Wednesday, November 3, 2021

प्रकाशोदय पर्व दीपावली

ब्रह्मांड व्यापी पदार्थ और ऊर्जा का जब अखंड चेतना मे रूपांतरण होता है, तब प्रकाश का उदय होता है. यह चेतना उजाले और अंधेरे सब में भास्वर होती है. यह प्रकाश चेतना ध्वनि में है और श्वास प्रश्वास में भी. प्राणन में जो चेतना प्रवाहित हो रही है, उसी को उपलब्ध होना प्रकाशित होना है. इस उपलब्धि या अयोध्या में ही राम वापस आकर बसते हैं. चमकती हुयी रोशनी उसका स्थूल रूप है. स्थूलता में चमकती रोशनी में ही पदार्थ गतिमान दिखायी पड़ते हैं. 


सूर्य, चंद्र और तारे प्रकाश देते हैं, सदा अस्तित्वमान रहते हैं. पर दीपक अनथक प्रकाश देता है और प्रकाश देते हुए स्वयं को अर्पित कर देता है. यह जलता हुआ दीपक जीवन का प्रतीक है. जलते दिए की अस्थिरता की भाँति जीवन चलता है. 

दीपक का तेल/घी प्रेम और भक्ति का प्रतीक है, इसकी बाती इच्छा का प्रतीक है. दीपक की लौ का शीर्ष भाग ज्ञान का तो उसका ऊष्म भाग प्रेम और भक्ति  का प्रतीक है. ज्ञान भाग में ही हमारे गुरुदेव निवास करते हैं.


यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।��योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।गीता 6.19।।

जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए यतचित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।।


न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥कठोपनिषद २/२/१५, मुंडक और श्वेताश्वतर में भी है..

वहां न सूर्य प्रकाशित होता है और चन्द्र आभाहीन हो जाता है तथा तारे बुझ जाते हैं; वहां ये विद्युत् भी नहीं चमकतीं, तब यह पार्थिव अग्नि भी कैसे जल पायेगी? जो कुछ भी चमकता है, वह उसकी आभा से अनुभासित होता है, यह सम्पूर्ण विश्व उसी के प्रकाश से प्रकाशित एवं भासित हो रहा है।


गीता में यह इस प्रकार आया है..

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।15.6।।

उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है।। 


शुभ दीपावली🙏

Thursday, May 13, 2021

गायत्री मंत्र स्वरूप और महत्व

गायत्री : स्वरूप और महत्व
राकेश नारायण द्विवेदी

बृहदारण्यक उपनिषद के पांचवें कांड में गायत्री स्वरूप का विस्तृत विवेचन मिलता है। गायत्री के चार पाद हैं। एक द्यौ (स्वर्ग), भूमि और अंतरिक्ष से मिलकर, दूसरा वेदत्रयी से तो तीसरा प्राण, अपान और व्यान से मिलकर बनता है। चौथा पैर सूर्य का है, यह दिखाई देता भी है और नहीं भी दिखता। शरीर मे सूर्य आंख का अधिष्ठातृ देवता है। सूर्य आंख पर ही विश्राम करता है। भू सिर को भुवः हाथों को और स्व पैरों को कहा जाता है। 
गया की रक्षा करने के कारण गायत्री नाम हुआ। गया प्राण को कहा गया है।  बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है। प्राणा वै गयाः,  तत्प्राणांस्तवे, तद्यद्गयांस्तवे, तस्माङ्गायत्री नाम।  गया के इस अर्थ से  गया शहर और बोधगया में बुद्ध को प्राप्त बोधि का भी क्या कोई सम्बन्ध है! क्या गो जिसका अर्थ इंद्रियां होता है, गोस्वामी से तो उसका अर्थ प्रकट ही है, गोकुल और गाय से भी क्या कोई अर्थ संगति बनती है!
ऋग्वेद में गायत्री के दो अलग-अलग मंत्र मिलते हैं। एक 3/62/2 में बहुप्रचलित गायत्री मंत्र मिलता है-

 तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

हे मनुष्यो ! सब हम लोग (यः) जो (नः) हम लोगों की (धियः) बुद्धियों को (प्रचोदयात्) उत्तम गुण-कर्म और स्वभावों में प्रेरित करै उस (सवितुः) सम्पूर्ण संसार के उत्पन्न करनेवाले और सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त स्वामी और (देवस्य) सम्पूर्ण ऐश्वर्य के दाता प्रकाशमान सबके प्रकाश करनेवाले सर्वत्र व्यापक अन्तर्यामी के (तत्) उस (वरेण्यम्) सबसे उत्तम प्राप्त होने योग्य (भर्गः) पापरूप दुःखों के मूल को नष्ट करनेवाले प्रभाव को (धीमहि) धारण करैं।

दूसरा मंत्र ऋग्वेद 5/82/1 में दिया गया है- 

तत्स॑वि॒तुर्वृ॑णीमहे व॒यं दे॒वस्य॒ भोज॑नम्। श्रेष्ठं॑ सर्व॒धात॑मं॒ तुरं॒ भग॑स्य धीमहि ॥

हे मनुष्यो ! (वयम्) हम लोग (भगस्य) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त (सवितुः) अन्तर्य्यामी (देवस्य) सम्पूर्ण के प्रकाशक जगदीश्वर का जो (श्रेष्ठम्) अतिशय उत्तम और (भोजनम्) पालन वा भोजन करने योग्य (सर्वधातमम्) सब को अत्यन्त धारण करनेवाले (तुरम्) अविद्या आदि दोषों के नाश करनेवाले सामर्थ्य को (वृणीमहे) स्वीकार करते और (धीमहि) धारण करते हैं (तत्) उसको तुम लोग स्वीकार करो। 
इन दोनों मंत्रो के अर्थ यहाँ स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत दिये हुए हैं। इन अर्थों में गायत्री का रहस्य प्रकट नही होता है। 
पूज्यपाद स्वामी जी महाराज दतिया की पुस्तक वैदिक उपदेश में गायत्री मंत्र मूल तो नहीं मिलता है, पर उसका हिंदी अर्थ जो दिया है, वह ऋग्वेद 5/82/1 की व्याख्या प्रतीत होती है, उन्होंने लिखा है सभी वस्तुएं हम सबको प्राप्त हों तथा हे मनुष्यो सब लोग उस अमूल्य ब्रह्मलोक परमात्मा के परम प्रकाश को प्राप्त करो। 
गायत्री का रहस्य खुलता है छान्दोग्य उपनिषद में। जिसमे ऋग्वेद 5/82/1 का मंत्र इस प्रकार दिया गया है। अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत्समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ 5/2/7॥

. Then, while saying this Ṛk mantra foot by foot, he eats some of what is in the homa pot. He says, ‘We pray for that food of the shining deity,’ and then eats a little of what is in the homa pot. Saying, ‘We eat the food of that deity,’ he eats a little of what is in the homa pot. Saying, ‘It is the best and the support of all,’ he eats a little of what is in the homa pot. Saying, ‘We quickly meditate on Bhaga,’ he eats the rest and washes the vessel or spoon. Then, with his speech and mind under control, he lies down behind the fire, either on the skin of an animal or directly on the sacrificial ground. If he sees a woman in his dream, he knows that the rite has been successful [and that he will succeed in whatever he does].
छान्दोग्य उपनिषद के साथ बृहदारण्यक उपनिषद का पांचवां कांड देखना चाहिए। इसमे गायत्री मंत्र का स्वरूप स्पष्ट हुआ है। गायत्री की उपासना का संकेत  छान्दोग्य उपनिषद में किया गया है। ऋग्वेद के पांचवे मंडल का ही मंत्र आदि शंकराचार्य पर बनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में बोला जाता है। किसी समय देखी इस फ़िल्म में सुने उस मंत्र पर ध्यान तो जाता है, पर बहुप्रचलित गायत्री मंत्र के बरक्स उसका पूरा महत्व नहीं मिलता, जिससे वह जिज्ञासा वही अधूरी रह जाती है। बृहदारण्यक उपनिषद के इस कांड को पढ़ने पर गायत्री मंत्र और उसकी उपासना का रहस्य खुल जाता है। गायत्री प्राण शक्ति है, इसीलिए इसे सूर्य उपासना के तौर पर भी लिया जाता है। उपनिषदों में आये अर्थ के बाद भी उपासना पूरी तरह नहीं खुलती, यह तो गुरुदेव की कृपा के फलस्वरूप ही साधक को प्राप्त होती है। लेकिन गायत्री उपासना पर इतना बल क्यो दिया गया है, यह सुस्पष्ट हो गया है।

