द उपदेश देते हैं ये करो वो करो न करो। रात में न निकलो, ऐसे कपडे न पहनो, लडकों से गलती हो जाती है, मेरी कोई होती तो गोली मार देता आदि आदि और दम यह कि हम 'मर्द' हैं तो उसकी प्रतिक्रिया स्त्री समाज से इस तरह आती है तो अचरज क्यों हो!  लेखिका स्त्रीपुरुष के अंतरंगतम प्रसंगों के प्रचंड आवेगों को जो शिल्प देती हैं, वह किसी के लिये आसान नहीं है और इस कृति का इस रूप में स्वागत होना चाहिये। जिस तरह हम पुरुष पर विश्वास करते आये हैं, स्त्रियों पर भी करके देखें, जो निराशा और कमी अब तक देखी गयी, शायद अब वह न रहे, मैं नाउम्मीद नहीं हूं।
डा राकेश नारायण द्विवेदी
वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर, हिंदी
गांधी महाविद्यालय, उरई (जालौन)
मोबाइल 9236114604

मातृभाषा राजभाषा और राष्ट्रभाषा

मातृभाषा राजभाषा और राष्ट्रभाषा
भारतेंदु हरिश्चंद ने कओ है - निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौ मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय कौ सूल ।।
इतै निज भाषा कौ अर्थ मातृभाषा सें है, जौन भाषा जनम के समय से ही बालक सुनत और सीखत हैं, उ भाषा खों मातृभाषा कओ जात है। जा भाषा में जो मिठास और अपनत्व होत है बौ धरतीभर में दुरलभ है । रबींद्रनाथ टैगोर ने मताई के दूद के समान ही मां की बोली खों मानो है। ई तरा से जो आदमी जी बोली के आंचल जनमत है और अपनों कामकाज करत है बा बोली उ के लाने मातृभाषा कई जात है। हमाई मातृभाषा बुंदेली है । बंुदेलखंड भारत को जिउ मानो जात और उ जिउ की जा बोली बुंदेली है।
बोली और भाषा में मुक्ख अंतर उ की ब्यापकता को होत है। बोली को छेत्र सीमित होत जबकि भाषा को छेत्र ब्यापक । बोली को ब्याकरण होबौ जरूरी नइयां लेकिन भाषा को ब्याकरण होबो जरूरी मानो जात है। बोली और भाषा में जे अंतर कैबे सुनबे भरके लानें हैं, काए सें के ब्रज एक बोली है लेकिन उ के संगे हम भाषा लगाउत है । जा बोली में समृद्ध साहित्य रचो गओ है जा सें जा बोली सम्मान पाकें भाषा कई जान लगी। दूसरें, खड.ीबोली जो हमाई सरकार के कामकाज के माध्यम की भाषा है। भारत की राजभाषा जेई है, जीखों बोली कही जात है लेकिन है जा भाषा।
भारत की राजभाषा ऑफिशियल लेंग्वेज संबिधान के अनुच्छेद 343 की उपधारा 1 के अनुसार हिंदी, लिपि देवनागरी और अंकन कौ सरूप अंतरराश्टीय है, जी देश कौ सरकारी कामकाज जौन भाषामें करो जात उएै राजभाषा कई जात है। जबअपने देश  में 14 सितंबर 1949 के दिन हिंदी खों राजभाषा के रूप में मंजूर करो गओ तब पं0 नेहरू जैसे कछू लोगन ने कई कै अबे सरकारी कामकाज निपटाबे के लानें शब्दनके मायने पारिभाषिक शब्दावली को बिकास होबे मेंसमय लगै सो 15 सालके लाने अंगरेजी खों सह राजभाषा बना दओ जाबे। ई तरा हिंदी के संगे अंगरेजी खों  संगलगेठी राजभाषा बना दओ गओ। जबकि अपने देश में जबसे संस्कृत कमजोर होत गई प्राकृत अपभ्रंश सौरसेनी आदि नाव सें भाषा बदलत रई। अपनी बोलचाल की भाषाउ बुंदेली पूरे देश में छाई रई। कछू प्रांत अपवाद हैं। आज दुरभाग्य सें ब्यावहारिक स्थिति जा बन गई है कि सबरौ कामकाज अंगरेजी में निपटाओ जान लगो और हिंदी केवल अनुवाद की भाषा बन कें रे गई। 15 साल के लाने बनी सहराजभाषा अंग्रेजी खों आंगे बनाए रखबे या हटाए रखबे के लाने 1965 में प्रस्तावआओ, ई पै कई राज्यन नें आपत्ति जताई,भौतई मंथन भओ, तबइ पं0 नेहरू ने निष्कर्ष दओ के जब तकदेश कौ एक राज्य  भी हिंदी खों एकमात्र राजभाषा बनाए रखबे में आपति करै, तब तक हिंदी खों अकेली राजभाषा   नई बनाओ जैहै और जा स्थिति ऐसी बन गई कि देश के 29 राज्य जब तक एक साथ हिंदी खों अकेले राजभाषा बनाबे के लाने सहमत नइ हुइएं तबलों हिंदी खों दोयम दरजा दओ जात रैए। नागालैंड जैसे राज्यन में तो बाकायदा अंगरेजियइ खों राजभाषा बना रखो
राश्टभाषा नैशनल लैंग्वेज किसी समूचे राश्ट में बोली और ब्यवहार में जी भाषा खों प्रयोग करो जात उए राश्टभाषा कओ जात है । अपने देश में कैउकन भाषाएं जुदेजुदे अंचलन में प्रयोग में लाई जात                                                                        

