Sunday, June 9, 2024
मई २०२४
1/5/24
ललितपुर : नामकरण का कश्मीर कनेक्शन....
ललितपुर नामक स्थानों के नामकरण में कश्मीर का योगदान प्रतीत होता है। नेपाल के ललितपुर के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश का ललितपुर भी उनमें से एक है। कश्मीर के इतिहास प्रसिद्ध राजा हुए हैं ललितादित्य। उनके बाद के शासकों का संबंध उत्तर प्रदेश के ललितपुर से सटे महाभारत काल के राज्य चंदेरी से रहा है। चंदेरी से जुड़ा हुआ बड़ा इतिहास हर कालखंड में मिलता है। महाभारत काल में यह राजा शिशुपाल की राजधानी था। बुद्ध काल के सोलह में से चेदि नाम का महाजनपद चंदेरी रहा है। सूफ़ी संतों के युग में सदन कसाई दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन के आदेश से यहाँ आकर रहे। उनके नाम की दरगाह ललितपुर में है। देश के अन्य भागों में भी सदन कसाई की बड़ी बड़ी दरगाहें हैं। नाभादास जी के भक्तमाल में इनकी कथा आई है। तुर्की से चंदेरी में आकर प्रथम मुग़ल शासक बाबर ने मेदिनी राय से युद्ध किया। चंदेरी में ही अकबर के युग में बैजू बावरा नाम के एक महान संगीतज्ञ का जन्म हुआ, चंदेरी के पुराने क़िले में ही उनकी समाधि भी है। बैजू बावरा के संतान नहीं थी, उन्होंने गोपाल कृष्ण को गोद ले लिया था। गोपाल कृष्ण स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा पाकर कश्मीर के राजा के दरबार में चले गये थे। स्वामी हरिदास भी इसी बुंदेलखंड के ओरछा दरबार में थे, बाद में वृंदावन चले गये, फिर कभी वापस नहीं लौटे। चंदेरी राज्य अंग्रेजों के समय तक रहा, जब मर्दन सिंह इसके अंतिम राजा रहे। चंदेरी के अतिरिक्त ललितपुर जनपद के तालबेहट, बानपुर और कैलगुवा में इनके क़िले और गढ़ियाँ इसकी गवाही दे रहे हैं। बैजू बावरा के दत्तक पुत्र गोपाल से एक पुत्री हुई, उसे छोड़कर गोपाल कश्मीर जाकर रहने लगे। बैजू बावरा को अपनी नातिन की देखरेख का दायित्व लेना पड़ा था। बैजू बावरा अकबर के दरबार में रहने के बजाय ग्वालियर आ गए, जहां उन्हें सूचना मिली कि उनके गुरु हरिदास समाधिस्थ होने वाले हैं। वे अपने गुरु के अंतिम दर्शनों के लिए वृन्दावन पहुंचे और उनके दर्शन करने के पश्चात् विभिन्न प्रकार की आपदाओं का सामना करते हुए अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में कश्मीर नरेश की राजधानी श्रीनगर पहुंचे। उस समय उनका शिष्य गोपालदास वहां दरबारी गायक था। फटेहाल बैजू ने अपने आने की सूचना गोपालदास तक पहुंचाने के लिए द्वारपाल से कहा, तो द्वारपाल ने दो टूक जवाब दिया कि उनके स्वामी का कोई गुरु नहीं है। यह सुनकर बैजू को काफ़ी आघात पहुंचा और वे श्रीनगर के एक मंदिर में पहुंचकर राग ध्रुपद का गायन करने लगे। बैजू के श्रेष्ठ गायन को सुनकर अपार भीड़ उमड़ने लगी। जब बैजू की ख़बर कश्मीर नरेश के पास पहुंची, तो वे स्वयं भी वहां आए तथा बैजू का स्वागत कर अपने दरबार में ले आए। कश्मीर नरेश ने गोपालदास को पुनः संगीत शिक्षा दिए जाने हेतु बैजू से निवेदन किया। राजा की आज्ञा से उन्होंने गोपाल को पुनः संगीत शिक्षा देकर निपुण किया।
कश्मीर के प्रतापी राजा ललितादित्य का नाम विश्रुत ही है। कल्हड़ की राजतरंगिणी में और कश्मीरी साहित्य और दर्शन में उनका नाम जगह जगह आता है। उनके बाद के राजाओं ने उनके नाम पर चंदेरी राज्य के अंतर्गत ललितपुर का नामकरण कराया होगा, ऐसा मानना उस किंवदंती से अधिक तर्कसंगत जान पड़ता है जिसमें कहा जाता है कि गौंड राजा सुमेर सिंह की पत्नी ललितकुंवर के नाम पर इसका नाम ललितपुर हुआ। जनश्रुति के अनुसार राजा सुमेर सिंह चर्म रोग से पीड़ित थे। वह पवित्र गंगाजल में चर्म रोग संबंधी व्याधियों को उपचार की क्षमता को देखने के लिए गंगा स्नान की आकांक्षा लिए जा रहे थे। मार्ग में अधिक अस्वस्थ हो जाने के कारण ललितपुर की सीमा पर शिविर लगा कर ठहर गए। उनकी पत्नी को दिव्य स्वप्न हुआ, जिसमंे उनको यह फरमान दिया गया कि यदि राजा वहां स्थित तालाब में स्नान करें, तो वे ठीक हो जाएंगे। इसके बाद राजा ने तालाब मंे स्नान किया और रोग मुक्त हो गए। उस तालाब का नाम सुमेर तालाब पड़ा। राजा वहां बस गए और इसका नाम अपनी पत्नी ललिता के नाम पर ललितपुर रखा। उसी सिद्ध पोखर का विकसित रूप आज नगर के बीचों-बीच स्थित है, जिसका नाम ‘सुमेरा तालाब’ है। सुमेरा तालाब का संबंध अवश्य सुमेर सिंह के नाम पर हो सकता है। परंतु ललितपुर के नामकरण की संगति सांस्कृतिक परंपरा और इतिहास से मेल नहीं खाती। गोंड शासन का परिक्षेत्र ललितपुर तक नहीं था। राजा सुमेर सिंह की पत्नी ललिता देवी के नाम पर ज़िले का नाम अगर रखा जाता तो अवश्य वह कोई इतिहास प्रसिद्ध नायिका रही होती। पर ऐसा नहीं है। इतिहास में कोई रानी ललिता देवी नाम से नहीं मिलती। रानी अहिल्या बाई होलकर ने देश भर में जगह जगह बड़े मंदिर बनवाये, पर उनके नाम पर स्वयं उनका बनवाया कोई स्मारक नहीं है। रानी दुर्गावती और रानी अवंतिबाई के उदाहरण इतिहास में मिलते हैं, उन्हीं के द्वारा उनके नाम पर बनवाये स्मारक नहीं हैं। समकालीन राजनीति में बसपा सरकार की मुख्यमंत्री मायावती ने जो स्मारक लखनऊ में बनवाये, उनमें स्वयं उनकी मूर्ति तो है, पर उस स्थान या पार्क का नामकरण उनके नाम पर नहीं है। यद्यपि उनके नाम पर राजकीय महाविद्यालय है। किसी के जीवनकाल में स्वयं के द्वारा उसी के नाम पर किया गया कोई सार्वजनिक नामकरण हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं है। पत्नी के नाम पर नगर के नामकरण का उदाहरण अपने यहाँ हमें याद नहीं आता। शाहजहाँ की पत्नी मुमताज़ बानो के नाम पर ताजमहल एक स्मारक भर है। ललितपुर शहर में राजराजेश्वरी माँ ललितेश्वरी देवी का मंदिर कश्मीर में शैव दर्शन के साथ साथ फली फूली शाक्त परंपरा से अनुकृत या उद्गत जान पड़ता है। कन्नौज के मूल निवासी आचार्यों के वंशज कश्मीर के श्रीनगर निवासी आचार्य अभिनवगुप्तपाद कश्मीर के शैव दर्शन के बड़े प्रस्तोता तो हैं ही, वे ही शाक्त दर्शन के भी उद्गाता हैं। ललितापुर नाम का गाँव भी इस जनपद में है। नेपाल के ज़िला ललितपुर का संबंध भी कश्मीर के लोक विश्रुत राजा ललितादित्य के नाम पर रखा गया मालूम होता है।
बैजू बावरा पर १९५२ में एक प्रसिद्ध फ़िल्म भी बन चुकी है।
६/५/२४
मन मथुरा दिल द्वारिका काया काशी जान।
दशवां द्वारा देहरा तामे जोति पहचान॥
"हर मरें तो हम मरें और हमरी मरे बलाय,
साँचे गुरु का बालका मरे ना मारा जाय।"
७/५/२४
तंत्र शास्त्र में मदिरा या शराब का प्रयोग वर्ज्य नहीं है, जैसा कि वैष्णव उपासना का विधान है। व्यक्ति जिस उपाय से तत्व को ग्रहण कर ले, ज्ञान प्राप्त कर ले, उसके ऊपर ही है। हम अपने अनुभव से कह सकते हैं कि हमें हमारे गुरुदेव ने बिना मदिरा सेवन के ही नशा तारी किया हुआ है। मदिरा का नशा उतर जाता है, नाम नशा उतरता ही नहीं।
८/५/२४
ये और बात है कि वो ख़ामोश खड़े रहते हैं
लेकिन जो बड़े होते हैं वो बड़े ही होते हैं।
९/५/२४
भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार हैं। वे अकेले हैं जिनका भगवान विष्णु के ही अवतार राम और कृष्ण से अलग अलग कारणों से मिलना हुआ। भगवान परशुराम विष्णु के अवतारों में अकेले हैं जो चिरंजीवी हैं, वर्तमान में ध्यानस्थ होकर हम सबका मंगल कर रहे हैं। अंतिम अवतार भगवान कल्कि के समय भगवान परशुराम उनके गुरुदेव होंगे।
भगवान परशुराम का जन्म इंदौर मुंबई हाईवे पर महू ज़िले के एक स्थान जनपाव में हुआ। यहाँ जमदग्नि आश्रम है।
मनु और इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रियों की रक्षा करते हुए भगवान परशुराम ने आतताइयों को बार बार नष्ट किया। केरल के साहित्य में भगवान परशुराम का वर्णन बार बार आया है। गोकर्ण और गोमांतक से लेकर केरल और कन्याकुमारी तक परशुराम क्षेत्र माना जाता है। वहीं गुजरात के लोग कहते हैं, दक्षिण गुजरात में वापी से तापी (नदियों) तक का क्षेत्र परशुराम नी भूमि है। समंतपंचक कुरुक्षेत्र में भगवान परशुराम का स्थान है।
प्राचीन काल से ही भगवान परशुराम के मंदिर, तीर्थ और सरोवर देश के चारों कोनों में पाये गये हैं।
उडुपी के अनन्तेश्वर मंदिर में भगवान परशुराम की पूजा लिंग विग्रह के रूप में होती है। केरल के अतिरिक्त आंध्र प्रदेश के राजम्पेट् में मंदिर है। चीन की सीमा से जुड़ा हुआ सुदूर अरुणाचल प्रदेश है, वहाँ के लोहित ज़िले में परशुराम कुण्ड है। मकर संक्रांति के दिन इसमें स्नान करते हैं। उत्तर भारत में भगवान परशुराम का जन्म दिन अक्षय तृतीया के लोकपर्व के रूप मे मनाया जाता है।
महाराष्ट्र के नांदेड में परशुराम भगवान की माता रेणुका का मंदिर है, यह स्थान माहुरगढ़ ५१ शक्तिपीठों में से एक हैं। देवदासियों द्वारा कर्नाटक के लोकगीतों में भगवान परशुराम को येलमा का पुत्र कहा जाता है। नीचे राजा रवि वर्मा द्वारा तैयार चित्र दिया गया है...
14/5/24
इस श्वास का उत्स क्या है। न जाती हुई श्वास का अंत मिलता है और न आती हुई श्वास का उद्गम स्थान ज्ञात हो पाता है। जीवन केवल इस श्वास के संधि स्थान का नाम है। श्वास की संधि में जीवन और मरण घटता रहता है। यह जीवन कहाँ से आता है और कहाँ जाता है, इसे जानना श्वास के उद्गम स्थान और विश्राम स्थान को समझने जैसा है।
१५/५/२४
प्राचीन वेदांत संप्रदाय में दो मार्ग प्रचलित थे। एक उपासना–मार्ग और दूसरा विचार–मार्ग। उपासना–मार्ग में भूतशुद्धि और चित्तशुद्धि सम्पूर्ण हो जाने के बाद ज्ञान के उदय होने पर ज्ञान के बाद जीवनमुक्ति आयत्त हो जाती है। उसके बाद काल की प्रतीक्षा नहीं रहती। किन्तु विचार–मार्ग में उच्च अधिकारी का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्ति होने पर भी उस ज्ञान के प्रभाव से, देह–मन शुद्ध न होने तक जीवनमुक्ति सिद्ध नहीं होती। इसलिए तांत्रिक दार्शनिकों ने अज्ञान को बौद्ध और पौरुष अज्ञान के रूप में बांटा है, उसी प्रकार ज्ञान को बौद्ध और पौरुष रूप में बांटा है। पौरुष अज्ञान की निवृत्ति सदगुरु की कृपा से क्षण भर में हो जाती है, किन्तु बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति बौद्ध ज्ञान के उदय के बिना नहीं हो सकती। इसी बौद्ध ज्ञान के विकास के लिए तपस्या, साधना, विचार, योगाभ्यास आदि आवश्यक है। बौद्ध ज्ञान के उदय से बौद्ध अज्ञान निवृत्त हो जाने के बाद पूर्व प्राप्त पौरुष अज्ञान की निवृत्ति पौरुष ज्ञान के उदय रूप में अनुभूत होता है।
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(सनातन साधना की गुप्त धारा)
श्री गोपीनाथ कविराज जी
१७/५/२४
किसी प्रथा के बाह्य कर्मकांड से चिपके बिना उसमे विद्यमान सत्य के प्रति निष्ठा का होना विवेक है। बिना पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के किसी आध्यात्मिक प्रथा में निष्ठा रखना पाखंड है। किंतु आध्यात्मिक प्रथा, सिद्धांत, गुरु इनमें से किसी के प्रति निष्ठा न होना आध्यात्मिक पतन है।
२०/५/२४
'श्रत्' माने सत्य और 'धा' माने धारण करना होता है। सत् को ही महात्मा लोग छिपाने के लिए श्रत् बोलते हैं। निरुक्त में आया है कि श्रदिति सत्य, सत्य नाम। सत्य का नाम है श्रत्। इस पर किसी ने कहा कि तब सत् ही बोलो न! श्रत् क्यों बोलते हो? बोले कि नहीं, यह बात छिपाने की है। अमुक वस्तु सच्ची है- ऐसा धारण करने का नाम श्रद्धा है। और विश्वास? विगत श्वास हो जाना विश्वास है। उसके लिए मुर्दा सरीखे हो जाना पड़ता है। टारे से न टरे, हटाने से भी नहीं हटना - ऐसी निष्ठा अंतःकरण में हो जाना विश्वास है।
- स्वामी श्री अखण्डानन्द सरस्वती
२५/५/२४
संसार समय के माध्यम से देखा गया सत्य है।
सत्य, 'समय-शून्य' माध्यम से देखा गया संसार है। ओशो गीता दर्शन
२६/५/२४
एक अमर भक्त ऋषभदेव की स्तुति : भक्तामर स्तोत्र
ऋषभदेव हिंदू परंपरा के भगवान के चौबीस अवतारों में एक हैं। भागवतम् में इनका वर्णन आया है। ऋषभदेव के बड़े पुत्र का नाम था भरत इसलिए इस अजनाभ खंड का नाम ही भरत पड़ गया, आगे चलके भरत से भारत हुआ।वैदिक देव रुद्र के साथ भी उनका नाम आया है, यहाँ ऋषभ का अर्थ बैल कहा गया है। जैन परंपरा के चौबीस तीर्थंकरों में वे पहले हैं, इसीलिए वे आदिनाथ हैं। उनका नाम ही घोषित करता है कि वे नाथ परंपरा के भी प्रस्तोता स्वीकृत हैं।
जैन परंपरा में सतत और सर्वत्र गाया जाने वाला भक्तामर स्तोत्र इन्हीं ऋषभदेव की स्तुति है। यह मूल रूप से संस्कृत भाषा में ४८ गेय श्लोकों में निबद्ध है, जिनका अनुवाद देश की कई भाषाओं में हुआ है। कहते हैं एक क्रुद्ध राजा ने आचार्य मानतुंग को ४८ तालों में बंद करके बंदी बना लिया था। आचार्य श्री भक्तामर स्तोत्र के एक एक श्लोक की रचना करते गये और वे ताले एक एक कर टूटते चले गये। भागवत् कथा श्रवण से भी सात दिन की कथा में बांस की सात गाँठे खुलती जाती हैं।
मानतुंग के सारे ताले खुलने पर राजा ने क्षमा याचना की। सातवीं सदी में इस स्तोत्र की रचना वसंततिलका छंद में हुई है। आज यह प्रत्येक जैन परिवार में दिन प्रतिदिन गाया जाने वाला अमर स्तोत्र हो गया है. एक श्लोक देखें...
वल्गत्-तुरंग-गज-गर्जित-भीमनाद-�माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्।�उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं�त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति: ॥42॥
Friday, May 3, 2024
अप्रैल २४
अप्रैल २०२४
बृहदारण्यक उपनिषद सबसे पुराने और बड़े उपनिषदों में मान्य है। इसमें संवत्सर का प्रयोग इस प्रकार आया है सोऽकामयत, द्वितीयो म आत्मा जायेतेति; स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनाया मृत्युः; तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत् । न ह पुरा ततः संवत्सर आस; तमेतावन्तं कालमबिभः, यावान्संवत्सरः; तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात्; स भाणकरोत्, सैव वागभवत् ॥ १/२/४ ॥
मृत्यु कुछ और नहीं, वरन् वह हमारी भूख का नाम है। सृष्टि उत्पत्ति के क्रम में मृत्यु ने दूसरा रूप निर्मित करने की इच्छा की, यहाँ से प्रजापति द्वारा संवत्सर का अभ्युदय हुआ, इससे पूर्व वर्ष या सम्वत्सर नहीं था। मृत्यु या हिरण्यगर्भ ने जल प्रक्षेपित करके वर्ष निर्माण किया। इसे संवत्सर कहा गया। विराज भी इसे कहा गया है। जल की उत्पत्ति अग्नि से और अग्नि की उत्पत्ति जल से होने के अलग अलग वर्णन मिलते हैं। जल में अग्नि समाहित है। जन्म और लय उसमे लीन हुए रहते हैं। तज्जलानिति। जल ही किसी रचना का हेतु है। इसीलिए पूजा पद्धति में जल का प्रयोग सर्वप्रथम किया जाता है।
संवत्सर या वर्ष जन्म से लेकर मृत्यु तक का कालखंड है।
संवत्सर ऊँचा पद है। आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है। चैत्र का अर्थ है चित्त का उन्मेष जो करे और प्रतिपदा का अर्थ प्रतिपादन करने से है। आज नव संवत्सर विक्रम वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा २०८१ आरंभ हो रहा है। आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ।
10/4/24
भागवत में आया है- सत्ययुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में अर्चा-पूजा से जो फल मिलता है, कलियुग में वह केवल भगवन्नाम से मिलता है। इससे स्पष्ट है कि अपने स्वरूप को जानने के लिए ध्यान सर्वोत्तम साधन है। अपना स्वरूप जानना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। ध्यान की अलग अलग विधियां हमारे संत महापुरुष देते हैं, जिन विधियों में ध्यान के तरीके शास्त्र सम्मत ढंग से दिए गए हैं, वे सब उपयोगी हैं, बस उनमें से जो हमें गुरुदेव बताएं उस पर श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ते रहें। गुरु को ध्यानमूल कहा गया है ध्यानमूलं गुरुः मूर्ति। वैसे अगर शांतचित्त होकर सिर और रीढ़ सीधी करके ही बैठने का अभ्यास बना लिया जाए तो भी बहुत उपयोगी है, अच्छे अर्थों में रीढ़ सीधी रखने का मुहावरा यूं ही नहीं चल रहा है। ध्यान की कुछ तकनीकें अवश्य ऐसी हैं, जिन पर चलने से व्यक्ति गन्तव्य तक शीघ्र पहुँचता है...