Saturday, February 13, 2021

दस दिन हिमालय के संग संग

दस दिन हिमालय के संग संग
      चुप रहने के दौरान एक दिन अचानक भगवान बद्रीनाथ के दर्शन की इच्छा हुई। वहाँ जाने के लिए विचार-प्रकिया चल पड़ी। घर में बात की तो धर्मपत्नी ने वहाँ की दुर्गमता और मौसम की अनिश्चितता के भय से और पुत्री की जिम्मेदारी के कारण हिमालय यात्रा जाने मे अनिच्छा प्रकट की। पुत्री को यह यात्राएँ धार्मिक रीति की लगती हैं, इसलिए उसकी इच्छा पूर्व विदित ही थी। तथापि मुझे जाने की स्वीकृति इन लोगों की तरफ से मिल गई। 
तत्काल श्रेणी में कानपुर से हरिद्वार जाने के लिए मैंने आई आर सी टी सी की वेवसाइट पर आरक्षण कराने हेतु प्रयास किया, पर दो मिनट के लिए मेरे अकाउट को रोककर एजेंट सारी सीट बुक करा लेते हैं, इसलिए अगले दिन भी प्रयास करने पर टिकट आरक्षित नहीं हो सकी। विवश होकर उरई के एक एजेंट को टिकट कराने के लिए कहा उन्होने हरिद्वार तक संगम लिंक एक्सप्रेस में अगले दिन का टिकट करा दिया। 6 जून को सायं 6 बजे बस से कानपुर के लिए प्रस्थान कर गए। रेलगाड़ी के निर्धारित समय से कुछ विलंब से हमारी बस कानपुर पहुँची, किंतु रेलगाड़ी धीरे-धीरे तीन धंटे की देरी से कानपुर आई। हरिद्वार पहुँचते-पहुँचते रेलगाड़ी ने निर्धारित समय से सात घंटे का विलंब कर दिया। 
रेलगाड़ी के आरक्षण के बाद मैंने हरिद्वार से बद्रीनाथ जाने के लिए इंटरनेट पर साधन देखे। निजी संचालकों से संपर्क किया, पर उन पर भरोसा नहीं जमा, मेरे अकेले होने के कारण उन्होंने भी रुचि नहीं दर्शाई। यह देखते हुए गढ़वाल मंडल विकास निगम की साइट पर पहुंचे, वहां देखा कि बद्रीनाथ अकेले नहीं, बल्कि केदारनाथ और बद्रीनाथ का संयुक्त टूर जाता है, पर वह भी 8 जून को उपलब्ध नहीं था। 8 जून को उनका टूर नंबर 4 ऋषिकेश, उत्तराखण्ड के चारों धाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बद्रीनाथ जाने वाला था। इसमें तीन सीटे खाली थी। रूपए 23520/- जमा कराके एक सीट आरक्षित कर ली। इनोवा कार से यात्रा के लिए कम से कम चार सीटें आरक्षित होती हैं। सायं 7.30 बजे 7 जून 2019 को हरिद्वार से एक टेम्पो में सवार होकर ऋषिकेश के लिए चले। टेम्पो चालक ने एक सौ रूपए मागें थे। उसने रास्ते में एक दूसरे टेम्पो में बिठाया और एक सौ रूपए का नोट देने पर बीस रूपए वापस कर दिए। दूसरे टेम्पो में कुछ स्थानीय महिलाऐं सवार थी। वे हंसने लगीं, पूछने पर उन्होंने बताया किराया तो चालीस रुपए ही है। 
रात दस बजे गढ़वाल मंडल विकास निगम के ऋषिकेश स्थित भारत भूमि रेस्ट हाउस पहुंचे उन्होने तत्काल एक कमरा दे दिया, वहां भोजन किया। गढ़वाल मंडल विकास निगम (जी एम वी एन) उत्तराखण्ड सरकार का प्रतिष्ठान है। गढ़वाल में जगह-जगह महत्वपूर्ण स्थानों पर निगम के आधुनिक सुविधा युक्त सुंदर रेस्ट हाउस और होटल बने हैं। इन्ही में भोजन सुविधा भी उपलब्ध हैं। आरक्षित टिकट में निगम की तरफ से यात्रा के अतिरिक्त आवास व्यवस्था सम्मिलित है। भोजन का खर्चा यात्री को स्वयं वहन करना होता हैं। निगम की यह व्यवस्था यात्रियों के लिए सुविधाजनक हैं, यहां सुरक्षित, सुंदर और सुरुचिपूर्ण आवास और अपने खर्चे पर भोजन मिलता हैं। 
8 जून को प्रातः 7.30 बजे ऋषिकेश से हमारी बस यमुनोत्री जाने के लिए रवाना हुई। बस में तेलंगाना, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार राज्य के कुल चौबीस यात्री थे। इनमें गढ़वाल निवासी एक दंपत्ति मुंबई से आए थे। ऋषिकेश से देहरादून के रास्ते डाम्टा, बड़कोट होते हुए दिन भर की यात्रा के बाद सायं 6 बजे फूलचट्टी नामक स्थान पर निगम के रेस्ट हाउस पहुंचे। फूलचट्टी से प्रातः हम लोगों को बस द्वारा जानकी चट्टी पहुंचना था। वहां से पैदल यमुनोत्री 6 किमी है। यमुनोत्री सुबह 10.30 बजे पहुंच गए। यमुनोत्री चार धाम यात्रा का आरभिक स्थल हैं। यम और यमुना सूर्य और संज्ञा के जुडवां पुत्र एवं पुत्री है। संज्ञा जब सूर्य के ताप को सहन नहीं कर सकी तो उन्होनें छाया के नाम से एक क्लोन तैयार कर लिया। एक दिन यम ने छाया को लात मार दी। इस पर गुस्से में छाया ने यम को शाप दे दिया कि तेरी टांग सड़कर गिर जाए। जब यमुना धरती पर आई तो उसने अपने तपस्यारत भाई के इस कष्ट को दूर किया। यम इससे बहुत प्रसन्न हुआ और वरदान दिया कि यमुनोत्री में जो स्नान करेगा उसे दर्दनाक और अकाल मृत्यु से छुटकारा मिलेगा और मोक्ष की प्राप्ति होगी। 
हरिद्वार से यमुनोत्री 233 किमी0 है यमुनोत्री 12972 फुट (3291 मी0) की ऊँचाई पर स्थित हैं। यमुनोत्री के मुख्य ग्लेशियर को मंदिर के समीप से ही देखा जा सकता हैं। दर्शनार्थी उस ग्लेशियर पर चढ़ जाते हैं, जिसके नीचे से यमुना का जल निकलना शुरू होता है। यमुनोत्री के बगल में ही 89 सेटीग्रेड गर्म जल का सूर्य कुंड हैं। यमुनोत्री जाने के लिए घोड़े-खच्चर, पालकी और पोनी खूब मिलते हैं। खच्चरों की लीद पहाड़ों के झरनों से बह रहे जल से मिलकर सड़ांध या बदबू पैदा करती हैं। इसकी सफाई होती है पर इसमें अभी बहुत सुधार किये जाने की आवश्यकता है। एक टोकरी में यात्री को बिठाकर नेपाली युवक लादकर ले जाते हैं पालकी में चार व्यक्ति लगकर श्रद्धालुओं को ले जाते है। घोड़ों-खच्चरों की सुविधा से यह यात्रा सुगम हो जाती है। अधिकांश यात्री पैदल ही यहां जाते है। खच्चरों से यात्री गिरकर घायल भी होते हैं, पर इसकी फिक्र श्रद्धालु नहीं करते। यमुनोत्री में श्रद्धालु अपनी साड़ी और अन्य पहने हुए कपडें छोड़कर आ जाते हैं, जिससे वहां का सौदर्य तो विकृत होता ही हैं नदी का प्रवाह भी बाधित होता है। सरकार या व्यवस्थापकों को वह कपड़े निकालने में धन खर्च करना पड़ता हैं। यमुनोत्री से उसी दिन वापस आकर हम लोग फूलचट्टी में रात्रि विश्राम किए। यमुनोत्री के दर्शन और स्नान करने के उपरांत अब हम गंगोत्री जाने के लिए वापस बड़कोट के रास्ते धरासू, डुंडा उत्तरकाशी होते हुए हर्षिल में दिन भर की यात्रा करने के बाद रात्रि में 9 बजे पहुंचे। यहां करीब तीन धंटे हम लोग जाम में भी फंसे रहे। हर्षिल गंगोत्री से 25 किमी0 पहले एक सुरम्य स्थान हैं। यहां भी भागीरथी के किनारे निगम का सुन्दर होटल हैं। गंगोत्री से लेकर देवप्रयाग तक गंगा का नाम भागीरथी हैं राजा भगीरथ के तप से गंगा पृथ्वी पर आई हैं, इसलिए इसका सुयश भगीरथ को देने के लिए यह यहां भागीरथी कही जाती हैं। उत्तरकाशी से आगे मनेरी बांध हैं, जिससे बिजली भी बनाई जाती हैं और थल सेना का बड़ा केन्द्र हैं। यहां से चीन की सीमा निकट हैं, अतः सेना का अपना हैलीपैड भी यहां हैं। हर्षिल से प्रातः 6 बजे हम लोग निकले। निकलते ही कई ऊँचे- ऊँचे ग्लेशियरों का दर्शन हुआ। प्रकृति के समक्ष समर्पण मनुष्य का स्वभाव है, यह उसकी परिणति भी हैं। उत्तराखण्ड के पवित्र पहाड़ और नदियां प्रकृति के उच्चतर उदाहरण हैं। यहां श्रद्धालु और पर्यटक सब तरह के यात्री आते हैं। जो पर्यटक केवल मौज मस्ती और गर्मी से बचने के लिए यहां आते हैं। वे भी यहां के पोर-पोर में स्थापित आध्यात्मिक चेतना को अनुभव कर सकते हैं। ऊँचे पहाड़ों की यात्रा मनुष्य की चेतना को समस्वर करने के उद्देश्य से धार्मिक रीति नीति में जोड़ी गई। पहाड़ और नदियों से जुड़ी कहानियों को कोई गलत माने, पर भारत की चेतना में इन्हें बड़े गहरे आत्मसात् किया गया हैं, यह भारत की बड़ी विशेषता है। प्रकृति के रोमांच तो दुनिया भर में बिखरे पड़े हैं, लेकिन भारत की प्रकृति विशिष्ट है और भारत की मनीषा इन्हें स्वयं से अभिन्न रूप में जोड़ती हैं। हिन्दू, सिख, बौद्ध और जैन धर्मों के श्रद्धा केन्द्र उत्तराखण्ड में दर्शनीय हैं। 
ऊँचें पहाड़ों और हिमालय की दुर्गम यात्रा यहां के लोग सहजता से संपन्न कराते हैं। हिमालय भी पहाड़ ही हैं, बस यह सदा हिमावृत रहते हैं, और थोड़े और ऊँचें हैं इसलिए इन्हे हिमालय कहा गया हैं। 
मैदानी क्षेत्रों के राजमार्गों पर सौ किमी0 चलने पर भी हमें कोई न कोई दुर्घटना दिख जाएगी, पर यहां के सर्पिल घुमाव में पहाड़-दर-पहाड़ हजारों किमी0 संकरी सड़कों पर भी हमें कोई दुर्घटना नहीं दिखी। यह अवश्य है कि गर्मी के मौसम से भीड़-भाड़ बढ़ने से यहां वाहनों के लबे जाम लग जाते हैं, जो घंटों में खुल पाते हैं, पर यहां के ड्राइवर बड़े घैर्य, समझदारी और सहयोग से आने-जाने वाले वाहनों को पास कराते हैं। अगर अपने वाहनों को आगे पीछे करने की जरूरत हुई तो यह खुशी-खुशी कर लेते हैं। यहां के वाहन चालकों को कोई जल्दी नहीं होती और जाम में फंसे होने के कारण हुई देरी पर कोई क्षोभ भी नहीं। बरसात के मौसम में पहाड़ों पर भूस्खलन होता रहता हैं, पर यहां उसके प्रति भी एक तरह की सहजता है पर्यटन यहां के लोगों की आय का मुख्य साधन हैं। चार-पांच महीने में अर्जित आय से वर्ष भर का गुजारा होता हैं। 