'कई चाँद थे सरे आसमां' की समीक्षा

थाइलैंड और उसका जनजीवन

थाइलैंड और उसका जनजीवन

डा राकेश नारायण द्विवेदी

15 से 21 अक्टूबर 2013 को संपन्न मेरी थाइलैंड यात्रा न केवल पहली विदेश यात्रा थी, वरन् यह पहली बार की हवाई यात्रा भी थी । मात्र साढ़े चार घंटे की हवाई यात्रा से दक्षिण पूर्व एशिया के इस सुंदर और संपन्न देश में पहुंचा जा सकता है । दुनिया के कुछ देशों में जाने के लिये अग्रिम वीज़ा लेने की आवश्यकता नहीं है, थाइलैंड भी उनमें से है । यहां पासपोर्ट धारक सीधे पहुंचकर वीज़ा आन अराइवल की सुविधा ले सकते हैं । इसमें भी अगर पंक्ति में खड़े होने की असुविधा से बचना है तो दो सौ बाट अतिरिक्त देकर अलग काउंटर से वीज़ा बनवा सकते हैं । एक हज़ार बाट यहां की वर्तमान वीज़ा फीस है । बाट थाइलैंड की मुद्रा का नाम है, जिसकी दर वर्तमान में दो रुपये में एक बाट की है । अमेरिकन डालर से बाट खरीदे जाते हैं । जिस तरह वर्तमान में अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, उसी तरह अमेरिकन डालर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा है । लगभग तिरसठ रुपये में एक डालर खरीदा गया । नियमानुसार थाइलैंड वीज़ा प्राप्त करने के लिये न्यूनतम पांच सौ डालर या एक हजार पाच सौ बाट अपने साथ रखने आवश्यक होते हैं । जब मुझे यह मेरे टूर निर्देशक और विश्व हिंदी मंच के अध्यक्ष डा प्रणव शर्मा ने बताया तो मेरी प्रतिक्रिया थी कि कदाचित् फोकटिया लोगों की आवश्यकता ऐसे देशों को नहीं है ।

गो इंडिगो के जिस विमान से यात्रा हुयी, उसमें तीन तीन कुर्सियां होती हैं, जो भारतीय रेल के कुर्सीयान का स्मरण कराती हैं । रेलों में एयर होस्टेज की तरह नवयुवतियों की सेवायें उपलब्ध नहीं होतीं, पर विमानों में ये निशुल्क पेयजल देती हैं । शुल्क भुगतान करने पर खानपान की सुविधा भी प्राप्त होती है । विमान में लघुशंका करने के बाद फ्लश चलाने पर पानी नहीं निकलता, वरन् सोख्ता करके कमोड की सफाई होती है । कमोड में पानी से गुदा प्रक्षालन की सुविधा नहीं थी, पानी की खाली बोतल होस्टेज से लेकर काम चलाना पड़ता है । पता नहीं कैसे कुछ व्यक्ति बिना पानी प्रक्षालन किये हुये, टिसू पेपरों से पोंछकर ही काम चला लेते हैं । यह स्थिति बैंकाक के होटल रायल पैलेस में भी रही, जिसमें हम लोग तीन दिन ठहरे । बिहार के एक सज्जन को अत्यधिक परेशानी हुयी, उन्होंने कहा, हम तो पेपर पढ़ते है, उससे यह काम नहीं किया जा सकता ।