मनुष्यों के लिए जितनी बातें सुनने, स्मरण करने या कीर्तन करने की हैं, उन सबमें ध्यान की विधियों को जानने का राजा परीक्षित का प्रश्न श्री शुकदेव स्वामी ने सर्वोत्तम बताया है। आगे श्री शुकदेव जी ने कहा है..
अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम्।
मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन्।।2/1/17 फ़ेसबुक से २०२० में आज की पोस्ट
११/४/२४
भेद से अभेद दशा का नाम मोक्ष है। भेद से अभेद को प्राप्त होकर भेद में होना प्रेम है। अर्थात् प्रेम बिना मुक्ति के संभव नहीं है।
गुरु व्यक्ति नहीं, न कोई व्यक्ति ही गुरु हो सकता है। अखंड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरं। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
१६/४/२४
सापेक्ष जगत् में वस्तु, व्यक्ति और परिस्थिति निरपेक्ष होकर रहना वस्तुतः जीवन का रहस्य है।
ध्यान में बैठे बिना व्यक्ति को वास्तव में समस्या क्या है! इसी का पता नहीं चल पाता है। जब तक समस्या ज्ञात नहीं होगी, उसका निदान कैसे संभव है!
१७/४/२४
रामचरित चिंतामणि चारू।
संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥
जग मंगल गुनग्राम राम के।
दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
श्री रामचन्द्रजी का चरित्र सुंदर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर शृंगार है। श्री रामचन्द्रजी के गुण-समूह जगत् का कल्याण करने वाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधाम के देने वाले हैं॥
सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥
भावार्थ-
ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोग का नाश करने के लिए देवताओं के वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये सीताराम के प्रेम के उत्पन्न करने के लिए माता-पिता हैं और संपूर्ण व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं।
We often translate Rashtra as a nation. But these are not the same. Our concept of Rashtra has evolved over a period of 7,000 years or more. For us, Rashtra is not defined or determined by mundane political or territorial boundaries. Rashtra is a cultural and spiritual entity that transcends beyond the political boundaries. Rashtra etymologically means an instrument or tool to attain moksha. It has a universal purpose also.
नाध्यात्मेन विना बाह्यं नाध्यात्मं बाह्यवर्जितं ।
सिद्धये ज्ञानक्रियाभ्यां तद्द्वितीयं संप्रकाशते ॥
पादांगुष्ठाग्रतो व्यक्ता नाभितो हृदयं गता ।
सुषुम्ना नाम सा ज्ञेया ब्रह्मरन्ध्राब्ज निर्गता ॥
अनायासेन मरणम्, बिना दैन्येन जीवनम्।
देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्।।
अनायास ही मृत्यु, बिना दैन्य(दीनता,गरीवी,किसी चीज की कमी) अर्थात् दैन्यहीन जीवन हो। और जब भी मृत्यु आये तो वह भी आपके सानिद्य में आये। हे प्रभु!यह मुझे प्रदान करें।
१८/४/२४
गोरखपुर का गोरखनाथ के नाम से चाहे जितना नाम हो, पर योग को पश्चिमी जगत् में पहुँचाने का श्रेय परमहंस योगानंद जी को ही जाता है। गोरखपुरवासी नागरिकों को चाहिए कि देशवासी उनके सपूत के इस अवदान को याद करें। उनकी योगी कथामृत जब से छपी है, श्रेष्ठ और बेस्ट सेलर में बनी हुयी है। गोरख बाबा के योग को दुनिया से व्यावहारिक रूप में परिचय तो वस्तुतः योगानंद जी ने ही कराया है।
बहुत कम ऐसा देखा जाता है, उनकी पद्धति उनके जाने के बाद भी व्यवस्थित ढंग से चल रही है। 🙏
१९/४/२४
आत्मा की परमात्मा से मिलन की आकांक्षा को सूफ़ी संतों ने कितने ढंग से उकेरा है कि वे लोकगीत बन गए....आज भी जगह जगह गाए जा रहे हैं। फ़िल्मों से होते हुए वे विवाह गीत बन गए हैं।
काहे कों ब्याही रे बिदेस रे सुन बाबुल मोरे।
हम तौ बबुल तोरे अंगना कौ कूरा झरि-पुछि कें फिक जांय रे ।
सुन बाबुल मोरे।
हम तौ बबुल तोरे बाग की कोयल कूकत पर घर जांय रे ।
सुन बाबुल मोरे।
हम तौ बबुल तोरे खूंटा की गैयां, जित हांकौ हंकि जांय रे ।
सुन बाबुल मोरे।
हम तौ बबुल तोरे खेत की चिरियां,चुगि-चुगि कें उड जांय रे ।
सुन बाबुल मोरे
अमीरखुसरो
२१/४/२४
सफलता वास्तव में क्या है! यह है जो कार्य अधूरे हैं, जिनका अंतराल है, उन्हें पूरा करना।
22/4/24
अनुत्तराष्टिका
सङ्क्रामोऽत्र न भावना न च कथायुक्तिर्न चर्चा न च
ध्यानं वा न च धारणा न च जपाभ्यासप्रयासो न च ।
तत्किं नाम सुनिश्चितं वद परं सत्यं च तच्छ्रूयतां
न त्यागी न परिग्रही भज सुखं सर्वं यथावस्थितः ॥ १॥
संसारोऽस्ति न तत्त्वतस्तनुभृतां बन्धस्य वार्तैव का
बन्धो यस्य न जातु तस्य वितथा मुक्तस्य मुक्तिक्रिया ।
मिथ्यामोहकृदेष रज्जुभुजगच्छायापिशाचभ्रमो
मा किञ्चित्त्यज मा गृहाण विलस्वस्थो यथावस्थितः ॥ २॥
पूजापूजकपूज्यभेदसरणिः केयं कथानुत्तरे सङ्क्रामः
किल कस्य केन विदधे को वा प्रवेशक्रमः ।
मायेयं न चिदद्वयात्परतया भिन्नाप्यहो वर्तते
सर्वं स्वानुभवस्वभावविमलं चिन्तां वृथा मा कृथाः ॥ ३॥
आनन्दोऽत्र न वित्तमध्यमदवन्नैवाङ्गनासङ्गवत्
दीपार्केन्दुकृतप्रभाप्रकरवत् नैव प्रकाशोदयः ।
हर्षः सम्भृतभेदमुक्तिसुखभूर्भारावतारोपमः
सर्वाद्वैतपदस्य विस्मृतनिधेः प्राप्तिः प्रकाशोदयः ॥ ४॥
रागद्वेषसुखासुखोदयलयाहङ्कारदैन्यादयो ये भावाः
प्रविभान्ति विश्ववपुषो भिन्नस्वभावा न ते ।
व्यक्तिं पश्यसि यस्य यस्य सहसा तत्तत्तदेकात्मता-
संविद्रूपमवेक्ष्य किं न रमसे तद्भावनानिर्भरः ॥ ५॥
पूर्वाभावभवक्रिया हि सहसा भावाः सदाऽस्मिन्भवे
मध्याकारविकारसंकरवतां तेषां कुतः सत्यता ।
निःसत्ये चपले प्रपञ्चनिचये स्वप्नभ्रमे पेशले
शङ्कातङ्ककलङ्कयुक्तिकलनातीतः प्रबुद्धो भव ॥ ६॥
भावानां न समुद्भवोऽस्ति सहजस्त्वद्भाविता भान्त्यमी
निःसत्या अपि सत्यतामनुभवभ्रान्त्या भजन्ति क्षणम् ।
त्वत्संकल्पज एष विश्वमहिमा नास्त्यस्य जन्मान्यतः
तस्मात्त्वं विभवेन भासि भुवनेष्वेकोप्यनेकात्मकः ॥ ७॥
यत्सत्यं यदसत्यमल्पबहुलं नित्यं न नित्यं च यत्
यन्मायामलिनं यदात्मविमलं चिद्दर्पणे राजते ।
तत्सर्वं स्वविमर्शसंविदुदयाद् रूपप्रकाशात्मकं
ज्ञात्वा स्वानुभवाधिरूढमहिमा विश्वेश्वरत्वं भज ॥ ८॥
॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादैर्विरचितानुत्तराष्टिका समाप्ता ॥
23/4/24
शास्त्र से ज्ञात होता है कि ब्रह्म एक , अखण्ड और अद्वैत
होने पर भी परब्रह्म और शब्दब्रह्म इन दो विभागों में
कल्पित होता है । शब्दब्रह्म को भलीभाँति जान लेने से परब्रह्म की प्राप्ति होती है । " शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्मादिगच्छति ।"
शब्दब्रह्म का स्वरूप जानना और उसे जानकर उसका अतिक्रमण करना , यही मुमुक्षु का एकमात्र लक्ष्य है । उसका अतिक्रमण किये बिना विशुद्ध परमतत्व रूप चैतन्य का साक्षात्कार सम्भव नहीं है ।
जिसे प्रणव या ॐकार कहते हैं , यही शब्दब्रह्म है । उपनिषद , शाक्त - शैवागम योग शास्त्र आदि में लिखा है कि प्रणव को भलीभाँति जानना आवश्यक है , क्योंकि वह परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय तो है ही , साथ ही परब्रह्म से अभिन्न रूप भी है ।
माण्डूक्योपनिषद में इसका काफी वर्णन है ।
ॐकार में मात्राएँ हैं और उसका अमात्रक अर्थात मात्राहीन शुद्ध रूप भी है । उसकी मात्रायुक्त अवस्था के भी दो भेद हैं -- एक शुद्ध , दूसरा अशुद्ध । उसके मात्रायुक्त शुद्ध -रूप का परिचय योगियों को मिलता है । अमात्रक -अवस्था अप्रमेय , अखण्ड है , उसके आदि अन्त का निर्णय नहीं हो सकता ।
ॐकार - साधन
पृष्ठ 414
भारतीय संस्कृति और साधना
३०/४/२४
" भारत दार्शनिक देश है "यानी भारत का अत्यन्त साधारण आदमी भी चाहे जितना व्यभिचारी , इन्द्रिय-लोलुप क्यों न हो,पुराने जमाने से चली आयी विचारमालिका को दुहराता रहता है। 'जीवन क्या है ?मृगतृष्णा है' ;'जीवन क्या है ?आखिर मरना है!'- इस तरह के उदगार यदि आत्मा की सफलता के चिह्न हैं तो उनकी कीमत भी है।परन्तु साधारणतःवे साधारण दार्शनिक वाक्य जन-साधारण के लिए ऐसे नहीं होते। उनका अर्थ अनुभूति द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता। ऐसी परिस्थिति में फिलासफी कभी भी जन-साधारण को सत्पथ पर नहीं चला सकती,ऐसा मेरा ख्याल है।"- मुक्तिबोध
Wednesday, April 3, 2024
मार्च २४
३/३/२४
वीरभोग्या वसुंधरा! बलमुपास्व! नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः...
आधिभौतिक कष्टों को दूर करने के लिए बल चाहिए, आधिदैविक दुखों से निवृत्ति के लिए भी संसाधन जुटाने ज़रूरी हैं, इसके लिए भी बल आवश्यक है. इनके बाद आध्यात्मिक कष्टों का निवारण करना है तो पहले दो से होकर गुजरना पडेगा, यहाँ पहुँचकर बल और सत्य एक हो जाते हैं. यहाँ बल अप्रासंगिक हो जाता है या वह अविभाज्य हो जाता है. व्यक्ति को बिना इन तीनो दुखों के निवारण के विश्राम प्राप्त होना संभव नहीं है... २०२२ में आज की फ़ेसबुक पोस्ट
जो कुछ व्यक्त हो रहा है, वह पीड़ा है। पीड़ा प्रकाश ही प्रेमरूप करुणावान है। यह करुणा ही आनंद है, वही रस है, यही जीवन है। स्वर्ग है। इसके उलट अज्ञान है, मृत्यु है, अविद्या और माया है। नर्क है।
जो अव्यक्त हो रहा है वह भी प्रेम है। किंतु वह विश्राम अवस्था में है।
''भव भावे मुझको और उसे मैं भाऊँ |. कह मुक्ति, भला किस लिए तुझे मैं पाऊँ |”. यशोधरा
देवगढ़ नाम के पाँच स्थान ज्ञात हुए हैं। ललितपुर उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त ओड़िशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी देवगढ़ या देवगड है। देवगिरी महाराष्ट्र के खानदेश में अलग स्थान है। एक समय यह औरंगज़ेब की राजधानी रहा है। इस क्षेत्र में घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग हैं। देवघर झारखंड का एक और अलग स्थान है, जहां बारह ज्योतिर्लिंगों में एक बाबा बैद्यनाथ आसीन हैं।
इसके अलावा देवबंद सहारनपुर में एक और प्रसिद्ध स्थान है। यूँ, अपने यहाँ डग डग देवी पग पग देव की कहावत प्रचलित रही। अतः देव नाम से अनेक जगहें अपने देश में मिलती हैं।
ललितपुर से पश्चिम में ३२ किमी दूर बेतवा किनारे छोटा सा गाँव है देवगढ़। जैन और बौद्ध कलाओं के उत्कृष्ट विग्रह और शैल चित्र तो यहाँ मिलते ही हैं। यहाँ ६ठी शताब्दी ईस्वी का गुप्तकालीन दशावतार मंदिर इतिहास के छात्रों और विद्वानों के आकर्षण का केंद्र रहा है।
सबसे पहले अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने अपनी यात्रा के दौरान १८७४-७७ के दौरान इस स्थान को प्रकाश में लाया। फिर पीसी मुकर्जी ने १८९९ में अपनी रिपोर्ट में इसे दशावतार मंदिर या सागर मठ नाम दिया। रामायण में वर्णित विष्णु के दस अवतारों की कथा यहाँ विभिन्न पाषाण मूर्तियों में व्यक्त की गई है। बाद में पुरातत्वविद दयाराम साहनी ने इसकी खुदाई कराई और उन्होंने इसे गुप्तकाल का स्मारक माना। पंडित एम डी वत्स ने इस स्थान से कुछ और खोजें की थीं। सब इस बात पर एकमत हैं कि यह गुप्त काल का मदिर है और उस समय का यह एकमात्र अवशेष है।
देवगढ़ में ग्यारह सौ से ऊपर मूर्तियाँ पायीं गईं हैं। यहाँ जैन धर्म के भगवान शांतिनाथ मंदिर के बाहर ८६२ ई का संस्कृत भाषा में लिखा एक शिलालेख मिला है।
कुंदनलाल जैन लिखते हैं....
भगवान शांतिनाथ के प्रसिद्ध मंदिर के समक्ष स्थित स्तम्भ लेख से इस पुण्य स्थली की प्राचीनता का प्रबल प्रमाण उपलब्ध होता है। इसी स्तम्भ लेख से इस नगर का प्राचीनतम नाम ‘‘लुअच्छगिरि’’ था ऐसा स्पष्ट होता है। इस स्तम्भ लेख को सं. ९१९ शाके ७८४ में श्री कमलदेव आचार्य के शिष्य श्री देव ने उत्कीर्ण कराकर प्रतिष्ठित कराया था, उस समय यहां महाराज भोज देव का शासन था। स्तम्भ लेख मूल पाठ निम्न प्रकार है— ‘‘ओ परम भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर श्री भोजदेव मही प्रबद्र्धमान, कल्याण विजय राज्ये, तत्प्रदत्त पंच महाशब्द महासामन्त श्री विष्णु राम परिभुज्य या (के) लुअच्छगिरे श्री शान्त्यायतन संन्निधे श्री कमल देवाचार्य शिष्येण श्री देवेन कारापितं इदम् स्तम्भं। सं. ९१९ अश्वयुज शुक्ल पक्ष १४ चतुर्दश्यां वृहस्पति दिने उत्तर भाद्रपदा नक्षत्रे इदम् स्तम्भं घटितमिति। शक काल (शब्द) सप्तशतानि चतुराशीत्यधिकानि ७८४।। वाजुआगगाक गोष्ठभूतेनाऽयं स्तम्भं ’’ इस समय यहां का शासक विष्णु राम था जो पंच महाशब्द और महासामन्त की उपाधि से विभूषित था।
आगे चलकर १२ वीं शताब्दी में देवगढ़ का नाम ‘‘कीर्तिगिरि’’ रखा गया, जो यहां के चंदेल शासक कीर्ति वर्मा ने यहां अपनी विजय के उपलक्ष्य में अपने ही नाम के प्रथमाक्षरों की पहचान स्वरूप इसे प्रचलित कराया। सं. ११५४ में इस प्रदेश की विजय प्राप्ति के पश्चात् महाराजकीर्तिवर्मा ने अपनी प्रशस्ति स्वरूप जो शिलालेख प्रतिष्ठत कराया वह यहां प्राप्त हुआ है। जिसका मूल पाठ निम्न प्रकार है।
चंदेलवंश कुमुदेन्दु विशालकीर्ति:, ख्यातो बभूवनृपसंघतांध्रि पद्म:।
विद्याधरो नरपति कमलानिवासी, जातस्ततो विजयपाल नृपोनृपेन्द्र: ।।१।।
तस्याद्धर्मपर: श्रीमान् कीर्तिवर्मनृपोऽभवत्, अस्त कीर्ति सुधाशुभ्र: त्रैलोक्यं सौधतामगात्।
अगदं नूतनं विष्णु:माविर्भूतमाप्य यम्, नृपाब्धि तत्समाकृष्टा श्रीरस्थैर्य: प्रमार्जयेत्।।२।।
राजेन्द्र मध्यगतश्चन्द्र निभस्य यस्य, नूनं युधिष्ठिर सदा शिव रामचन्द्र:।
एते प्रसन्न गुणरत्न निधौ प्रविष्टा, यत्तद् गुणप्रकर रत्नमये शरीरे।।३।।
तदीयामात्य मंत्रीन्द्रो रमणीपुर विनिर्गत:, वत्सराजेति विख्यात: श्री मान्महीधरात्मज:।
ख्यातो वभूब किल मंत्रपदैक मात्रे, वाचस्पतिस्तदिह मंत्रगुणैस्सभास्याम् ।।४।।
योऽयं समस्त मही मंडल माशुशत्रो, राच्छिद्य कीर्तिगिरि दुर्गमिदं व्यधन्त।
श्रीवत्सराज घट्टोऽयं नूनं ते नामकारित:, ब्रह्मांडमुज्ज्वलं कीर्तिरारोहतुममात्मन: ।।५।।
सं.११५४ चैत्र वदी द्वितीय बुधौ।
राग, लय, अक्षर सर्वत्र बिखरे हुए हैं। बस उन्हें संयोजित करने की आवश्यकता। पूरी सृष्टि एक लय, एकताल और एक सुर में निबद्ध है। उठते जागते खाते पीते काम करते और यह सब न करते हुए वह सुर बज रहा है। जो सुनहै सोई जाने।
७/६/२४
तुर्यावस्था का अर्थ है भीतर और बाहर दोनों का ज्ञान होना।
जाग्रत में संसार दिखता है, स्वप्न में संसार के प्रतिबिंब तो सुषुप्ति में बाहर का और भीतर का ज्ञान नहीं दिखता है।
८/३/२४
यत्र सोऽस्तमयमेति विवस्वांश्-
चन्द्रमः प्रभृतिभिः सह सर्वैः ।
कापि सा विजयते शिवरात्रिः
स्वप्रभाप्रसरभास्वररूपा ॥
फाल्गुन माह की सबसे अंधेरी यानि कृष्ण पक्ष चौदहवीं की रात्रि का समय, जब सूर्य और चंद्र आदि सब अस्त हो जाते हैं, तब शिवरात्रि होती है। सूर्य और चंद्र के अस्तंगत होने पर विश्व उन्मीलित हो जाता है। अस्तंगत होने की प्रक्रिया ही शिव की बारात है। बारात यानि विचार, वासना, स्मृति और कल्पना। इनमें व्यक्ति डूबता उतराता रहता है। शिव की यह बारात शक्ति के घर से होकर फिर शिवमय हो जाती है। यह बारात शिव की है और शिव में ही वह लीन हो जाती है। शिव में लीन होने से पहले उसे शक्ति परीक्षा से गुजरना होता है। और तब व्यक्ति ज्योति दर्शन करता है। यह ज्योति प्रभा शिव विग्रह की भाँति गोलाकार है, भास्वर है।
महाशिवरात्रि की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ....