उत्तराखण्ड में दुनिया की प्रचीनतम नगरी कहीं गई काशी हैं तो कई पवित्र नदियों के संगम प्रयाग भी हैं। यहां उत्तरकाशी में भगवान विश्वनाथ का मंदिर हैं। उत्तरकाशी का पुराना नाम बाड़ाहाट हैं। उत्तरकाशी वस्णा और अस्सी नदियों के मध्य में स्थित हैं। एक तरफ असी और भागीरथी का संगम हैं तो दूसरी सीमा पर वरूणा और भागीरथी का संगम हैं। उत्तरकाशी को सौम्यकाशी भी कहा गया। स्कंद पुराण में इयमुत्तर काशी हि प्राणिनां मुक्तिदायिनी कहा गया। यहां के विश्वनाथ मंदिर के सामने शक्ति स्तंभ लेख पर अंकित विवरण के अनुसार यह शहर 6-7 वीं शाताब्दी में मध्य हिमालय के प्रसिद्ध ब्रह्मपुर राज्य की राजधानी रहा हैं। यह विवरण ह्वेनसांग द्वारा दिया गया हैं। 
उत्तराखण्ड में समस्त तीर्थाें और पवित्र नदियों का संगम हुआ है। यहां प्रमुख रूप से पांच प्रयाग मिलते हैं। प्रयाग का अर्थ हैं दो नदियों का मिलन स्थल। बद्रीनाथ और जोशीमठ के बीच अलकनंदा और धौलीगंगा नदियों का संगम विष्णुप्रयाग कहा जाता हैं। पांच प्रयागों मे से यह हिमालय से उतरते समय पहला संगम हैं। इसके बाद नंद प्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग तथा देवप्रयाग संगम मिलते हैं। नंदप्रयाग यदुवंशियों का राज्य रहा हैं। कर्णप्रयाग में अलकनंदा में पिंडर नदी मिलती है। अलकनंदा बद्रीनाथ के ऊपर से निकलती हैं और जब तक यह ऋषिकेश के पास देवप्रयाग में भगीरथी से नहीं मिलती, इस नदी में पांच पदियों के संगम हो जाते हैं। रुद्रप्रयाग में अलकनंदा और मंदाकिनी नंदियों का संगम होाता हैं। मंदाकिनी नदी केदारनाथ के पास से निकली हैं। पांचवां प्रयाग, देवप्रयाग हैं, यहां भागीरथी और अलकनंदा का संगम हुआ हैं। इसमें सरस्वती नदी का भी संगम हुआ। सरस्वती नदी बद्रीनाथ से आगे माणा गांव के पास निकली हैं जहां एक भीम शिला हैं। कहते हैं भीम ने इस शिला के द्वारा सरस्वती नदी पर पुल बना दिया और रास्ते पांडव सी स्वर्गारोपण किए। गंगा को मंदाकिनी भी कहा गया है। केदार क्षेत्र से निकली मंदाकिनी रुद्रप्रयाग में भागीरथी से मिलकर गंगा बन जाती है। हिमालय क्षेत्र में अनेक नदियां झरने और बर्फीले सोते मिलकर गंगा को समृद्ध करते जाते हैं। 
भागीरथी गोमुख और गंगोत्री से निकल कर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिल जाती हैं भागीरथी और अलकनंदा दोनों नदियों का रंग मटमैला हैं, किन्तु मंदाकिनी नीलवर्णा हैं। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद यह गंगा कही जाने लगती हैं। वस्तुतः राजा भगीरथ के कठिन तप के बाद गंगा जी स्वर्ग से जब उतरी तो पश्चात्वर्ती लोक मानस ने भागीरथी को श्रेय देने के आशय से देवप्रयाग तक इसे भागीरथी नाम दिया। गंगा को जह्नु ऋषि से जुड़ा होने से जाह्नवी भी कहा गया हैं। 
यमुनोत्री से निकली यमुना का रंग श्यामल हैं। यमुना की जलधारा उत्तराखण्ड के बाद पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से होते हुए उत्तरप्रदेश के बड़े भूभाग से प्रवाहित होते हुए प्रयागराज में गंगा से मिलती हैं। 
उत्तराखण्ड में उत्तरकाशी ही नहीं, गुप्तकाशी भी हैं। केदारनाथ से निकली मंदाकिनी नदी के किनारे के एक ओर गुप्तकाशी है तो इसके दूसरे किनारे पर उरवी मठ हैं जहां के ओकारेश्वर मंदिर में बाबा केदार की पूजा की जाती हैं। केदारनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं तब बाबा, केदार इस मंदिर में आकर विराजते हैं तो बद्रीनाथ की कपाट बंदी में बद्रीनारायण जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में आकर  रहने लगते हैं। 
गुप्तकाशी से आगे फाटा होते हुए सोनप्रयाग पहुंचते हैं। सोन प्रयाग से आगे पांच किमी0 गौरीकुंड तक उत्तराखण्ड शासन से अनुबंधित चार पहिया वाहन यात्रियों को लेकर आते-जाते हैं। गौरीकुड से केदारनाथ 16 किमी0 का रास्ता पैदल अथवा खच्चर/पालकी से तय किया जाता हैं। गौरीकुंड में मंदाकिनी के किनारे एक तप्त कुंड हैं। गर्म जल के कुंड यमुनोत्री और बद्रीनाथ में भी हैं। सोनप्रयाग के नाम में प्रयाग जुड़ने से प्रतीत होता हैं कि यहां भी नदियों का संगम होगा, पर वर्तमान में मंदाकिनी ही यहां प्रवाहित होती हैं। 2013 में जब केदारनाथ में बाढ़ प्रलय हुई थी तब से वहां यात्रियों की संख्या एक निश्चित दबाव से अधिक न हो, इसके लिए शासन ने सोनप्रयाग में एक यात्री पंजीकरण/सुविधा केन्द्र खोल दिया हैं। यहां पंजीकरण करने के बाद ही यात्री को खच्चर/पालकी का पंजीकरण हो पाएगा। उत्तराखण्ड यात्रा का एप भी प्ले स्टोर से डाउनलोड करके केदारनाथ सहित सभी धामों की यात्रा का पंजीकरण किया जा सकता हैं। 
केदारनाथ क्षेत्र में 2013 की बाढ़ में एक बड़ी चट्टान बहकर मुख्य मंदिर के एक छोर पर टिक गई थी, जिससे मंरि को क्षति नहीं पहुंची यद्यपि मंदिर के आस पास के सारे होटल, धर्मशालाएं, बाजार इत्यादि बहकर समाप्त हो गए। तब से सरकार यहां निजी संचालकों को निर्माण कार्य कराने पर रोक लगाए हैं। आदि शंकराचार्य की समाधि भी उस बाढ़ में बह गई। केदारनाथ  मंदिर के मुख्य पुजारी ने बताया अब भगवत्वाद शंकराचार्य की समाधि का निर्माण कार्य प्रारंभ हो रहा हैं। केदारनाथ मंदिर के पुजारी कर्नाटक के वीरलिंग शैव संप्रदाय के आचार्य होते हैं। 
उत्तराखण्ड में विभिन्न पौराणिक नदियों के पांच प्रयाग हैं तो पांच बद्री और पांच केदार भी यहां हैं। हर बद्री और हर केदार की अपनी विशेषता है। प्रमुख या वर्तमान बद्रीनाथ मंदिर/क्षेत्र नर और नारायण पर्वत के मध्य में हैं। बद्रीनाथ मंदिर के पीछे नर और नारायण पर्वत के बीच हिमाच्छादित नीलकंठ पर्वत शिखर की शोभा दर्शनीय हैं। यहां नारद और सूर्यकुंड भी हैं, जिनमे गर्म जल उपलब्ध रहता है।
विशाल बदरी बद्रीनाथ से भिन्न स्थान हैं। योगध्यान बदरी पांडुकेश्वर में पांडु ने जिनका ध्यान किया हैं, वह कहलाए हैं। जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच में यह स्थान हैं। भविष्य बद्री जोशीमठ से 17 किमी0 दूर है। कहते हैं जब नर और नारायण पर्वत भविष्य में मिलकर एक हो जाएँगें और बद्रीनाथ के दर्शन लुप्त हो जाएंगें तब भविष्य बद्री पर आकर बद्रीनाथ के दर्शन सुलभ होंगे। यहां पत्थर पर बद्रीनाथ का आकार निरंतर बड़ा होता जा रहा हैं। आदि बद्री कर्णप्रयाग से 16 किमी0 दूर रानीखेत के रास्ते पर हैं। काले पत्थर की भगवान विष्णु की मूर्ति यहां हैं। वृद्ध बदरी जोशीमठ से 7 किमी0 दूर अनीमठ में हैं। यहां आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने भगवान विष्णु की उपासना बद्रीनाथ जाने से पहले की थी। कहा जाता है कि भगवान विष्णु एक वृद्ध के रूप में यहां गणेश जी के याथ खेला करते थे।
महाभारत युद्ध में अपने भाइयों को मारने के बाद प्रायश्चित करने के आशय से पांडव भगवान शिव की आराधना काशी में रहकर करने लगे, पर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन नहीं दिया और तब पांडव गुप्तकाशी में जाकर तपस्या करने लगें। भगवान शिव तब केदार क्षेत्र में जाकर रहने लगे। पांडवों ने शिव तपस्या जारी रखी। 
शिव एक भैंसे के रूप में वेष बदलकर छिप गए, पांडवों ने शिव की इस रूप में पहचान कर ली, शिव धरती में समा गए, लेकिन उनकी कूबड़ दिखती रही, इसी स्वरूप की पूजा केदारनाथ मंदिर में की जाती हैं। यहां शिव को घी का लेप किया जाता है। 
मान्यता है कि शिव की भुजाएं तुंगनाथ के शिव मंदिर में हैं, चेहरा रूद्रनाथ में नाभि मद महेश्वर मंदिर में तो जटा और सिर का भाग कल्पेश्वर मंदिर में मौजूद हैं। इन्ही पांच अलग-अलग पवित्र स्थानों को पंचकेदार कहा जाता हैं।
रुद्रनाथ में ही वैतरणी नदी बहती हैं कहा जाता हैं दिवंगत आत्माएं मुक्ति के लिए इस नदी को पार करके ही सूक्ष्म और कारण विश्व में जाती हैं। रुद्रनाथ गोपेश्वर से 23 किमी0 हैं, जिसमें पहले पांच किमी0 मोटर वाहन से और शेष 18 किमी0 पैदल जाना पड़ता हैं। पैकेज्ड टूर में पांचों बद्री और पांचों केदार नहीं ले जाया जाता हैं। यद्यपि पांच प्रयागों से होते हुए यह यात्रा संपन्न होती हैं। 
जोशीमठ से आगे गोविंद घाट से 15 किमी0 दूर पैदल/खच्चर के रास्ते हेमकुंड पहुंचा जा सकता हैं। यहां सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने ध्यान किया था। सात बर्फीली चोटियों के नीचे हेमकुंड सरोवर और गुरूद्वारा बना हुआ हैं। गुरुद्वारा के समीप लक्ष्मण जी का मंदिर भी यहां हैं। इस पवित्र सरोवर को 1930 में एक सिख हवलदार सोलन सिंह ने खोजा था। 