थाइलैंड के लोग शांत प्रकृति एवं अपने काम से काम रखने वाले होते हैं । धीरे से अपनी बात रखते हैं । चीखने चिल्लाने से दूर रहते हैं । गौर वर्णी, नाटा क़द, चौड़ा माथा, उन्नत उरोज और पुष्ट जंघाओं वाली थाई युवतियों की आंखें कुछ धंसी हुयी होती है, इसीलिये वे अपनी आंखों पर प्राय: आइलिड लगाती हैं । यहां की महिलायें छोटे किंतु निजी अंगों को ढंके हुये वस्त्र पहनती हैं । साड़ी यहां भारतीय स्त्रियां ही पहने हुये मिलेंगी ।  पुरुषों का पहनावा भारतीय पुरुषों से भिन्न नहीं है । ४४अक्षरों वाली थाई यहां की मुख्य भाषा है ।  थाई सर्वाहारी होते हैं । पृथ्वी का हर जीव जंतु इनका खाद्य है । जीवित सफेद झींगा बड़े चाव से ऐसे खाते हैं, जैसे भारत में लाई चना खाये जाते हैं , शाकाहार में इनका विश्वास अल्प ही है । आम तौर पर थाई शाम को सात बजे तक अपना डिनर कर लेते हैं । समय और अनुशासन के धनी थाई खूब मेहनती होते हैं । स्त्रियां अधिक काम करती हुयीं देखी गयीं । हवाई अड्डे पर एक युवती का यही काम था कि आगंतुकों को कोई कठिनाई न होने पाये, वह जा जाकर लोगों को गाइड कररही थी । थाई अपने काम के प्रति बेहद निष्ठावान होते हैं । टूर और ट्रेवल्स को बढ़ाने पर इनका विशेष ज़ोर रहता है । जिस काम के लिये यह धनराशि लेते हैं, उसे संतुष्टिपूर्ण ढंग से संपन्न करते हैं ।  थाइलैंड में आधे से अधिक जन बौद्ध धर्मावलंबी हैं, धर्म का समाज से गहरा नाता होता है । जिस तरह बौद्ध धर्म में बाह्याचारों का स्थान नहीं, उसी प्रकार यहां का समाज कोई क्या कर रहा है, उसे रोकना टोकना ज़रूरी नहीं मानता । पारंपरिक रूप में थाइलैंड की सभ्यता भारत की प्राचीन सभ्यता से भिन्न नहीं है । इस देश का पुराना नाम सियाम है । इसकी रुचियां और संस्कार भारतीयों से भिन्न नहीं है । यहां किंग राम का ही शासन है । हमेशा राम का ही शासन रहता है । इस अर्थ में यहां रामराज्य ही रहता है । नवें राम इस समय यहां के शासनाध्यक्ष हैं । आगे इनकी इकलौती पुत्री इस ज़िम्मेदारी को निभायेंगी । राजकुमारी संस्कृत में उच्च शिक्षित हैं । इनकी शिक्षा दिल्ली से ही पूरी हुयी है । थाइलैंड में अयुध्या है, सीता के नाम पर अनेक स्थान नाम हैं । हवाई अड्डे पर समुद्र मंथन की अप्रतिम शिल्पकारी देखते ही बनती है और यह देखकर लगता ही नहीं कि हम भारत में नहीं हैं । संस्कृत के कई शब्द ध्वनिगत अंतर के साथ थाइलैंड में सुने जाते हैं । स्वागत के लिये स्त्रियों द्वारा कहा जाने वाला "सवातिका" स्वस्तिक से मिलता जुलता है ।

पर्यटन केंद्र कैसे विकसित किये जायें, यह थाइलैंड से अच्छी तरह जाना जा सकता है । इन्होंने बैंकाक शहर के मध्य प्रवाहित हो रही नदी में क्रूज (पानी के जहाज) चला रखे हैं, जिनकी दो मंजिलों पर बैठकर चलते हुये जबाज में लोग डिनर करते हैं, गानों पर जमकर थिरकते हैं । गीत गाने वाली थाई बालायें भारत पाकिस्तान के सद्भाव में जिंदाबाद के नारे लगवातीं हैं । जिस देश के पर्यटक अधिक होते हैं, उस देश के गाने अधिक गाती हैं । भारत के पर्यटक ही अधिक संख्या में देखे जाते हैं । भारत के लोग भी पाकिस्तानियों के आगे नाच गाकर देश भक्ति और सद्भाव का विरल नज़ारा पेश करते हैं । यद्यपि भारत और पाकिस्तान के स्त्री पुरुषों में तनाव की छाया भी झांकती रहती है कि कहीं कोई अवांछित न हो जाये । फोटो खींचकर बेचना यहां हर पर्यटन जगह पर प्रचलित है । वह चाहे पटाया बीच और कोरल आइलैंड पर ग्लाइडिंग करते हुये हो, क्रूज पर सुंदरी के साथ, सफारी वर्ल्ड में सील एवं डाल्फिन मछलियों तथा चिम्पाजियों द्वारा चुंबन करते हुये हो या चाहे स्टंट करते हुये जांबाजों के साथ हो । आइ पैड, मोबाइल और कैमरा के बढ़ते प्रचलन के बीच भी ये लोग अपने फोटो बेच ही लेते हैं, क्योंकि फोटो पेश करने का इनका तरीक़ा आकर्षक होता है । तस्तरी पर, फोल्डर बनाकर, पटाया और बैंकाक की सुंदर प्राकृतिक पृष्ठभूमि में किसी पर्यटक का जब ये फोटो िबना उसकी जानकारी के उसके सामने प्रस्तुत करते हैं तो पर्यटक सहज ही १००-२०० बाट अपनी जेब से निकाल कर दे देते हैं।