९/३/२४
Thy light of goodness and Thy protective power are ever shining through me. I saw them not, because my eyes of wisdom were closed. Now Thy touch of peace has opened my eyes; Thy goodness and unfailing protection are flowing through me.
~ Paramahansa #Yogananda
Through Cathy Ginter. Thank you!
TODAY IS MAHASAMADHI ANNIVERSARY OF SWAMI SRI YUKTESWAR GIRI
In a letter from Master (Paramhansa Yogananda) to Rajarsi Janakananda (Yogananda's advanced disciple) dated March 17th [1936], written in Ranchi just 9 days after Sri Yukteswar left his body...
"Inspite of all wisdom and perception, I feel very lonely since our Guruji Swami Sri Yukteswar Giriji left us. Now you know, beloved one, what consolation you have given me, what gratefulness you have won from me and Guruji for being the divine instrument of making it possible for me to come here and pay to him my last respects on earth. I wrote you, “Guruji is planning to give up his body. Perhaps I can stay him.” I had it all planned to go on March 6 to Puri where he was residing, but God didn’t let me lest I pray to keep him here. Instead, I started to go on March 8, and I was prevented. Then I went on March 9 and arrived at Puri March 10 morning, only to see his lifeless body in samadhi posture. According to custom I had to bury his body in the ashram grounds. The body which had reflected omnipresent wisdom lay lifeless before me mocking, “I didn’t let you pray for me.”
”On March 9, 7 p.m., our Guruji left his body; and about that time he intimated to me of his departure. Also on the train I saw two tunnels of light and his astral self telling me of his departure. Though since his departure I have been seeing him all of the time, practically, still it is a great, great shock that I won’t ever be able to show you and Mt. Washington devotees Swami Sri Yukteswarji in body. He had told me, “If I live through March (Bengali Chaitra month), I will live longer.” When I had asked him to see an American lady from California, he replied, “I won’t see her now, nor anyone else in this life.” I know there would have been a great battle if I was present at the time of his passing. I wrote a letter to him asking him not to give up his body, but the people through whom I sent it did not read it to him. Guruji was slightly feverish for five days. His fever left in the end; and while his body seemed perfectly well, he left in samadhi."
“If there were words, I would write to you how I feel about the material disappearance of Master. Imagine, the Lord God did not want me to pray lest He have to grant my prayer or deny it. The lion has left his cage, the lion whose roar of wisdom kept me undergoing a thousand privations and demands of organization work. If I could weep, I would feel relieved. If I would cry, the gods would cry with me. If I had a thousand mouths, I would say India lost one of the greatest in wisdom. But the saddest of all is I could not show him you.”
"I am sad, even though I see him at every turn of my gaze. He was one of the wisest men, greater in exposition of wisdom than Shankara as far as I know. When comes such another? I am remembering all the divine play and communion he had with me. I can hardly think anything else these days than of all his untold gifts of upliftment given to me. I saw many teachers, but none like our lord who was a spiritual lion, never bending, ever aflame with wisdom.”
१२/३/२४
ध्यान एक लंबा धैर्य और प्रतीक्षा जनित घटनाओं का दर्शन है। सामने एक बेर रखा है, वह मिट्टी बनेगा, उसमें अंकुरण होगा, फिर बेर होगा, इस पूरे चक्र को घटित होते देखने की प्रक्रिया ध्यान है।
१५/३/२४
यह संसार वर्तुलाकार है। किंतु उस वर्तुल में पुनरावर्तन नहीं है। पुनरावर्तन उसके घटने से प्रतीत ही होता है। यह श्वास प्रक्रिया में भी दिखता है। श्वास आ रही है और जा रही है। श्वास के नासिका रंध्रों में प्रवेश और वहीं से निर्गम होने के कारण यह पुनरावर्तित प्रतीत होती है, परंतु यह जहां से उठती है और जहां विलीन होती है वह स्थान अनादि और अनंत है। इसमें सब घटित तो हो रहा है, उसी को हृदय कहा गया है। इस दहर की थाह नहीं है। घटने के कारण वह वर्तुल है, अन्यथा तो वह गति, स्थान और समय से परे है।
वैदिक युग में कुछ अवसरों पर अविवाहित कुमारियां अग्नि के चारों ओर एकत्र हुआ करती थीं, वे जाज्वल्यमान अग्नि के सामने हाथ जोड़ा करती, उसकी परिक्रमा किया करती और यह गीत गाया करती थीं..
यही प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र हुआ...
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् |
उर्वारुकमिव बन्धनान् इतो मुक्षीय मामुतः||
मंत्र का ऐतिहासिक अर्थ
आओ हम सब सुगंधित देव, सर्वदृष्टा देव और हमारे पति के ज्ञाता देव की पूजा में निमग्न हो जाएँ. जिस प्रकार से भूसी से दानों को अलग कर दिया जाता है उसी प्रकार हम भी पितृ गृह के बंधनों से मुक्त हों, परंतु कभी, कदापि भी, पति गृह से विरत न हों.
Let us be absorbed in the worship of the Fragrant One, the All-seeing One, the Husband-knowing One. As a seed from the husk, so may we be freed from bondage here (the parents' house), but never, never from there (the husband's home). swami ramtirth
दूसरा अर्थ -
हम त्रिनेत्र को पूजते हैं,
जो सुगंधित हैं, हमारा पोषण करते हैं,
जिस तरह फल, शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है,
वैसे ही हम भी मृत्यु और नश्वरता से मुक्त हो जाएं। १५ मार्च २२ की फ़ेसबुक पोस्ट
20/3/24
अगर पुरुष सूक्त या ब्राह्मणोस्य मुख मासीद.....ऋचा को बाद की रचना भी मान लिया जाए तो भी ऋग्वेद में अग्नि, इंद्र, मरुत इत्यादि देवताओं का वर्णन बार-बार आया है, यह वर्णोत्पत्ति के ही तो आधार हैं।
बाद में वेदांत या उपनिषद ग्रंथों में ब्रह्म और क्षत्र पदों का वर्णन हुआ है। गीता में यह वर्ण विभाजन स्पष्ट हो गया है। गीता उपनिषदों का सार संग्रह जैसा है। यह सही है कि वर्ण विभाजन का आधार गुण कर्म ही रहे होंगे, इन गुण कर्मों को जातियों में सुरक्षित किया और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संक्रमित करते आए। वर्ण विभाजन के सूत्र वेद ग्रंथों में भी मिलते हैं। वर्ण व्यवस्था से हम सबको कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, उसमे ऊँच नीच की भावना यदि न रहे। वर्ण का अर्थ रंग है और रंग रूप की अभिव्यक्ति के प्रथम संकेतक हैं। इस प्रकार वर्ण सृष्टि उद्गम के परिचायक हैं, आप इसे कुछ और नाम भी दे सकते हैं, पर यह सृष्टि उद्गम की पहचान हैं, इसे कैसे अस्वीकार कर सकते हैं।🙏 २०२३ की आज की फ़ेसबुक पोस्ट
२१/३/२४
कोई दूसरे को चोट नहीं पहुँचाना चाहता है। वह स्वयं की समस्या दूर करने के लिए समाधान करता है। उस क्रम में हमें लगता है वह हमें परेशान कर रहा है। यह तक कि अगर दूसरे का जीवन भी वह लेना चाहता है तो वह भी उस समस्या के समाधान के क्रम में ही ऐसा करना चाहता है। ऐसा भी होता है कि हमारा ही पूर्वकृत्य कोई कष्ट बनकर वापस लौट कर आ रहा हो।
इसी तरह कोई दूसरे को सुख भी नहीं देता। वस्तुतः दूसरे को दिये गए सुखकर्म आत्मतृप्ति के वाहक ही हैं।
२४/३/२४
होली पर्व एक सामाजिक सांस्कृतिक विरेचन है, वह विरेचन का उत्सव है। ढंग और बेढंग इसमें एकमेक हो जाते हैं। रंगों में डूबना यानी अपनी पहचानों को मिटा देना है। पहचान को लेकर हम कितने सजग, कितने सक्रिय होते हैं कि उस पहचान का महत्व क्या है, वह किसलिए है, यही भूल जाते हैं। यह उत्सव इस पहचान का बोध कराता है। होली में हमारा असल रूप दिखने लग जाता है। किसी के प्रति दुष्टता की हद तक भी। परंतु होली का उत्सव हार्दिकता का है। रंग और गुलाल हार्दिकता के साथ प्रयोग किए जाते हैं। यह इस उत्सव की स्वाभाविकता है। होली का अर्थ है बीइंग डन जो हो लिया या जो हो गया। जीवन में सब कुछ होना ही तो है, इसे प्रत्यक्ष कर लेने का नाम होलिया या होलिका है।
अस्तु! इस होलिका को जो जैसे घटित होते देख रहा है, रंगों से या बिना रंगों के! होलिका से वह बाहर नहीं रह सकता। होलिका से हुए बिना प्रह्लाद संभव नहीं। इस होलिका का दर्शन या उससे गुजर जाने के बाद विशेष प्रसन्नता या आह्लाद/प्रह्लाद का उदय होता है। होलिका ज्ञानाग्नि में दग्ध हो जाती है, आह्लाद शेष रह जाता है.
आप सबको होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ....
भारत का जनमानस अपनी आध्यात्मिकता के प्रति सजग रहकर यदि वंचित रहकर भी प्रसन्न रहना चाहता है तो यह स्थिति आलोचना की परिधि से परे है। यदि यह जनमानस विवश होकर प्रसन्न है तो उसे और कर्मशील होना होगा।
२७/३/२४
आज प्रातः देखा, जिह्वा पलटी हुई थी। सुबह होंठ नहीं खुल पा रहा था। निद्रा में ध्यान।
परब्रह्म केवल प्रेम में निवास करता है। प्रकृति का कण-कण इसी प्रेम को व्यक्त कर रहा है। व्यक्त होता है, इसीलिए तो व्यक्ति है। प्रकृति का हर तत्व कितनी सहजता से व्यक्त हो रहा है। ब्रह्म को व्यक्त करने के लिए हमें नाम और रूप का सहारा लेना पड़ता है। राम वही हैं। ५/८/२० ट्विटर पोस्ट
Friday, March 1, 2024
फ़रवरी २४
१/२/२४
आत्मा और शरीर के मध्य में ये मन अपने खेल दिखाये।
जो इस मन में शिव को बसाए वो बस में करे मन को योगी हो जाए।
यत् गच्छति न कालं न जीवनम्।
अकार आदि वर्णो के समुदाय को क्रम या व्यतिक्रम से उच्चारण करने पर जो वस्तु प्रकाशित होती है, उसे ‘शब्द’ जानना चाहिये और उस शब्द से जिस अभिप्राय की प्रतीति हो, उसका नाम ‘अर्थ’ है।
श्वेतकेतु कहते हैं- शब्द और अर्थ में एक प्रकार से कोई नियत सम्बन्ध नहीं है। कमल के पत्ते पर स्थित जल की भाँति शब्द एवं अर्थ का अनियत सम्बन्ध है, ऐसा जानो। सुवर्चला बोली- महाप्राज्ञ! अर्थ पर ही शब्द की स्थिति है, अन्यथा उसकी स्थिति नहीं हो सकती। साधु शिरोमणे! यदि बिना अर्थ का कोई शब्द हो तो उसे बताइये।
श्वेतकेतु ने कहा- अर्थ के साथ शब्द का वाचकत्वरूप सम्बन्ध है और वह सम्बन्ध नित्य है। यदि शब्द है तो उसका अर्थ भी सदा है ही। विपरीत क्रम से उच्चारण करने पर भी शब्द का कुछ-न-कुछ अर्थ होता ही है (जैसे नदी, दीन इत्यादि)। सुवर्चला बोली- शब्द अर्थात् वेद का आधार है अर्थभूत परमात्मा।
२/२/२४
घटनाओं में सुख, सौंदर्य और सफलता नहीं है, घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में सौंदर्य सुख है, आह्लाद है। प्रस्तुतीकरण किसी पक्ष का हो, अगर उसमे रंजकता और स्थायित्व है तो वह ध्यानाकर्षक ही होगा। घटनाएँ होती रहती हैं, आप हम घटना के किसी पक्ष में खड़े होते हैं या विरोध में होते हैं, वह अच्छी या बुरी लगती है, उसका कुल कारण यही है कि उसका प्रस्तुतीकरण कैसे हुआ है या उसे हमने कैसे समझा है।
५/२/२४
साधनानाम् अनेकता’ अर्थात् साधना अनेक प्रकारकी होती है ।
गुरुकृपा हि केवलं शिष्यपरममङ्गलम् ।’
६/२/२४
किं कुर्वन्ति ग्रहा सर्वे यस्य केन्द्रो बृहस्पतिः।
मत्तमातंगयूथानां भिनत्तयेकोऽपि केशरी।
(मानसागरी)
ज्योतिष जीपीएस की तरह है, गंतव्य की दिशाएं सुझाता है। वह अंतिम और एकमेव पथ नहीं, संभावना मात्र है।
काल में ज्योतिष रहता है, महाकाल से जुड़ने पर काल की अनुकूलता हो जायेगी।
Vशून्य
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
एक अवधारणा
शून्य >
जो है ,
जो नहीं है ,
लेकिन जो . है . भी नहीं है
और
जो . नहीं . भी नहीं है ।
जो >>है और नहीं << का निषेध भी नहीं है ।
>>>आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
प्रकृति में मन बुद्धि शरीर सब एक लय में रहते हैं, विकृति में इनमें गड़बड़ हो जाती है। प्रकृति की लय बनी रहे, इसके लिए संस्कृति होती है।
छोड़ना नहीं, छूटना वैराग्य है। मंत्र की तरंग होती है, अर्थ समझ आए, न आए। तरंग में अर्थ होगा ही। मंत्र अगर जागृत हो तो उसका असर अवश्य होगा। मोबाइल है, बैटरी है, पर वह रिचार्ज न हो तो वह नहीं चल पाएगा। श्लोक का अर्थ होता है।
शिव समूचे अस्तित्व की पहचान है, लिंग उसका विग्रह है या मूर्तमान स्वरूप है। बाद में उसकी पहचान जननेन्द्रिय से जोड़ दी गई।
कहानी या कथा से हम मंत्र के अर्थ को जानने का प्रयत्न करते हैं।
७/२/२४
जैसे कोई प्रकाश कौंधता है,
शब्द उसी तरह होता है। उस प्रकाश में जो कुछ दिखता है, वह उस शब्द का अर्थ है। प्रकाश के कौंधने में जो आवाज होती है, वह ध्वनि या स्फोट है। कौंधता हुआ प्रकाश आकाश का एक हिस्सा है। शब्द आकाश का ही तो गुण है। कोई वस्तु हो, उसका आकाश अवश्य होगा। निराकाश में या बिना आकाश के किसी वस्तु का होना संभव नहीं है। घट का आकाश उसका आयतन है।
शब्द की आवाज ध्वनि है, इसे सुनना दुष्कर है। आकाश को सुनना शब्द सुनना है। आभास जहां शुरू होता, वहाँ से शब्द की सत्ता आरंभ होती है। यह ध्वनि कौंधते हुए प्रकाश की आवाज के मानिंद है। स्थूल कानो से इसे नहीं सुन पाते। वायु की आवाज स्थूल कानों से सुनी जा सकती है। अग्नि की ध्वनि और स्थूल होती है, जल और पृथ्वी की ध्वनियाँ भी सुनी जा सकती हैं।
हर वस्तु का अपना आकाश है, अपना शब्द है। परम शब्द में सब शब्दों का समाहार है। उस परम् या तत्व से सब शब्दों का निर्गमन होता है। तत्व ही उसे इसीलिए कहा गया कि बस वह है, क्या है, कैसे है, उसका निर्वचन संभव नहीं।
ध्यान के दौरान पाँचों महाभूतों का सही मिश्रण तैयार हो जाता है, इस मिश्रण के परिणामस्वरूप दैनन्दिन कार्यों पर उसका सकारात्मक असर पड़ना स्वाभाविक है। एक सामरस्य बन जाने से जीवन समस्वर हो जाता है।
९/२/२४
जो व्यक्ति जितनी बड़ी राजधानी में निवास करता है, वह उतने बड़े हृदय का होता है, या कहें उसे ऐसा होना चाहिए। बड़ी राजधानी के व्यक्ति में डाह और ईर्ष्या का स्तर उतना कम होना चाहिए। कोई ज़िला मुख्यालय जनपद वासियों की राजधानी है। तहसील मुख्यालय तहसील वासियों की राजधानी है तो जो जितनी छोटी बड़ी प्रशासनिक इकाई है वह उतने समूह की राजधानी है। राजधानी का अर्थ है व्यक्ति उतनी बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष तौर पर दूसरों के आने जाने और व्यवहार बर्ताव को देखता समझता है। इस प्रकार विभिन्न व्यक्तियों की रहनी से उसे जीवन जीने का सीधा ज्ञान प्राप्त होता है। बिना पुस्तकों को पढ़े, यह एक प्रकार का सत्संग है।
९/२/२४
आज ध्यान में आया श्लोक, जो खोजने पर पता चला श्वेताश्वतर उपनिषद की ऋचा है।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
मैं उस परम पुरुष को जान गया हूँ जो सूर्य के समान देदीप्यमान है और समस्त अन्धकार से परे है। जो उसे अनुभूति द्वारा जान जाता है वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है। जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा का कोई अन्य मार्ग नहीं है।
११/२/२४
अपना क्या है इस जीवन में सब तो लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार॥ अरुण कमल
प्रकृति नित्य परिवर्तनशील है। आज का विकास कल बासी हो जाता है, उसकी जगह कोई नया प्रतिरूप बन जाता है। हम समझते हैं, उसका अच्छा हो गया। उसने उत्थान कर लिया। नित्य बदल रही प्रकृति में यह सब होना स्वाभाविक है। राधा उल्लसित है, हम उससे प्रेम करें। हम उल्लसित राधा को देखकर आनंदित हों कि अतीत से उपजे अवसाद और भविष्य की झूठी कल्पनाओं के ज्वार में डूबे रहें। मौन के अतिरिक्त सब कल्पना ही है।
Silence is essential.