Saturday, December 26, 2020

बुंदेली 'नर' और उसका अर्थविकास


बुंदेली 'नर' और उसका अर्थविकास
राकेश नारायण द्विवेदी
बुंदेली में अब भी कई शब्द ऐसे प्रचलित हैं, जिनकी संगति न केवल वैदिक वाङमय से बैठती है, अपितु बौद्ध और यहां तक कि संगम या तमिल साहित्य से भी उनका मेल बैठता है।
बुंदेली भाषा का प्रयोग क्षेत्र भारत के उत्तरी और दक्षिणी भागों के मध्य ही नहीं, पूर्वी और पश्चिमी भूभाग के बीच भी अवस्थित है। भारत के उत्तरी और दक्षिणी  हिस्सों में आर्य और द्रविड़ संस्कृति का विभाजन रहा है। बुन्देलखण्ड इन दोनों के बीच मे होने से उत्तरी और पूर्वी भाग की संस्कृत, प्राकृत, पाली और पुरानी हिंदी की शब्दावली से जुड़ा रहा है। बुंदेली में कतिपय शब्द-पद ऐसे भी मिलते हैं, जिनका प्रयोग क्षेत्र इस अंचल से बाहर वह क्षेत्र भी है, जिसे वैदिक संस्कृति में भी नहीं गिन सकते। इस आलेख में नर शब्द की अर्थ चर्चा करेंगे।
'नर' की अर्थव्याप्ति बहुत अधिक है। कोई शब्द अपने एक अर्थ से होता हुआ कहाँ तक पहुँच जाएगा, इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल है। नर शब्द का प्रचलित हिंदी अर्थ व्यक्ति है, जिसमे स्त्री, पुरुष और उभयलिंगी मनुष्य सम्मिलित हैं, पर बुंदेली में नर का एक अर्थ पेट या उदर है। नर भरना मुहावरा यहां पेट भरने की व्यंजना के अर्थ में प्रयुक्त होता है, अन्न द्वारा भूख शांत करने के लिए नहीं। किसी शब्द का अर्थ विकास उन शब्दों के पर्यायवाची शब्दों में मिलता है, पर कई बार देखते हैं कि किसी शब्द के अनेकार्थ होते हैं। उन अर्थों में परस्पर समानता नहीं मिलती। उनमें संगति नहीं दिखती, उसका कारण है कि वह शब्द प्रसंग विशेष में प्रयुक्त हुआ, पर उसका उद्गम भाव कुछ अन्य था। पर्यायवाची शब्द वैयाकरणों ने अपनी सुविधा के लिए तय किये हैं, पर कोई शब्द दूसरे शब्द का पर्याय नहीं होता। प्रत्येक शब्द एक विशिष्ट भावदशा और क्रिया सम्पादन के लिए प्रयुक्त होता है, उसका समानार्थी किसी अन्य शब्द को मान लिया जाता है, पर वह ठीक-ठीक वही नहीं होता, जिसके लिए वह पहली बार प्रयुक्त होकर रूढ़ हुआ है। भाव सागर में जब व्यक्ति गोते लगाता है तो उसे व्यक्त करने के लिए शब्द बौने पड़ने लगते हैं। जिस व्यक्ति ने जितनी भावदशाओं को व्यक्त कर लिया, वह उतना बड़ा साहित्यकार बन गया। सम्पूर्ण भावदशाओं को व्यक्त नहीं किया जा सकता। साहित्य में इन भावों को पूरी तरह शब्दबद्ध न कर पाने के कारण विभिन्न ललित कलाएं विकसित हुई, चित्रकला, मूर्तिकला इत्यादि। इन कलाओं में भी जब यह भावालोडन बना ही रहा तो संगीत और वाद्य से भी उसे जानने समझने का प्रयत्न किया गया, पर फिर भी उसे केवल अवगाहन ही किया जा  सका है।
नर का अर्थ व्यक्ति हिंदी में है, पर बुंदेली में यह कभी न मिटने वाली क्षुधा को शांत करने वाला उदर है। नर का अर्थ व्यक्ति ग्रहण करने के लिए हमे बुंदेली भाषा के इस शब्द की गहराई में जाना होगा। बुंदेली में एक शब्द नरा भी है, जो गर्भस्थ शिशु और प्रसूता मां की नाभियों से जुड़ा रहता है। जनन के समय इसे काटकर जच्चा और बच्चा को पृथक किया जाता है। गर्भनाल ही बच्चे के विकास को प्रेरित करती है। इसी की वजह से बच्चा मां के गर्भ में जीवित रहता है। यह सुरक्षा के साथ-साथ पोषण देने का भी काम करती है। यह बच्चे को कई तरह के संक्रमण से सुरक्षित रखने का काम करती है। गर्भनाल मां और बच्चे को जोड़ने का काम करती है। मां जो कुछ भी खाती है, आहार नाल के माध्यम से उसका पोषण बच्चे को भी मिलता है। गर्भनाल बच्चे के लिए फिल्टर की तरह भी काम करती है। यह उस तक सिर्फ पोषण पहुंचाती है और विषैले पदार्थों को भ्रूण तक नहीं जाने देती। नरा काटने की प्रक्रिया यहां सम्पादित की जाती है। गर्भावस्था में बच्चे की गर्भनाल ही उसकी लाइफलाइन होती है जिसकी मदद से बच्चे को सभी पोषक तत्व और ऑक्सीजन मिलता है। ये गर्भाशय में आपको और बच्चे को छठे सप्ताह से बच्चे के जन्म तक जोड़े रखता है।
बच्चे के कुल वजन का छठा हिस्सा इसी गर्भनाल का होता है। नरा गाड़ना एक और बुंदेली मुहावरा है, जिससे व्यक्ति के मूल निवासी होने का बोध होता है। कोई व्यक्ति जहां जन्म लेगा, वहाँ का निवासी स्वाभाविक रूप में होगा ही, अब आवागमन बढ़ने से यह मुहावरा अर्थ छवि खो रहा है।
यहां भी नर का अर्थ व्यक्ति पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता है। नर का एक अर्थ जल है, नार भी उसे कहते हैं। नारायण (Narayan) नार + अयन
नारायण में संधि का प्रकार (Type of Sandhi) : Dirgha Sandhi (दीर्घ संधि)। 
जल' एक बहुश्रुत शाश्वत वाक्य 'जन्मात् लयपर्यंतं यत् स्थितं तज्जलम्' का प्रत्याहार या 'शॉर्टफॉर्म' है। अर्थात जो वस्तु इस संसार के जन्म से लेकर उसके समाप्त होने तक मौजूद रहे, वह 'जल' कहलाती है। 'ज' अर्थात् जन्म और 'ल'अर्थात् 'लय' (अथवा प्रकृति में लीन हो जाना) इन दो क्रियाओं का वाचक जल कहलाता है।
मनुस्मृति में लिखा है कि 'नर' परमात्मा का नाम है । परमात्मा से सबसे पहले उत्पन्न होने का कारण जल को 'नार' कहते हैं । महाभारत के एक श्लोक के भाष्य में कहा गया है कि नर नाम है आत्मा या परमात्मा का । यह 'नार'' कारणस्वरूप होकर सर्वत्र व्याप्त है इससे परमात्मा का नाम नारायण हुआ । कई जगह ऐसा भी लिखा है कि किसी मन्वतंर में विष्णु 'नर' नामक ऋषि के पुत्र हुए थे जिससे उनका नाम नारायण पड़ा । ब्रह्मवैवर्त आदि पुराणों में और भी कई प्रकार की व्युत्पत्तियाँ बतलाई गई हैं । तैत्तिरीय आरण्यक में नारायण की गायत्री है जो इस प्रकार है—'नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्' । यजुर्वेद के पुरुषसूक्त और उत्तर नारायण सूक्त तथा शतपथ ब्राह्मण (१६ । ६ । २ । १) और शांखायन श्रौत सूत्र (१६ । १३ । १) में नारायण शब्द विष्णु या प्रथम पुरुष के अर्थ में आया है । जैन लोग नरनारायण को ९ वासुदेवों में से आठवाँ वासुदेव कहते हैं ।
जल को 'नीर' या 'नर' से जाना जाता है और भगवान विष्णु पानी में रहते है तो उनको नाम नारायण बना ।नारायण को मतलब है पानी के अंदर रहने वाले भगवान।