थाइलैंड को प्रायः लोग मौज मस्ती के लिये जानते हैं, पर यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि यहां बिना हार्न के ही सारे वाहन दौड़ते हैं । हफ्ते भर के प्रवास में मैंने हार्न नहीं सुना । यदि कोई हार्न बजाता है तो बताया गया कि पुलिस उसे एक इमरजेंसी मानती है । किसी खतरे के बिना यहां हार्न नहीं बजाया जाता और यह यहां के लोगों में सहज अभ्यास में सम्मिलित हो गया है । कोई व्यक्ति गुटखा, पान मसाला चबाते हुये यहां नहीं दिखा । कहीं सार्वजनिक स्थान पर थूकना भी यहां विरल ही है । थाइलैंड के सफारी वर्ल्ड में जंगली जीव जंतु, पशु पक्षी पूर्ण सुरक्षित और हमारे इतने क़रीब हैं कि रोमांच होता है । वाहन सेंसर लगे जालीदार दरवाज़ों को स्वतः खोलकर और बंदकरते हुये प्रवेश एवं निकास करते हैं । वाहन में बैठकर सड़क किनारे बने मचानों पर चीतों, भालुओं और शेरों की मस्ती को देखकर मन भयमिश्रित पुलकायमान हो जाता है । बिना तनाव के हम इन वन्य पशुओं का दीदार बिना जाली के यहां करते हैं । इन पशुओं को भरपूर तृप्तिदायक भोजन मिलता हो, जिससे ये अपने सामने से निकलते पर्यटकों पर हमला नहीं करते । दर्जनों की संख्या में एक साथ ऐसे हिंस्र पशु किसी चिड़ियाघर में अन्यत्र दिखाई नहीं पड़े ।

थाइलैंड के लोगों में सेक्स बेचने की प्रवृत्ति देखी जाती है । यहां स्त्री पुरुषों के नग्न शो भी होते हैं, कामक्रीड़ा करते हुये शो देखना वीभत्सकारी लग सकता है । मुझे लगता है इसे देखने का एक बार आकर्षण होता ही होगा ।  सेक्स वर्करों की नंबर प्लेट लगाकर नुमाइश होती है, जिनमें से कामातुर पर्यटक चयन कर घंटे भर के ही चार पांच हजार रुपये सहर्ष खर्च कर देते हैं । सेक्स वर्कर सम्मान की जिंदगी जीती हैं । सेक्स जैसे बंद विषय को जानने की दृष्टि से ऐसे शो वयस्क भूमिका का निर्वाह करते हैं । सामाजिक ताने बाने और धर्म की भूमिका इसमें प्रमुख मानी जा सकती है । कहने को तो यहां कहा जाता है, "गुड बायज गो टु टेंपल, बट बेड बायज कम टु पताया", पर साथ ही पर्यटकों को इसके लिये प्रोत्साहित भी किया जाता है । इसके पक्ष में अनेक तर्क दिये जाते हैं कि भारत में काम को ठेंगे पर और सेक्स को दिमाग में रखा जाता है, किंतु इस देश में काम को दिमाग में और सेक्स को समुचित स्थान पर रखा जाता है । भारतीय संस्कार कभी कभी इस देश को चकलाघरी देश के रूप में निरूपित करने की ओर उन्मुख करते हैं । मसाज केंद्रों की यहां भरमार है, आम तौर पर थाइलैंड की महिलायें फुट मसाज, ड्राइ मसाज, आइल मसाज, एरोमाथेरेपी केंद्रों पर परिश्रमपूर्वक मसाज करती हैं । इनके श्रम और समर्पण को देखकर यह कहना ही पड़ता है कि आगंतुक की संतुष्टि इनका सर्वोपरि ध्येय होता है ।
शब्दार्णव, 245 ए, नया पटेल नगर,
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डा राकेश नारायण िद्ववेदी