We need silence just as much
as we need air, just as much as
plants need light.
If our minds are crowded with
words and thoughts, there is no
space for us.
~Thich Nhat Hanh
१२/२/२४
प्रेम चेतना का परम विस्तार है। परम तक पहुँचने के बाद यह प्रेम रीतता नहीं है। यह क्षीण नहीं होता, अपितु दिन दिन बढ़त सवायो। सांसारिक प्रेम उस परम तक पहुँचने का माध्यम है। संसार के संबंधों के प्रेम से परम प्रेम का विस्तार उपलब्ध होता है। संसार का प्रेम किसी से हो, वह अपनी आत्यंतिक दशा तक पहुँच जाए तो परम उपलब्ध हो जाता है। आत्यंतिक दशा के प्रेम में प्रेमी की भी आवश्यकता नहीं रह जाएगी, सब कुछ प्रेममय हो जाएगा। उस प्रेम में जो अपने हैं, वे हैं, जो नहीं हैं, वे पराये नहीं रह जाएँगे। हमें अब आलंबन की आवश्यकता नहीं, हर क्षण उद्दीपन है, यह उद्दीपन ही आलंब हो गया है। हम सदा स्थायी भाव में हो जाते है।
केवल वासनागत शारीरिक भूख मिटाने के लिए बनाये गये संबंध प्रेम नहीं है। किसी भी तरह की भूख की इच्छा से पार जाये बिना प्रेम स्थायी नहीं हो सकता। स्त्री और पुरुष अथवा दो प्रेमियों को उस परम प्रेम को उपलब्ध होने की दिशा में सतत प्रयत्न करना चाहिए। संसार में दो प्रेमियों को रहते हुए किसी से कोई माँग और शिकायत नहीं करनी चाहिए। वासनागत प्रेम और वास्तविक प्रेम में अंतर करना कोई मुश्किल नहीं है। यदि दो में से कोई एक वास्तविक प्रेम का पुजारी हुआ तो दूसरे के वासनागत प्रेम को तुरंत भाँप जाएगा। वास्तविक प्रेम के पुजारी के लिए वासनागत प्रेम से कोई घृणा नहीं होगी, करुणा ही बरसेगी।
१३/२/२४
जो देव में बस गया या जिसमें देव बस गया, वह वासुदेव है। भगवान की यह अद्वैत सूचक उपाधि है।
'परा' शब्द परमात्म तत्व है।
'पश्यन्ति' शब्द आत्म तत्व है।
'मध्यमा' का आधा अंश मनस्तत्व है।
ये सभी तत्व मध्यमा के शेष आधे रूप 'बैखरी' शब्द में आकर व्यक्त होते हैं। इस प्रकार तीसरा तत्व भी पूर्ण हो जाता है।
मौलिक रूप से तीन तत्व हैं और तीन वर्ण (अक्षर या ध्वनियाँ) हैं। बैखरी तो तीनों की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है। वेदों में इन तीनों को 'त्रयी विद्या' के नाम से विभूषित किया गया है। त्रयी विद्या युक्त तत्व 'ॐ' है जो 'अक्षरब्रह्म' का स्वरुप समझा जाता है जिसे मंत्र-शास्त्र में 'प्रणव' की संज्ञा मिली है। उसी के अनुसार 'परा' घोर तुरीयावस्था है और पश्यन्ति, मध्यमा और बैखरी क्रमशः सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत अवस्थाएं हैं।
आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मानसिक अवस्था का जो सूक्ष्म अर्थ है, वह एक प्रकार का संस्कार या प्रतिबिम्ब है, जब मनुष्य सुषुप्ति अवस्था के संस्कारों अथवा प्रतबिम्बों के माध्यम से विगत बातों का स्मरण करता है। प्रश्न यह है कि उन संस्कारों अथवा प्रतिबिम्बों का कारण क्या है ? क्योंकि संस्कार जब कार्य है तो उसका कोई न कोई कारण अवश्य होना चाहिए। इसका कारण है शब्द या नाम। सम्पूर्ण जगत शब्द, अर्थ और नाम रूप है।
यही वह स्थान है जहाँ से मंत्र-शास्त्र का आविर्भाव होता है। इस बात को गहराई से समझने के लिए निम्न तथ्य जानना आवश्यक है-
मध्यमा वाणी और उसका अर्थ दोनों सूक्ष्म हैं। वह लिंग शरीर से सम्बद्ध है। किसी शब्द के अर्थ को ग्रहण करने की दिशा में मन दो कार्य करता है। उसका एक अंश तो सूक्ष्म शब्द के साथ एकाकार होता है दूसरा अंश बाह्य वस्तु के रूप में आकार ग्रहण करता है। यही सूक्ष्म अर्थ है। क्योंकि जैसे ही हम कोई शब्द सुनते है और उसका अर्थ सामने आता है, वैसे ही वस्तु का आकार प्रकट हो जाता है। इस प्रकार सूक्ष्म शब्द और सूक्ष्म अर्थ दोनों मन के ही दो रूप हैं। इसे एक उदाहरण से और समझा जा सकता है। किसी ने कोई शब्द या शब्द समूह या वाक्य बोला और दूसरे ने सुना। लेकिन उसकी समझ में नहीं आया। इसका मतलब यह हुआ कि उसके मन से उसका तादात्म्य ठीक से नहीं जुड़ पाया या उसने उसे ठीक से पकड़ नहीं पाया। तो वहाँ पर अर्थ के रूप में किसी वस्तु का आकार नहीं बनेगा।
मनुष्य के शरीर में षट्चक्र हैं जिनमें पचास दल हैं। प्रत्येक दल पर संस्कृत वर्णमाला का एक-एक अक्षर है जो सूक्ष्म है और शरीर के भीतर स्थित कण्ठ, तालु आदि स्थानों के आघात से बैखरी आधार ग्रहण करता है। उन्हीं सूक्ष्म अक्षरों को 'मातृका' कहा गया है। 'मातृका' पराशक्ति या परावाक् के पचास रूप समझी जाती है। अतः पचास वर्ण मातृका बीजरूप भी हैं। जिस चक्र के दलों पर जितनी बीजरूप वर्ण-मातृकाओं की स्थिति है, वे आपस में मिलकर बीजाक्षर मन्त्र कहलाते हैं। प्रत्येक बीजाक्षर मन्त्र से शरीर में मन्त्र-तत्वों में से एक-एक तत्व का उदय होता है। बाद में उस बीजाक्षर मन्त्र को उसी तत्व से सम्बंधित बतलाया जाता है। जब कोई बीजाक्षर बैखरी का रूप धारण करेगा तब अपने से उत्पन्न होने वाले तत्व को भी साथ साथ व्यक्त करेगा।
तंत्र-शास्त्र में केवल छः चक्रों की चर्चा की गयी है। किन्तु योग पर जो तंत्र आधारित है, उसने छः चक्रों के आलावा एक सातवें चक्र की भी कल्पना की है जिसे 'सहस्रार' कहा जाता है। सहस्रार चक्र में एक हज़ार दल हैं। किन्तु उन दलों पर मातृकाओं की स्थिति नहीं है, बल्कि मातृकाओं से सम्बंधित लोकों, देवताओं और तत्वों के दर्शन होते हैं। सहस्र दलों के बीच जो कर्णिका है, वह विश्वब्रह्माण्ड का केंद्र है। वहाँ पहुँचने पर मन पूर्ण स्थिर, निर्विकार और शान्त होकर आत्मा में विलीन हो जाता है, मन का अस्तित्व ही एक प्रकार से ख़त्म हो जाता है और उसके बाद मन से मुक्त आत्मा परमात्म तत्व में विलीन हो जाती है जिस विलिनीकरण प्रक्रिया के लिए आचार्य, इष्ट और परमात्म तत्व की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
री का अर्थ गति, ऊर्जा या संभावना है। स्त्री शब्द का विकास इसी से हुआ है।
१५/२/२४
ओशो के प्रति निरादर न रखते हुए भी यह बात कहना चाहता हूँ कि अमेरिका गये शुरुआती सन्यासियों के दिखाए मार्ग में अगर खोट है या झूठ है तो कौन सा मार्ग हमारा पाथेय बन सकता है। ओशो की एक रील पर टिप्पणी
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।।
जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।
जो पराई स्त्री को माता के समान समझते हैं और पराया धन जिन्हे विष से भी भारी विष है । जो दूसरों की संपत्ति को देख कर खुश होते हैं और दूसरे की विपत्ति देख विशेष रूप से दुखी होते हैं और हे राम जी ! जिन्हे आप प्राणों के समान प्यारे हैं उनके मन आप के लिए रहने योग्य शुभ भवन हैं ।
रस को बनते हुए जानने की एक पद्धति है और दूसरी रस का पुनरुत्पादन करके उसे भोगने की प्रवृत्ति है। पहली पद्धति भारत की है तो दूसरी पश्चिम की है। दोनों का होना सामरस्य के लिए आवश्यक है।
हैं तो दोनों एक, पर विकसित दो में होते हैं। मूलाधार और सहस्रार जब मिल जाते हैं तब इसकी अनुभूति होती है।
१६/२/२४
बद्ध चित्त का लक्षण
तदा बन्धो यदा चित्तं
किंचिद्वांछति शोचति ।
किंचिन्मुंचति गृह्णाति
किंचिद हृष्यति कुप्यति !
[अष्टावक्र गीता ]
किसी से याचना करना , किसी से कुछ अपेक्षा करना , किसी से कुछ चाहना ,किसी बात पर दु:खी होना , किसी बात पर गुस्सा होना , किसी बात पर हर्षित होना , मैं ग्रहण कर रहा हूँ या मैं त्याग कर रहा हूँ , यह भाव मन में आना
बद्ध-चित्त के लक्षण हैं !
मुक्त चित्त का लक्षण है >>>
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वांछति शोचति !
न मुंचति न गृह्णाति न हृष्यति कुप्यति !
[अष्टावक्र गीता ]
अर्थात्
चाह गयी ,चिन्ता मिटी मनुआँ बेपरवाह !
जाकों कछू न चाहिये , सो ई शाहंशाह !
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा !
मत्वेति हेलया किंचिन्मा गृहाण विमुंच मा !
अष्टावक्र
जब न तो चित्त संग्रह में ही आसक्त होता है और न त्याग में !
मैं त्याग कर रहा हूँ , त्याग करने वाला >> मैं << हूँ , यह भी बन्धन है !
अहंकार अपने विविध बंधनों से चित्त को बाँधता है , इसलिए अहंकार बंधन है !
अहंकार जब बर्फ की तरह पिघल जाय , तब जल में लहरें आने लगती हैं , वह लहर ही मौज है और वही मुक्ति का स्वरूप है !
१७/२/२४
राधा प्रकृति का प्रतीक आश्रय है, नाम है, उसका हृदय कृष्ण है। कृष्ण को चोर कहा गया, क्योंकि वे प्रकृति के हृदय हैं और चित्त चुराते हैं। यह चोर न हो, आकर्षण न हो तो राधा जड़ हो जाएगी, शव ही रहेगी।
दूसरी तरफ़ राधा यदि न हो तो वह लीला भूमि ही निर्मित नहीं होगी, जिस पर यह सारा अभिनय घटित हो रहा है। कृष्ण प्रकाश है और राधा पर्दा है। दोनों में से कोई एक न हो तो संसार का चलचित्र चल नहीं सकता।
कोई पूछे फिर प्रकाश को प्रक्षेपित करने वाला या निर्देशक कौन है, वह भी कृष्ण ही है। निर्देशक कृष्ण है तो राधा उस लीला की उत्प्रेरक या उद्भाविका शक्ति है।
१९/२/२४
रात में ध्यान के दौरान आज्ञा चक्र में गुदगुदी हो रही थी कि अचानक पूरा कपाल ठंडा होने लगा, जैसे किसी ने बर्फ का टुकड़ा डाल दिया हो। वह ठंडक पूरे ध्यान सत्र में बनी रही। सिर अचानक झटके से ऊँचा उठा। और इस प्रकार ध्यान पूरा हुआ। कोई क्रिया नहीं, कोई विधि नहीं।
माटी मूक हो गई, पर स्वामी विद्यासागर महाराज जी महावीर होकर बोलते रहेंगे। ॐ शांति शांति। पूज्य महाराज जी का हंसता हुआ सौम्य चेहरा सदा याद रहेगा। उनका मूक माटी अनुभूतियों का महाकाव्य है, हम सबका पाथेय बना रहेगा।
यदि तुम्हारा हृदय, प्रेम और करुणा से ओतप्रोत है तो तुम बहुत शक्तिशाली हो! श्रीश्री रविशंकर
२२/२/२४
अक्सर, हम जो सोचते हैं, वह लिख नहीं पाते, कह भी नही पाते। एक लेखक उसे लिखता है, इसलिए वह बड़ा है।
२३/२/२४
सुनो सहिष्णु बनकर
देखो करुणा से
और
बोलो प्रेम से।
२६/२/२४
A wise woman who was traveling in the mountains found a precious stone in a stream. The next day, she met another traveler who was hungry, and the wise woman opened her bag to share her food.
The hungry traveler saw the precious stone and asked the woman to give it to him. She did so without hesitation. The traveler left, rejoicing in his good fortune. He knew the stone was worth enough to give him security for a lifetime. But a few days later he came back to return the stone to the wise woman.
"I've been thinking," he said, "I know how valuable the stone is, but I give it back in the hope that you can give me something even more precious. Give me what you have within you that enabled you to give me the stone."
२८/२/२४
कोई परम् सूक्ति का बार बार दोहराव कर्णकटु लगने लगता है। उत्तम संगीत को भी बार बार श्रवण करना अरुचिकर हो जाता है। किंतु ऐसे ऐसे कोई नाम बन जाये, उसे जप की भाँति अजपा तक पहुँच जाया जाए तो परमानंद की अनुभूति होने लग जाती है। वह आनंद तरह तरह का सौंदर्य बनकर हर अभिव्यक्ति में कौंध रहा है। नया नया बनकर व्यक्त हो रहा है, उसमें दोहराव नहीं, नवता है। वह स्रोत है, वह कोई एक वस्तु, व्यक्ति या अभिव्यक्ति नहीं है, पर उसमें वह समाया हुआ है। वह सबमें समाकर भी उनसे बाहर है। उसे पकड़कर क़ैद नहीं किया जा सकता, किसी विधि, मंदिर, मंत्र और ऋचा में भी। हाँ इनसे हम उसे अनुभव में अवश्य उतार सकते हैं। उस तत्त्व को अनुभव में उतारने के ही सभ्यतागत सारे जतन अपनाए जाते हैं। मानव इन युक्तियों की बार बार और अलग अलग खोज करता आया है और करता भी जा रहा है।
२९/२/२४
ध्यान में कभी कभी किसी समस्या पर चिंतन चलता रहता है। उस पर सोचते सोचते भी कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। फिर अचानक सब भूल जाते हैं। यानी वह कोई समस्या है ही नहीं। जैसा समय और परिस्थिति के अनुरूप बने, कर जायें। बस यही समाधान है। ध्यानोत्तर किए गए कार्यों में किसी प्रकार की समस्या नहीं रह जाती। ऐसा बहुधा होता है कि काम करते करते किसी अन्य के मुख से करणीय कर्तव्य व्यक्त हो गया, तदनुसार कार्य संपन्न करने से वह समस्या जाती रही।
ध्यानोत्तर कार्य और कार्योत्तर ध्यान एक दूसरे को संपुष्ट करते हैं।
MANTRA & PRANAYAMA
Pranayama [controlled breathing] and mantra naturally go together and work best in combination. Using a mantra along with pranayama unites the mind and prana, drawing our attention and awareness into the breathing process. It can turn pranayama into meditation, as well as bring energy, vitality and wakefulness into the repetition of the mantra. Uniting prana (our power of action) with the mind (our power of knowledge) integrates us back into the source of our being. Prana gives shakti to the mantra and makes it alive and vibrating within our entire body.