पानी का जन्म भगवान विष्णु के पैरों से हुआ है. पानी को नीर या नर भी कहा जाता है. भगवान विष्णु भी जल में ही निवास करते हैं. इसलिए नर शब्द से उनका नारायण नाम पड़ा है. इसका अर्थ ये है कि पानी में भगवान निवास करते हैं. इसीलिए भगवान विष्णु को उनके भक्त 'नारायण' नाम से बुलाते हैं.
नारायण का शाब्दिक अर्थ : नर के चलने के लिए दिखाया गया मार्ग (orbit) होता है।

चूंकि सनातन धर्म में ईश्वर को परम आत्मा माना गया है, और सभी मनुष्यों को उसी एक परम पिता की संतान, अतः उस ईश्वर के बताय रास्ते पर चलना ही सब मनुष्यों का ध्येय बनता है |
इसलिए परमात्मा के लिए भी नारायण शब्द का प्रयोग करते हैं |
नारासु अयनं,यस्य स: नारायण:। जल में है घर जिसका , अर्थात् नारायण --क्षीरशायी श्री हरि विष्णु। ईश्वर, भगवान,परमात्मा।
जल पीने से भूख भी शान्‍त हो जाती है; प्‍यासे मनुष्‍य की प्‍यास अन्‍न से नहीं बुझती। हमारे शरीर मे तीन चौथाई हिस्सा जल ही है, उसी प्रकार भूमण्डल का तीन चौथाई हिस्सा भी जलाप्लावित है। यह अलग बात है कि उसमें से 97.5 प्रतिशत जल पीने योग्य नहीं है।
सब प्राणी जल से पैदा होते हैं और जल से ही जीवन धारण करते हैं और उसी में लय हो जाते हैं। कबीर कहते हैं-
जल में कुंभ कुंभ में जल है बाहर भीतर पानी। 
फूटा कुंभ जल जलहिं समाना
यह तत कथ्यो ग्यानी। 
वेदों में वर्णित है- अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा।।
अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः।।

मुझ (मंत्रदृष्टा ऋषि) से सोमदेव ने कहा है कि जल में (जलसमूह में) सभी औषधियाँ समाहित हैं। जल में ही सर्व सुख प्रदायक अग्नि तत्व समाहित है। सभी औषधियाँ जलों से ही प्राप्त होती हैं।

 आपः पृणीत भेषजं वरुथं तन्वेsमम।।
ज्योक् च सूर्यं दृशे ।।

हे जल समूह! जीवनरक्षक औषधियों को हमारे शरीर में स्थित करें, जिससे हम निरोग होकर चिरकाल तक सूर्यदेव का दर्शन करते रहें।।

जल’ की उत्पत्ति के संबंध में एक अन्य पुरातन- अवधारणा भी विचारणीय है। लगभग सभी पुराणों और स्मृतियों में यह श्लोक (थोड़े-बहुत पाठभेद से) दिया रहता है जो इस अर्थ का वाचक है कि जल की उत्पत्ति ‘नर’ (पुरुष = परब्रह्म) से हुई है अतः उसका (अपत्य रूप में) प्राचीन नाम ‘नार’ है, चूंकि वह (नर) ‘नार’ में ही निवास करता है, अत: उस नर को ‘नारायण’ कहते हैं-

आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।।

-ब्रह्मपुराण/अ-1/श्लोक-38

विष्णुपुराण के अनुसार इस समग्र संसार के सृष्टि कर्ता ‘ब्रह्मा’ का सबसे पहला नाम नारायण है। दूसरे शब्दों में में भगवान का ‘जलमय रूप’ ही इस संसार की उत्पत्ति का कारण है-

जल रूपेण हि हरिः सोमो वरूण उत्तमः।
अग्नीषोममयं विश्वं विष्णुरापस्तु कारणम्।।

-अग्निपुराण /अ.-64/श्लोक 1-2

‘हरिवंश पुराण’ भी इसकी पुष्टि करता है कि ‘आपः’ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। ‘हरिवंश’ में कहा गया है कि स्वयंभू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सर्वप्रथम ‘जल’ की ही सृष्टि की। फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधीन किया जिससे एक बहुत बड़ा ‘हिरण्यमय-अण्ड’ प्रकट हुआ। वह अण्ड दीर्घकाल तक जल में स्थित रहा। उसी में ब्रह्माजी प्रकट हुए-

ततः स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्।।35।।
हिरण्य वर्णभभवत् तदण्डमुदकेशयम्।
तत्रजज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयंभूरिति नः श्रुतम्।। 37।।

इस ‘हिरण्यमय अण्ड’ के दो खण्ड हो गये। ऊपर का खण्ड ‘द्युलोक’ कहलाया और नीचे का ‘भूलोक’। दोनों के बीच का खाली भाग ‘आकाश’ कहलाया। स्वयं ब्रह्माजी ‘आपव’ कहलाये-

‘उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्ञज्ञिरे।
आपवस्य प्रजासर्गें सृजतो ही प्रजापतेः।।49।।’

अर्थात्- इस प्रकार प्रजा की सृष्टि रचते हुए उन ‘आपव’ (अर्थात् जल में प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्मा के अंगों में से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए।

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का रसमय रूप आदि से अंत तक जो परब्रह्म है, जिसे तत् कहा गया, उसे आप कहा गया। आप सम्बोधन में वह जल ही आत्मतत्व को व्यक्त कर रहा है।

-हरिवंश/हरिवंश पर्व/प्रथम अध्याय

‘जल’ केवल ‘नारायण’ ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु और महेश (रूद्र) तीनों है।

‘वायु पुराण’ के अनुसार जल शिव की अष्टमूर्तियों में से एक है। दूसरे शब्दों में ‘रूद्र’ की उपासना के लिए जो आठ प्रतीक निर्धारित हैं उनमें से एक जल है।
जल का कोई रंग नहीं होता। वह इंद्रधनुष के सभी रंगों को धारण कर सकता है। उसका कोई आकार नहीं, आवाज भी नहीं और गति भी नहीं। 