The sound of the breath is our most natural and constant outer mantra, we could say. The sound of our heartbeat, which is connected to the sound of the breath, is our most natural internal mantra. An important goal of mantra practice is to get one’s mantra to resonate with the breath, so that it is naturally repeated, strengthened and deepened along with every breath that we take—and then to get it to resonate with every heartbeat, so that our heartbeat is the beat of the mantra.§ वामदेव शास्त्री
Wednesday, January 31, 2024
दिसंबर २३
१/१२/२३
श्री हरिवंश गुसांई भजन की रीति सकृत कोऊ जानि है।
श्री राधाचरण प्रधान हृदै अति सहृद उपासी।
कुंज केलि दंपति तहाँकी करत खबासी॥
सर्व सुमहा प्रसाद प्रसिधिता के अधिकारी।
विधि निषेध नहिं दास अनन्य उत्कट व्रतधारी॥
श्री व्यास सुवन पथ अनुसरै सोई भलैं पहिचानि है।
श्री हरिवंश गुसांई भजन की रीति सकृत कोउ जानि है॥
२/१२/२३
मथुरा को ऐसी प्रसिद्धि न मिली होती अगर वृंदावन न हुआ होता और वृंदावन को भी हम नहीं जान पाते अगर वहाँ ऐसे महात्मा न हुए होते। यह आश्चर्यजनक बात ही है कि भाष्य आदि की रचना न करने पर भी महाप्रभु चैतन्य को एक बड़े भारी सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना गया। समय समय पर उनके रचे मात्र आठ श्लोक शिक्षाष्टकम् नाम से प्रसिद्ध हैं। चैतन्य चरितामृतम जैसी रचनाएँ तो उनके कृष्णदास जैसे शिष्यों ने की हैं। १५१५ ई में चैतन्य महाप्रभु वृंदावन आये और इसे पुनर्स्थापित किया। इसी समय देवबंद निवासी महात्मा हितहरिवंश भी यहाँ हुए, हितहरिवंश ने ८४ वैष्णवों की वार्ता लिखी, हित चौरासी नाम से यह प्रकाशित है। इसे गोकुलनाथ की रचना भी कहा जाता है। सनातन धर्म में चौरासी एक विशिष्ट संख्या है। इसका प्रयोग और निदर्शन कई जगह और बार बार होता आया है। ब्रज भाषा में यह हिंदी गद्य की पहली रचनाओं में गिनी जाती है। राधावल्लभ सम्प्रदाय के आकर ग्रंथ हित चौरासी के इस पद से उसकी रीति-नीति का पता चलता है -
श्री हरिवंश गुसांई भजन की रीति सकृत कोऊ जानि है।
श्री राधाचरण प्रधान हृदै अति सहृद उपासी।
कुंज केलि दंपति तहाँकी करत खबासी॥
सर्व सुमहा प्रसाद प्रसिधिता के अधिकारी।
विधि निषेध नहिं दास अनन्य उत्कट व्रतधारी॥
श्री व्यास सुवन पथ अनुसरै सोई भलैं पहिचानि है।
श्री हरिवंश गुसांई भजन की रीति सकृत कोउ जानि है॥
एक अन्य पद दृष्टव्य है-
"जोई जोई प्यारों करे सोई मोहि भावे, भावे मोहि जोई, सोई सोई प्यारे।“
वृंदावन में हरित्रयी नाम के तीन बड़े महात्मा हुए हैं, राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्रीहितहरिवंश जी, इसी संप्रदाय के ओरछा का राज़दरबार छोड़कर गए पंडित हरिराम व्यास और तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास। आजकल इसी संप्रदाय के स्वामी प्रेमानंद जी के दर्शन और प्रवचन हम सबको मिल रहे हैं। पीले वस्त्रों में रहने वाले, सदा प्रसन्नचित्त और ऊर्जस्वित इन बाबा की विगत सत्रह अठारह वर्षों से दोनों किडनी ख़राब हैं। हर दो दिन या नियमित अंतराल पर उनका डायलिसिस किया जाता है। बाबा की दिनचर्या रात दो बजे से प्रारंभ हो जाती है। यह एक प्रत्यक्ष चमत्कार है। बाबा जी लंबी कथा और आख्यान नहीं सुनाते, न भजन और गीत ही। साधारण और विशेष हर तरह के व्यक्तियों के प्रश्नों और टिप्पणियों को सुनते और उन पर अपना बेलाग होकर उत्तर देकर मार्गदर्शन करते हैं। उनकी एकांतिक वार्ता में विभिन्न शास्त्रों और ग्रंथों के संदर्भ एवं कथाओं की झलक आती है। वे कोई लंबी चौड़ी साधना और उपासना करने को नहीं कहते, किसी भौतिक दुःख दर्द निवारण करने का दावा नहीं करते। नाम जप एकमात्र उनका मंत्र है। सभी धर्मों के लोग उनकी बातों को ध्यान से आत्मसात् करते हैं। रीति रिवाजों का विधि निषेध - यह करना, यह न करना - उनके यहाँ नहीं पाया जाता। नशा और व्यसन से दूर रहने का निर्देश रहता है। उनकी बातों से युवा प्रभावित हो रहे हैं। यह देखना आश्वस्तिदायक है। सोशल मीडिया पर उनकी जो छोटी छोटी रील चलती हैं, उनकी आवृत्ति और पसंद व टिप्पणियों को देखकर हमें लगता है वर्तमान में आध्यात्मिक नेताओं में वे सबसे अधिक देखी जाने वाली रीलें होंगी।
इन्द्रियों के माध्यम से की जाने वाली भक्ति जीव के हृदय में भगवत प्रेम को जागृत करती है। इसीलिए इसको साधन भक्ति कहा जाता है। भाव प्रेम की प्रथम अवस्था का नाम है, अत: भक्ति मार्ग की प्रक्रिया में भाव भक्ति का दूसरा स्थान है। जब भाव घनीभूत हो जाता है, तब वह प्रेम कहलाने लगता है।
साधन भक्ति के दो भेद हैं- वैधी और रागानुगा। शास्त्रीय विधियों द्वारा प्रवर्तित भक्ति वैधी और भक्त के हृदय में स्वाभाविक रूप से जागृत भक्ति रागानुगा कहलाती है।
Yoga is the art of doing everything with the consciousness of God. Not only when you are meditating, but also when you are working, your thoughts should be constantly anchored in Him...If you think of God while you perform your duties in this world, you will be mentally united with Him. Cease to think that you are working for yourself. Find God by striving to make your daily activities less identified with "me" and "mine" and more identified with God.
Paramahansa Yogananda
३/१२/२३
लक्ष्मी के साथ स्वाभाविक क्रम में बहकर उन्हें आने दो, सरस्वती को अर्जित करते हुए बहाकर उन्हे जाने दो और काली के साथ काल अबाधित रहकर उन्हे आने और जाने दो।
हमारी हर वृत्ति ब्रह्माकार हो जाये। ब्रह्म में स्थित हो जाना ब्रह्मचर्य कहलाता है। मात्र जननेंद्रिय के निग्रह को ब्रह्मचर्य नहीं माना जा सकता, निग्रह या संयम तो पाँचों कर्मेन्द्रियों - वाक्, हाथ, पैर, उपस्थ या जननेंद्रिय और पायु या मलोत्सर्गेंद्रिय का हो, परंतु पाँचों ज्ञान इंद्रियों श्रोत्र, नेत्र, नासा, जिह्वा और त्वक् का प्रत्याहार हो जाए, वे ब्रह्म में तद्रूप हो जाएँ, तब सच्चा ब्रह्मचर्य होता है। अखंड ब्रह्मचर्य का अर्थ है ज्ञानेंद्रियों का सदा के लिए ब्रह्म में स्थित हो जाना। पाँच कर्मेन्द्रियों का संयम होगा, वे कर्मशील रहेगी, पर अपने लिए नहीं, ज्ञानेद्रियों की तद्रूपता के बाद ब्रह्मचारी होकर वे बस ईश्वर के काम में लग जायेंगी। कर्मेन्द्रियाँ कर्म से पृथक् नहीं रह सकती, पर वे ब्रह्मचर्य के बाद अकर्म दशा को उपलब्ध हो जायेंगी।
उपस्थ का अर्थ लिंग ही नहीं, योनि भी है। यह शब्द देते समय किसी लिंग विशेष का अर्थ नहीं ग्रहण किया गया है।
प्रेम आत्मा में छिपी परमात्मा की ऊर्जा है। जैसे शरीर और आत्मा को श्वाँस जोड़ती है, वैसे ही बल्कि उससे भी गहरे प्रेम आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। प्रेम दूसरे की आँख में दिखायी देता है, यह अपने आपको दर्पण में देखने जैसा है।
बृहदारण्यक उपनिषद् 6.2.13
योषा वा अग्निर्गौतम; तस्या उपस्थ एव समित्, लोमनि धूमः, योनिरार्चिः, यदन्तः करोति तेंगाराः, अभिनन्द विस्फुल्लिङ्गाः; तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति; तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति; स जीवति यावज्जीवति, अथ यदा मृयते ॥ 13 ॥
13. हे गौतम, नारी अग्नि है। इस अग्नि में देवता बीज अर्पित करते हैं। उस प्रसाद से मनुष्य का जन्म होता है। वह तब तक जीवित रहता है जब तक उसका जीना नियत है। फिर, वह मर जाता है।
५/१२/२३
क्रिया योग अर्थात् योग में क्रिया और क्रिया में योग हो जाना। जीवन की हर क्रिया योग से हो और योगसंवित होकर सारे कर्म संपन्न होते रहें। योग में आरूढ़ होकर किए गए कर्म ही यज्ञ हैं। इसलिए सच्चा यज्ञ क्रियायोग ही है। जब हम सृष्टि के कण कण को यज्ञमय देखते हैं तो परमात्मा का साक्षात होने लगता है। इस यज्ञ की अग्नि को समझना होता है और ध्यान से अपने विचारों में आत्मसात् करता होता है। गीता 4:23-24 पर कहा गया है :
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयतेII
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
अर्थ : जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले ऐसे मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं।
जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं।
पंचाग्नि का वर्णन उपनिषदों में आया है, उसी से यह सृष्टि यज्ञ की क्रिया चल रही है। इस पंचाग्नि में अलग अलग स्तरों पर कोई समिधा है, कोई ज्वाला है, कोई आग है तो कुछ धुंआ है। बृहदारण्यक उपनिषद में आया है-
श्लोक 6.2.9:
असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम; तस्यादित्य एव समित्, रश्मयो धूमः, अहरचिर, दिशोङ्गाराः, अवन्तरदिशो विस्फुल्लिङ्गास्; तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः, श्रद्धां जुह्वति; तस्या आहुत्यै सोमो राजा संभवति॥ 9 ॥
9.हे गौतम, वह संसार (स्वर्ग) अग्नि है, सूर्य उसका ईंधन है, किरणें उसका धुआं है, दिन उसकी ज्वाला है, चारों ओर उसकी भस्म है, और मध्यवर्ती उसकी चिंगारी है। इस अग्नि में देवता श्रद्धा (सूक्ष्म रूप में द्रव्य आहुतियां) देते हैं। उस तर्पण से राजा चंद्रमा का जन्म होता है (बलिदान करने वाले के लिए चंद्रमा में एक पिंड बनाया जाता है)।
पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम; तस्य संवत्सर एव समित्, अभ्राणि धूमः, विद्युदर्चिः, अशनिरङ्गाराः, ह्रदयोयो विस्फुलिंगाः; तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति; तस्या आहुत्यै विष्टिः सम्भवति ॥ दस ॥
10. हे गौतम, पर्जन्य (वर्षा के देवता), अग्नि हैं, वर्ष इसका ईंधन है, बादल इसका धुआं है, बिजली इसकी लौ है, गरज इसकी राख है, और गड़गड़ाहट इसकी चिंगारी है। इस अग्नि में देवताओं ने राजा चंद्रमा का तर्पण किया। उस प्रसाद से वर्षा उत्पन्न होती है।
अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम; तस्य पृथिव्येव समित्, अग्निर्धुमः, रात्रिरार्चिः, चन्द्रमा अंगाराः, नक्षत्राणि विषफुलिङ्गाः; तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति; तस्या आहुत्या अन्नं संभवति ॥ ॥
11. हे गौतम, यह संसार अग्नि है, पृथ्वी इसका ईंधन है, अग्नि इसका धुआं है, रात्रि इसकी ज्वाला है, चंद्रमा इसकी राख है, और तारे इसकी चिंगारी हैं। इस अग्नि में देवता वर्षा करते हैं। उस प्रसाद से अन्न उत्पन्न होता है।
पुरुषो वा अग्निर्गौतम; तस्य व्यत्तमेव समित्, प्राणो धूमः, वागर्चिः, चक्षुरङ्गाराः, श्रोत्रं विस्फुल्लिङ्गाः; तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति; तस्या आहुत्यै रेतः संभवति ॥ 12 ॥
12. हे गौतम, मनुष्य अग्नि है, खुला मुख उसका ईंधन है, प्राण उसका धुआं है, वाणी उसकी ज्वाला है, आंख उसकी भस्म है और कान उसकी चिंगारी है। इस अग्नि में देवता भोजन अर्पित करते हैं। उस प्रसाद से बीज उत्पन्न होता है।
नारी अग्नि है, यज्ञ के पात्र के रूप में काम करने वाली यह पांचवीं अग्नि है। उस अग्नि में देवताबीज अर्पित करें. उस प्रसाद से मनुष्य का जन्म होता है। इस प्रकार पानी (तरल पदार्थ), जिसे 'विश्वास' के रूप में नामित किया गया है, क्रमशः स्वर्ग, वर्षा-देवता, इस दुनिया, पुरुष और महिला की अग्नि में अर्पित किया जाता है, जो क्रमशः विश्वास, चंद्रमा, बारिश, भोजन और बीज के अधिक से अधिक स्थूल रूपों में होता है। जिसे हम आदमी कहते हैं. चौथा प्रश्न, 'क्या आप जानते हैं कि कितनी आहुति देने के बाद जल मनुष्य की आवाज के साथ ऊपर उठता है और बोलता है?' इस प्रकार उत्तर दिया गया है, अर्थात कि जब पाँचवीं आहुति स्त्री की अग्नि में अर्पित की जाती है, तो जल, बीज में परिवर्तित होकर, एक मानवीय आवाज़ से युक्त हो जाता है। वह , वह आदमी, इसी क्रम में पैदा हुआ, रहता है। कितनी देर? जब तक उसका जीवित रहना नियत है , अर्थात् जब तक उसके पिछले कर्मों का फल, जिसके कारण वह इस शरीर में रहता है, जीवित रहता है। फिर , उस थकावट पर, जब वह मर जाता है।
छाँदोग्य उपनिषद में भी ऐसा ही निरूपण मिलता है- योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः॥१॥ (छान्दोग्य).
अर्थ : हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ(गुप्तांग) ही समिध्(यज्ञ की लकड़ी) है, पुरुष जो उपमंत्रण(आमंत्रण) करता है वह धूम(धूंआ) हैं, योनि ज्वाला है, जो भीतर की ओर काम क्रिया है वह अंगार हैं और उससे जो आनन्द होता है वह विस्फुलिंग(चिंगारी) हैं।
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति॥२॥ (छान्दोग्य).
अर्थ : उस इस अग्नि में देवगण वीर्य का हवन करते हैं । उस आहुति से गर्भ उत्पन्न होता है
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधयः ओषधीनां पुष्पाणि, पुष्पाणां फलानि फलाना पुरुषः, पुरुषस्य रेतः।
~ बृहदारण्यक उपनिषद (६ । ४ । १)
भूतों का रस पृथ्वी है। पृथिवी का रस जल है। जल का रस औषधियाँ हैं। औषधियों का रस पुष्प है। पुष्प का रस फल है। फल (अन्न) का रस पुरुष है। पुरुष का रस रेत (वीर्य) है।
शुक्र के दो रूप हैं :
१. रेत
२. रज
रेत पुरुष में होता है। रज स्त्री में होता है। रेत में तेज होता है। रज में ज्योति होती है।
रेत के कारण पुरुष तेजस्वी होता है। रज के कारण स्त्री ज्योतिर्मयी होती है। शुक्र (वीर्य) का रज (अण्ड) से मिलने पर प्रजा की उत्पत्ति होती है।
जब तक गृहस्थ पांच अग्नि या सत्य-ब्राह्मण का ध्यान नहीं जानते, तब तक वे स्त्री की अग्नि से पैदा होते हैं जब आस्था से शुरू होने वाली पांचवीं आहुति (तरल पदार्थ) क्रम से दी जाती है, और फिर से परलोक प्राप्ति की दृष्टि से अग्निहोत्र आदि संस्कार करें। उन संस्कारों के माध्यम से वे फिर से पितरों की दुनिया में जाते हैं, धुएं आदि के देवता को पार करते हुए, औरफिर से लौटें, वर्षा-देवता इत्यादि के क्रम में गुजरें। फिर वे फिर से स्त्री की अग्नि से जन्म लेते हैं, फिर से संस्कार करते हैं, इत्यादि, इस प्रकार इस दुनिया और अगले दुनिया के बीच अपने आगमन और प्रस्थान द्वारा एक रहट की भाँति लगातार घूमते रहते हैं।
जो लोग यज्ञ, दान और तपस्या के माध्यम से संसारों को जीतते हैं, वे धुएँ के देवता तक पहुँचते हैं, उनसे रात्रि के देवता, और उनसे पखवाड़े के देवता तक पहुँचते हैं।जिसमें चंद्रमा क्षीण होता है, उससे छह महीने के देवता, जिसमें सूर्य दक्षिण की ओर यात्रा करता है, उनसे पितरों की दुनिया के देवता, और उससे चंद्रमा। चंद्रमा पर पहुंचकर वे भोजन बन जाते हैं। वहां देवता उनका आनंद लेते हैं, जैसे पुजारी चमकदार सोम रस पीते हैं (धीरे-धीरे, कहते हैं, जैसे कि), 'फूलो, क्षीण हो जाओ।' और जब उनका पिछला कार्य समाप्त हो जाता है, तो वे आकाश से वायु, वायु से वर्षा और वर्षा से पृथ्वी तक पहुँचते हैं। पृथ्वी पर पहुँचकर वे भोजन बन जाते हैं। फिर उन्हें फिर से पुरुष की अग्नि में अर्पित किया जाता है, फिर स्त्री की अग्नि में, जहां से वे दूसरी दुनिया में जाने के उद्देश्य से जन्म लेते हैं (और संस्कार करते हैं)। इस प्रकार वे घूमते हैं। जबकि दूसरे जो इन दोनों तरीकों को नहीं जानते वे कीट-पतंगे और बार-बार काटने वाली चीजें (कीट-मच्छर) बन जाते हैं।
शरीर छोड़ने के बाद अर्चि मार्ग और धूम्र मार्ग से गमन की प्रक्रिया को पंचाग्नि क्रम से समझा जा सकता है। ब्राह्मण वही है, जो इस पंचाग्नि को तपे या जाने, ऐसे ब्राह्मणों को अग्निहोत्र कहा गया है। ऐसे व्यक्ति पुनर्जन्म को जानते हैं, जीवों के निर्माण, संवहन और ध्वंस की प्रक्रिया से अवगत रहते हैं, इस अर्थ में वे त्रिकालज्ञ होते हैं और समाज की सर्वविधि भलाई करते हैं।
शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा
*शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा*
*यस्तु क्रियावान् पुरूष: स विद्वान् ।*
*सुचिन्तितं चौषधमातुराणां*
*न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥*
*भावार्थ -* *वास्तव में विद्वान् और सफलतम् व्यक्ति बनने के लिये अच्छी पुस्तकों और शास्त्रों का केवल अध्ययन करना पर्याप्त नहीं, अपितु जीवन में उनका अनुकरण करना आवश्यक होता है, जैसे रोग दूर करने के लिए दवा की अच्छी जानकारी होना या दवा का नाम ले लेना पर्याप्त नही अपितु दवा का नियमित सेवन करना आवश्यक एवम् लाभदायक होता है।*
६/१२/२३
अगर व्यक्ति आध्यात्मिक हुए तो वे सच्चे अर्थों में धार्मिक होंगे। ऐसा धार्मिक व्यक्ति नैतिक भी होगा। यह धार्मिकता और नैतिकता जीवन और समाज के उन्नयन के लिए अपरिहार्य है। नैतिकता तो धार्मिक हुए बिना भी प्राप्त हो सकती है, पर वह स्खलित या दिशा विहीन हो सकती है। अगर व्यक्ति नैतिक बना रहा तो वह भी अंततः धार्मिक ही होगा। धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ है, उसकी संकीर्णताओं से दूर रहना। यद्यपि धर्म है तो संकीर्णता कैसी! परंतु अपनी रीति और नीति का दुराग्रह संकीर्णता ही मानी जाएगी। इन रीतियों को ही तो अज्ञानी व्यक्ति धार्मिकता समझ लेते हैं। कोई अच्छी रीति है, वह नीति हो गई तो भी उसका आग्रह करना आवश्यक नहीं। वही नीति वह अपनी रीति से प्राप्त कर लेगा, ऐसा भरोसा करना चाहिए। हम अपनी रीति को नीति में परिणत होते हुए तो देखें। व्यक्ति यदि आध्यात्मिक होकर धार्मिक है तो उसमें संकीर्णता का लेश नहीं होगा। इसे अधिक से अधिक अपनाया जाना श्रेयस्कर है। तब जीवन और राजकाज में शुचिता का उदय होगा। व्यक्ति नाहक होड़ लगाने से बचेंगे। वे आलसी नहीं बनेंगे। जीवन में संतुष्टि तो होगी, पर अकर्मण्यता नहीं होगी। ऐसी स्थिति देश के आध्यात्मिक होने से अवश्य आएगी। आध्यात्मिकता में कोई पाखंड और दिखावा नहीं है, जो है, वह हृदय से है। ऐसी दशा में व्यक्ति का चरित्र धवल बनता है, फिर समाज में कदाचार कम होते हैं और राष्ट्र सर्वतोभावेन उन्नति करता है। स्वामी रामतीर्थ 1902-03 में अमेरिका में रहे, उन्होंने वेदान्त पर वहाँ अनेक भाषण दिये। वे कहा करते थे, तुम सब वेदांत के परिपोषक हो, बिना वेदान्त को ग्रहण किए हुए इतनी उन्नति कर ही नहीं सकते। जो कुछ और ज़रूरी है या कमी है, वह भी वेदान्त के ही आराधन से प्राप्त हो जाएगा। पश्चिम ने थोड़े समय में ही भौतिक संसाधनों का अपूर्व उत्थान कर लिया है, आध्यात्मिकता की गहराइयों तक भी वे पहुँच सकते हैं। दुर्भाग्य से, भारत ने वेदान्त को जन्म देकर भी उसे भुला दिया। उसके अवशेष स्पष्ट रूप में यहाँ उपस्थित हैं। एक समय भारत अपने सर्वविध उत्कर्ष पर था, इसी कारण तो उसने दुनिया को वेदान्त या ऐसे दर्शन दिये जो मनुष्य की अंतिम खोज सिद्ध हुए, पर उसने उन्हें स्वयं धारण करना छोड़ दिया, और लौकिक और पारलौकिक दोनों तरह के विकास से वह दूर होता गया, जितने जल्दी भारत सच्चे अर्थों में वेदान्त या आध्यात्मिकता को धारण कर ले, उतने जल्दी वह आगे बढ़ता जाएगा। यहाँ वेदान्त का अर्थ किसी संप्रदाय विशेष से ग्रहण नहीं करना चाहिए, वरन जिस सीढ़ी से व्यक्ति तत्व की छत पर पहुँच जायें, वह सीढ़ी ही वेदान्त समझी जा सकती है। इस दर्शन में परम् का समाहार हो जाता है।
Don't joke all the time with each other. Be happy and cheerful inside. Why dissipate in useless talk the perceptions you have gained? Words are like bullets: when you spend their force in idle conversation, your supply of inner ammunition is wasted. Your consciousness is like a milk pail: when you fill it with the peace of meditation you ought to keep it that way. Joking is often false fun that drives holes in the sides of your bucket and allows all the milk of your peace to run out.