सिद्ध और नाथ परम्परा में भोगनाथ के नाम से विख्यात चीन के लाओत्से ने जल की तरह व्यक्ति को रहने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा है 
 The supreme good is like water, which nourishes all things without trying to. It is content with the low places that people disdain. Thus it is like the Tao. In dwelling, live close to the ground. In thinking, keep to the simple. In conflict, be fair and generous. In governing, don't try to control. In work, do what you enjoy. In family life, be completely present. When you are content to be simply yourself and don't compare or compete, everybody will respect you.
बिहारी ने इसे एक सुंदर दोहे में इस प्रकार कहा है-
नर की अरु नर नीर की एकै गति कर जोइ । जेतो नीचे ह्वै चले तेतो ऊँचे होइ ।—बिहारी
आदिवासियों की एक लोककथा में आता है कि सृष्टि के आरंभ में केवल माता, रात्रि और जल ही था। 
जल ही सब सभ्यताओं और संस्कृतियों का विभाजक तत्व है। नदी के ऊपर या नदी के नीचे, इस प्रकार लोगों को बांटा जाता रहा। किस नदी से हो, यह पहचान व्यक्ति की रही। अपनी नदी या जल के प्रति सच्चे रहे तो अंततः समुद्र में मिल ही जायेंगे। दो भिन्न जल जब मिलते हैं तो प्रयाग बनता है, इसी से हमने भिन्न गोत्रों में विवाह करना सीखा है। मरने के बाद भी वैतरणी नदी का प्रतीक हमने बनाया, जो चाहे कहीं मौजूद न हो, पर जल तत्व ही हमारी मरणोत्तर गति के साधनो में है। 
गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।। 
भावार्थ- छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं। (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गंदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गई हो।
 समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥
सरिता जल जलनिधि महुँ जोई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥
भावार्थ : जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एक-एककर) सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्री हरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है।
स्कॉटलैंड में नर का अर्थ प्रसन्नता, कोरिया में देश, मंगोलिया में सूर्य तो कुर्दिस्तान में इसका अर्थ अनार वृक्ष होता है।
जापान के मध्य भूभाग में, होन्शु द्वीप स्थित है, वहां नर नामक एक शहर है, यह जापान की पहली राजधानी (710-784) रहा। जापानी बौद्धों का यह  महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां के ऐतिहासिक स्मारक को यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्मारकों में सम्मिलित किया गया है।
सायोनारा एक फिल्मी गीत में आया शब्द है, जिसका अर्थ अलविदा होता है।
अमेरिका में नर बहुत लोकप्रिय शिशु नाम है।
वराहमिहिर की वृहत्संहिता और बाल रामायण में नर का अर्थ हीरो या नायक से लिया गया है।
नर से ही विकसित होकर नीर बना है, जल के अर्थ में इसे प्रयुक्त किया जाता है। 
नर्दा (जलस्रोत), नरेटी (जल पूरित नारियल का बाह्य भाग), नर्र्याबो (जल की उग्रता के कारण चीत्कार का अर्थ), नरुवा (डंठल) इत्यादि शब्दों में जल की विभिन्न गतियों के कारण अर्थ उद्भासित हो रहे हैं।
कश्मीरी शैव दर्शन और त्रिक साधना पद्धति में शिव एवं शक्ति के अतिरिक्त तीसरा त्रिक नर नाम से है। यह नर यहां भी जीव के लिए प्रयुक्त हुआ है।
इस प्रकार नर का अर्थ जब जल से होते हुए व्यक्ति तक पहुचता है तो इसमे अर्थ की इयत्ता की सीमा नहीं रहती, उसी तरह जैसे 'मनुष्य' के अर्थ में असीम सौंदर्यबोध प्रकट होता है। नर और नारायण की युति भी यूं ही नहीं हुई। भगवान के चौबीस अवतारों में से यह एक अवतार हैं, जो बद्रीनाथ हिमालय में अगल बगल के दो पहाड़ों के रूप में मान्य हैं। करोड़ों वर्ष पहले आज के हिमालय की जगह समुद्र था। सब मिलाकर हिंदी में नर का अर्थ जल से होते हुए व्यक्ति तक विकसित हुआ है। 
245 शब्दार्णव, नया पटेल नगर, कोंच रोड, उरई -285001(जालौन) मोबाइल 9236114604