- Sri Paramahansa Yogananda,
in a talk to disciples
8/12/23
दीयते ज्ञान सद्भावः क्षीयते पशुभावना।
दानक्षपण संयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता॥
जिसके द्वारा ज्ञान दिया जाता है और पशु भावना का क्षय होता है। इस प्रकार के दान और क्षपणयुक्त क्रिया का नाम दीक्षा है। यह आत्मसंस्कार का ही दूसरा रूप है।
एको नादात्मको वर्णः सर्ववर्णाविभागवान।
सोsनस्तमित रूपत्वात् अनाहत इवोदित॥
९/१२/२३
शक्ति को शैवीमुख करना होगा, अन्यथा वह जैवीमुख रहने से ख़ुद को ही ग्रस लेगी।
१४/१२/२३
'Croatia' has numerous lakes and rivers and waterfalls and one such river is the 'Drava' a name possessing 'Dra' a root in Sanskrit meaning to 'run' and this expands as 'Drava' meaning to 'flow' to 'trickle' to 'stream' and the source of this Croatian river. james robinson cooper
१५/१२/२३
सुख दूर दिखाई देता है, उस तथाकथित सुख के जितने भीतर प्रवेश करते जाते हैं, उसकी परत दर परत से सामना होता जाता है। उसकी वास्तविकता ज्ञात होती जाती है कि वास्तव में यह सुख नहीं था। जैसे अमेरिका में रह रहे एशियन प्रायद्वीप के सभी निवासी अपने लगने लगते हैं, फिर जब उनसे उनके देशों में मिलते हैं तो वही सुख दुःख में परिणत होने लगता है। जितना समीप आते जाते हैं प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, प्रतिशोध और हड़पकर या येन केन प्रकारैन उसे पीछे करने, उसके जैसे होने या उससे आगे जाने की कामना बलवती होती जाती है। और समीप जाते हैं तो रक्त संबंधियों में भी यह भावना घर करती जाती है। और भीतर और गहरे, गहनतम जाने पर पता लगता है कि यह अपने मन में ही उठ रही हिलोरें हैं। जैसे दूर से देखने पर माना गया सुख दुःख हो गया, वैसे ही निकट से देखने पर वह दुःख भी सुख हो जाता है, जब हम उसे परम गहराई से देखने लग जाते हैं। परम गहराई से देखने पर उस यथार्थ से सामना हो जाता है कि न वह था, न यह है। एक के होने पर दूसरा है और दूसरे के होने पर पहला है, वास्तव में वे एक भी नहीं हैं। संसार की दृष्टि से देखें तो उससे दूर होने पर सुख है और निकट जाने पर दुःख है। इसका विपरीत भी उतना ही वास्तविक लग सकता है। दूर बैठे व्यक्ति को निकट जाने में और निकट बैठे व्यक्ति को दूर जाने में सुख प्रतीत होता है। इसी तरह निकट के व्यक्ति को दूर जाने पर और दूर के व्यक्ति को पास आने पर दुःख लगता है। एक छोर को फैला देना और उसका संकोच कर लेने जैसा यह खेल है। परमार्थ में दोनों कुछ नहीं हैं, संसार में दोनों का आभास तो होता है, पर वे एक सूत्र से गुँथे हुए हैं। वास्तव में उनका अस्तित्व नहीं है। हम यदि संसार के सुख को पाने का प्रयत्न करेंगे तो दुःख भी या तो पहले मिलेगा या बाद में, बिना दुःख के सुख की संभावना नहीं है। यह केवल दूर से या निकट से देखने भर की क्रिया है। क्रिया एक ही है, उसकी दृष्टि के परिणाम दो हैं। क्रिया का सूत्रपात जहां से हो रहा है, वहाँ अवस्थित रहना आ जाए तो शीशे की तरह सुख और दुःख पारदर्शी लगने लगेंगे। सुख और दुःख ही जीवन हैं। जब जीवन है तो मृत्यु अवश्यंभावी है।
प्रकृति का मूल स्वभाव देना है, छीनना भी उसका एक परिणाम है। हम बिना दिये रह नहीं सकेंगे। कुछ नहीं तो स्वस्थ होने की मंगलकामना करेंगे ही। क्या यह शुभकामनाएँ काम नहीं करती हैं? क्या शरीर वाक् से बाहर है? भावना बड़ी है, शरीर उसके सामने अति लघु है। स्वास्थ्य कामना किसके लिए नहीं करेंगे, जो पथच्युत हैं, क्या उनके लिए सन्मार्ग की कामना नहीं करेंगे, नहीं रह पायेंगे आदरणीय! रामेश्वर मिश्र पंकज की पोस्ट पर
१६/१२/२३
किसी तत्व को स्वीकार कर लेने से उस पर ध्यान नहीं जाता। ध्यान नहीं जाने का अर्थ है वर्तमान में अवस्थित हो जाना। ध्यान न होने का ही नाम है। न होना में होना भी है और न भी। युगपत्।
अंतर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टि निमेषोन्मेष वर्जिता।
इयं सा भैरवीमुद्रा सर्व तंत्रेषु गोपिता।
तस्यै नमः कल्पितसृष्टिमुक्त्यै
नक्तं दिवं मोहविवेकधात्र्यै।
सुखप्रदायै ह्यसुखप्रहत्र्यै
देव्यै च काल्यै कलनात्मिकायै।।
महामहोपाध्याय आचार्य रामेश्वर झा विरचितः
उस परम शक्ति को नमस्कार अर्पित हो, जिसने सृष्टि तथा मुक्ति दोनों की कल्पना की है, जो दिन - रात (सर्वदा) मोह और विवेक को धारण करने वाली है, सुखदायिनी तथा दुःखहारिणी है और जो अपनी ही कलना रूप काली है।
I praise the Shakti (cosmic energy) that imagined creation and liberation; that night and day (constantly) bears ignorance (delusion, inaccurate knowledge) and wisdom (True knowledge, discernment); who is provider of joy and alleviates suffering and that which manifests itself as Kali
Mahamahopadhyaya Acharya Rameshwar Jha
१७/१२/२३
ध्यान में जब विचारों की जकड़न हो जाती है तो उसी समय आँख खुलने पर वह जकड़न जाती रहती है। तब हम उस संघर्ष से बाहर हो जाते हैं। इसी तरह आँख खोलने पर विषयाकर्षण बढ़ता है तब उसे आँख बंद करते हुए ध्यान की प्रक्रिया से लुप्त कर दिया जाता है। आँख से दिखाई दे रहे बाहर के विषयों का आकर्षण तीव्र होने पर हाँग सौ ध्यान उसकी निवृत्ति करा देता है और आँखें बंद होने के समय मन की यायावरी और उसके संघर्ष से उपराम आँख खोलते हुए प्राप्त होता है। वह क्षण भी कभी आता है जब चाहे आँख खुली हो या या बंद, मन से पार जाकर आत्मानंद की अनुभूति होती है। वह क्षण अपूर्व और विरल है, वह हर क्षण न भी उपलब्ध रहे, पर उसकी स्मृति बनी रहती है या घटनाओं के घटाटोप के बीच वह स्मृति घटित हो जाती है, तब उस क्षण के समान ही उस समय आनंद प्राप्त होता है।
सत्य है वाचा यथार्थ कथितम
ऋत है मनसा यथार्थ कल्पितम
शिव बिंदु है, शक्ति बीज। दोनों से मिलकर नाद बनता। नाद वाक् में
परिणत हुआ। नाद ताल के साथ उतरता है। ताल ही सृष्टि करता है।
सुख दुःख के द्वंद्व में उच्छलित न होना तपस है।
स्वस्य अध्ययनम् स्वाध्यायः। inner awakening
ईश्वर प्रणिधान सीधे संभव नहीं। प्रकृष्ट रूप से जितने कर्म हैं, उनका फल अर्पित करना होता है, फिर जो प्रसाद मिले, उसे पाना ईश्वर प्रणिधान है।
आसन अपनी शक्ति में अवस्थित होने का नाम है। आस्यते स्थीयते अस्मिन इति आसनं । ह्रदय प्रतिष्ठा स्थान है, जिसमें सब हो रहा है।
हृदयो दीपवत् प्रभु- याज्ञवल्क्य।
वक्ता श्रोता बहुत हैं, मथि काढ़े ते और। प्रकाश और विमर्श के सामरस्य का नाम संवित है। प्रकाश शिवावस्था है तो विमर्श शक्तिरूपा है। मध्यविकासाद्चिदानंदलाभः। प्रकाश का स्पंद विमर्श कहलाता है।
वर्ण संवित का स्वरूप है, जो नाना रंगों में अभिव्यक्त होता है। सूर्य की कोई रश्मि बादल बनती है तो कोई जल का अवशोषण करती है। अग्निसोमात्मकं जगत्।
प्राप्त को पहचानना। यह पहचान एकरूप होती है गुरुतः शास्त्रतः और स्वतः। स्व का बोध गुरु और शास्त्र से होता है। इसका आभास अहंरूप में होगा, अन्यथा निराभास है। हो जाना ही भाव का अर्थ है। यह नोइंग नहीं रेकग्निशन है। चेतना इसे कह सकते हैं- चेतयते इति चेतना। every knowledge is self recognitive in nature. recognition पूरा होता है। नॉलेज की भाँति खंड खंड नहीं। शब्द तो पहचान हैं, उनकी फ्रीक्वेंसी या ट्रांसमिशन को पकड़ना है। शब्दः कश्चन् यो मुखादुदयते मंत्रः। प्राणस्य स्वरसेन यत् प्रवहणं योगस्यादभ्युदयः। जब शब्द लगता है तो वैयाकरण पुत्रोत्सव की भाँति आह्लादित होते हैं। आत्मा का छंद ही पुत्र है। छंद गति है। पुत्र जन्म यानि अपनी आत्मा से एकाकार हो जाना।
चित्शक्ति - मन
स्वातंत्र्य शक्ति- आनंद (अहंकार- बुद्धि)
इच्छा शक्ति - प्राण का आविर्भाव- पाँच
ज्ञान- पंच ज्ञानेद्रियाँ
कर्म- पंच कर्मेन्द्रियाँ कुल अठारह। यह स्वच्छन्दनाथ का स्वरूप है।
सूक्ष्म शरीर में एक साथ चक्र भेदन होता है, स्थूल में क्रमशः। भेदन के बाद देह दिव्य बनेगा, फिर वह चिन्मय होने लगेगा, तब आधार भूमि निर्मित होती है।
नामृतं इति अमृतं।
नाद के बाद ज्योति का उदय होगा।
वृत्ति का अर्थ है वर्तन। नित्य विमर्शन।
श्रद्धा योगी की माँ है।
आचार्य अग्नि का आधान करते हैं, पुत्रजन्म की भाँति उस समय वे गाते है, फिर उसमें घृत की आहुति करते हैं, कामना करते हैं कि अग्नि हमारी आहुति देवताओं तक पहुँचा दें।
अंदर की अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए बाहर की अग्नि जलाई जाती है। श्रद्धा सत्तर्क की जननी है, यह विचलित नहीं होने देगी। विद्याओं का संपूर्ण विकास सत्तर्क में समाहित होता है। योगी की सारी साधना सत्तर्क को उत्पन्न करने के लिए है। संकल्प पूजा का मूल है। संकल्पो भावनाप्रोक्ता। भावैस्तु व्यापार विशेष - भावना। संकल्प मूलाधार में बैठी अग्नि को उत्पन्न करेगा। सही संकल्प कर लेना योग में प्रवेश करना है। संकल्प करते समय जल लेते हैं, जल में रचना तत्व प्रधान है।
समं सर्वेषु भूतेषु आधानं - समाधान
विषय असुर हैं, वे इंद्रियों या देवताओं को पराजित करते हैं यही देवासुर संग्राम है। असुर भौतिकता है, यह विजयी बनती है।
Ek kahu to hai nahi, do kahu to gari
Hai jaisa taisa rahe, kahe Kabir vichari
"एक कहूँ तो है नहीं, दो कहूँ तो गारी |
है जैसा तैसा रहे, कहे कबीर विचारी ||"
If I say one, It is not, if I say two, it will be a violation
Let 'It' be what 'It' is, says Kabir upon contemplation
There is a oneness behind the apparent diversity. But oneness is not seen. Yet if I accept duality, it would be a violation, a false acceptance.
Let it be, whatever it is - I'll drop the analyzing.
गारी ही ते ऊपजे कलह कष्ट और मीच।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नीच॥
आवत गारी एक है उलटत होइ अनेक।
कह कबीर नहि उलटिये वही एक की एक॥
कर्मी व्यवस्था देता है।
वह काल का उत्पादक है। क्रिया कालस्य बोधकः।
बलि का अर्थ है जो आपका प्रिय है उसका अर्पण।
प्राणायामस्तथाध्यानं प्रत्याहारोsथ धारणा।
तर्कश्चैव समाधिश्च षडंगो योग उच्यते॥ तंत्रसार अध्याय ४
प्राप्ते च द्वादशे भागे जीवादित्य स्वबोधके।
मोक्षः स एव कथितः प्राणायामो निरर्थकः॥ तंत्रालोक ४/९०
सृष्टि के दुःखों का मूल परिवर्तन है। परिवर्तन शिव की क्रिया शक्ति के अधीन है। काली सदा नृत्य कर रही है। क्रिया ही काली है।
कलयति कलयते कलते वा इति कालः।
जिससे सब कुछ कलित होता है।
यं न क्षीयते ते नक्षत्रं। जो क्षीण न हों।
गृहीता इति ग्रहाः। जो ग्रहण किए गए हों।
यमस्वरूपा सकला निवृत्ति
नियमस्वरूपा सकला प्रवृत्ति।
सत्य सदा मधुर होता है, अप्रिय सत्य कुछ नहीं। सम्यक् वेदन संवेदन है।
अविधेयं विधेयं वा मौनं किं न विधीयते।
शौचात् स्वांगजुगुप्सा
१८/१२/२३
दो लोगों के बीच नहीं होता प्रेम
वह होता है दो लोगों के भीतर
अलग-अलग
जैसे दो नदियों के बीच नहीं होता पानी
वह होता है दो नदियों में
अलग-अलग
एक जैसे प्रेम को अपने भीतर लिए हुए
मिलते हैं दो लोग जब
हो जाते एक
जैसे घुलमिल जाती हैं नदियाँ
समन्दर के अंदर
हो जातीं एक
चिड़िया के बिना अधूरा नहीं हो जाता पेड़
जन्मा वह धरती की कोख से
न चिड़िया अधूरी होती पेड़ के बिना
पंखों में उसके आकाश भरा है
पाना प्रेम की भाषा नहीं है; देना भी प्रेम की भाषा नहीं
कोई बड़ी व्याकरणिक त्रुटि हो गई है
प्रेम की कविताई में
जिससे बेख़बर
गाता है पेड़ और हरी हो जाती चिड़िया
चन्द्रमा की बीन पर लहटती हैं समंदर के सीने में नदियाँ
और फिर मनुष्य है -
इमारतें बनाता है, सड़कें बनाता है
ढूँढ़ता है दूसरे ग्रहों में जीवन, कविता लिखता है
और मर जाता है
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बाबुषा
दिसम्बर,२३
बहुत खूब बाबुशा❤️❤️
प्रेम पाना नहीं, यह तो खूब कहा गया, प्रेम देना भी नहीं, यह नयी कहन है। बेख़बर होकर रहना, पूरे होशोहवाश में पेड़ और चिड़िया के मानिंद। दोनों ले रहे हैं, दे रहे हैं, पर दोनों इससे बेख़बर और तारी एक दूसरे में। क्या खूब।लव यू मच बाबुशा।
यत्र वाचो निमित्तानि चिह्नानीवाक्षरस्मृतेः।
शब्दपूर्वेण योगेन भासंते प्रतिबिंबवत्॥ वाक्यपदीयम १/२०
१९/१२/२३
अव्यक्त अन् है और व्यक्त अंत। सत् अव्यक्त है और य उसकी यात्रा, उसे पाने की, जानने की, समझने की। ध्यान भाषा में लिखी कविता या कविता में उतरा ध्यान। क्या कहें। प्यारी। बाबुशा
अरणिष्थं यथा ज्योतिः प्रकाशांतरकारणं।
तद्वच्छब्दोsपि बुद्धिस्थः श्रुतीनां कारणं पृथक्॥
आत्मरूपं यथा ज्ञाने ज्ञेयरूपं च दृश्यते।
अर्थरूपं तथा शब्दे स्वरूपं च प्रकाशते॥ वाक्यपदीयम
श्रीमद्भगवद्गीता के पात्रों और उनके शंखों के प्रतीकार्थ
DhritRashtra- the blind Mind
Sanjay - Impartial Introspection Kurus- the wicked impulsive mental & Sense tendecies
Dharmakahetra- holy plain Kurukshetra - "the bodily field of activity
Duryodhana - material desire Drona- Samskaras - preceptor of evil & good tendencis. past habits. विपाक
Arjun - Self Control मणिपुर चक्र
Bhim - Life control Anahata Chakra yuyudhan- Divine devotion. Virata- Samadhi
Drupada- Extreme dispassion- तीव्र संवेग
Dhrishtaketu- Power of mental Resistence -यम
Chekitana- Spiritual Memory
Kashisaja- Discriminative Intelligence,
Purujit - Mental Interiorization - Pratyahar - प्रत्याहार
Kuntibuoja - Right posture ! Asana Shaibya- Power of Mental Adherence - नियम
Yudhamanya- Life force Control - Pranayama
Ultamaujas- Son of vital Celebacy i-e Abhimanya -- Self Mastery - संयम
Sons of Draupadi- five awakened spinal Centres. - कुंडलिनी
Sahadera - Power to stay away from evil
Nakul Rower to to obey Good Rules. Swadhishthana
Yudhishthira- Divine Calmness Vishuddhi chakra
Bhishma - Inner Seeking Ego आस्मिता
Karna- Attachment राग
Kripa - Individual delusion अविद्या
Ashwatthama. Latent Desire - आशय
Vikarna. Repulsion - द्वेष
Somadatti - Bharishrawas_ Son of Somadalta) power of Material action कर्म
भूरी बहुलम श्रवः क्षरणंThat flow which frequently.