Friday, November 10, 2017

व्यक्ति नाम निर्वचन

व्यक्ति नाम निर्वचन
राकेश नारायण द्विवेदी
व्यक्ति नामों में स्वगुणार्थकता न होने के कारण उन्हें निरर्थक मानने वाला एक वर्ग है। विलियम शेक्सपियर (1564-1616) ने मानव जीवन की शाश्वत भावनाओं को बड़ी कुशलता से चित्रित किया है। रोमियो एंड जूलियट शेक्सपियर के प्रारंभिक नाटकों में है। इसकी कथावस्तु का सार है- जुलाई का महीना था। बसंत ऋतु अपनी जवानी पर थी। बेरोना नगर के एक कुलीन परिवार के मांटेग्यू के घर मासक्यूडवार (मुखौटा नृत्य) का आयोजन हुआ था, यह रोमियो का अपना घर था।
नृत्य के अवसर पर केपुलेट परिवार की जूलियट भी रोमियो के घर आई हुई थी। इसी नृत्य के दौरान दोनो की आंखें चार हो गईं और हृदय की गहराई में उतर गई। रोमियो अपने को न रोक सका, उसने जूलियट के घर जाकर उसके निजी कक्ष में पहुंचकर अपने प्रेम का इजहार किया। जूलियट भी रोमियो पर फिदा थी। वह उसे पाने के लिए तड़प रही थी, किंतु दोनो परिवारों के बीच वर्षो से चली आ रही शत्रुता से रोमियो और जूलियट की शादी संभव नहीं थी। दोनों ने ऐसे में चुपके से एक गिरजाघर में जाकर शादी कर ली, लेकिन दुर्भाग्य से दोनो परिवारों में जंग छिड़ गई।
लड़ाई में रोमियो के एक करीबी दोस्त की मौत हो गई बदले में रोमियो ने भी जूलियट के चचेरे भाई की हत्या कर दी। रोमियो को देश के बाहर जाने की सजा मिली। इसी बीच जूलियट के पिता ने उसका विवाह पेरिस के काउंट के साथ निश्चित कर दिया। रोमियो नगर से निष्कासित जीवन जी रहा था। वह जंगल-जंगल भटक रहा था और जूलियट-जूलियट रट रहा था। रोमियो की अनुपस्थिति में जूलियट उदास थी। शादी से बचने के लिए वह नींद वाली दवाई पीकर सो गई ताकि सबको लगे वह मर चुकी है।
रोमियो को इस नाटक के बारे में कुछ पता नहीं था। जूलियट के मरने की खबर पाकर वह वहां पहुंचा। उदास मन से उसने जूलियट को अपना आखिरी चुंबन दिया और जहर पीकर अपनी जान दे दी। जब जूलियट का नशा उतरा तो सामने अपने प्रेमी की लाश देखकर वह सन्न रह गई। उसने रोमियो के छुरे से ही खुद को मार डाला। इस प्रकार दोनों ने एक साथ दुनिया को अलविदा कह दिया। दोनो परिवार उस समय एक भी हुए किंतु तब प्रेमी युगल दुनिया से उठ चुका था।
इस नाटक की पंक्ति ॅींजश्े पद ं दंउमघ् अर्थात् नाम में क्या रखा है को नाम चर्चा के समय बहुत अधिक उद्धृत किया जाता है। इसका संदर्भ जानना आवश्यक है, नाटक के द्वितीय अंक के द्वितीय दृश्य में जूलियट रोमियो के संबंध में कहती है -
जूलियट - आह रोमियो! क्यों हो तुम रोमियो! अपने पिता को अस्वीकृत कर दो, अपना यह नाम त्याग दो। यदि तुम ऐसा नहीं कर सकते तो तुम मेरे प्रेम से प्रतिश्रुत हो, फिर मैं केपुलेट नहीं रहूंगी। रोमियो (स्वगत) क्या मै और सुनता रहूं या इसका उत्तर दूं। जूलियट तुम्हारा नाम ही तो मेरा शत्रु है, तुम तुम ही हो, तुम मांटेग्यू नहीं हो। क्या है मांटेग्यू़़? न हाथ, न पांव, न बाहु, न आनन मनुष्य का कोई भी तो अंग नहीं। कोई और नाम रख लो न?
नाम में है ही क्या? यदि हम गुलाब को किसी और नाम से पुकारते, तो तब भी उसमें इतनी ही सुगंध आती। यदि रोमियो को इस नाम से न पुकारा जाता, तब भी रोमियो तो वही रहता? इस नाम के बिना भी उसकी यह बहुमूल्य पूर्णता तो अभावग्रस्त न होती। रोमियो! छोड़ दो अपना यह नाम। नाम में तुम्हारा कोई भाग नहीं, इस नाम के बदले मुझ संपूर्ण को ले लो।
रोमियों -तुम्हारा वचन ही मेरा प्रमाण हो। प्रेम ही तो मुझे चाहिए, मैं पुनः नामकरण संस्कार कराऊंगा। अब मैं कभी भी रोमियो नहीं रहूँगा।
‘नाम में क्या रखा है’ शेक्सपियर की यह बात भाषा विज्ञान की दृष्टि से गलत थी। गुलाब को अगर और नाम से पुकारे तो उसकी खुशबू चली नहीं जाएगी, पर और किसी नाम से पुकारने पर गुलाब की पहचान ही नहीं रह पाऐगी, क्योंकि गुलाब नाम उस फूल के लिए सामाजिक मान्यता प्राप्त कर चुका है। हम गुलाब को अन्य जो भी कहें, दूसरे व्यक्ति उसे कैसे समझ पाएंगे। दूसरी बात; वस्तुओं के नाम और व्यक्तियों के नाम एक ही तरह के नहीं होते। वस्तुओं के नामों के लिए सामूहिक स्वीकृति अनिवार्य है, वहीं व्यक्तियों के नाम परिवार की संस्कृति के दिग्दर्शक होते हैं।
यह उक्ति वस्तुतः नाम और शब्द को एक मानने के कारण कही गई। यह ठीक है कि नामों की निर्मिति हमारे चिरपरिचित शब्दों से होती है, परंतु शब्द जब एक बार नाम के रूप में प्रयुक्त होते हैं तब वे शब्द नहंी रह जाते। आक्सीजन और हाइड्रोजन के संयोग से जल बनता है। जल में उक्त दोनों तत्वों की अवस्थिति तो है परंतु जल बनने के पूर्व जैसी नहीं। अतः जल का परीक्षण विश्लेषण उसके निर्माणक तत्वों के विश्लेषण परीक्षण से भिन्न होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। इसीलिए शब्दों का अनुवाद अन्य भाषाओं में हो जाता है किंतु नामों को हमें यथारूप ही सभी भाषाओं में ग्रहण करना होता है। एक नाम से एक ही व्यक्ति या वस्तु का बोध होता है, परंतु जब वह नाम केवल शब्द ध्वनि मात्र होता है तब वह व्यक्तिवाचक से जातिवाचक बन जाता है।
इस उक्ति के समर्थक कहते हैं कि मानव मनोविज्ञान नाम को हल्का मानता हैं, इसलिए शेक्सपियर ने यह बात कही, लेकिन नामकरण के प्रति व्यक्ति की सजगता किसी से छिपी हुई नहीं है। नामकरण के समय मनुष्य के मन में बहुत सी सांस्कृतिक स्थितियां विद्यमान रहती हैं। चाहे वह किसी तरह का नाम रखे। शेक्सपियर के इस नाटक में ही नाम बदलने का मनोविज्ञान समझा जा सकता है, क्योंकि रोमियो और जूलियट के परिवारों में परस्पर शत्रुता थी और वे उस समस्यामूलक अतीत से अपना छुटकारा चाहते थे। जूलियट से प्रेम के कारण रोमियो अपना नाम बदलने के लिए तैयार भी हो जाता है। ऊपर दिए गए संवाद में दोनों प्रेमियों के परिवार नाम केपुलेट और मांटेग्यू के प्रति ही विरक्ति दिखाई पड़ती है। रोमियो के लिए तो जूलियट रोमियो नाम से ही पुकारती है।
नाम और शब्द को एक मानने का कारण यह भी रहा है कि इन दोनों के मूलरूपों का अध्ययन व्युत्पत्ति के माध्यम से किया जाता रहा है। वस्तुतः व्युत्पत्ति के लक्ष्य एवं उसकी प्रणालियों ने दीर्घकाल तक नामों को उन शब्दों के रूप में घटाने का प्रयास किया है, जो वे नाम बनने के पूर्व थे। इस प्रकार नामों के संकेतार्थ एवं वैशिष्ट्य को सर्वथा भुलाने का प्रयास किया गया है। जैसा हाल में सैफ अली और करीना कपूर के बच्चे का नाम तैमूर रखे जाने पर देखा गया। अर्थतत्व के रूप में बहुत से लोग तुर्की शब्द तैमूर का अर्थ लोहा लेते रहे, जबकि देश का बहुत बड़ा वर्ग इसे क्रूर मंगोल शासक तैमूर लंग से अनुकृत मानकर नामकर्ता की मानसिकता को दोषी बता रहा है। फेसबुक पर शबनम शुक्ला कहती है नाम अगर तलवार सिंह है तो क्या वह आदमी तलवार है। ऐसे भी नाम होते है, जिन्हें हम निरर्थक कह सकते हैं जैसे पप्पू, गुड्डू, गोलू, मुन्ना, पुल्लू, सट्टू इत्यादि। परंतु नाम रूप में वे सीधे भावना से जुड़कर एक विशिष्ट अर्थ की प्रतीति कराते हैं, जिसे हम नामवैज्ञानिक अर्थ कह सकते हैं। नाम का व्युत्पत्तिमूलक अन्वेषण ही नाम विज्ञानी का कार्य नहीं है, वह तो प्रत्येक नामवैज्ञानिक अध्ययन का प्रारंभिक सोपान है। प्रयोगवाद के नामकरण के सम्बन्ध में नामवर सिंह ने कहा है कि नामकरण प्रायः औचित्य-अनौचित्य का ध्यान रखे बिना ही हो जाता है। इसलिए प्रयोगवाद नाम निरर्थक और अपर्याप्त होते हुए भी हिंदी साहित्य के इतिहास में अब स्थापित तथ्य है। इससे अब एक निश्चित काल प्रवृत्ति का बोध होता है, प्रचलन से इसमें पर्याप्त अर्थवत्ता आ गई।
नाम के संबंध में पहली बात डाॅ भीमराव अंबेडकर ने भी यही मानी है कि नाम के अर्थ का प्रश्न उत्पन्न हो।
इसका अर्थ है कि नामी के बारे में पढ़ने-सुनने वाले व्यक्ति पर उसका पहला प्रभाव नाम से ही होता है। त्रिधा जिज्ञासा में नाम धाम और काम सम्मिलित है, किंतु नाम जिज्ञासा सर्वप्रथम है।
नाम और रूप का संबंध निरूपण करते हुए विद्याभूषण विभु ने लिखा है, नाम कल्पित एवं कृत्रिम है तो रूप प्रकृति-प्रदत्त। एक अदृश्य है तो दूसरा प्रत्यक्ष। दोनों में कला-कौशल है। एक में चातुर्य है, दूसरे में सौंदर्य। वाणी नाम का अनुष्ठान करती है, श्रवण उसका अभिनंदन करते हैं। रूप से नेत्रों का रंजन होता है। दोनों अंतःकरण के आकर्षण-विकर्षण के कारण होते हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व चिरकाल तक स्थिर नहीं रह सकता। अनामी रूप या अरूपी नाम कहीं न मिलेगा। परंतु नाम में एक विशेषता यह है कि वह गतिवान है।
नाम कैसे बनते हैं-
भारत मे इस विषय पर विचार सर्वप्रथम यास्क ने किया, जिसेे निघंटु तथा निरुक्त कहा गया है। निघंटु भारत में ही नहीं, विश्व में कोश निर्माण का सर्वप्रथम ज्ञात प्रयास है। यह वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त थोड़े से दुर्लभ और दुरूह शब्दों का संग्रह है। इसमे ंशब्दों की व्याख्याएं नहीं है। इसलिए यह आधुनिक अर्थ में ‘कोश’ नहीं है, बल्कि शब्द संग्रह मात्र है जिसे परंपरा यास्ककृत मानती है। निघंटु में पांच अध्याय है। प्रथम तीन को नैघंटुक काण्ड, चतुर्थ को नैगम कांड और पंचम को दैवत कांड कहते हें। इन तीन कांडों के विषय क्रमशः पर्यायवाची शब्द, अनेकार्थवाची शब्द और देवता है। जिसमें प्रथम अध्याय में भौतिक वस्तुओं का वर्णन है जैसे पृथ्वी जल, वायु तथा प्रकृति की वस्तुएं जैसे मेष, उषा दिन व रात्रि इत्यादि। दूसरे अध्याय का विषय है मनुष्य और उसके बाहु अंगुलि इत्यादि अंग तथा उससे संबद्ध पदार्थ तथा गुण जैसे संपत्ति, संपत्ति, क्रोध, युद्ध इत्यादि। तृतीय अध्याय में भावात्मक गुणों का वर्णन है यथा गुरूता, लघुता इत्यादि। निघंटु तथा निरुक्त के संपादक तथा अंग्रेजी भाषांतरकार प्रो0 लक्ष्मण सरूप ने ही कहा है कि निघंटु की व्यवस्था वैज्ञानिक नहीं, न ही अधिकांशतः प्रणालीबद्ध है, परंतु कम से कम शब्दों के विधिपूर्वक वर्गीकरण का प्रयास अवश्य किया गया है।
निरुक्त निघंटु का महषि यास्क कृत सुप्रसिद्ध भाष्य है। यह निर्वचन, भाषा विज्ञान एवं शब्दार्थ विज्ञान का प्राचीनतम भारतीय ग्रंथ माना जाता है। यास्क की इस रचना का काल भारत रत्न से विभूषित डाॅ पाडरंग वामन काणे 800 से 500 भारत ई0 पू0 के बीच का मानते है।  निरुक्त का प्रथम संस्करण रुडोल्फ राॅथ द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसे 1852 में गाॅटिंगन में प्रकाशित किया गया। उस समय वैदिक वाङमय केवल पांडुलिपियों में  ही प्राप्त था। ऋग्वेद का भी मुद्रित पाठ्य उपलब्ध नहीं था। उस समय लैटिन भाषा  के ऋग्वेद नमूना ;त्पहअमकंम ैचमबपउमदद्ध के नाम से  फ्रेडरिख अगस्त रोजन का 1830 में 121 ऋचाओं का आंशिक अनुवाद किया गया था। प्रो0 फ्र्रैडरिक मैक्समूलर ने ऋग्वेद का जर्मन अनुवाद 1856 में किया। सत्रहवीं सदी में मुगल बादशाह औरंगजेब के भाई दाराशिरोह ने कुछ उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया जो पहले फ्रांसीसी और बाद में अन्य भाषाओं में अनूदित हुए। यूरोप में इसके बाद वैदिक और संस्कृत साहित्य की ओर ध्यान गया। पाश्चात्य विद्वानों ने भी स्वीकार किया है वेद विश्व का प्राचीनतम साहित्य है। धर्मशास्त्र इतिहासकार डाॅ0 पांडुरण वामन काणे ने वेदों का रचनाकाल 4000 से 1000 ई0पू0 माना है। हिंदी में पहली बार वेदों का प्रकाशन ऋग्वेद भाष्य के रूप में दयानंद सरस्वती ने 1877 में कराया, लेकिन यह पूर्ण नहीं था। अंग्रेजी भाषा में 1850-1888 में एच.एच विल्सन ने, उसके बाद राॅल्फ टी एच ग्रिफिथ ने 1889-92 में, पश्चात ए ए मैक्डोनेल ने 1917 में महत्वपूर्ण अनुवाद किए। प्रो मैक्डोनैल एवं ए.बी. कीथ ने 1912 में वैदिक इंडैक्स आॅफ नेम्स एंड सब्जेक्ट्स तैयार किया जिसमें वैदिक नामों और विषयों की व्याख्यात्मक अनुसूची दी गई है। इससे पूर्व प्रो0 एम. मोनियर विलियम्स का 1899 में व्युत्पत्ति और भाषा की दृष्टि से संस्कृत अंग्रेजी शब्दकोश प्रकाशित हुआ, जिसमें भारत यूरोपीय भाषाओं का सामीप्य संस्कृत से दिखाया गया है। इन्होंने म्ना जो ‘नाम’ की धातु है, उसका संबंध मैन से जोड़ा है। निरुक्त में ‘मन’ धातु का अर्थ विचारना है, इसीलिए मनुष्य इस धातु से संबंद्ध हुए, क्योंकि वे अपने कार्य विचार पूर्वक करते हैं।
निघंटु और निरुक्त का महत्व देखने के लिए उपर्युक्त प्रसंग में हमें जाना पड़ा। नाम कैसे रखे जाते हैं, इस विषय पर निघंटु तथा निरुक्त की टीका में महत्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है।ं यास्क समस्त शब्दों को मूल धातुओं से व्युत्पन्न बताते हैं। वह लोक के दैनंदिन व्यवहार में वस्तुओं की संज्ञा के लिए शब्द, व्यप्तिमान तथा सूक्ष्म होने के कारण व्यक्त शब्दों को अधिक मान्यता देते हैं। यास्क धातुओं के अलावा कुछ शब्दों की उत्पत्ति प्रकृति की ध्वनियों की अनुकृतियों से भी मानते हैं, जैसे पक्षियों के नाम। किंतु यह शब्दानुकृति भाषा के निर्माण में महत्वपूर्ण भाग नहीं लेती। वहीं प्लेटो (जन्म 428 ई.पू. निधन 348 ई.पू.) अपनी रचना क्रैटिलस ं;ब्तंजलसनेद्ध में वर्णमाला की ध्वनियों के मूल को प्रकृति की ध्वनियों में खोजने का प्रयास करते हैं और कहते है शब्दानुकृति भाषा के निर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपादान है।
यास्क ने भाषा के चार भाग माने हैं- नाम, आख्यात (क्रिया), उपसर्ग तथा निपात (निरुक्त 1-1) संस्कृत में उपसर्गों का प्रयोग विभक्ति के रूप में कहीं-कहीं ही होता है।
संस्कृत में उपसर्ग क्रिया विशेषण का कार्य करते हैं। यास्क ने नाम व क्रिया के लक्षण बताए हैं। क्रिया की आधारभूत धारणा भाव (होना ठमबवउपदह) है, जबकि नाम की आधारभूत धारणा सत्व (या बनी हुई वस्तु, इमपदह) है। परंतु जहां दोनों में ‘भाव’ क्रिया के द्वारा निर्दिष्ट होता है, प्रारंभ से अंत तक सम्पूर्ण प्रक्रिया का मूर्तरूप, जिसने सत्व के गुण ले लिए हैं नाम के द्वारा निर्दिष्ट होता है, जैसे जाना (व्रज्या), पकाना (पक्ति) इत्यादि। क्रिया के छः विकार होते हैं- उत्पत्ति, सत्ता, विपरिणमन, वृद्धि, उपक्रम तथा विनाश। जबकि अरस्तू कहते हैं नाम या संज्ञा एक संश्लिष्ट ;ब्वउचवेपजद्ध सार्थक ध्वनि है, जिसमें काल का कोई विचार नहीं होता है, किंतु क्रिया भी संश्लिष्ट सार्थक ध्वनि है, पर उसमे ंकाल का विचार होता है।
अरस्तू (जन्म 384 ई0पू0 निधन 322 ई0पू0) ने क्रिया के लक्षण में काल के विचार पर बहुत बल दिया हे। वह इसमें होने वाले कार्य व्यापार (।बजपवद) के विचार की अपेक्षा करते हैं, किंतु क्रिया व्यापार तथा काल दोनों में प्रथम मुख्य तथा द्वितीय गौण महत्व का है। यास्क ने इसीलिए भाव शब्द चुनकर दोनों का समावेश किया है। नाम (संज्ञा) का अरस्तू कृत लक्षण निषेधात्मक है। वह नाम के लक्षण में ‘क्या नहीं है’ यह बताते हैं जबकि यास्क निश्चयात्मक लक्षण प्रस्तुत करते हुए बताते हैं कि सत्व नाम की आधारभूत धारणा है।
नामों की उत्पत्ति के संबंध में दुर्ग (निरुक्त भाष्यकार) ने कहा है कि नाम तीन तरह से मिलते हैं 1. वे जिनकी धातुएं स्पष्ट हैं, 2. वे जिनकी धातुओं को अनुमान से जाना जा सकता है तथा 3. वे नाम जिनकी धातुओं का अस्तित्व ही नहीं है। प्लेटो अपने क्रैटिलस में हर्मोजीनस के द्वारा इस सिद्धांत को प्रस्तुत करता है कि नाम रूढ़ है। स्वेच्छा से रख दिए जाते हैं तथा स्वेच्छा से बदल जिए जाते हैं । क्रैटिलस कहता है, वह स्वाभाविक हैं। सुबरात बीच का मार्ग अपनाते हुए कहते हैं नाम स्वाभाविक हैं परंतु उनमें रूढ़ि का भी अंश है। ‘यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि यास्क का काल प्लेटों से कम-से कम एक शताब्दी पूर्व था।’  यास्क व प्लेटो दोनों अपनी-अपनी पुस्तकों क्रमशः निरुक्त तथा क्रैटिलस  में अपने पूर्ववर्ती विद्वानों तथा निरुक्त संबंधी गवेषणाओं को एकत्र करते हैं। यास्क और प्लेटो में मूल अंतर यह है कि यास्क धातुओं को उपसर्ग, आगम तथा प्रत्ययों से पृथक करते थे अर्थात् शब्दो को बनाने वाले तत्व से मूल तत्व को पृथक करके देखते थे और इसलिए वह शब्दों का उनके घटक अवयवों में विश्लेषण करने के सामान्य नियम बनाने में समर्थ हुए जबकि प्लेटो इस अंतर का नहीं समझते थे परिणामतः उन्होंने अटकल को निर्वचन का आधार बनाया और इसीलिए आगे चलकर शेक्सपियर (1564-1616) नाम में क्या रखा हैं जैसी निरर्थक उक्ति लिख गए।
निरुक्त में प्रथम अध्याय (12 से 14) में यास्क ‘नाम कैसे रखे जाते हैं’, इस समस्या पर विचार करते हुए युक्तियां देते है 1- प्रत्येक सत्व जो विशिष्ट कार्य करता है, समान नाम से व्यवहृत होना चाहिए उदाहरणार्थ प्रत्येक सड़क पर दौड़ने वाला अश्व (दौड़ने वाला) कहा जाना चाहिए न कि केवल घोड़ा ही 2- प्रत्येक सत्व के उतने नाम होने चाहिए जितनी क्रियाओं से वह संबद्ध है जैसे-खंभे को स्थूल (सीधा खड़ा होने वाला) ही नहीं, उसे दहशया (गर्त में स्थित) और संजनी (जो बांसो के साथ संयुक्त की जाती है) भी कहना चाहिए 3- नाम रखने के लिए केवल उन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए जो धातुओं से व्याकरण के नियम के अनुसार बनाए गए हों, जिससे वे जिस पदार्थ के वाचक हों, उसका अर्थ बिल्कुल स्पष्ट और भ्रांतिरहित हो उदाहरण पुरुष (आदमी) के स्थान पर पुरिशय (अर्थात् नगरवासी) होना चाहिए, अश्व (घोड़ा) अर्थात् अष्टा (अर्थात दौड़ने वाला) 4- यदि पदार्थो का नाम क्रियाओं के आधार पर रखा जाना है तो पदार्थ (सत्व) क्रिया से पहले होते हैं (उदाहरणार्थ अश्व अस्तित्व में आ जाता है इससे पहले होते हैं (उदाहरणार्थ अश्व अस्तित्व मे आ जाता है इससे पहले कि वह वास्तव में दौड़े) 5- नामों की व्याख्या करने में लोग कुतर्क करते हैं उदाहरण जब वह कहते हैं कि पृथ्वी (पृथिवी) यह इसलिए कहलाती है, क्योकि यह फैली हुई है (प्रथ)। तब वे यह नहीं सोचते कि इसे किसने फैलाया और उसका आधार (ठहरने का स्थान) क्या था।
यास्क की उस आलोचना का का उत्तर भी निघंटु और निरुक्त के टीकाकार ने दिया है, जिसमे कहा जा सकता है कि ऐसे शब्द होते हैं जिनका मूलरूप समान होता है, परंतु अर्थ भिन्न होता है उदाहरण लैटिन बनचध्बनचपकव इच्छा करना तथा संस्कृत ानच क्रुद्ध होना है, किंतु दोनों का एक ही मूल है। यास्क की सीमाएं भी थीं वह संस्कृत के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा नहीं जानते थे। वह वैदिक और लौकिक संस्कृत के रूपो से परिचित थे। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से संस्कृत का लौकिक रूप वैदिक रूप का ही विकास है।
अब संस्कृत के बाद और भी भाषाओं का अस्तित्व ज्ञात हुआ है, यदि उनका अर्थ न भुला दिया गया हो तो आज भी अधिकांश शब्दों का मूल संस्कृत धातु में मिल जाता है।
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