Jayadrath- Body Attachment अभिनिवेश
Dhananjaya - winner of wealth- Arjuna- Devdatt conch
Bhima-Paundra- anahat chakra Aum that which disintegrates
Yudhishthira - Anantvijaya - Conquers infinity
Nakul- Sughosha Sounds clearly and sweetly swadhishthan
Sahadeva - Manipushpaka- manifest by its sound muladhar
Pandava- the soulful powers of descrimination।
२०/१२/२३
The great Urdu poet Mirza Ghalib wrote:
उम्र भर ग़ालिब यही भूल करता रहा
धूल चेहरे पे थी, आईना साफ़ करता रहा।
“All through his life Ghalib made this error,
The dirt was on his face,
And he kept wiping the mirror.”
The Upaniṣads say:
“The Creator created the senses outward-looking. Hence they see other things and not the Inner Being, the ātman, Self.”
- Kaṭhopaniṣad, 2.1.1.
In the next verse, he asks,
“How may one see the Self?
As the Self is without a second, it is impossible to see it.
And how may one see God?
To see Him is to be consumed by Him.”
The scriptures say,
‘īśvaro guru atmeti mūrtibheda vibhāgine’,
that is, God, Guru and ātman are one; only the forms are different.
- Dakṣiṇāmūrtti Stōtram,
Prefatory verse, Adi Sankara.
If, therefore, to see God means to become the food of the Divine, we cannot claim to have seen the Satguru till our ego has melted away in the fire of love and knowledge.
लोकसाक्षी जगच्चक्षु: पुण्य़चारित्रकीर्तन: ।
कोटिमन्मथसौन्दर्यो जगन्मोहनविग्रह: ॥101॥
जगन्नाटकवैभव: ॥122॥
२२/१२/२३
सम् में जिसका अंत हो जाए, वह संत है।
गुरुप्रदत्त ध्यान से मंगल होना अवश्यंभावी है और मंगलमय होने का लक्षण है ध्यानस्थ होकर रहना। ध्यानमंगलम परस्पर पूर्वापर और उत्तरपूर्व का संबंध रखते हैं।
23/12/23
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते |
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् || 12-12||
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5।।
प्रकाश ही प्रकाश है। प्रकाश का भान कैसे होता है। एक छाया के माध्यम से। देह एक छाया ही है, जैसे दर्पण के पीछे अगर उसका लेप न लगा रहे तो शीशा आरपार हो जाएगा और अपना स्वरूप दर्शन नहीं होगा। देह की उपयोगिता इसीलिए है कि उसमें रहकर हम प्रकाश दर्शन कर सकते हैं।
अन्यों के आकर्षण विकर्षण भी साधक के मन पर आघात प्रतिघात करते हैं। साधक का मन साफ़ हो गया, पर उसके मन पर संसार और उसके निवासियों का प्रभाव पड रहा है, यह सब बातें ध्यान में आती हैं, किंतु जब वे निर्मूल होती हैं, उनसे असंगता हो जाती है तो आनंद का सोता झर उठता है। इसलिए ध्यान दशा में बने रहना तब तक अपरिहार्य है, जब तक संसार किसी न किसी रूप में हमारे भीतर मौजूद है।
२४/१२/२३
यदि तुम हर हाल में अपने ही विचारों की पूर्ति में जुटे रहोगे तब तुम कभी ख़ुश नहीं रह पाओगे, क्योंकि जीवन तुम्हारे व्यक्तित्व को संतुष्ट करने के लिए नहीं है। बुद्धिमान इस कोशिश की फलहीनता को पहचान कर, गहरे आत्मसमर्पण में लीन हो जाता है और "जो है" उसके साथ मनोहर समक्रमिकता अनुभव करता है। हमें आध्यात्मिक रूप से इतना विकसित होना है जब तक यह हमारा स्वाभाविक अनुभव ना हो जाए। मूजी बाबा
26/12/23
सोकर जागने पर, सोने के लिए जाने पर, स्वप्न में और कार्य करते समय श्वास पर ध्यान बना रहे बस फिर क्या शेष रह जाता है!
ध्यानमंगलं....
श्रीमद्भागवतम् में सबसे बड़ा स्कंध या कैंटो दशम स्कंध है। यह स्कंध इतना बड़ा है कि अध्यायों के असंतुलन को दूर करने के लिए इसे पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभाजित करना पड़ा। इस स्कंध के पूर्वार्ध के २९वें से ३३वें अध्याय के पाँच अध्यायों को रास पंचाध्यायी कहा गया है। यह रास पंचाध्यायी भागवतम् का प्राण है। श्रीकृष्ण की दिव्य लीला के माध्यम से प्रेम और समर्पण की प्रतिष्ठा इसमें की गई है।रास पंचाध्यायी की व्याख्या संस्कृत परंपरा में तो विस्तार से और लंबे कालखंड में वर्णित हुई ही है, उसके विभिन्न दर्शनो के मूर्धन्य आचार्य इसके रहस्य को अपने अपने ढंग से सुलझाने में प्रवृत हुए हैं। श्री वल्लभाचार्य, श्री श्रीधर स्वामी, श्री जीव गोस्वामी आदि ने इस आध्यात्मिक तत्त्व की व्याख्या बड़े विस्तार से की है। हिंदी में भी श्री सूरदास और अनेक कृष्ण भक्त परंपरा के बड़े कवियों के यहाँ पूरे ठसक के साथ यह विद्यमान है। वृंदावन रस इस रास पंचाध्यायी में समाया हुआ है। गोपी गीत के प्रारंभ में ही कहा गया है-
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः
श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है।
भारत के आध्यात्मिक रहस्य को समझते हुए रास पंचाध्यायी को लिखने पढ़ने के काल के प्रारंभ से ही हमारे महात्मा जन उसमें डुबकी लगाते आ रहे हैं। रास पंचाध्यायी नाम से स्वतंत्र ग्रंथ भी महात्माओं ने लिखे हैं, भागवत् कथावाचक इस प्रसंग को अपने शब्दों में खोलते हैं, कतिपय इसके रहस्य को लेकर बहुत खुलकर न कहते हुए संकोच कर जाते हैं। उनकी अपनी सीमा भी हो सकती है। रास रहस्य का ही अपर रूप है। रहस्य यानि जिसे लिखा या बोला नहीं जा सकता, बल्कि इसे अनुभव में उतरकर मात्र जाना जा सकता है। रहस्य यानि होना या being। आगे इसे देखा जाता है, साक्षी भाव आगे का है। पहले पहल यह या वह मात्र होता ही है। यह कोई प्रश्न नहीं कि इसका उत्तर हो। हाँ प्रश्नोत्तरी इसके अनुभव में उतरने में सहायक अवश्य हो सकती है। अन्य कोई उपाय भी सहायक हो सकता है। वह सब उपायों से जाना जा सकता है, क्योंकि उस रहस्य के सूत्र ही तो वे उपाय हैं। श्रद्धावान व्यक्ति में यह उपाय घटित होते हैं। श्रद्धा तो इन उपायों की माँ है। इस रहस्य को जानने के उपरांत जीवन में जानने, पाने और करने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता। इस रहस्योद्घाटन का एक उपाय भागवतकार ने इसी रासपंचाध्यायी में निरूपित किया है। वह है ध्यानमंगलं। वैसे तो कोई तात्विक निरूपण करता हुआ ग्रंथ एक ही निष्कर्ष पर पहुँचेगा, क्योंकि तत्व एक ही है, जो सर्वांतर्यामी है, विभु है।
एक तत्व की ही प्रधानता
कहो उसे जड़ या चेतन।
अपने रचना काल के बाद से जिस ग्रंथ और उसकी परंपरा की छाप भारतीय समाज पर बहुत गहरे रूप में छूटी है, वह श्रीमद्भागवतम् ही है। इस प्रकार भारतीय परंपरा का प्रधान ग्रंथ अगर देखना हो तो वह भागवतम् ही ठहरेगा। भागवतम् का प्राण जैसा कहा गया कि रास पंचाध्यायी है, और इसी को आगे बढ़ाकर कहा जा सकता है कि रास पंचाध्यायी का प्राण गोपीगीत है और गोपीगीत का प्राण ध्यानमंगलं है। ध्यान में उतरकर गोपियों और कृष्ण के रास के रहस्य को जाना जा सकता है, और तब ही यह हम सबका मंगल करेगा। ध्यान उस रहस्य को अनुभव में लाने का सटीक और शीघ्रगामी उपाय है। भागवतकार ने इसका संकेत निदर्शन रासपंचाध्यायी के ३१वें अध्याय गोपीगीत में इस प्रकार किया है-
प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं
विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् ।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः
कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥ १०॥
(हे प्यारे ! एक दिन वह था , जब तुम्हारे प्रेम भरी हंसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह तरह की क्रीडाओं का ध्यान करके हम आनंद में मग्न हो जाया करती थी । उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है , उसके बाद तुम मिले ।....)
ध्यानमंगलम् भागवतम् का बीज शब्द है।
कामकेलि में दो प्राणियों का मिलन शरीर के स्तर पर होता है। प्रेम में दो का मिलन मन के स्तर पर होता है, प्रार्थना में दोनों होना भर रह रह जाते हैं, अभी भी दो का अस्तित्व उपस्थित है, क्योंकि उन दो को एक होते हुए देखने वाला कोई है। ध्यान में वह देखने वाला भी नहीं रह जाता, इस क्रिया के बाद फिर मंगल ही शेष रहता है। सब मंगलमय हो जाता है। यह आत्यंतिक मिलन है। यहाँ दो नहीं हैं। इसे एक भी नहीं कह सकते, क्योंकि एक को कहने के लिए दूसरे का आसरा लेना पड़ेगा। यहाँ कबीर गाते हैं-
एक कहूँ तो है नहीं, दो कहूँ तो गारी |
है जैसा तैसा रहे, कहे कबीर विचारी॥
गीता में कहा गया है....ज्ञानाध्यानं विशिष्यते...शास्त्रज्ञानसे ध्यान श्रेष्ठ है।
२७/१२/२३
श्रद्धा को योगी की माँ कहा गया है। जिस किसी ने अपनी आत्मा के मंदिर में ईश्वर को स्थापित कर लिया है, वह योगी है। शब्दार्थ:-
श्रद्धा=सत्य का धारण करना
अन्तःज्ञात= हृदय से जाना हुआ
क्षालन=शुद्धता, शुद्ध करने का कार्य।
श्रद्धा, मूल रूप से एक संस्कृत शब्द है, जो दो शब्दों का संयोजन है "श्रत्'' जिसका अर्थ है सत्य, हृदय या विश्वास और "धा" जिसका अर्थ है जिसकी ओर मन प्रवृत्त हो। श्रत् के उक्त अर्थ में तीन शब्द अवश्य दे दिये गए हैं, पर यह तीनों भारतीय मेधा के महत्वपूर्ण शब्द हैं। यह वे शब्द भी हैं जो संस्कृत ही नहीं द्रविड भाषाओं में भी पाये जाते हैं। हृदय वह स्थान है, जिसमें सबकुछ घटित होता है, विश्वास उस घटन को देखने वाला होता है; वह साक्षी है।
श्रद्धा ही वह जननी है, जिसके उत्पन्न होने पर हम अपने स्रोत को जान पाते हैं। कितने ही उपायों से हम जानना चाहें, हम जान लें तो भी हम वहाँ टिक नहीं सकते, यदि श्रद्धा का उदय न हुआ हो। श्रद्धा का उदय भी श्रद्धा से होता है, उसका उदय हमें श्रद्धावान बनाने के लिए होता है। यह श्रद्धा अंततः श्रद्धा में ही पर्यवसित हो जाती है। श्रद्धा परम् शक्ति है, उसके उदय होने पर वह इतनी तीव्र असरकारी है कि उसमें भक्ति और ज्ञान एकमेक हो जाते हैं, उसके बाद कर्म अकर्म हो जाते हैं। हमारी निष्ठा का जन्म हो जाता है।
श्रद्धा कोई अंधे विश्वास का नाम नहीं है, बल्कि वह जाग्रत और प्रमाणित आस्था है, जो हमें प्रेम और करुणा से आप्लावित रखती है।
श्रद्धा स्व को समझने का आत्यंतिक लक्ष्य है।
श्रद्धा और प्रेम के योग को भक्ति कहा गया है। श्रद्धा का ठीक ठीक समानांतर कोई शब्द अन्य भाषाओं में नहीं मिलता, संस्कृत में भी इसका ठीक ठीक पर्यायवाची शब्द नहीं पाया जाता। यह अनोखा शब्द हमारे ऋषियों ने अवश्य समाधिसुख में रचा होगा। परम् सत्य का जब बोध होगा, श्रद्धा स्वयमेव उदित हो जाएगी, क्योंकि श्रद्धा के बिना परम सत्य का बोध हो ही नहीं सकता। यह दोनों युगपत् घटना हैं।
गोस्वामी तुलसीदास एक श्लोक में लिखते हैं-
...श्रद्धा विश्वास रुपिणौ। भवानी और शंकर को क्रमशः श्रद्धा और विश्वास के रूप में समझा गया है। जिनके बिना सिद्ध पुरुष भी अपने हृदय में स्थित ईश्वर का दर्शन नहीं कर पाते।
श्रद्धा हम सबके भीतर होती है, पर वह आवरण में रहती है। श्रद्धा मन का निर्देशन मन के पार रहकर करती है। संस्कार और वासना की छिपी गहराइयों से यह आती है। श्रद्धा अगर धारण किए होंगे तो हम मूल स्मृति से जुड़ जाएँगे। जहां श्रद्धा होगी, वहाँ व्यक्ति असफल होने पर निराश नहीं होगा। श्रद्धावान व्यक्ति यह जानेगा कि असफलताओं से उसका उत्साह चुकने वाला नहीं है। श्रद्धा एक अनुभूति या एहसास है, इसे बौद्धिक रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह एक संपूर्णता है, जिसमें व्यक्ति को व्यक्त होने का अर्थ ज्ञात हो जाता है। श्रद्धा मनुष्य के भीतर सदा आवरण में नहीं रहती, वह बाहर प्रकट होगी ही। श्रद्धा एक आत्मविश्वास है, जो अपने स्रोत से उदय होकर उपलब्ध होती है। श्रद्धा सत्य का विश्वास पूर्वक अनुसरण करने का नाम है। श्रद्धा को पढ़ाया नहीं जा सकता, पर उसे सुलगाया जा सकता है। श्रद्धा से रहित कोई व्यक्ति नहीं होता, अगर कोई अश्रद्धा जता रहा है तो वह उसी श्रद्धा के प्रभाव से ही। यह एक सकारात्मक ऊर्जा है, जो स्वयं के भीतर से ही प्रकट होती है। श्रद्धा अटल और दृढ़ विश्वास है। करुणा और प्रेम इसके लक्षण हैं।
अज्ञात को जानने की तत्परता को हम श्रद्धा कहते हैं। अज्ञेय को जानना श्रद्धा के कारण संभव हो पाता है।
पुराणों में श्रद्धा के जो वर्णन आये हैं, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। इन कहानियों से हमारे संस्कारों के अनुसार कुछ सूत्र ग्रहण किए जा सकते हैं।
श्रद्धा दक्ष प्रजापति और प्रसूति की चौबीस पुत्रियों में एक है। इन चौबीस पुत्रियों में से तेरह धर्मदेव को ब्याही थी। श्रद्धा भी उन तेरह में से एक हैं। इनसे काम नामक पुत्र हुआ।
सूर्य की पुत्री का नाम श्रद्धा है, इसके दूसरे नाम सावित्री, प्रसवित्री, वैवस्वती आदि हैं। सावित्री को गायत्री भी माना गया है।
भागवत् के अनुसार - कर्दम प्रजापति और देवहूति की पुत्री श्रद्धा हुई, जो अंगिरस की पत्नी थी। उनके दो पुत्र उतथ्य और वृहस्पति, इनकी चार पुत्रियाँ- सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति हुई।
वैवस्वत मनु की पत्नी का नाम श्रद्धा है।
मनु स्वायंभुव और शतरूपा की दो पुत्रियों में से एक श्रद्धा है।
बौद्ध साहित्य में श्रद्धा एक महिला श्रावक है।
हिंदी के सुप्रसिद्ध महाकाव्य कामायनी की प्रमुख पात्र श्रद्धा है। कामायनी का श्रद्धा सर्ग भी विश्रुत ही है।
बाईस इंद्रियों में से एक श्रद्धा है। इद या इन्द का अर्थ है नियंत्रण युक्त महान शक्ति।
श्रद्धा का अर्थ विश्वास बुद्धकाल से प्रारंभ हुआ।
ऋग्वेद में श्रद्धा सूक्त मिलता है, जिसमें पाँच ऋचाएँ हैं। कतिपय देखें-
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते । श्रद्धां हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥ ऋग्वेद १०/१५१/४
Gods, worshippers, and those who are protected by Vāyu, solicit Śraddhā, (they cherish) Śraddhāwith heartfelt desire, through Śraddhā a man acquires wealth.”
श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि । श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ॥ १०/१५१/५
śraddhām prātar havāmahe śraddhām madhyaṃdinam pari | śraddhāṃ sūryasya nimruci śraddhe śrad dhāpayeha naḥ ||
English translation:
“We invoke Śraddhā at dawn, and again at midday, and also at the setting of the sun; inspire us inthis world, Śraddhā, with faith.”
श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः । श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि ॥ १०/१५१/१
śraddhayāgniḥ sam idhyate śraddhayā hūyate haviḥ | śraddhām bhagasya mūrdhani vacasā vedayāmasi ||
English translation:
“Agni is kindled by Śraddhā, by Śraddhā is the oblation offered; with our praise we glorify Faith, of the family of Love; cf. Nirukta 9.31].”
श्रद्धा में अग्नि को प्रदीप्त किया जाना संभव होता है। अर्थात् आत्मज्ञान की अग्नि श्रद्धा द्वारा हविष्यान्न का हवन किया जाता है, अर्थात् आत्मा सत्ता को परमात्मा सत्त में विलय कर पाना श्रद्धा द्वारा ही संभव हो पाता है। श्रद्धा भग (ऐश्वर्यादिक) के सिर पर होती है अर्थात् सभी ऐश्वर्यों का परिणाम श्रद्धा का ही सत्परिणाम है। याज्ञिक और योगी सर्वप्रथम श्रद्धा की ही उपासना करते हैं। श्रद्धा अपनी चरम परिणति ईश्वर साक्षात्कार के रूप में प्रकट करती है। श्रद्धा की अग्नि का हवन जब विश्वास में होता है तो हम अपने उत्स तक जा पहुँचते हैं। यहीं सगर्भ या सबीज़ और निर्गर्भ या निर्बीज प्राणायाम का अन्तर ज्ञात होता है। गुरु न हुए, श्रद्धा न हुई, मंत्र न हुआ तो मछली की भाँति श्वास लेना हो जाएगा। षडंग एवं अष्टांग योग से पार सत्तर्क समाधि यह श्रद्धा ही है।
यजुर्वेद में है
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यत। 1⁄4यजुर्वेद 19/301⁄2
अर्थात् व्रत धारण करने से मनुष्य को श्रेष्ठ अधिकार व योग्यता की
प्राप्ति होती है इससे मनुष्यों का आदर सत्कार बढ़ जाता है।सम्मान प्राप्त होने से सत्य कर्मों के प्रति श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न होता है।
अतः सत्याचरण ही हमारे चरित्र की प्राण शक्ति है।
श्रद्धा की महानता के गुण गीता में भी गाये है -
‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति’।।
‘योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः’।।
श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णित है-
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्-6.23)
"सभी प्रकार के वैदिक ज्ञान की महत्ता उन्हीं मनुष्यों के हृदय में प्रकट होती है जिनकी भगवान और गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा होती है।"
यह श्रद्धा अपने भीतर ही उपस्थित है, ईश्वर, गुरु और आत्म तीनों में यह श्रद्धा तुरीयवत रहकर इन तीनों को एक रखती है।
दुनिया में सब कुछ विश्वास के सहारे ही कार्य संपन्न हो रहा है। रोगी का चिकित्सक के प्रति, विक्रेता का क्रेता के प्रति भरोसा ही उनकी प्रक्रिया को गति देता है। हम कितनी ही अपनी विधियाँ और संहिताएँ तैयार कर लें, बिना विश्वास आगे नहीं बढ़ सकते हैं। विश्वास अगर शब्द है तो श्रद्धा उसका अर्थ है। विश्वास और श्रद्धा का संबंध शब्द और अर्थ की भाँति है, जल और लहर की तरह है। श्रद्धा परिचालिका शक्ति है और विश्वास उसका आधार।
श्रद्धा यजमान है, पुरोहित भी और उपास्य ब्रह्म भी। विश्वास की शक्ति से श्रद्धा का अभ्युदय होता है। श्वास की विशिष्ट दशा से होकर जाने का मार्ग ही विश्वास है। श्रद्धा मूलतः सत्व से उत्पन्न होती है। श्रद्धा धर्म का मूल है।
Bhagavad Gita: Chapter 17, Verse 3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स: || 3||
हमारी श्रद्धा का गुण हमारे मन की प्रकृति द्वारा निर्धारित होता है। सभी लोगों में श्रद्धा होती है चाहे उनकी श्रद्धी की प्रकृति कैसी भी हो। यह वैसी होती है जो वे वास्तव में है।
सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं
यदीयते तत्र पुमानपावृत: ।
सत्त्वे च तस्मिन्भगवान्वासुदेवो
ह्यधोक्षजो मे नमसा विधीयते ॥ भागवतम् 4/3/२३ ॥
सत्त्वम् – चेतना; विशुद्धम् – शुद्ध; वासुदेव – वासुदेव; शब्दितम् – जाना जाता है; यत् - क्योंकि; इयते - प्रकट होता है; तत्र – वहाँ; पुमान – परम पुरुष; अपावृत्तः – बिना किसी आवरण के; सत्वे – चेतना में; च- और; तस्मिन – उसमें; भगवान - परम व्यक्तित्व का परम व्यक्तित्व; वासुदेवः – वासुदेव; हाय - क्योंकि; अधोक्षजः - दिव्य; मैं - मेरे द्वारा; नमसा – नमस्कार सहित; विधीयते - पूजा की जाती है ।
अनुवाद
मैं सदैव शुद्ध कृष्णभावनामृत में भगवान वासुदेव को नमस्कार करने में लगा रहता हूँ। कृष्ण चेतना हमेशा शुद्ध चेतना होती है, जिसमें भगवान के परम व्यक्तित्व, जिन्हें वासुदेव के नाम से जाना जाता है, बिना किसी आवरण के प्रकट होते हैं।
वासुदेव का अर्थ सर्वव्यापी या स्थानीयकृत भगवान का परम व्यक्तित्व है।
सब कुछ पाकर भी
हासिल-ए -जिंदगी कुछ भी नहीं
मैंने देखे हैं एक से एक
सिकंदर खाली हाथ जाते हुए..!!
२८/१२/२३
जम्हाई काल की अधिकता का स्वाभाविक समायोजन है। जैसे कैलेंडर सेट किया जाता है, कैलेंडर सेट करना तो कृत्रिम कार्य है, मानवकृत है, चंद्रमा की गति को तिथि की अधिकता या लघुता से नापा जाता है, क्योंकि बनी बनाई नाप में वह गति नहीं समाएगी। जम्हाई भी आती जाती श्वास का समायोजन ही है।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥
काल को समेटा नही जा सकता। वह जंभाई में आकर स्वयं समायोजित होने की अनुभूति कराता है। काल की षोडशी कला यही है। वह पंद्रह के गुणन में भी समाहित नहीं रहता, वह किसी संख्या में नहीं आ पाता। किसी वर्ष में अधिक मास पड़ने का लक्षण है, वह काल निश्चित संख्या में नहीं गिना जा सकता। फरवरी 29 दिन की हर चौथे वर्ष करके भी काल को बराबर भागों में नहीं बांटा जा सका। उसे भी कई वर्षों बाद कोई दिन आगे करके फिर जीवन संचालन के लिए कैलेंडर सेट करना पड़ता है। काल की ऐसी गति को देखते हुए हम महाकाल और महाकाली को मानते हैं, वही इसकी नियंता हैं, मनुष्य इन्हे पूरे रूप में नहीं जान पाता।
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास कहा गया है, इस मास में शुभ कार्य अधिक होने लगते हैं। जैसे जँभाई आने के बाद आराम मिलता है। वैसे ही अधिकमास में किए गए उपासना कार्य अधिक फलदायी होंगे ही। राशियाँ और नक्षत्रों की गति को शरीर की सूक्ष्म हलचल के माध्यम से बोधगम्य किया गया है। जो बाहर है, वह भीतर ही है। भीतर का ही बाहर सर्वत्र प्रकट होता है।
३०/१२/२३
अंग्रेज़ी नववर्ष प्रारंभ होने के समय कैलेंडर बदलने का उत्साह अवश्य रहता है। दिनांक तो हर दिन बदल रहा है, पर नये वर्ष का दिनांक पूरी तरह बदल जाता है। नया कैलेंडर टाँगना और पुराना हटाना प्रतीक है पुराने दुःस्वप्नों से बाहर आने का और नये संकल्प लेने का। पुराने से बाहर आने का अर्थ यह नहीं कि वह दूषित था, नये संकल्प के उत्साह का अर्थ भी यह नहीं कि जीवन में सब अच्छा होने वाला है। नए वर्ष में हम अच्छा और सुंदर होने की उम्मीद करने के सुख से अवश्य जुड़ जाते हैं। अच्छा का अर्थ है, अ इच्छा। इच्छा न होना इसका आशय नहीं। इच्छा न होने का अर्थ है उनका संपूर्ण हो जाना अथवा उनका होना और न होना ; बराबर हो जाना। जो कार्य हो रहे हैं, वे मात्र पारलौकिक इच्छारूप होने से चल रहे हैं, इसे जीना।
अच्छा हुए बिना नया कुछ नहीं घटित होता, वह मात्र उम्मीद बनकर रह जाता है। उम्मीद इस नाते संतोषजनक मानी जा सकती है कि उसके बाद कुछ अच्छा घटेगा। अच्छा घटना ही मुख्य है, वह चाहे नाउम्मीदी में ही क्यों न घटित हो जाए। जो अच्छा है, वह सुंदर है। सुंदर में भी सम् की यात्रा चल रही है।
३१/१२/२३
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भुतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय।पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति।तं होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति।स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा॥
उन्होंने जाना कि अन्न ही 'ब्रह्म ' है। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि अन्न से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं तथा उत्पन्न होकर ये अन्न के द्वारा ही जीवित रहते हैं तथा अन्न में ही ये पुनः लौटकर समाविष्ट हो जाते हैं। जब उन्होंने यह जान लिया तो वे पुनः अपने पिता वरुण के पास आये और बोले ''हे भगवन् मुझे 'ब्रह्म' की शिक्षा दीजिये।'' उनके पिता ने उनसे कहा, ''तप के द्वारा तुम 'ब्रह्म' को जानने का प्रयास करो, क्योंकि मनन में एकाग्रता ही 'ब्रह्म' है।'' भृगु अपने मनन में एकाग्र हो गये तथा अपने मनन की तपऊर्जा से...
अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। प्राणो वा अन्नम्।शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्।स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या॥
तुम अन्न की निन्दा नहीं करोगे; कारण, वह तुम्हारे श्रम का व्रत है। वस्तुतः प्राण भी अन्न है, तथा शरीर भोक्ता है। शरीर प्राण पर प्रतिष्ठित है तथा प्राण शरीर पर प्रतिष्ठित है। अतएव यहाँ अन्न पर अन्न प्रतिष्ठित है। जो इस अन्न पर प्रतिष्ठित अन्न को जानता है, वह स्वयं सुदृढ प्रतिष्ठा प्राप्त करता है, वह अन्न का स्वामी (अन्नवान्) एवं उसका भोक्ता बन जाता है। वह प्रजा (सन्तति) से, पशुधन से, ब्रह्मतेज से महान् बन जाता है, वह कीर्ति से महान् बन जाता है।
यो मा ददाति स इदेव मा३वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म्।सुवर्न ज्योतीः। य एवं वेद। इत्युपनिषत्॥
जो मुझे देता है, वस्तुतः वही मेरी रक्षा करता है क्योंकि मैं ही अन्न हूँ, अतः जो मेरा भक्षण करता है मैं उसी का भक्षण करता हूँ। मैंने इस सम्पूर्ण विश्व को विजित कर लिया है तथा इसे अपने अधीन कर लिया है, सूर्य के ज्योतिर्मय रूप के समान है मेरा प्रकाश।" जो यह जानता है वह इसी प्रकार गान करता है। वस्तुतः यही है उपनिषद् यही है वेद का रहस्य।
वह हम दोनों की एक साथ रक्षा करे, वह हम दोनों को एक साथ अपने अधीन कर ले, हम दोनों एक साथ शक्ति एवं वीर्य अर्जित करें। हमारा अध्ययन हम दोनों के लिए तेजस्वी हो, प्रकाश एवं शक्ति से परिपूर्ण हो। हम कदापि विद्वेष न करें।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।। गीता 3.14।।
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka
।।3.14।।इसलिये भी अधिकारीको कर्म करना चाहिये क्योंकि कर्म जगत्चक्रकी प्रवृत्तिका कारण है। कैसे सो कहते हैं भक्षण किया हुआ अन्न रक्त और वीर्यके रूपमें परिणत होनेपर उससे प्रत्यक्षही प्राणी उत्पन्न होते है। पर्जन्यसे अर्थात् वृष्टिसे अन्नकी उत्पत्ति होती है और यज्ञसे वृष्टि होती है। अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यमें स्थित होती है सूर्यसे वृष्टि होती है वृष्टिसे अन्न होता है और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात पायी जाती है। ऋत्विक् और यजमानके व्यापारका नाम कर्म है और उस कर्मसे जिसकी उत्पत्ति होती है वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसमुद्भव है अर्थात् वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसे उत्पन्न होता है।
स्वामी तेजोमयानंद द्वारा किया हुआ अर्थ-
समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।।
बिना अग्नि उत्पन्न हुए ज्ञान प्राप्ति संभव नहीं। जब तक रगड़ नहीं होगी, चिंगारी उठेगी नहीं। इसलिए तपस् ब्राह्मण के लिए अनिवार्य विधान है। ब्राह्मण को अग्निमुख कहा गया, क्योंकि वह अग्नि को उत्पन्न करता है। वह पुरोहित है क्योंकि अपने शरीर रूपी यजमान का वह अग्न्याधान करके हित करते है। यज्ञ क्रिया में देखा जाता है कि अग्न्याधान होने पर पुरोहित नाच उठते है, वे मानो पुत्रोत्सव मनाते हुए गाने लगते है। ज्ञान अग्नि आधान करना ही पुत्र जन्म है। इसके बिना जीवन की गति नहीं। वरना यह ऋण जातक पर बना ही रहेगा। यजमान वह है जो यज्ञ करे। यज्ञ बड़ा व्याप्तिपूर्ण शब्द है। यजन करने को यज्ञ कहते हैं, यज्ञ का उच्चार यज़्न किया जाता है, इस उच्चार में उसका अर्थ अधिक स्पष्ट रूप में उद्भासित होता है। इज्यते भी यज्ञ का ही शब्द विस्तार है। इज्यते का अर्थ है संपन्न करना। यज़्न कर्मों के समुद्भव का नाम है। सम्यक् कर्म से यज्ञ का उद्भव होता है। कर्म जब अकर्म हो जाए तब वह सम्यक् कर्म बनता है। अकर्म तब बनता है, जब व्यक्ति योग को उपलब्ध हो जाए, योग्य हो जाये। फिर व्यक्ति जो करेगा वह योगदान ही होगा। वह योग फिर दान हो जाएगा। असल दान योग्य होने के बाद, अकर्म दशा प्राप्त करने पर या यज्ञ कर्म समुद्भव होने के बाद किया जाता है। इस प्रकार किए हुए यज्ञ से पर्जन्य बनते हैं, जिनका पर्यायवाची बादल किया गया है, परंतु यह प्रजा का ध्वनिवाची भी है। यजन करने से समुत्पन्न पर्जन्य या प्रजा ही वृष्टि करती हैं। वृष्टि है प्रजा के सामूहिक मन का उद्गार। सामूहिक मन का सूचक ही भौतिक रूप में चंद्र है, जिसका स्रोत सूर्य है। उसके द्वारा की गई वृष्टि से उत्पन्न हुए अन्न से सभी प्राणी जन्म लेते हैं। अन्न है, जिसका प्रवाह कभी रुद्ध न हो। 'न' सतत प्रवाहित होने का नाम है।अ भाव एवं अभाव दोनों का बोधक है। अन्न बनने का क्रम बहुत गूढ़ है। अन्न से हम जन्म लेते है, उसी से पोषित होते हैं और उसी में अन्न ही बन जाते हैं। इसलिए अन्न को ब्रह्म जाना गया है।
तैत्तिरीय गाता है-
यो मा ददाति स इदेव मा३वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म्।सुवर्न ज्योतीः। य एवं वेद। इत्युपनिषत्॥
जो मुझे देता है, वस्तुतः वही मेरी रक्षा करता है क्योंकि मैं ही अन्न हूँ, अतः जो मेरा भक्षण करता है मैं उसी का भक्षण करता हूँ। मैंने इस सम्पूर्ण विश्व को विजित कर लिया है तथा इसे अपने अधीन कर लिया है, सूर्य के ज्योतिर्मय रूप के समान है मेरा प्रकाश।" जो यह जानता है वह इसी प्रकार गान करता है। वस्तुतः यही है उपनिषद्, यही है वेद का रहस्य।
वहाँ भाषा काम नहीं करती। भाषा में कहना ही पड़े तो वह उल्टी पुल्टी हो जाती है। फिर भी उनके कोई सूत्र मिल ही जाते हैं। तत्त्वमीमांसा सब भौतिक ज्ञानों का उत्स है, यह वैसे ही न है कि चीनी पानी में घुल गई, अब बताने वाला कौन रहा। हाँ चीनी को पानी में जाते हुए और उसकी मिठास का पहले के पानी से अंतर समझने देखने वाला कोई जो होगा, वही हम सबका सहायक होगा। डी एस मणि त्रिपाठी की पोस्ट पर
शिक्षा जीवन की एक सतत् प्रक्रिया है, मार्ग है, वह गंतव्य नहीं है। उम्मीद करें, बेहतर करें, करते जाएँ, और कोई उपाय नहीं है!
जीवन को सुंदर बनाने में जो मॉडल उपयुक्त हो, शिक्षा पद्धति में उसका आश्रय लेना श्रेयकर है। अभी उस पूरे मॉडल की खोज शेष है।
सबसे पहले शिक्षा के उद्देश्य पर ही हम सब एकमत हो जायें।
मनुष्यता के लक्ष्य को पाने के लिए हमें वास्तविक अर्थों में अंदर से भारतीय और बाहर से दुनिया के हो जाना आवश्यक है। जो लोग शिक्षा को केवल यूरोपीय दृष्टि का साधक समझते हैं, वे दुविधा में रहते हैं। यद्यपि यूरोपवासी भी भारतीय मन के हैं, इसमें पूर्वग्रह नहीं रखा जा सकता। पर यह अवश्य है और जैसी आपकी चिंता है कि भारतवासी पूरे रूप में भारत के नहीं रह गए हैं....जयशंकर तिवारी की पोस्ट पर
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